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पतरस किस प्रकार शिष्य बने

HOW PETER BECAME A DISCIPLE
(Hindi)

संदेश रचयिता डॉ क्रिस्टोफर एल कैगन
डॉ आर. एल.हायमर्स जूनि. द्वारा लॉस
ऐंजीलिस बैपटिस्ट टैबरनेकल में रविवार संध्या
काल में सितंबर १‚ २०१९ को किया गया प्रचार
Text by Dr. Christopher L. Cagan;
preached by Dr. R. L. Hymers, Jr.
at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, September 1, 2019

‘‘उन दोनों में से जो यूहन्ना की बात सुनकर यीशु के पीछे हो लिए थे‚ एक तो शमौन पतरस का भाई अन्द्रियास था। उस ने पहिले अपने सगे भाई शमौन से मिलकर उस से कहा‚ कि हम को ख्रिस्तुस अर्थात मसीह मिल गया। वह उसे यीशु के पास लाया: यीशु ने उस पर दृष्टि करके कहा‚ कि तू यूहन्ना का पुत्र शमौन है‚ तू केफा‚ अर्थात पतरस कहलाएगा" (यूहन्ना १:४०; पेज १११६ स्काफील्ड)


यह पहिला मौका था जब पतरस और यीशु की मुलाकात हुई। पतरस का मूल नाम शिमौन था। यीशु ने उन्हें ‘‘पतरस" नाम दिया था जिसका अर्थ होता है ‘‘चट्टान"। अंद्रियास पतरस के भाई थे। पतरस एक मछुआरे थे। अंद्रियास और पतरस एक गांव में रहते थे जो गलील की झील से अधिक दूरी पर नहीं था। गलील की झील में वे मछली पकड़ा करते थे। जीवन संघर्षमय था चूंकि मछली पकड़ना शारीरिक दृष्टि से दक्षतापूर्ण व अति मेहनत का कार्य था। पतरस विवाहित थे क्योंकि यीशु ने उनकी सास को बीमारी की अवस्था में ठीक किया था। जब वे यीशु से मिले उनकी उम्र लगभग ३० वर्ष थी। सभी शिष्यों में वे सबसे बड़े थे।

गलील के मछुआरे सख्त आदमी थे। शारीरिक तौर पर मछली पकड़ने का कार्य मेहनत का होता है। उन्हें डर का सामना करना पड़ता था क्योंकि गलील की झील में अचानक से भयंकर तूफान आते रहते थे। ये तूफान उनकी नावों को पलट दिया करते और आदमियों को डूबो दिया करते थे।

पतरस फरीसी नहीं थे। चूंकि वह यहूदी थे, कभी कभी सिनेगॉग जाया करते थे। वह कठोर पुरातनपंथी भी नहीं थे‚ फरीसियों के समान। परंतु दूसरे मछुआरों से अलग वह अपने हृदय में विचार किया करते थे कि वह एक पापी इंसान है। बाद में एक बार उन्होंने यीशु से कहा भी था‚ ‘‘हे प्रभु‚ मेरे पास से जा‚ क्योंकि मैं पापी मनुष्य हूं" (लूका ५:८; पेज १०७८)

इस तरह हम देखते हैं कि पतरस की शुरूआत एक धार्मिक व्यक्ति या भले मसीही बंधु के समान नहीं हुई। वह एक अशिष्ट प्रकार के व्यक्ति थे। एक मछुआरे होने के लिए उनका ऐसा होना लाजिमी था। पूर्ण रूप से वह किसी ‘‘चर्च में पले बढ़े" व्यक्ति नहीं थे। वह खराब भाषा का प्रयोग करते थे और जल्द क्रोध करने वाले व्यक्ति थे। वह एक पापी इंसान थे। जिसने कई कई गलतियां की थीं।

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अब उस इंसान के बारे में सोचिए जिसे आप मसीह के लिए जीतने का सोच रहे हैं। पतरस के समान वह भी ‘‘चर्च में नहीं पला बढ़ा" एवं पूर्ण रूप से चर्च के ज्ञान से सुसज्जित और दीक्षित नहीं है। वह नहीं समझता कि क्यों उसे चर्च की सभाओं में आना चाहिए। वह सोचता है कि घंटे विडियों गेम्स खेलना और भटके हुए मित्रों के साथ घूमने में कोई बुराई नहीं है। हर कोई तो उसी के समान है। उसके अपने पाप हैं। उसके अपने गलत विचार हैं। उसकी अपनी समस्याएं हैं। उससे बहस करके आप उसे मसीह के लिए नहीं जीत सकते हैं। इसके बजाय उसे यीशु के विषय में बताइए। उसे बताइए‚ यीशु ने आपके लिए क्या किया। उसके मित्र बनिए। अपने साथ उसे चर्च में लाने के लिए सहृदयता की जरूरत होगी। पतरस कुछ नहीं जानते थे‚ अनजान थे और ऐसे ही संसार का हर भटका हुआ व्यक्ति अनजान होगा।

उनके भाई अंद्रियास ने पतरस को यीशु के बारे में बताया‚ ‘‘उस ने पहिले अपने सगे भाई शमौन (पतरस) से मिलकर उस से कहा कि हम को ख्रिस्तुस अर्थात (मसीह) मिल गए" (यूहन्ना १:४१; पेज १११६) । पतरस पहिली बार यीशु के बारे में सुनकर उनके शिष्य नहीं बन गए थे।

यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है। ‘‘निर्णयवाद" पर लिखे एक निबंध पर ए. डब्ल्यू टोजर ने इसे स्पष्ट किया है कि लोगों को ‘‘पापी जन द्वारा बोले जाने वाली प्रार्थना’‘ बुलवाने से कोई सच्चे मसीही बंधु या सच्चे मसीही शिष्य पैदा नहीं होते हैं। पतरस ने यीशु के बारे में पहिली बार सुनकर कोई ‘‘निर्णय" नहीं ले लिया था। हां‚ पतरस रूचि रखते थे। वह उनके बारे में और सुनना चाहते थे। परंतु यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के मरने के बाद के समय में पतरस ने यीशु के शिष्य बनकर उनके पीछे चलने का निर्णय लिया।

‘‘यूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा‚ समय पूरा हुआ है‚ और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो । गलील की झील के किनारे किनारे जाते हुए‚ उनने शमौन और उसके भाई अन्द्रियास को झील में जाल डालते देखा; क्योंकि वे मछुवे थे। और यीशु ने उन से कहा; मेरे पीछे चले आओ; मैं तुम को मनुष्यों के मछुवे बनाऊंगा। वे तुरन्त जालों को छोड़कर उनके पीछे हो लिए" (मरकुस १:१४—१८; पेज १०४६)

हर वह जन जिसे आप मसीह के पास लेकर आने का यत्न कर रहे हैं — किसी बिंदु पर आकर निर्णय लेगा कि उसे मसीह का शिष्य बनना है अथवा नहीं। यही संघर्ष है। यही युद्ध है। अगर वह आपके साथ कुछ सप्ताह या महिने चर्च आ जाता है तो भी यह युद्ध खत्म नहीं हो जाता है। यह तो सतत लड़ाई है जो महिनों या वर्षो तक जारी रहती है।

नहीं पता कि इस लड़ाई में क्रेटन चान जैसा व्यक्ति भी सुसमाचार प्रचार में अप्रभावी हो जाता है। वह भी कई निर्णयवादियों के समान सोचता है कि लोग सुसमाचार की कुछ ‘‘अधूरी" बातें जान लेने भर से चर्च ‘‘आने" लगे हैं। चान एवं वॉलड्रिप जैसे निर्णयवादी नये लोगों को जल्दी अधिक दूर ‘‘ले जाना’‘ चाहते हैं। वे नहीं समझ पाते कि सच्चे तौर पर आत्मा को जीतना निरंतर चलने वाली लड़ाई है। इसलिए सच्चे रूप में किसी आत्मा को जीतने में बुद्धि लगती है: ‘‘जो आत्मा को जीतता‚ वह बुद्धिमान है।" (नीतिवचन ११:३०; पेज ६८०) इस पद को ऐसे भी अनुवादित किया जा सकता है। ‘‘जो बुद्धिमान है‚ आत्मा को जीतता है।" डॉ ए॰ डब्ल्यू टोजर ने बुद्धिमानी से कहा था,

‘‘तात्कालिक क्रिश्चियनिटी के समर्थक उद्धार के अनुभव को दवाब देकर एक ही बार में महसूस करवाके उस पर इठलाते हैं, जबकि उद्धार के परिपक्व होने की प्रक्रिया जीवनपर्यंत चलती रहती है । वे दुख सहन करके, क्रूस उठाकर, व्यवहारिक आज्ञापालन करके आत्मा के पवित्रीकरण के प्रभाव की उपेक्षा करते हैं। वे आत्मिक प्रशिक्षण की जरूरत पर, सही धार्मिक आदतों के निर्माण पर और इस जगत, शैतान व देह के विरूद्ध चलने वाले संघर्ष की आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देते हैं" (दि इनऐडिक्वेसी ऑफ ‘इंस्टेंट क्रिश्चियनिटी’)

एक बड़े ‘‘चर्च विभाजन" के दौरान पतरस भी परखे गए। दूसरे लोग छोड़कर जा रहे थे। पतरस ने नहीं छोड़कर जाने का निर्णय लिया। उनने अन्य लोगों के साथ नहीं जाने का निर्णय लिया।

‘‘इस पर उसके चेलों में से बहुतेरे उल्टे फिर गए और उसके बाद उसके साथ न चले। शमौन पतरस ने यीशु को उत्तर दिया, कि हे प्रभु हम किस के पास जाएं? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं। और हम ने विश्वास किया और जान गए हैं, कि परमेश्वर का पवित्र जन तू ही है।यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, क्या मैं ने तुम बारहों को नहीं चुन लिया? तौभी तुम में से एक व्यक्ति शैतान है यह उनने शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदाह के विषय में कहा, क्योंकि यही जो उन बारहों में से था, जो यीशु को पकड़वाने को था" (यूहन्ना ६:६६—६९; पेज ११२४)

यीशु ने बारहों शिष्यों से पूछा, ‘‘क्या तुम भी चले जाना चाहते हो? शमौन पतरस ने उस को उत्तर दिया, कि हे प्रभु हम किस के पास जाएं? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं" (यूहन्ना ६:६७‚६८) । इस गद्यांश में दो बातें प्रमुख हैं।

१॰ जो चले गए उनका क्या हुआ फिर कभी उनके विषय में दुबारा सुनने में नहीं आया! मैंने अपने ६१ सालों की सेवकाई में यही पाया है कि जो चर्च विभाजन में छोड़कर चले गए‚ वे कभी भी मजबूत शिष्य नहीं बन पाए। मैंने तो कभी भी ऐसा मजबूत शिष्य नहीं देखा!

२॰ अगर पतरस उस ‘‘विभाजन" में छोड़कर चले जाते तो उनका भी हृदय परिवर्तन कभी नहीं हो पाता।

‘‘वे निकले तो हम ही में से‚ पर हम में के थे नहीं; क्योंकि यदि हम में के होते‚ तो हमारे साथ रहते‚ पर निकल इसलिये गए कि यह प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं" (१ यूहन्ना २:१९; पेज १३२२)

‘‘वे तुम से कहा करते थे कि अंत के समय में ऐसे ठट्ठा करने वाले होंगे‚ जो अपनी अभक्ति की अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे" (यहूदा १८, १९; पेज १३२९)

जो छोड़कर जाते हैं वे प्रगट कर जाते हैं कि उन्होंने मसीही शिष्यता की सच्चाई को नहीं देखा। एक शिष्य बनना‚ यीशु के सच्चे अनुयायी बनना‚ कुछेक बाइबल के पद स्मरण करने से या कुछ सिद्धांतों को मानने से कहीं बढ़कर है। शिष्यता में ठहरे रहने का निर्णय जुड़ा होता है‚ छोड़कर जाने का कोई अर्थ नहीं‚ क्योंकि ‘‘बाहर कुछ" लाभप्रद नहीं मिलेगा। पतरस ने इसे देखा — यद्यपि अभी भी उनका हदय परिवर्तन नहीं हुआ था!

मेरा मानना है कि आप समझ सकते हैं कि आत्मा को जीतना कितना बड़ा प्रोजेक्ट है! ये केवल किसी का नाम लेकर आना या किसी से प्रार्थना करवाना नहीं है। एक जीवित व्यक्ति के साथ यह एक जीवित संघर्ष है!

अगर हमें यह बोध हो जाए कि मसीह कौन है‚ तो हृदय परिवर्तन और शिष्यता इससे भी बढ़कर है!

‘‘परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? शमौन पतरस ने उत्तर दिया‚ कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उस को उत्तर दिया‚ कि हे शमौन योना के पुत्र‚ तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं‚ परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है‚ यह बात तुझ पर प्रगट की है" (मत्ती १६:१५—१७; पेज १०२१)

परमेश्वर पिता ने दिखाया (प्रकाशन) दिया कि यीशु पतरस के लिए क्या थे। परमेश्वर ने पतरस को दिखाया‚ यीशु वास्तव में कौन थे। परंतु पतरस का हृदय परिवर्तन तब भी नहीं हुआ!!! कई लोगों का विचार है कि इस समय तो पतरस का मन परिवर्तन हो चुका होगा। पंरतु लोग गलत सोचते हैं!

यूहन्ना ने जब पतरस पर प्रकट किया कि यीशु वास्तव में कौन थे — इसके ठीक बाद पतरस ने गॉस्पल का इंकार करना शुरू कर दिया!!!

‘‘उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगे कि मुझे अवश्य है कि यरूशलेम को जाऊं और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं और मार डाला जाऊं और तीसरे दिन जी उठूं। इस पर पतरस उन्हें अलग ले जाकर झिड़कने लगे कि हे प्रभु‚ परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा। उनने फिरकर पतरस से कहा‚ हे शैतान‚ मेरे साम्हने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातों पर नहीं‚ पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है" (मत्ती १६:२१—२३; पेज १०२२)

पतरस ने सुसमाचार का इंकार किया। उनने यीशु को भी यह कहने पर झिड़का कि उन्हें क्रूस पर एक दिन चढ़ना है और वे तीसरे दिन जीवित होंगे। यहां इस घटना में पतरस सुसमाचार को मानने से इंकार करते हैं! तो इस तरह एक व्यक्ति बरसों तक यीशु का अनुयायी हो सकता है तौभी अपने विश्वास को लेकर संघर्षरत रह सकता है। यह तय बात है!

पतरस शेखी बघारते थे कि वह कितने मजबूत मसीही जन हैं। यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के पहिले की रात को वे यीशु से बोले‚ ‘‘यदि मुझे तेरे साथ मरना भी हो‚ तौभी‚ मैं तुझ से कभी न मुकरूंगा" (मत्ती २६:३५; पेज १०३८) और कुछ घंटे बाद वे यीशु को तीन बार पहिचानने से इंकार कर देते हैं!

अभी तक पतरस यीशु के परिपक्व अनुयायी नहीं बन पाए थे! जब यीशु को गैतसेमनी में बंदी बनाया गया‚ पतरस यीशु से दूर भाग खड़े हुए। तीन बार जोर के स्वर में उन्होंने यीशु को पहिचानने से इंकार किया। पतरस भी अन्यों के साथ शिष्य बन कर रहे थे — किंतु अभी तक उनका संघर्ष पूरा नहीं हुआ था। वह अभी तक विश्वास के लिए जीते नहीं गये थे। अभी तक यीशु की जीवित कलीसिया में उनका ‘‘प्रवेश" नहीं हुआ था!

यीशु के मरके जीवित होने पर पतरस का अंततः हृदय परिवर्तन हो गया। यूहन्ना २०:२२ में यह दर्ज है,

‘‘(यीशु ने) फिर उन से यह कहकर उन पर (पतरस और अन्य शिष्यों पर) फूंका और उन से कहा, पवित्र आत्मा लो" (यूहन्ना २०:१९—२२; पेज ११४४)

व्याख्याकार जॉन एलिकॉटस ने हमें बताया कि कैसे प्रेरित यूहन्ना को ‘‘स्मरण है कि उस एक क्षण का प्रभाव उनके आगे के जीवनों को प्रभावित करेगा तथा वे नयी आत्मिक सृष्टि बन चुके होंगे जिसके तहत उन्होंने अब मृत्यु से नए जीवन में प्रवेश किया" (एलिकॉटस कमेंटरी ऑन दि व्होल बाइबल)। निसंदेह, डॉ जे वर्नान मैगी ने कहा कि यीशु के जीवित होने की घड़ी, पतरस का पुर्नजन्म हुआ, उन्होंने नया जीवन पाया! (यूहन्ना २०: २२ के उपर थू् दि बाइबल से पढ़िए)

यह वह समय था जब पतरस ने पूर्ण रीति से यीशु पर विश्वास किया। जल्द ही वे एक निडर प्रेरित बन गए और पेंतुकुस्त के दिन प्रचार किया और तीन हजार लोगों के हृदय छिद गए तथा वे भी यीशु पर विश्वास लाने में संभागी हुए। आगे चलकर वह मसीह के नाम का इंकार करने के बजाय मरना पसंद करते हैं। किंतु इस दशा तक पहुंचने के पूर्व, वह गलत रूप से चलते रहे, विफल हुए, उनके अपने संघर्ष थे, फिर उन्हें गहन दृष्टि प्राप्त हुई।

क्या आप देख सकते हैं कि किसी की आत्मा को जीतना गंभीर बात है, एक बड़ा संघर्ष है? यह फोन कॉल या दोहराने भर वाली प्रार्थना से नहीं किया जा सकता। किसी पुरूष या स्त्री की जीवन आत्मा को जीतना एक पूरे जीवन भर का संघर्ष है। इसके लिए आपकी प्रार्थनाएं लगेगीं। इसमें बुद्धिमानी की जरूरत होगी। इसमें प्रयास लगेगा। इसमें समय लगेगा। अगर जीवन भर में आप एक आत्मा भी जीत पाए तो आप धन्य हैं। आप ने बहुत कर लिया। आपने बहुत अच्छा किया। मेरी प्रार्थना है आप ऐसा करने के लिए समर्थ होंगे।

क्या यह राह तय करने के हिसाब से बहुत लंबी जान पड़ती है? क्या यह बहुत लंबी व कठिन जान पड़ती है? यीशु बोले थे, ‘‘क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं" (मत्ती: ७:१४; पेज १००४)

आइए इस संदेश का अंत स्वयं पतरस के शब्दों से ही करें। पतरस के क्रूस पर लटकाए जाने के पहिले, ये ही वे अंतिम शब्द थे, जो उन्होंने लिखे थे,

‘‘पर हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ। उन्हीं की महिमा अब भी हो, और युगानुयुग होती रहे" (२ पतरस ३:१८; पेज १३२०)


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(संदेश का अंत)
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