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मसीह का शिष्य बनाने का तरीका

CHRIST’S METHOD OF MAKING DISCIPLES
(Hindi)

डॉ आर एल हायमर्स जूनि.
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या लॉस ऐंजीलिस के बैपटिस्ट टैबरनेकल में
१५ जुलाई‚ २०१८ को प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, July 15, 2018


मत्ती की पुस्तक अध्याय १०:१ को खोल लीजिये। स्कोफील्ड स्टडी बाइबल में यह पेज संख्या १००८ पर मिलता है। अब पद १ के पहिले आधे हिस्से को देखिये।

‘‘फिर उन्होंने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर.......... "

यूनानी शब्द ‘‘मैथीटस का अनुवाद अंग्रेजी में ‘‘डिसाइपल" किया गया है। नये नियम की पुस्तक में इस शब्द के मायने ऐसा व्यक्ति जो अपने शिक्षक से सीखता है और उनका अनुसरण करता है। ये शब्द उन बारहों मनुष्यों की ओर संकेत देता है जिन्होंने यीशु का अनुसरण किया था।

मेरा उददेश्य आप को यह दर्शाना है कि किस प्रकार मसीह ने उन बारह मनुष्यों को बुलाया। और उनके नया जन्म पाने के पूर्व उन्हें किस प्रकार प्रशिक्षित किया। वर्तमान में हमारे बहुत सारे चर्चेस में यह पद्धति नहीं अपनाई जाती है। भिन्न भिन्न जबानों में बोलने वाले पेंटीकॉस्टल हो या बुनियादी बाइबल शिक्षक — ये सभी शिष्य बनाने के लिये अलग अलग पद्धति अपनाते हैं। वे प्राय: नये व्यक्तियों को घेर लेते हैं। फिर उनसे कुछ इस प्रकार पूछा जाता है कि‚ ‘‘क्या तुम स्वर्ग जाना चाहते हो?" वे तब तक उन नये व्यक्तियों पर दवाब बनाते रहते हैं कि जब तक उनमें से अधिकतर यह न कह दें कि‚ ‘‘हां‚ मैं जाना चाहता हूं।" फिर आत्मा जीतने वाले ये लोग उस व्यक्ति से कहते हैं कि‚ ‘‘मेरे पीछे यह प्रार्थना दोहराइये।" जैसे जैसे ‘‘आत्मा — जीतने" वाला वह व्यक्ति बोलता जाता है‚ वैसे वैसे भौचक्का सा‚ नया प्राणी‚ वही शब्द दोहराता जाता है। फिर जिस प्रकार जोएल आस्टिन अपने संदेश की समाप्ति पर कुछ इस प्रकार कहता है —वैसे ही ये ‘‘आत्मा — जीतने" वाले लोग भी कुछ ऐसा ही कहते हैं‚ ‘‘हम मान लेते है कि अगर आप ने यह प्रार्थना की है‚ तो आप ने नया जन्म पा लिया है।" कुछ और अच्छे चर्चेस में‚ वे उस नये व्यक्ति का नाम और फोन नंबर लिख लेते हैं जिसके साथ उन्होंने प्रार्थना की थी, फिर कुछ दिनों बाद वे उस व्यक्ति के पास किसी को उसके ‘‘मार्गदर्शन" के लिए भेजते हैं। मेरे अनुभव से ऐसी पद्धति से तो मुश्किल से ही कोई सच्चा अनुयायी बन पाता है! जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने प्रार्थना की थी, प्राय: उसका हदय परिवर्तन नहीं हो पाता है। एक दिन ऐसा आता है कि वे या तो उस ‘‘आत्मा — जीतने वाले" से छिपने लगते हैं या फिर उस पर चीख पड़ते है कि ‘‘तुम यहां से दफा हो जाओ!" जब आप उनको ‘‘समझाईश" के लिये जाना चाहते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया नकारात्मक आती है!

इस पद्धति में क्या गलत है? अक्सर यह असरकारक नहीं होती है! सच कहा जाये तो यह बिल्कुल कारगर नहीं है। मैं साठ वर्षो से बैपटिस्ट प्रचारक रहा हूं और यह मेरा अनुभव है। यह क्यों कारगर नहीं है? क्यों यह पद्धति शिष्य पैदा नहीं करती? क्योंकि हममें से अधिकतर ने इस पर कभी ध्यान नहीं दिया कि यीशु किस तरह शिष्य बनाते थे! बस यही कारण है!

आप सोच सकते हैं कि मैं ‘‘प्रभुता वाले उद्धार" की शिक्षा दे रहा हूं, परन्तु मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं। मैं वह नहीं सिखा रहा हूं जो जॉन मैकआर्थर और पॉल वॉशर सिखाते हैं। मैं क्यों ‘‘प्रभुता वाले उद्धार" का इंकार करता हूं इसका कारण जानने के लिये कृपया हमारी पुस्तक प्रीचिंग टू ए डाईंग नेशन पढ़िये कि मैंने उसकी पेज संख्या ११७—११९ में क्या कहा है। यह संपूर्ण पुस्तक हमारी वेबसाईट www.sermonsfortheworld.com पर आप बिना दाम के पढ़ सकते हैं। उद्धार केवल यीशु पर विश्वास रखने से और उनके लहू से शुद्ध किये जाने पर होता है।

अच्छा, जरा मुझे बाइबल में चारों सुसमाचारों की पुस्तकों में कोई एक स्थल पर तो बता दीजिए जहां यीशु ने ‘‘पापियों द्वारा की जाने वाली प्रार्थना" दोहरवायी हो और उसके बाद उन व्यक्तियों को समझाईश दी हो। आप एक भी ऐसा स्थल नहीं बता सकते जहां यीशु ने ऐसा किया हो! सदैव यीशु पहिले लोगों को ‘‘समझाईश" दिया करते थे। वे सीधे उन्हें यह बता देते थे कि कौनसा कार्य उन्हें पहिले करना चाहिये!

इस पद्धति से यीशु लोगों को मन फिराने के लिये समझाते थे। वे जानते थे कि इन व्यक्तियों को पहिले शिष्यता के कड़े सत्यों को जानना आवश्यक है — इसके पहिले कि लोग उन पर विश्वास करें और उद्धार पायें!

‘‘किंतु" कोई कह सकता है कि‚ ‘‘ऐसे कड़े सत्य उन्हें डरा कर भगा देंगे।" हां यह सच है! ऐसे कड़े सत्य उनमें से अधिकतर को डरा कर शिष्यता से दूर कर देंगे! मसीह के अनेक शिष्य उन्हें छोड़ कर चले गये थे। उन्होंने उनसे ठहरे रहने की विनती भी नहीं की। उन्होंने बारहों से भी कहा‚ ‘‘क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?" (यूहन्ना ६:६७) किंतु वे सब नहीं गये! जो ठहरे रहे और सीखा, तो वे मसीह के इतने पक्के शिष्य हो गये, और क्रूस के सैनिक बन गये!

डॉ आयजक वाटस ने प्राचीन मसीहियों से १८ वीं शताब्दी में इस प्रकार कहा था। उनका गीत रूप में कथन था‚

क्या मैं जो चेला मेम्ने का और क्रूस का योद्धा हूं‚
शर्माउं नाम के मानने से और सेवा न करूं?

मुझे निश्चय लड़ना है‚ अगर मुकुट पाना है‚ मेरी हिम्मत बढ़ा‚ प्रभु।
परिश्रम‚ संकट‚ धैर्य तेरे वचनों से पाया है
(‘‘एम आय ए सोल्जर ऑफ दि क्रास?" डॉ आयजक वाटस‚ १६७४—१७४८)

हम नये लोगों से यह अपेक्षा नहीं कर सकते हैं कि वे मसीह के लिये उस आत्मिक संघर्ष में कूदें। मगर वे इस अभ्यास को करते रहेंगे‚ तो यह आसान होता जाएगा। अपनी बात कहूं तो मैं इस तरह मसीही नहीं बना। मुझे तो पहले यह सीखना था कि क्रूस उठाने वाला मसीही जन ही सच्चा मसीही होता है। मुझे कड़ी शिष्यता से होकर गुजरना पड़ा था‚ इसके पहिले कि मैंने यीशु पर विश्वास किया और मैं क्रूस का सैनिक बन गया। ऐसा ही आपके साथ भी होना आवश्यक है!

जो मैंने अभी कहा‚ बहुत से चर्चेस में इसे अपनाया नहीं जाता है! इसके बावजूद भी नहीं कि ये सत्य बात है। ‘‘निश्चित मुझे लड़ना है‚ अगर मुझे राज्य करना है‚ मेरा साहस बढ़ा‚ प्रभु।" यह पंक्तियां बहुत बड़े मसीही भक्ति गीतकार ने १८ वीं शताब्दी में लिखी थी। और इन्हीं पंक्तियों को हजारों लोग बर्फ में टखने तक धंसे, खड़े होकर गाते थे, जब जार्ज व्हाईटफील्ड या जॉन वेस्ली प्रचार किया करते थे! परन्तु अब आराधनाओं में ये गीत सुनने को नहीं मिलते हैं! इसलिये गीत की पुस्तक में बहुत ही कम‚ मसीही संघर्ष के आह्वान के गीत पाये जाते हैं। जब आयजक वाटस ने १८ वीं शताब्दी में ‘‘क्या मैं जो क्रूस का योद्धा हूं" की रचना की, तब से लेकर आज तक मसीही संघर्ष के आह्वान और गंभीर शिष्यता के विषयों पर बने गीत लगभग कम प्रसिद्ध होते चले गये।

यह गीत आप ही हम तक सुसमाचार संदेश लेकर आता है। यीशु ने अपने शिष्यों को सुसमाचार संदेश कब सुनाना आरंभ किया? १ कुरूंथियों १५:३ सुसमाचार के मूल तथ्यों को प्रस्तुत करता है:

‘‘इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी‚ जो मुझे पहुंची थी‚ कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गये‚ ओर गाड़े गये और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठे" (१ कुरूंथियों १५:३)

यीशु के शिष्यों ने जब उनका अनुसरण करना शुरू कर दिया‚ उसके एक वर्ष पश्चात उन्होंने उन्हें सुसमाचार संदेश देना आरंभ कर दिया। मत्ती १६:२१‚२२ में इसका उल्लेख है‚

‘‘उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगे कि मुझे अवश्य है कि यरूशलेम को जाऊं और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं और तीसरे दिन जी उठूं। इस पर पतरस उसे अलग ले जाकर झिड़कने लगा कि हे प्रभु परमेश्वर न करे‚ तुझ पर ऐसा कभी न होगा" (मत्ती १६:२१‚२२)

पतरस यीशु का अनुसरण पिछले एक साल से कर रहे थे। तौभी पतरस ने यीशु को झिड़का यह बात कहने के लिये कि वह‚ ‘‘मारे जायेंगे और तीसरे दिन जीवित हो उठेंगे" (मत्ती १६:२१) उसी वर्ष फिर से यीशु ने अपने शिष्यों को सुमसाचार संदेश दिया। तो यह समझ में आता है कि पतरस यीशु के शिष्य बन जाने के एक साल बाद भी सुसमाचार का अर्थ नहीं समझे थे।

उसी वर्ष फिर से यीशु ने अपने शिष्यों को सुसमसाचार संदेश दिया‚

‘‘जब वे गलील में थे तो यीशु ने उन से कहा; मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा। और वे उसे मार डालेंगे‚ और वह तीसरे दिन जी उठेगा। इस पर वे बहुत उदास हुए" (मत्ती १७:२२‚ २३)

इस बात पर ध्यान दीजिए कि उन्होंने पहिले से ही यीशु को रूपांतरित देखा था। जब उन्होंने यीशु को रूपांतरित रूप में देखा‚ उसके पश्चात वे एक छोटे लड़के में से दुष्टात्मा को बाहर निकालने में विफल रहे। उन्होंने यीशु से पूछा कि वे क्योंकर दुष्टात्मा नहीं निकाल पाये। यीशु का उत्तर था‚ ‘‘तुम्हारे अविश्वास के कारण" (मत्ती १७:२०)। तब यीशु ने उन्हें फिर से सुसमाचार सुनाया कि‚ ‘‘वे उसे (यीशु को) मार डालेंगे‚ और वह (यीशु) तीसरे दिन जी उठेंगे। इस पर वे (शिष्य) बहुत उदास हुए" (मत्ती १७:२२‚ २३)।

तीसरी बार‚ यीशु ने शिष्यों को फिर सुसमाचार दिया‚ इसका उल्लेख मत्ती की पुस्तक अध्याय २०: १७—१९ में मिलता है। इसके समानांतर पाठ लूका के अध्याय १८:३१—३४ में मिलता है।

‘‘फिर उस ने बारहों को साथ लेकर उन से कहा; देखो‚ हम यरूशलेम को जाते हैं और जितनी बातें मनुष्य के पुत्र के लिये भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा लिखी गई हैं वे सब पूरी होंगी। क्योंकि वह अन्यजातियों के हाथ में सौंपा जाएगा और वे उसे ठट्ठों में उड़ाएंगे; और उसका अपमान करेंगे और उस पर थूकेंगे। और उसे कोड़े मारेंगे और घात करेंगे और वह तीसरे दिन जी उठेगा। और उन्होंने इन बातों में से कोई बात न समझी: और यह बात उन में छिपी रही और जो कहा गया था वह उन की समझ में न आया" (लूका १८:३१—३४)

जब यीशु ने उन्हें दो साल तक सुसमाचार समझाया‚ शिष्य तब भी सुसमाचार नहीं समझे‚

‘‘और यह बात उन में छिपी रही और जो कहा गया था वह उन की समझ में न आया" (लूका १८:३४)

कई बार सुसमाचार सुनने पर भी शिष्य नहीं समझ पाये कि यीशु उनसे किस विषय पर बोल रहे हैं! (मत्ती २६:१४‚१५)

किंतु यीशु उनसे पुन: बोले‚ ‘‘तुम जानते हो कि दो दिन के बाद फसह का पर्व्व होगा और मनुष्य का पुत्र (यीशु) क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिये पकड़वाया जाएगा" (मत्ती २६:२)

अब, बार — बार सुसमाचार सुनने पर यीशु के शिष्यों में से एक यहूदा ने महापुरोहितों के साथ मिलकर यीशु के साथ धोखा करने की योजना बनाई! (मत्ती २६:१४‚१५)

एक बाद फिर यीशु ने उन्हें सुसमाचार दिया (मत्ती २६:३१‚३२)। पतरस और अन्य शिष्य गैतसेमनी के बगीचे में सोने चले गये थे। जब सैनिक पहुंचे और यीशु को बंदी बना लिया तब पतरस ने तलवार खींची और सैनिकों को मारने का प्रयास किया। ‘‘तब सब चेले उन्हें (यीशु को) छोड़कर भाग गए" (मत्ती २६:५६)।

अब हम, अंतत: इन ग्यारह शिष्यों के नये जन्म लेने पर आते हैं, इनके हृदय परिवर्तन होने की चर्चा करते हैं। यहूदा, यीशु के साथ धोखा करके, आत्म ग्लानि से पहिले ही फांसी लगा चुका था। नये जन्म का अनुभव वह कभी नहीं पा सका। यीशु पुर्नरूत्थित होकर अन्य शिष्यों से मिलें। उन्होंने शिष्यों को अपने घाव दिखाये,

‘‘तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी" (लूका २४:४५)

उनके नये जन्म का प्रारंभ इस बिंदु से होना आरंभ होता है‚ जैसे ही यीशु ने ‘‘पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी" शिष्य सुसमाचार संदेश समझ गये (लूका २४:४६)।

अब यूहन्ना अध्याय २०:२१—२२ खोल लीजिये। यहां शिष्यों का नया जन्म होता है। पुर्नरूत्थित मसीह उनके पास आये‚

‘‘यीशु ने फिर उन से कहा‚ तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है‚ वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूं। यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा‚ पवित्र आत्मा लो" (यूहन्ना २०:२१‚२२)

उन्होंने पवित्र आत्मा प्राप्त किया और अंततः वे नया जन्म पा गये!

प्राचीन व्याख्याकार इससे सहमत है। आप को लूका अध्याय २४:४५ के उपर‚ मैथ्यू हैनरी और विशेषकर जॉन चार्ल्स एलिकॉट की व्याख्या पढ़ना चाहिए। डॉ जे वर्नान मैगी का कहना था‚ ‘‘मैं निजी स्तर पर मानता हूं कि जिस क्षण प्रभु ने उन पर पवित्र आत्मा फूंका और कहा‚ ‘पवित्र आत्मा लो’ तब वे मनुष्य पुर्नरूत्थित (नया जन्म पा गये) हो गये। इसके पूर्व पवित्र आत्मा का निवास उनके भीतर नहीं पाया जाता था......यीशु मसीह ने उनके भीतर शाश्वत जीवन फूंका" (जे वर्नान मैगी‚ थ्रू दि बाइबल, यूहन्ना २०:२२ पर व्याख्या)।

डॉ थॉमस हेल ने भी इसे बहुत स्पष्ट किया है‚ ‘‘पवित्र आत्मा का दिया जाना‚ शिष्यों के जीवन में बहुत अहम घटना थी। क्योंकि तब उन्होंने नया जन्म पाया......तब उन्हें सच्चा और पूर्ण विश्वास प्राप्त हुआ। इस बिंदु पर पहुंचकर उन्हें आत्मिक जीवन प्राप्त हुआ (थॉमस हेल‚एम. डी.‚ दि अप्लाइड न्यू टेस्टामेंट कमेंटरी‚ यूहन्ना २०:२२ पर व्याख्या‚ पेज ४४८)।

मैंने दो एक कारणों से मसीह के शिष्यों के नये जन्म के उपर यह अध्ययन आप को प्रदान किया है।

१॰ यह नये जन्म के आधुनिक विचार को‚ कि पहिले नया जन्म हो और फिर शिष्यता आवें‚ दुरस्त करता है। आजकल हमारे सभी चर्चेस यथार्थ में इसी पद्धति को अपना रहे हैं।

२॰ यह अध्ययन हमें मसीह की शिष्य बनाने की पद्धति से परिचय करवाता हैः पहिले उन्हें सिखाइये‚ तब उनके मन फिराने के लिये कार्य कीजिए। यह पद्धति‚ नेवीगेटर्स की पुस्तक‚ दि लॉस्ट आर्ट ऑफ डिसाईपलशिप के बिल्कुल विपरीत है। मेरे विचार से तो यह पुस्तक बिल्कुल गलत है। यीशु ने उन्हें नया जन्म लेने से पूर्व शिष्य बनना सिखाया।


मसीह ने अपने महान आदेश में हमें ‘‘शिष्य बनाने का कार्य" सौंपा था (मत्ती २८:१९‚ २० एनएएसबी)

‘‘इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को (चेला बनाओ‚ एनएएसबी) और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है‚ मानना सिखाओ: और देखो‚ मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं। आमीन।" (मत्ती २८:१९‚ २०)

मेरे विद्वान पास्टर डॉ तिमोथी लिन ने कहा था‚

‘‘केवल ‘चेला बनाओ’ क्रिया आदेशात्मक भाव में कही गयी है......दूसरे शब्दों में‚ ‘जाना’ (यहां) आदेश नहीं है‚ परन्तु चेला बनाओ‚ आदेश है। मसीह के महान आदेश का मुख्य विषय यही है" (दि सीक्रेट ऑफ चर्च ग्रोथ‚ पेज ७५)

मसीह हमें ‘‘सारे देशों को सिखाने की" आज्ञा देते हैं — यथार्थ में इसका अनुवाद ‘‘चेले बनाओ" किया गया है — डब्ल्यू ए क्रिसवेल। वास्तव में न्यू अमेरिकन स्टैंडर्ड बाइबल इसे ‘‘चेला बनाओ" अनुवाद करती है।

यह प्रारंभ के तीन सौ साल पहिले हुआ करता था कि कक्षाओं में बपतिस्मा देने के पहिले शिष्यता सिखाई जाती थी। डॉ फिलिप श्राफ‚ एक मसीही इतिहासकार ने कहा था‚ ‘‘इस निर्देश की (अवधि) कभी कभी दो साल निर्धारित है‚ तो कभी तीन साल।" हिप्पोलिटस २१७ ए डी से २३५ ए डी तक रोम के पोप थे। हिप्पोलिटस का कहना था‚ ‘‘(उन्हें) तीन सालों तक वचन को सुनने दीजिए" (दि एपोलिस्टिक ट्रेडीशन ऑफ हिप्पोलिटस‚ भाग २)

बपतिस्मा लेने के पूर्व शिष्यता काल आता है। प्रेरितों की पुस्तक में कम से कम दो उदाहरण हैं जहां शिष्य पौलुस‚ नये शिष्य बने लोगों को मसीहत की शिक्षा देते हैं। बरनबास पौलुस को अंताकिया लेकर आया।

‘‘और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत लोगों को उपदेश देते रहे" (प्रेरितों की पुस्तक ११:२६)

पौलुस ने यही सब बातें लुस्त्रा‚ इकोनियम और फिर से अंताकिया में की।

‘‘और चेलों के मन को स्थिर करते रहे और यह उपदेश देते थे कि हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा " (प्रेरितों की पुस्तक १४:२२)

डॉ श्रॉफ ने कहा था‚ ‘‘चर्च एक मूर्तिपूजक संसार के बीच था..... चर्च ने पाया कि विशेष अध्यापक द्वारा (लोगों) को बपतिस्मा के लिए तैयार करने की शिक्षा देने की आवश्यकता है..... .....ये (कक्षाएं).....एक सेतु का काम करती हैं जो संसार से चर्च की ओर ले जाता है.....जो प्रारंभकर्ता को सिद्वता की ओर ले चलता है। (सीखने वालों) को अविश्वासी नहीं कहा गया है। परन्तु आधा मसीही जन कहा गया है (जो अभी तक शिष्य नहीं हैं)" (हिस्ट्री ऑफ दि क्रिश्चयन चर्च‚ वॉल्यूम २‚ पेज २५६)। डॉ श्रॉफ ने कहा कि यह पद्धति ‘‘आज भी" मिशनरी जगहों पर अपनायी जाती है (उक्त संदर्भित‚ पेज २५५)।

हम अब‚ अपनी सुबह की आराधना को शिष्यता की कक्षा में बदल देंगे। हमारे चर्चेस विफल है‚ हमारे अपने बच्चों को चर्च में बनाये रखने में। चर्चेस असफल हैं‚ बाहर दुनिया के युवाओं को समझाने में। इन सब की जड़ यह हैं कि हम यह महसूस करने में विफल हो गये हैं कि आज के ये युवा नास्तिक असभ्य हैं और सांसारिक प्रलोभनों के प्रति आसक्त हैं। इन्हें पहिले शिष्यता का पाठ पढ़ाया जाना अनिवार्य है। इसके पहिले कि वे नये जन्म का अनुभव प्राप्त करें और मसीही जीवन व्यतीत करें। दक्षिणी बैपटिस्ट चर्च प्रति वर्ष २००‚००० सदस्य खो रहा है जो ‘‘आधे क्रिश्चयन" हैं — जिनको कभी शिष्य नहीं बनाया गया! जॉन एस डिकरसन ने कहा था कि सच्चे मसीहियों की जनसंख्या ‘‘७ प्रतिशत अमेरिकियों से गिरकर ४ प्रतिशत पर आ जायेगी — अगर नये शिष्य पैदा नहीं होंगे" तो (दि ग्रेट इवेंजलीकल रिसेशन‚ पेज ३१४)

यह हमारा ध्येय है! ध्येय है हमारा कि हमारे युवा बच्चे मसीह यीशु को पहचानने और ग्रहण करने में उच्चतम संभावना तक पहुंचे। हम यहां युवा लोगों की सहायता करने के लिये हैं कि वे हमारे चर्च में आवें‚ यीशु के शिष्य बनें‚ उनका नया जन्म होवे‚ वे दूसरों को यीशु के बारें में सीखने के लिये‚ यीशु पर भरोसा करने के लिये और नया जन्म पाने के लिये हमारे चर्च में लेकर आवें!

जो युवा लोग यहोवा द्वारा चुने हुए हैं‚ वे कुछ और कठिन और चुनौतीपूर्ण करने के लिये तैयार किये जायेंगे। जो सच्ची क्रिश्चयनिटी में रूचि नहीं रखते हैं‚ वे स्वयं अपना रास्ता बनाकर खुद ब खुद बाहर हो जायेंगे। हम नहीं चाहते हैं कि वे जायें‚ परन्तु अनुभव से हमने यही जाना है कि वे छोड़कर चले जायेंगे! जब वे छोड़कर जावें तब आप का हदय दुखी न होने पाये। याद रखिये‚ यीशु ने क्या कहा था‚ ‘‘बुलाये हुए बहुत से हैं‚ किंतु चुने हुए थोड़े हैं।" केवल सच्चे मसीही जन‚ नया जन्म प्राप्त ही इस चर्च में ठहरे रहेंगे!

आइये‚ साथ साथ आगे बढ़ें। सिद्ध कर देंवे कि हमारा परमेश्वर यहोवा अभी भी जीवित और सबसे अधिक सामर्थी परमेश्वर है। हमने अतीत में गलतियां की थीं। परन्तु अपनी गलतियों से हमें लाभ और अनुभव मिला। हमने अपनी विफलता को सफलता में बदल लिया है। आज यीशु मसीह पर घोर अविश्वास के दुर्बल युग में‚ हम और अधिक सफलता पायेंगे‚ जब हम इस चर्च को मसीही शिष्यों से भरा मजबूत चर्च बनाने की ओर कदम उठायेंगे। याद रखिये‚ हम कभी नहीं रूकेंगे‚ कभी पीछे नहीं हटेंगे‚ कभी साहस नहीं छोड़ेंगे। हम तब तक नहीं रूकेंगे‚ जब तक हमारा अच्छा चर्च‚ महान चर्च न बन जाये — जो युवाओं को चुनौती देता हो और नया जन्म पाये हुओं की एक शक्तिशाली आत्मिक सेना को तैयार करता हो! आइये‚ अपने स्थानों पर खड़े होकर‚ गीत की पुस्तक में से गीत संख्या ६ गाते हैं‚ ‘‘क्या मैं जो क्रूस का योद्धा हूं?" रचयिता डॉ आइजक वाटस (१६७४—१७४८)

क्या मैं जो क्रूस का योद्धा हूं‚ और मेम्ना यीशु का‚
शरमाउं नाम के मानने से‚ और सेवा न करूं?

क्या मैं फूलों की शैया पर बना रहकर उंचा उठाया जाउं‚
जब दूसरे ईनाम के लिये परिश्रम करें और कठिन समयों से होकर गुजरें?

क्या मेरे कोई शत्रु नहीं सामना करने के लिये? क्या मैं बाढ़ से होकर न निकलूं?
क्या यह निकम्मा संसार मुझ पर दया करेगा‚ कि तुझ ईश्वर तक पहुंचुं?

निश्चय मुझे लड़ना है‚ अगर राज्य करना है; मेरा साहस बढ़ाइये‚ प्रभु यहोवा।
मैं दुख‚ परिश्रम‚ संकट सहूंगा‚ तेरे वचन की सामर्थ से
   जो क्रूस का योद्धा हूं?" रचयिता डॉ आइजक वाटस‚ १६७४—१७४८)


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व मि बैंजामिन किकेंड ग्रिफिथ द्वारा एकल गान:
          ‘‘क्या मैं जो क्रूस का योद्धा हूं?" (रचयिता डॉ आइजक वाटस‚ १६७४—१७४८)