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स्वर्गारोहण और मसीह का द्वितीय आगमन

THE ASCENSION AND SECOND COMING OF CHRIST
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, १८ जुलाई, २०१० को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में दिया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Morning, July 18, 2010

‘‘और उसके जाते समय जब वे आकाश की ओर ताक रहे थे, तो देखो, दो पुरूष श्वेत वस्त्र पहिने हुए उन के पास आ खड़े हुए। और कहने लगे; हे गलीली पुरूषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा’’ (प्रेरितों के कार्य १:१०–११)


आज प्रात: मैं मसीह के स्वर्गारोहण और उसके द्वितीय आगमन के उपर बोलूंगा। मैं आप को महान स्पर्जन के संदेश ‘‘स्वर्गारोहण और उनके द्वितीय आगमन पर व्यवहारिक विचारविमर्श’’ का सरलतम रूप प्रस्तुत करूंगा। स्पर्जन ने इस संदेश को दिसंबर २८, १८८४ में प्रचार किया था (मेट्रपालिटन टैबरनेकल पुल्पिट, वाल्यूम ३१, पेज १३–२४)। किसी ने भी प्रभु यीशु मसीह के जीवन और सेवकाई के उपर इतनी गंभीरता से नहीं बोला होगा, जितना कि सी एच स्पर्जन ने प्रचार किया। मेरी बड़ी इच्छा है कि युवा प्रचारकों की पीढ़ी स्पर्जन के संदेशों को उत्साह और प्रेरणा के लिये अवश्य पढ़े। हमारी पीढ़ी को प्रचारकों के राजकुमार के संदेश को पढ़ना आवश्यक है। उनके संदेश विशेषकर प्रभु यीशु मसीह के जीवन और सेवकाई के उपर, आवश्यकता है कि उनको सरल रूप में करके, २१ सदी में उन्हें पुनः प्रचारा जाये। युवा लोगों को आवश्यकता है कि उनके संदेशों को आज सुनें। हमारे कम पढ़े लिखे दिमागों के लिये, उनको सरल किया जाना और कम शब्दचतुर भाषा में बोलना आवश्यक है। इसलिये मैं आज उनका संदेश सरल भाषा में करके आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं।

पांच बड़ी घटनाएं यीशु के जीवनकाल में बड़ी तेजस्विता के साथ प्रगट होती है। सभी सच्चे मसीही जन यीशु के जन्म, मत्यु, पुर्नरूत्थान और उनके स्वर्गारोहण पर विचार करना पसंद करते हैं। उनके द्वितीय आगमन पर सुनना पसंद करते हैं। यीशु के जीवनकाल में घटी पांच बड़ी घटनाएं बहुत महत्वपूर्ण है और हमें उनके बारे में अक्सर विचार करते रहना चाहिये।

इनमें से प्रत्येक घटना दूसरी घटना को जन्म देती है और उनके द्वितीय आगमन के लिये सोने की कड़ी का कार्य करती रहती है। उनका स्वर्गारोहण उनके महिमामयी रूप में द्वितीय आगमन को जन्म देता है।

आज प्रात: हम मसीह के स्वर्गारोहण से प्रारंभ करेंगे। मसीह ग्यारह शिष्यों के साथ जैतून पर्वत पर चढ़े। कुछ दिन पहले वे मृतकों मे से जीवित हुए थे। जीवित होने के बाद मसीह ने अक्सर अपने चेलों से बातें भी की है और उन्हें इस प्रकार कहा भी है,

‘‘मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो। यह कहकर उस ने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए’’ (लूका २४:३९–४०)।

जब वह जीवित हुए उन्होंने उनके साथ खाना भी खाया। उन्होंने उनके साथ चालीस दिन बातें की। और उन्हें आज्ञायें और कार्य सौंपे,

‘‘इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं’’ (मत्ती २८:१९–२०)।

‘‘और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूं, कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे जगत में भी न समातीं’’ (यूहन्ना २१–२५)।

परंतु अब पुर्नरूत्थित मसीह जैतून पर्वत पर अपने ग्यारह शिष्यों के साथ चढ़ते हैं। जैतून पर्वत के शिखर पर पहुंचकर यीशु ठहर जाते हैं। मसीहा शिष्यों के मध्य में ठहरते हैं और उन्हें प्रार्थना में आशीष देते हैं। वह अपने छिदे हुए हाथों को उपर उठाते हैं और जब वे हाथ उपर उठा रहे होते हैं, धरती से उनका आरोहण प्रारंभ हो जाता है। शिष्य उन्हें अपने से उंचा जाते देखकर विस्मय में हैं। एक ही क्षण में वे जैतून वृक्षों को पार कर जाते हैं। फिर मध्य हवा में आरोहित होते हैं और फिर बादलों वाले स्थान पर पहुंच जाते हैं। शिष्य आश्चर्यचकित खड़े रहते है, कौतुक होकर देखते रहते हैं। और ‘‘बादल ने उसे उन की आंखों से छिपा लिया’’(प्रेरितों के कार्य १:९)। शिष्य बादलों की ओर देखते खड़े रहे। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे और निरंतर अपने प्रभु को ओझल होते देख रहे थे।

लेकिन उनकी इस तंद्रा को किसी ने भंग किया। दो स्वर्गदूत उन्हें दिखाई दिये जो कह रहे थे ‘‘तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?’’ (प्रेरितों के कार्य १:११)। श्वेत वस्त्रों में उन स्वर्गदूतों ने बोलना आरंभ किया। स्वर्गदूतों ने प्रकट किया कि वे शिष्यों को जानते थे और इसीलिये इस तरह पुकारा, ‘‘हे गलीली पुरूषों।’’ जब शिष्य थोड़े सामान्य हुए तो वे यरूशलेम को लौटने लगे। उन्होंने यह जान लिया कि यीशु का स्वर्गारोहण शोक की बात नहीं है। पंरतु वह स्वर्ग की महिमा में अपने सिंहासन पर आसीन होने के लिये गये हैं।

आप देखेंगे कि मैंने बहुत अधिक कल्पना का प्रयोग नहीं किया है। जो कुछ हुआ उसे मैंने सरल भाषा में बता दिया। परंतु में चाहता हूं कि आप इस दश्य को अपने विचारों में लाकर सोचे, जब मैं हमारे पाठ से तीन बातें आप को बताता हूं,

‘‘और उसके जाते समय जब वे आकाश की ओर ताक रहे थे, तो देखो, दो पुरूष श्वेत वस्त्र पहिने हुए उन के पास आ खड़े हुए। और कहने लगे; हे गलीली पुरूषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा’’ (प्रेरितों के कार्य १:१०–११)

१॰ पहला, स्वर्गदूतों ने हल्की सी झिड़की शिष्यों को दी।

‘‘हे गलीली पुरूषों तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?’’ (प्रेरितों के कार्य १:११)।"

यह किसी काले कपड़े धारण किये मनुष्यों की फटकार नहीं थी। कोई तीखी या कठोर बातें नहीं कहीं गयी। बस हल्की सी झिड़की। एक सौम्य सी उलाहना दी गयी। आखिरकार, शिष्य एक गलती ही तो कर रहे थे, न कि कोई बड़ा पाप।

ध्यान दीजिये, पहले स्थान पर, शिष्य जो कर रहे थे, वह पहली नजर में तो सही था। अगर यीशु हमारे साथ होते तो हम उनके चेहरे की ओर ही देख रहे होते। जब वह स्वर्ग की ओर आरोहित हो रहे थे, तो यह उनके शिष्यों का कर्त्तव्य था कि वे उनकी ओर देखे। देखना गलत नहीं हो सकता था। हमें तो अक्सर बाइबल में देखने के लिये कहा जाता है। भजनकार ने कहा था, ‘‘हे यहोवा, भोर को मेरी वाणी तुझे सुनाई देगी, मैं भोर को प्रार्थना करके तेरी बाट जोहूंगा" (भजन ५:३) । प्रेरित पौलुस हमसे कहते हैं, ‘‘पृथ्वी पर की नहीं परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ’’ (कुलुस्सियों ३:२) ‘‘देखों’’ हमेशा एक उचित शब्द है। पूर्व अवतारित मसीहा कहते हैं, ‘‘तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ’’ (यशायाह ४५:२२)। पूरे जीवन भर ‘‘हमें यीशु की ओर ताकते रहना’’ है (इब्रानियों १२:२)

परंतु ‘‘घूरना’’ गलत होता है, ‘‘घूरना’’ में आराधना का भाव नहीं मिलता। परंतु एक उत्सुकता का भाव होता है। परमेश्वर ने जिसे प्रकाशित नहीं किया है उसे जानने की इच्छा रखना उचित नहीं हैं। मेरे मित्रों, खाली आकाश को ताकते रहने का कोई अर्थ नहीं है। अगर मसीह स्वयं उस आकाश में प्रकट नहीं होते हैं तो फिर हमारी आंखों को देखने के लिये कुछ नहीं है। स्वर्ग की ओर एक अविचल दृष्टि बनाये रखना सच्ची आराधना हो सकती है। परंतु अगर मसीह के लिये कार्य करने के बजाय उपर ही तकते रहना है तो यह निरर्थक मूर्खता है। आज ऐसे लोग विधमान हैं जो आकाश की ओर सिर उठाते हैं, बांहे फैलाते हैं, स्वर्ग की ओर ताकते हैं परंतु पर मसीह के लिये बहुत कम कार्य करते हैं यह निरी मूढ़ता है।

तौभी मैं कहता हूं कि उनका स्वर्ग की ओर देखना स्वाभाविक था। मुझे आश्चर्य नहीं है जब ग्यारह शिष्य ताकते खड़े रहें। अगर मैं वहां होता, तो मैं भी यही करता। क्या आप वहां देखते खड़े नहीं होते? मसीह हमें नादानी वश स्वाभाविक चीजें करने देने के लिये मना नहीं करते हैं। परंतु अधिक समय तक वह नहीं चाहते कि हम ऐसा करते रहें। फिर वे हमें बताने के लिये किसी को भेजते हैं, ‘‘तुम यहां खड़ें हुए क्यों घूर रहे हो?’’ तब सच्चा मसीही जन यह उत्तर देगा, ‘‘हमें सदा ही यहां खड़े होकर ताकते नहीं रहना है। हमें अपने नित्य जीवन में जीने के लिये लौट जाना है और मसीह के बताये कार्यो को करना है। यह उचित है कि हमें मसीह की आराधना करना है, परंतु हमें अपने कार्य पर लौट जाना है। यह उचित है कि हमें मसीह की आराधना करना है, परंतु हमें अपने कार्य पर लौट जाना है। हमें आत्मा जीतने वाले कार्य करना है और इस अंधकारमय संसार में गवाही बनना है।

यहां एक व्यवहारिक बिंदु हैः हम उनकी नकल कर सकते हैं। ‘‘अरे’’ आप कहेंगे कि ‘‘मैं तो ऐसे खड़े हुए नहीं घूर सकता।’’ परंतु मुझे निश्चित नहीं है कि आप अपनी जगह सही हैं। कुछ लोग बहुत उत्सुक होते हैं परंतु आज्ञाकारी नहीं। वे बाइबल भविष्यवाणी की बाते विस्तार से सीखने के लिये बहुत इच्छुक होते हैं लेकिन महत्वपूर्ण बातों की उपेक्षा कर देते हैं। मुझे याद है कि एक व्यक्ति भविष्यवाणी के विस्तार को जानने के लिये बहुत उत्सुक था, परंतु महत्वपूर्ण मसलों को नजरअंदाज कर देता था। मुझे याद है कि मै एक व्यक्ति को जानता हूं जो भविष्यवाणी के बारे में बहुत ज्ञान रखता था, परंतु अपने सात बच्चों के साथ उसने कभी पारिवारिक प्रार्थना नहीं की। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो बाइबल की भविष्यवाणियों के बारे में आप को सब बता सकते हैं परंतु नया जन्म, चर्च की सदस्यता, मसीही जीवन जीने के बारे में बहुत थोड़ा जानते हैं। मैं मानता हूं कि नबूकदनेस्सर राजा के स्वप्न में पैरों की छाप के बारे में अध्ययन करने का कुछ मूल्य है, उन राज्यों का महत्व और समझ जो पांव की दस अंगुलियां दर्शाती है, उनके बारे में ज्ञान रखना अच्छा है, परंतु ऐसा ज्ञान मसीही जीवन जीने का स्थान नहीं ले सकता। अगर अध्ययन में बिताया गया समय, आत्मा जीतने और प्रार्थना करने में बिताया जाये, तो मनुष्य के लिये अधिक उपयोगी और परमेश्वर के लिये महिमा लाने वाला होगा। मैं चाहता हूं कि आप भविष्यवाणी समझें परंतु हमारा मुख्य कार्य यह पुकारना है, ‘‘वह देखों परमेश्वर का मेम्ना!’’ सारे साधनों से आप भविष्यवाणी के बारे में सीखे, लेकिन पहले पारिवारिक बाइबल उपासना में अपने बच्चों को वचन के बारे में सिखायें, तय करें कि आप स्थानीय चर्च में खूब मेहनत कर रहे हैं कि नहीं, भटके हुए लोगों को चर्च में लेकर आयें कि उन्हें उद्वार मिले और इस तरह परमेश्वर के जीवित चर्च का निर्माण हो! हमारे चारों ओर सघन परेशानी, अज्ञानता और पाप का बाहुल्य है, ऐसा वातावरण परमेश्वर के लिये अधिकाधिक कार्य किये जाने की मांग करता है। और अगर आप नहीं सुनेंगे, तो यद्यपि मैं श्वेत वस्त्र पहने कोई स्वर्गदूत तो नहीं हूं, परंतु मैं आप से यही कहूंगा, ‘‘क्यों आप भविष्यवाणियों के अध्ययन को घूर रहे हैं, जबकि यीशु के लिये इतना कार्य किया जाना है और आप उसे नहीं कर रहे हैं?’’ आप उत्सुक तो हैं परंतु आज्ञाकारी नहीं। मैं जानता हूं कि आप मेरी नहीं सुनेंगे, परंतु तौभी मैंने आप को बता दिया है, और मैं प्रार्थना करता हूं कि पवित्र आत्मा इस विषय में आप के हृदय से बातें करे।

दूसरे लोग आराधना की बातें तो करते हैं परंतु सक्रिय नहीं हैं – ‘‘आराधना के गीत’’ और ‘‘आराधना’’ में रूचि रखते हैं किंतु भले कार्य के लिये उमंग नहीं है। सच्ची आराधनायें तो चर्चेस में बहुत कम देखने को मिलती हैं, मेरी हार्दिक इच्छा है कि ऐसी जीवंत आराधनायें संचालित हो। अधिकतर लोग आराधना के उददेश्य को आनंद और स्वसंतुष्टि के लिये मानते हैं। अगर एक व्यक्ति का धर्म सिर्फ स्वयं को आनंद पहुंचाने तक में निहित रहता है तो मेरा मानना है कि वह व्यक्ति बीमारी से ग्रसित है। जब एक व्यक्ति चर्च में संदेश का न्याय यह प्रश्न पूछकर करता है ‘‘कि क्या इस संदेश से मुझे आनंद मिला?’’ तो यह बिल्कुल स्वकेंद्रित सोच है। यह तो जैसे सूअरों के सदृश धर्म होगा जिसमें व्यक्ति यही सोच रहा है कि उसने संगीत का का कितना आनंद उठाया, आराधना में उसे कितना आनंद आया, संदेश सुनने में उसे कितना आनंद आया। यह सूअरों का धर्म होगा। मसीह की आराधना भी इस फैशन से की जा रही है कि वह आप को मसीह से दूर ले जा रही है! स्थानीय चर्च में अगर आराधना के अतिरिक्त खोये हुए लोगों को नहीं लाया जाता है तो उन्हें स्वर्गदूतों की फटकार पड़नी चाहिये।

वे जो केवल आराधना से ‘‘मन का सुख’’ प्राप्त करने जाते हैं या केवल बाइबल की भविष्यवाणियों पर नये विचार सुनने जाते हैं उन्हें स्वर्गदूतों द्वारा उलाहना दिया जाना चाहिये ‘‘हे गलीली पुरूषों तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?’’

२॰ दूसरा, मसीह का वर्णन आनंद के साथ किया गया है।

मैं चाहता हूं कि आप मसीह के आनंदपूर्वक वर्णन की ओर ध्यान देवें। उन्होंने उसे बताया,

‘‘यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है’’ (प्रेरितों के कार्य १:११)

मैं इस वर्णन को पसंद करता हूं ‘‘यही यीशु,’’ क्योंकि यह वाक्य उनके द्वारा बोला गया, जो उसे बहुत अच्छे से जानते थे। वह ‘‘स्वर्गदूतों को दिखाई’’ दिया (१ तिमोथियुस ३:१६) । उन्होंने उसे उसे पृथ्वी पर के संपूर्ण समय काल में देखा था। वे उसे जानते थे। जब उन्होंने उसे पिता के पास जाते हुए देखा, वे बोल उठे ‘‘यही यीशु।’’ मैं उनकी अचूक गवाही से जानता हूं कि वह यही यीशु है, वही यीशु जो एक बार धरती पर रहा। वह समान यीशु है।

यीशु चले गये परंतु वह आज भी विद्यमान हैं। वह हमें छोड़ कर गये हैं परंतु वह मृतक नहीं है। न वह आत्मा में परिवर्तित हो गये है न किसी रूप में घुल गये हैं। ‘‘यही यीशु,’’ अपने पिता के सिंहासन के पास चले गये हैं और निश्चित वह वहां उपस्थित है जैसे एक बार वे पीलातुस के दरबार में खड़े थे। जैसे यह तय था कि वे क्रूस पर टंगे थे, वैसे ही यह तय है कि यही यीशु पिता के सिंहासन के दाहिने हाथ बैठे हैं। जिस मसीह के उपर उन्होंने थूका था, उसी मसीह की आराधना अनंतकाल तक स्वर्गदूत करते हैं। जिस मसीह को उन्होंने कोड़े मारे थे, उसी मसीह की प्रशंसा अब स्वर्गदूत करते नहीं अघाते और स्वर्ग में संत उनकी निरंतर स्तुति करते हैं। इसके बारे में सोचिये और आज सुबह आनंदित होइये! यीशु जीवित हैं! सावधान रहें कि आप भी आत्मिक रूप से जीवित रहें। अपने आप को मूर्ख न बनने दें कि आप के पास करने के लिये कोई कार्य नहीं है। यह राह मत देखिये कि आप सशरीर उठा लिये जायेंगे। टी वी में दिखाये जा रहे ‘‘पाखंड’’ के समान अपने हाथों को हवा में न लहराये। मसीह जीवित हैं, और उन्होंने उनके आगमन तक आप को कार्य सौंपा हुआ है। जाइये उस कार्य में तल्लीन हो जाइये!

‘‘यही यीशु,’’ – मुझे यह शब्द पसंद है ‘‘यीशु’’ अर्थात ‘‘मसीहा।’’ अगर आप एक भटके हुए जन हैं तो सिर्फ उनका नाम ‘‘यीशु’’ ही, जो स्वर्ग चले गये हैं, आप को आमंत्रित करता है! क्या आप यही यीशु के पास आयेगे?’’ वह ऐसे व्यक्तित्व हैं जो अंधों की आंखे खोलते हैं। और कैदियों को जेल से बाहर निकाला। ओह आप की आंखे उनकी ज्योति को देख सकें! उन्होंनें कोढ़ियों को स्पर्श किया और मुरदों को जीवित किया वही यीशु आज भी सारे कार्य करते हैं। वह अंतिम सीमा तक आप को बचाने के लिये तैयार है। सदा के लिये वह आप को बचाने के लिये तैयार है! सचमुच मेरी प्रार्थना है कि आप उन्हीं यीशु की ओर ताकें और पापों से मुक्ति पावें! उनकी ओर देखें और जीवित रहिये! आप को यह करना है कि यीशु पर विश्वास रखकर उनके पास आइये। जैसे उस महिला ने उनके वस्त्र की किनारी छूकर ही चंगाई प्राप्त कर ली थी। वही यीशु तो आज भी चंगा करते हैं। जब वह धरती पर थे तब जैसा प्रेम पापियों के प्रति रखते थे, वही प्रेम आज भी आप सभों से है। वह आज भी आप को आप के पापों से मुक्त कर देंगे जैसा उन्होंने उस समय किया था जब वे इस जगत में थे।

‘‘यही यीशु,’’ ये शब्द केवल यही नहीं प्रकट करते कि वह वही मसीह थे जो इस धरती पर रहें, पंरतु यही मसीह फिर से आयेगे। वही यीशु जिनका स्वर्गारोहण हुआ, वह द्वितीय आगमन पर फिर प्रकट होंगे। द्वितीय आगमन पर वह वहीं मसीह होंगे जो स्वर्गारोहण के दिन उठा लिये गये होंगे। वह इस धरती पर पर रहने वाले मसीहा ही कहलायेंगे। यह महसूस करना आवश्यक होगा कि यीशु प्रकृति मे तो समान स्वभाव के होंगे परंतु अवस्थागत दशा में वह एक समान नहीं हो सकते। अब वह मसीहा है। जब वे बादलों में अपने दल बल के साथ प्रगट होंगें तब न्याय करेंगे। जब उन्होंने कहा है कि हम उनके रूप को छोड़कर, हाथों और पैरों में कीलों के निशान से उन्हें पहचान लेंगे। हम कह उठेंगे, ‘‘यह वही यीशु है! यह वही यीशु है!’’

जब चेलों से पूछा गया, ‘‘तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?" वे कह सकते थे कि हम यहां इसलिये खड़े हैं क्योंकि हम नहीं जानते कि कहां जायें? हमारा स्वामी तो चला गया। परंतु चूकि यह वही यीशु है और वह फिर से प्रकट होंगे, तो हमें जाना होगा और कार्य में लग जाना होगा। वे जो बाइबल का इंकार करते हैं, कहते हैं कि क्रिश्चियनिटी समाप्त हो गईं। आप के मसीहा तो जाते रहे।’’ तो हमारा उत्तर इस प्रकार हैः हम स्वर्ग को ताकते नहीं खड़े हैं। हम निराश नहीं हैं कि यीशु हम से दूर हो गये हैं। वह जीवित है! हमारा महान मुक्तिदाता जीवित है! यह हमारा आनंद है कि हम अपनी आंखे उठायें क्योंकि हम आशा करते हैं कि यीशु पुनः आयेंगे। यह हमारा बराबरी का आनंद है कि हम हमारी आंखे परमेश्वर की ओर लगाते हैं, शहरों में जाते हैं, लोगों को बताते हैं कि यीशु जीवित हुए हैं और वह उन्हें उद्वार दे सकते हैं और अगर वे यीशु पर विश्वास लाते हैं तो यीशु उन्हें अनंत जीवन प्रदान कर सकते हैं। हम हारे नहीं हैं। हम तो हार से बहुत दूर हैं! उनका स्वर्गारोहण हार नहीं है परंतु प्रगति है। उनके आने में देर इसलिये है क्यांकि वह धैर्यवान है और पापियों को प्रायश्चित का अवसर देना चाहते हैं। विजय कभी भी संदेहास्पद नहीं है। परमेश्वर की समस्त सेना अंतिम लड़ाई के लिये तैयारी कर रही है। वही यीशु अपने श्वेत घोड़े पर सवार होकर स्वर्ग की सेना के साथ सिर्फ विजय प्राप्त करने के लिये आ रहे हैं!

३॰ तीसरा, तीन महान बातों को अमल में लाया जा सकता है।

ये सत्य व्यवहारिक हैं। वे हमें स्वर्ग की ओर घूरने के लिये नहीं दिये गये हैं परंतु हमें प्रेरित करने के लिये दिये गये हैं कि हम परमेश्वर के उददेश्य को पूरा करे।

१॰ वे कौन से सत्य हैं? तो क्यों पहले, यीशु स्वर्ग को चले गये? यीशु चले गये! यीशु चले गये! यीशु आप से दूर गये, परमेश्वर के सिंहासन तक, जहां से वे हमारे लिये प्रार्थना कर सकते हैं मैं संसार में जाकर और पृथ्वी पर जाकर प्रचार करने का हर कारण देखता हूं क्योंकि वह स्वर्ग चले गये, पंरतु स्वर्ग और पृथ्वी का संपूर्ण अधिकार उनको दिया गया है। "इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो" (मत्ती २८:१०)।

२॰ दूसरा सिद्वांत है कि यीशु पुन: आ रहे हैं उन्होंने हमें त्यागा नहीं है। युद्व क्षेत्र में हमारा अगुवा युद्व क्षेत्र की दूसरी ओर मुड चुका है। शायद पलक झपकने के साथ यह होगा। इस युद्व क्षेत्र में मसीह जो राजा है और मैदान में जो सैनिक है, उनके मध्य बड़ी एकता है। वह हमारी चिंता करता है। उसका हृदय हमारे साथ है। वह हमारे लिये प्रार्थना कर रहा है। वह कहता है, "देख, मैं शीघ्र आने वाला हूं; और हर एक के काम के अनुसार बदला देने के लिये प्रतिफल मेरे पास है।" (प्रकाशितवाक्य २२:१२)

३॰ तीसरी व्यवहारिक बात यह है कि, वह उसी तरह आयेगें जिस तरह गये थे। बाइबल कहती है, "जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है (समान तरीके से) उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों के कार्य १:११) ऐसा प्रतीत होता है कुछ व्याख्याकार अंग्रेजी नहीं समझ पाते हैं। वे कहते हैं कि उनका "आत्मिक रूप" पेंतुकुस्त के दिन प्रकट होगां। परंतु प्रत्येक जन यह जान सकता है कि "आत्मिक आगमन" उस तरह से नहीं होगा जैसे वे यहां से स्वर्ग लौटे थे! हमारे प्रभु उपर उठा लिये गये थे। चेलों ने उन्हें हवा में उठा लिये जाते देखा था। वह पुन: लौटेंगे, जिस प्रकार वे यहां से गये थे। "देखो, वह बादलों के साथ आने वाला है" ( प्रकाशितवाक्य १:७) । यथाशब्द "यही यीशु" उपर गये थे। यथाशब्द "यही यीशु" पुन: लौटेंगे। जैसे वे बादलों में होते हुए चले गये वैसे ही बादलों में से प्रकट होंगे। मुझे तो निश्चय है, "और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा" ( अयूब १९:२५) । "और उस समय वह जलपाई के पर्वत पर पांव धरेगा .........तब मेरा परमेश्वर यहोवा आएगा, और सब पवित्र लोग उसके साथ होंगे" (जर्कयाह १४:४–५) । जब वह वापस आते हैं तो वे उददंडी राष्टों को अपने लोहे के डंडे से तोड़ डालेगा। क्योंकि उन दिनों उसकी सामर्थ कोई रोक नहीं सकेगा।

कोई भी यह न कहने पाये कि यीशु आत्मा के रूप में लौटेंगे बल्कि जैसे यीशु सशरीर उपर गये हैं – वही यीशु पुनः वापस आयेंगे। यीशु आ रहे हैं। यह एक सत्य है। इसलिये पहले उद्वार प्राप्त करें और स्थानीय चर्च के माध्यम से खोयी हुई आत्माओं को उद्वार पाने के लिये वचन सुनाये। सच बात तो यह है कि अपने मसीहा के लिये जीवित रहे। यीशु यथाशब्द आ रहे हैं, प्रतीकात्मक रूप में नहीं। इसलिये जैसी उनकी दी हुई आज्ञा थी, वैसे ही आप को जाना है और आपकी गवाही लोगों के सामने प्रकट हो कि कैसे यीशु आप के जीवन में कार्य करते हैं।

५॰ चौथी बात, अमल में लाने के लिये यह है कि आप को मिलने के लिये तैयार रहना है जब प्रभु लौटेंगे। मसीही जनों को स्थानीय चर्च के माध्यम से कार्य करते रहना है। परंतु क्या आप ने नया जन्म प्राप्त किया है? जब तक आप के मन का परिवर्तन नहीं होता है, आप यीशु से मिलने के लिये तैयार नहीं होंगे। पापों से मुंह मोड़ लीजिये और पूरी रीति से यीशु मसीह के पास आ जाइये। "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा" (प्रेरितों के कार्य १६:३१) । विश्वास कीजिये और जीवित रहिये! यीशु आप के पापों का मोल चुकाने के लिये मरे। यीशु मुरदों में से जीवित हुए। यीशु स्वर्ग में जीवित हैं। यीशु फिर से आ रहे हैं। यीशु में विश्वास कीजिए, पूर्ण रूप से, संपूर्ण हृदय से। वह आप को पाप, नर्क और कब्र से बचायेंगे। आमीन!



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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व डॉ क्रेटन एल चान द्वारा संदेश पढ़ा गया: प्रेरितों के कार्य १:१–१२
संदेश के पूर्व बैंजामिन किंकैड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
‘‘ही इज कमिंग अगेन'' (मैबेल जॉनस्टेन कैंप, १८७१–१९३७)


रूपरेखा

स्वर्गारोहण और मसीह का द्वितीय आगमन

THE ASCENSION AND SECOND COMING OF CHRIST

डॉ आर एल हिमर्स

‘‘और उसके जाते समय जब वे आकाश की ओर ताक रहे थे, तो देखो, दो पुरूष श्वेत वस्त्र पहिने हुए उन के पास आ खड़े हुए। और कहने लगे; हे गलीली पुरूषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा'' (प्रेरितों के कार्य १:१०–११)

(लूका २४:३९–४०; मत्ती २८:१९–२०; यूहन्ना २१:२५)

१॰   पहला, स्वर्गदूतों ने हल्की सी झिड़की शिष्यों को दी, भजन ५:३;
कुलुस्सियों ३:२; यशायाह ४५:२२; इब्रानियों १२:२

२॰   दूसरा, मसीह का वर्णन आनंद के साथ किया गया है, प्रेरितों १:११;
१ तिमोथियुस ३:१६

३॰   तीसरा, तीन महान बातों को अमल में लाया जा सकता है, मत्ती
२८:१९; प्रका२२:१२; प्रेरितों१:११; प्रका १:७; अय्यूब १९:२५;
जर्कयाह १४: ४–५; प्रेरितों १६:३१