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असंतुष्टों के लिये छुटकारा है

DELIVERANCE IS ONLY FOR THE DISSATISFIED
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स द्वारा लिखा गया
और जॉन कैगन द्वारा लॉस ऐंजीलिस के
दि बैपटिस्ट टैबरनेकल चर्च में, रविवार
१४ मई, २०१७ की सुबह दिया गया संदेश
A sermon written by Dr. R. L. Hymers, Jr.
and preached by Mr. John Samuel Cagan
Lord’s Day Morning, May 14, 2017

‘‘यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं’’ (लूका ५:३१–३२)


यीशु बाहर गये और उन्होंने एक कर वसूल करने वाले लेवी को देखा। मत्ती नामक व्यक्ति का यह दूसरा नाम था। यीशु ने उसे अपना अनुयायी होने के लिये आमंत्रित कर लिया,

‘‘तब वह सब कुछ छोड़कर उठा, और उसके पीछे हो लिया’’ (लूका ५:२८)

मत्ती नामक यह व्यक्ति रोमी शासन में कर वसूलने वाला था। यहूदी कर वसूल करने वालों को नापसंद करते थे क्योंकि वे रोमी सरकार के कहने से यहूदियों से नियम से भी बढ़कर दुगुना कर वसूलते थे। वे सरकार के पास जमा करवाने के अलावा अपने पास भी पैसा रख लेते थे। इसलिये वे बहुत धनी हो जाते थे और यहूदी उनसे बहुत चिढ़ते थे। यहूदी लोग उन्हें भ्रष्टतम पापी के रूप में देखते थे।

जब मत्ती यीशु के पीछे हो लिया, उसने ‘‘सब कुछ’’ त्याग दिया उसने कर वसूलने का सबसे लाभदायक व्यवसाय त्याग दिया। वह यीशु का अनुयायी हो गया।

तब मत्ती ने अपने घर में भोज का आयोजन किया। तब अन्य कर वसूलने वाले वाले लोगों की बड़ी भीड़ और पापी लोग उस भोज में आये। जेनो नामक कवि ने कहा था, कि ‘‘सारे कर वसूलने वाले लुटेरे होते थे।’’ फरीसी लोग इन कर वसूलने वालों से या उनके मित्रों से कोई संबंध नहीं रखते थे, बत्कि उन्हें ‘‘पापी’’ कहकर बुलाते थे।

जब कर वसूली करने वालों और अन्य उनके संगियों की भीड़ से घर भर गया तो फरीसी कुड़कुड़ाने लगे। वे यीशु के चेलों से कहने लगे,

‘‘तुम चुंगी लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाते–पीते हो?’’ (लूका ५:३०)

यीशु ने भोज से निकलकर उन्हें उत्तर दिया,

‘‘यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य (भले चंगों के लिये) नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं’’ (लूका ५:३१–३२)

यीशु ने फरीसियों को इन पापियों को इस भोज में बुलाने का कारण बतलाया। उन्होंने कहा कि जो अच्छे स्वास्थ्य के होते हैं, क्योंकि उन्हें वैध की आवश्यकता नहीं होती है। केवल वे जो रूग्ण होते हैं, उन्हें आवश्यकता लगती है। फरीसी और शास्त्री अपने आप को पाप रहित समझते थे। क्यांकि वे व्यवस्था का पालन करते थे, इसलिये उनके अपने विचारों में वे पाप करने से बचे हुए थे। स्वयं को पाप की बीमारी से ग्रसित नहीं मानते थे। फरीसी उस समय के पुरातन यहूदी होते थे।

शास्त्री वे लोग होते थे जो बाइबल की प्रतियां तैयार करते थे और शिक्षा दिया करते थे। उन्होंने यह विचार नहीं किया कि यीशु महान वैध वहां उपस्थित थे। उन्होंने सोचा,

‘‘हम धर्मी हैं, और औरों को तुच्छ जानते थे’’ (लूका१८:९)

यीशु का उत्तर ऐसे घमंडियों और स्वयं मुग्ध तुष्ट फरीसियों के लिये झिड़की थी।

‘‘यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं’’ (लूका ५:३१:३२)

अगर आप महसूस करते हैं कि आप अच्छे हैं, तो इसका अर्थ है कि आप को यीशु की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर आप महसूस करते हैं कि आप बर्बाद हो चुके हैं और पाप की अवस्था में पड़ें हुए हैं, तब यीशु आप के लिये महत्वपूर्ण होंगे। आप उन्हें खोजेंगे कि वे आप की आत्मा को चंगा कर दें और आप को पाप और उसके परिणाम से बचायें। यह आवश्यक है कि आप को पाप का बोध उत्पन्न हो।

यह आवश्यक है कि आप को पाप का बोध उत्पन्न हो। आप को अपने अधूरेहोने का अहसास जागे, आप लाचारी में हैं – ऐसा बोध हुए बगैर आप को यीशु की आवश्यकता नहीं महसूस होगी।

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

१॰ पहले स्थान पर, वे लोग हैं जो अपने जीवन शैली से संतुष्ट हैं, उन्हें यीशु की आवश्यकता महसूस नहीं होती।

आप ध्यान देंगे कि जब आप शुभ संदेश पढ़ते हैं, तो यीशु अक्सर पापियों की संगति में ही भोजन ग्रहण करते हुए दिख पड़ते हैं। पापी अपनी स्वयं की जीवनशैली से असंतुष्ट रहते थे। पापियों को लगता था कि उनके साथ अवश्य कुछ भयानक घटित हो रहा है। भटके हुए लोग यीशु की ओर अधिक आकर्षित होते थे क्योंकि वह उनके साथ मित्रवत व्यवहार करते थे। उनमें से कईयों ने उद्वार प्राप्त किया था।

वे अपने जीवन के तौर तरीकों से इतने असंतुष्ट हो चुके थे कि वे मसीह की ओर मुड़े। जैसे लूका की पुस्तक पांच अध्याय में मत्ती नामक कर वसूली अधिकारी के साथ हुआ। लूका अध्याय उन्नीस में जक्कई नामक कर वसूलने वाला, यीशु की ओर मुड़ा।

और यीशु ने उससे कहा,

‘‘हे ज़क्कई झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है। वह तुरन्त उतर कर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया। यह देख कर सब लोगे कुड़कुड़ा कर कहने लगे, वह तो एक पापी मनुष्य के यहां जा उतरा है......तब यीशु ने उस से कहा; आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी इब्राहीम का एक पुत्र है। क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उन का उद्धार करने आया है’’ (लूका १९:५–१०)

घमंडी शास्त्री और फरीसियों को यीशु की जरा सी भी आवश्यकता महसूस नहीं हुई; वे तो अपने जीवन से पूरी तरह से संतुष्ट थे। परंतु कर वसूल करने वाले और पापी जन उनके पास आये और छुटकारा पाया।

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

जो अपने जीवन के तौर तरीकों से संतुष्ट हैं, उन्हें यीशु की आवश्यकता नहीं होगी। परंतु वे लोग जो अपनी जीवन पद्वति से तंग आ चुके हैं, वे यीशु को खोजते हैं और उनके पास आते हैं, ऐसे लोग ही उद्वार पा जाते हैं।

आप की क्या स्थिति है? अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आप में से बहुतों के लिये यह सत्य है। जिस ढंग से आप का जीवन चल रहा है और अगर आप उसमें संतुष्ट हैं तो आप को यीशु की आवश्यकता कदापि महसूस नहीं होगी। तब आप को उद्वार नहीं मिलेगा। अगर आप अपने जीवन में प्रसन्न हैं तो भी आप को यीशु की जरूरत महसूस नहीं होगी कि वे आयें और आप के जीवन को बदल दें।

‘‘उस ने यह सुनकर उन से कहा, वैद्य भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों को अवश्य है’’ (मत्ती ९:१२)

२॰ दूसरे, वे लोग जो अपनी नास्तिकता से संतुष्ट हैं, वे यीशु की कोई आवश्यकता महसूस नहीं करेंगे।

अपने शहर की ओर देखिये। इसमें रह रहे लोगों के बारे में विचार कीजिये। क्या उसमें से बहुत से लोग गंभीरता से परमेश्वर की ओर विचार करते हैं? आप जानते हैं कि वे नहीं करते हैं। बाइबल कहती है,

‘‘कोई समझदार नहीं, कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं’’ (रोमियों ३:११)

जब तक परमेश्वर के अनुग्रह से पवित्र आत्मा आप के भीतर कार्य न करे, आप कभी भी मसीह में होकर परमेश्वर को नहीं ढूंढेगे। आप बिना परमेश्वर के जीने और मरने में संतुष्ट रहेंगे और परमेश्वरविहीन होकर ही दम तोड़ देंगे।

परंतु अगर परमेश्वर का अनुग्रह आप के भीतर कार्य करना आरंभ करे, तो आप अपने जीवन की शैली से बैचेनी महसूस करने लगेंगे।

आप हर चीज को अलग नजरिये से देखना आरंभ करेंगे। आप लोगों की भीड़ में रहेंगे और सोचेंगे कि ‘‘आप लोगों की भीड़ में रहेंगे और सोचेंगे कि ये लोग क्यों जी रहे हैं? ये परमेश्वर के प्रति इतने चिंताशील क्यों नहीं हैं?’’ आप अपने खुद के जीवन के लिये और आने वाली मत्यु के बारें में सोचना आरंभ करेंगे। आप का अपना धर्म आप को बहुत सतही और ऐसा लगेगा जिससे कोई शांति नहीं मिल रही हो, कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा हो। लोग जो बहाने बना रहे हों, वे बहाने आप को अपर्याप्त लगने लगेंगे। आप को लगने लगेगा, जीवन में खाने, सोने, पढ़ने और खेलने से बढ़कर कुछ अवश्य होना चाहिये।

जब परमेश्वर का अनुग्रह आप के भीतर कार्य करने लगता है, आप को लगने लगेगा, मैं परमेश्वर के बिना जीवन बिता रहा हूं। आप महसूस करने लगेंगे।

‘‘वे परमेश्वर के जीवन से अलग किए हुए हैं’’ (इफिसियों ४:१८)

आप सोचना आरंभ करेंगे कि परमेश्वर आप के लिये अजनबी हैं और उनके बिना आप भयानक दशा में हैं,

‘‘आशाहीन और जगत में ईश्वर रहित थे’’ (इफिसियों २:१२)

और इसलिये मैं पूछता हूं कि क्या आप अपने जीवन से जैसा यह है, उस में ही संतुष्ट हैं? अगर आप संतुष्ट हैं, तब तो बहुत कम आशा है कि आप मसीह के पास आयेंगे। जैसे हैं वैसा ही जीवन जीते जायेंगे - जीने में संतुष्ट, मरने में संतुष्ट, परंतु तौभी परमेश्वर को व्यक्तिगत जीवन में जाना ही नहीं।

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

अगर निजी जीवन में परमेश्वर विहीन जीवन के साथ आप संतुष्ट हैं तो आप यीशु के लिये कोई आवश्यकता महसूस नहीं करेंगे।

युवाओं में विशेष कर एक प्रवृत्ति पाई जाती है कि धर्म में अत्यधिक रूचि रखना दुर्बल होने का प्रतीक समझते हैं। वे जो सच्चे मसीही जन नहीं होते हैं, उनमें यह रूझान पाया जाता है कि वे लोग जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, वे थोड़े अजीब होते हैं और सुनने में विचित्र लगेगा, कि वे विश्वास करने वालों को असामान्य भी समझते हैं।

ऐसा कोई कहता नहीं हैं। प्रायः ऐसा बोला भी नहीं जाता हैं परंतु अन्य लोगों के मनों में यह धारणा उपजती है। लोग अक्सर ऐसा नहीं कहते हैं, ‘‘वह प्रार्थना करने जाता है, अजीब ही प्राणी है।’’ लोग प्रार्थनारत रहने वाले लोगों को कम स्तर का समझते हैं। वे मन ही मन ऐसा सोचते हैं। आप के विश्वास न करने वाले मित्र भी आप को ऐसा ही समझते हैं। वे ऐसी बातें आप के मन में डालेंगे, ‘‘ज्यादा धार्मिक मत बनों। ज्यादा पागल मत बनो – समझाईश देंगे।’’ इसका कारण इतना सामान्य है कि मनुष्य पाप की अवस्था में जीवन बिता रहे हैं, इसलिये वे सभी को एक ही नजर से देखते हैं।

‘‘क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो (परमेश्वर से बैर रखना) है’’ (रोमियों ८:७)

उद्वार नहीं पायी दशा में, सब मनुष्य,

‘‘स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे’’ (इफिसियों २:३)

इसलिये जिन्होंने उद्वार नहीं पाया है, वे मित्र और संबंधी आप को समझायेंगे कि परमेश्वर के प्रति इतना गंभीर होने की आवश्यकता नहीं है।

वे आप को दूसरे किसी चर्च ले जायेंगे या अपने चर्च में ले जायेंगे – साथ ही इस चर्च में आने से रोकेंगे! क्यों? क्योंकि यीशु मसीह का मुक्ति देने वाला शुभ संदेश ‘‘इस चर्च में’’ हर रविवार सुनाया जाता है। क्योंकि उनके चर्च शुष्क है, परमेश्वर वहां निवास नहीं करता। उनका हर संभव प्रयास है कि आप को परमेश्वर की सच्ची उपस्थिति से दूर रखना।

‘‘क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो (परमेश्वर से बैर रखना) है’’ (रोमियों ८:७)

मनुष्य का जब पुर्नरूत्द्वार नहीं होता है, तो वह परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना रहता है। जब परमेश्वर आप को पुकारना आरंभ करता है तो आप के मित्र और संबंधी आप को वापस खींचते हैं।

आप के माता पिता और आप के मित्र जिन्होंने यीशु को जाना नहीं हैं, वे भी आप को खींचते हैं।

परंतु यीशु ने कहा था,

‘‘मैं तुम से सच सच कहता हूं, वह समय आता है और अब है, जिस में मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएंगे’’ (यूहन्ना ५:२५)

भले ही आप इफिसियों की पुस्तक में लिखे अध्याय २:१, ५ के पदों के अनुसार आत्मिक रूप से मृतक हों, परंतु तौभी परमेश्वर आप को बुलाता है।

आप की आत्मिक मुरदा अवस्था में ही ‘‘आप परमेश्वर के पुत्र की आवाज को’’ सुनते हैं। आवाज सुनने के पश्चात आप बैचेन होने लगते हैं। आप परमेश्वर के पुत्र, यीशु के बिना जीवन में अब संतुष्ट नहीं रह पाते हैं। अब आप को और कुछ चाहिये होता है। आप यीशु को खोजने लगते हैं। जब तक आप सुप्त या मुरदा अवस्था में होते हैं। तब तक बिना मसीह के जीने या मरने से आप संतुष्ट रहेंगे।

केवल तब जब पवित्र आत्मा आप को दिखाये के आप के भीतर कुछ गलत है – आप का मन परमेश्वर विहीन है – केवल तब आप यह दोष अपने में देख पायेंगे और यीशु में रूचि रखेंगे।

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

३॰ तीसरे स्थान पर, वे लोग हैं जो अपने हृदय की बुराईयों में संतुष्ट हैं, वे यीशु की आवश्यकता अपने जीवन में महसूस नहीं करते हैं।

परमेश्वर प्रायः हमारी भावनाओं से पहले बात करते हैं। जब पवित्र आत्मा अपना यकीन दिलाने वाला कार्य करना आरंभ करता है, तो वह हमें सबसे पहले अपने पापों का बोध करवाता है।

ध्यान दीजिये कि बाइबल बताती है कि किस प्रकार लोग जब परिवर्तित होते थे, तो भावुक हो जाया करते थे। वह महिला जिसने यीशु के पैरों को चूमा, बहुत भावुक हो गयी थी।

‘‘और देखो, उस नगर की एक पापिनी स्त्री यह जानकर कि वह फरीसी के घर में भोजन करने बैठा है, संगमरमर के पात्र में इत्र लाई। और उसके पांवों के पास, पीछे खड़ी होकर, रोती हुई, उसके पांवों को आंसुओं से भिगाने और अपने सिर के बालों से पोंछने लगी और उसके पांव बारबार चूमकर उन पर इत्र मला’’ (लूका ७:३७–३८)

यीशु के पास आने में उसने शीघ्रता की और बचायी गयी।

पेंतुकुस्त के दिन जिन्होंने पतरस का संदेश सुना,

‘‘सुनने वालों के हृदय छिद गए’’ (प्रेरितों के कार्य २:३७)

इसका यथाशब्द अर्थ था कि ‘‘उनके हृदय छिद गये’’ थे। यह हमारे मनोभावों को हिलाता है। फिलिप्पी शहर का जेलर

‘‘कांपता हुआ गिरा’’ (प्रेरितों के कार्य १६:२९)

प्रेरित पौलुस ने कहा था,

‘‘मैं कैसा अभागा मनुष्य हूं! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?’’ (रोमियों७:२४)

ये सारी घटनायें बाइबल की बताती हैं कि परमेश्वर लोगों की भावनाओं को प्रभावित करते हैं और कि तब लोग अपने बुरे हृदय से असंतुष्ट हो जाते हैं। हर सच्चे परिवर्तन का अनिवार्य अंग है कि व्यक्ति अपनी भावनाओं में पहले प्रभावित होता है, और अपने अंर्तमन में पहले असंतुष्ट होने लगता है। वे अपने हृदय की ओर दृष्टि करते हैं और उनको उसमें पाप दिखाई पड़ता है। अपने भीतर पाप देखकर, वे उसे नापसंद करते हैं। वे अपने स्वयं के को कर देते हैं! जो वे हैं, वे उससे अप्रसन्न हो जाते हैं।

इसमें भी एक मानवीय तथ्य है कि कर वसूल करने वाले और पापी लोग यीशु के पास जल्दी आ जाते थे – और शास्त्री फरीसी यीशु से दूरी बनाये रखते थे।

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

आज सुबह जो प्रश्न आप के सामने हैं क्या आप अपने आप से असंतुष्ट हैं? क्या आप अपनी जीवन शैली से असंतुष्ट हैं? बिना परमेश्वर के आप बीमार हैं? क्या आप अपने से नाखुश हैं? क्या अपने पापों के प्रति बोध उत्पन्न होता है? क्या किसी भी स्तर पर अपने आप से नाखुश होने और भीतर पाप का बोध होने पर आप उस महान वैध यीशु मसीह के पास आने के लिये तैयार हैं? आखिरकार, यीशु ही एकमात्र जन है जो आप के पापों से छुटकारा दे सकते हैं। वही एकमात्र ईश्वर हैं जो आप के पापों का मूल्य चुकाने के लिये मरे। एकमात्र वहीं मरके सशरीर जीवित हुए कि आप को भी आत्मिक जीवन प्रदान करें। वही एकमात्र हैं जो स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हैं और आप के लिये प्रार्थना करते हैं। क्या आप उनके पास आने के लिये तैयार हैं? क्या उनके लहू से आप अपने पाप धोने के लिये तैयार हैं?

‘‘वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है’’ (लूका ५:३१)

अगर आप मसीह में उद्वार पाने के लिये हमसे कुछ पूछना चाहते हैं तो आगे दो पंक्तियों में आकर बैठ जाइये जब तक शेष चर्च के लोग अपने सुबह का नाश्ता ग्रहण करने उपर हॉल में जायेंगे। डॉ हिमर्स आइये और इस आराधना को अपनी शुभाशीष से समाप्त कीजिये।


अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स आप से सुनना चाहेंगे। जब आप डॉ हिमर्स को पत्र लिखें तो आप को यह बताना आवश्यक होगा कि आप किस देश से हैं अन्यथा वह आप की ई मेल का उत्तर नहीं दे पायेंगे। अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स को इस पते पर ई मेल भेजिये उन्हे आप किस देश से हैं लिखना न भूलें।। डॉ हिमर्स को इस पते पर rlhymersjr@sbcglobal.net (यहां क्लिक कीजिये) ई मेल भेज सकते हैं। आप डॉ हिमर्स को किसी भी भाषा में ई मेल भेज सकते हैं पर अंगेजी भाषा में भेजना उत्तम होगा। अगर डॉ हिमर्स को डाक द्वारा पत्र भेजना चाहते हैं तो उनका पता इस प्रकार है पी ओ बाक्स १५३०८‚ लॉस ऐंजील्स‚ केलीफोर्निया ९००१५। आप उन्हें इस नंबर पर टेलीफोन भी कर सकते हैं (८१८) ३५२ − ०४५२।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व नोहा सोंग द्वारा संदेश पढ़ा गया: लूका ८:२७–३५
संदेश के पूर्व बैंजामिन किंकैड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
‘‘आय एम अमेज्ड'' (ऐ एच ऐकले, १८८७–१९६०)


रूपरेखा

असंतुष्टों के लिये छुटकारा है

DELIVERANCE IS ONLY FOR THE DISSATISFIED

डॉ आर एल हिमर्स द्वारा लिखा गया
और जॉन कैगन द्वारा दिया गया संदेश
A sermon written by Dr. R. L. Hymers, Jr.
and preached by Mr. John Samuel Cagan

‘‘यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धमिर्यों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूं’’ (लूका ५:३१–३२)

(लूका ५:२८,३०; १८:९)

१॰ पहले स्थान पर, वे लोग हैं जो अपने जीवन शैली से संतुष्ट हैं, उन्हें यीशु की आवश्यकता महसूस नहीं होती, लूका १९:५–१०; मत्ती ९:१२

२॰ दूसरे, वे लोग जो अपनी नास्तिकता से संतुष्ट हैं, वे यीशु की आवश्यकता
महसूस नहीं करेंगे, रोमियों ३:११; इफिसियों ४:१८; २:१२;
रोमियों ८:७; इफिसियों २:३; यूहन्ना ५:२५

३॰ तीसरे स्थान पर, वे लोग हैं जो अपने हृदय की बुराईयों में संतुष्ट हैं,
वे यीशु की आवश्यकता अपने जीवन में महसूस नहीं करते हैं,
लूका ७:३७–३८; प्रेरितों के कार्य २:३७; १६:२९; रोमियों ७:२४