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उनके अपने मन की दृष्टि -
उनकी अपनी असहायता का ज्ञान

A SIGHT OF THEIR OWN HEARTS –
A SENSE OF THEIR OWN HELPLESSNESS

डो. आर. एल. हायर्मस, जुनि. द्वारा
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

लोस एंजीलस के बप्तीस टबरनेकल में प्रभु के दिन की शाम, 13 जून, 2010
को दिया हुआ धार्मिक प्रवचन
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, June 13, 2010


आज रात मैं सामान्य प्रकार का पाठ्य पुस्तक पर आधारित धार्मिक प्रवचन नहीं करनेवाला हूँ जो आमतौर पर मैं देता हूँ। यह एक अकेले पाठ का वर्णन करनेवाला धार्मिक प्रवचन नहीं है। बजाय, मैं आपको जागृतता और परिवर्तन पर बाइबल की पढाई देने जा रहा हूँ। महेरबानी करके मेरे साथ रोमियों 3:18 पर फिरो। इसे जोरसे पढ़ीये।

‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं''
       (रोमियों 3:18)।

वो मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था है। जैसे प्रेरितो पद 9 में कहते है, ‘‘वे सब पाप के अधीन है, कि, सारे मनुष्य पापो की शक्ति के अधीन है। पापो का शासन स्वाभाविक रूप से ही सब मे आता है, जन्म के द्वारा। पापो की शक्ति हमारे पहले माता-पिता, आदम, के द्वारा वारसे में मिली है, क्योंकि ‘‘जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई; और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई'' (रोमियों 5:12)। ‘‘मृत्यु'' यहाँ बात कही गई है मृत्यु की जो आदम पर आयी थी जब उसने पहला मानवीय पाप किया था। प्रभु ने कहा, ‘‘जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा'' (उत्पति 2:17)। और यही आदम को हुआ। जिस दिन उसने पाप किया उसी दिन वह आत्मिकरूप से मर गया। वो प्रभु से दूर किया गया था। ‘‘पापो में मरा हुआ'' (इफिसियों 2:5)। सारी मनुष्य जाति आदम से आयी हैं इसीलिये, सब मनुष्य आदम की तरह, ‘‘पापो मे मरे हुए'' है। आदमी अपनी स्वाभाविक अवस्था में, इसीलिये ‘‘पापो में मरा हुआ'' है, ‘‘पाप के अधीन'' जैसे प्रेरितो, रोमियों 3:9 मे कहते है पापो के द्वारा शापित और वश में किया हुआ।

फिर, पद 10 से 18 में वे वर्णन करते है आदमी अपनी स्वाभाविक हालात में, भयानक शब्दों के साथ खत्म होते है,

‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं''
       (रोमियों 3:18)।

एक दिन मैं व्यायामशाला में एक बुजुर्ग व्यक्ति से बात कर रहा था। हम साथ में तैर रहे थे, परंतु हम कुछ देर बाद रूक गये और बातचीत करना शुरू किया। उसने पहले बहुत अवसर पर मुझ से कहा था कि वे नास्तिक है। परंतु दूसरे दिन उन्होंने मुझे अपने धर्म के शुरूआत के सिद्धांत समझाना शुरू किया। उसने कहा, ‘‘मैं सोचता हूँ सारे धर्म डर के साथ शुरू हुए।'' यह कोई नया विचार नहीं था। बहुतों ने यह कहा है! परंतु मैं उसे जाने देता हूँ। बजाय, मैंने उनसे पूछा, ‘‘किस बात का डर?'' उन्होंने कहा, ‘‘मृत्यु का डर, अज्ञात डर।'' वे थोडे से आश्चर्यचकित हो गये यह जानकर कि मैं उनसे सहमत था। हाँ, यह शायद सत्य है की जगत के धर्म डर से शुरू हुआ था - मृत्यु का डर, अज्ञात डर। परंतु मैं और आगे नहीं गया, क्योंकि मैंने महसूस किया कि वो, पद सुनने के लिये तैयार नहीं था जो हमने अभी पढ़ा,

‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं''
       (रोमियों 3:18)।

हाँ, वे शायद अच्छी तरह से मृत्यु और अज्ञात से डरते थे, परंतु ‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं।''

मैं धर्मसेवा मे बावन वर्षों से भी ज्यादा समय से हूँ और मैंने कभी भी किसी एक भी व्यक्ति मे उनकी स्वाभाविक अवस्था में उसका अपवाद नहीं देखा। हर कोई, किसी भी उम्र का, किसी भी जाति का, जीवन के किसी भी मकाम पर, समान है, एकदम समान, किसी भी अपवाद के बिना मेने कभी भी देखा हो!

‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं''
       (रोमियों 3:18)।

इसीलिये परमेश्वर ने व्यवस्था दी। प्रभु के वचन आदमी को बचाने के लिये नहीं दिये गये थे, परंतु उसे जागृत करने दिये थे। महेरबानी करके रोमियों 3:19-20 जोर से पढीये।

‘‘अब हम जानते हैं कि व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के अधीन है; इसलिये कि हर एक मुंँह बंद किया जाए और सारा संसार परमेश्वर के दण्ड के योग्य ठहरे; क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है'' (रोमियों 3:19-20)।

परमेश्वर द्वारा व्यवस्था दी गई थी ‘‘कि हर मुंँह बंद किया जाए और सारा संसार परमेश्वर के दण्ड के योग्य ठहरे।'' ‘‘कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।''

यहाँ पर प्रेरितो व्यक्तिगत पापो के बारे मे बात नहीं कर रहे है। वे रोमियों 3:9-20 मे पापो की सूचि नहीं देते है। नहीं! कदापि नही! बजाय वे देते है पाप की अवस्था, पाप के हालात, आदमी ‘‘पाप के अधीन।'' और पाप की अवस्था में आदमी धर्मी नहीं होता (पद 10); आदमी समझता नहीं नाही, वो प्रभु को खोजते है (पद 11); वो शुद्ध निमित्त से कुछ अच्छा नहीं करता (पद 12); उसकी जबान धोखे से भरी है (पद 13); उसका मुँह श्राप और कटुता से भरा है (पद 14); उसके पाँव लहू छिडकने के लिये वेगवान है (पद 15); उसके रास्ते अवरोध और रहस्य से भरे हुए है (पद 16); उसे शांति का रास्ता नहीं पता (पद 17); और

‘‘उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं''
       (रोमियों 3:18)।

सुसमाचार का यह भाग हकीकत में मनुष्यजाति को नकारात्मक रोशनी दिखाते है! डो. मार्टीन लोयड - जोनेस, उनकी रोमियों 5, की टीप्पणी में कहते है, ‘‘पापी घृणाजनक है, वह परमेश्वर के संसार में राक्षस समान है, वो पूरी तरह से तिरस्कार करने योग्य और दृष्ट है (डो. एम. लोयड - जोनेस, एम. डी. रोमन्स : एक्सपोझीशन अॉफ चॅप्टर 5, एश्युरन्स, बेनर अॉफ ट्रुथ ट्रस्ट, 1971, पृष्ठ 123)।

यहीं है जहाँ परमेश्वर के वचन अंदर आते है, ‘‘कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है'' (रोमियो 3:20)। फिर भी व्यक्ति यह स्वीकार कर सकता है कि उसने प्रभु की व्यवस्था बिना इससे व्याकुल हुए तोडी है। ‘‘पाप की पहिचान'' तीव्रता से व्याकुल सिर्फ तब होता है जब पवित्र आत्मा, पापी को उसकी अवस्था में जागृत करती है, कि वह स्वाभाविकरूप से इसका व्यसनी हो चुका है। नशे का धुम्रपान करनेवाली माता से जन्मे हुए बच्चे की तरह, वो स्वाभाविकरूप से उस नशे का आदि हो जाता है, इसीलिये आदम का बच्चा स्वाभाविकरूप से व्यवस्था तोडनेवाला पापी होता है उसके अंतःमन मे। महेरबानी करके यूहन्ना 16:8 पर फिरे। इसे जोर से पढीये।

‘‘और वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा'' (यूहन्ना 16:8)।

जब परमेश्वर की आत्मा पापी के पास आती है वो निरूत्तर, दोषी, तीव्रता से व्याकुल करते है आत्मा को, उसे बताते है कि वो प्रभु की व्यवस्था तोडने का आदि हो चुका है, और उसके अंदरूनी स्वभाव से वो प्रभु के विरूद्ध द्रोही है।

अब, क्या मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछ सकता हूँ? क्या आपने कभी भी पाप की शक्ति, पाप की आप पर पकड महसूस की है? क्या आपने कभी भी महसूस किया है कि आप भीतर से पापी हो? क्या आपने महसूस किया है, जैसा डो. लोयड - जोनेस ने इसे कहा है, कि आप ‘‘परमेश्वर के संसार में राक्षस समान है'' - कि आप पूरी तरह से तिरस्कार करने योग्य और दुष्ट हो।'' प्रभु की दृष्टि में? और, अगर आपने ऐसा कभी भी महसूस नहीं किया है तो, फिर यह आपके लिये सत्य नहीं है कि आप प्रभु की आत्मा द्वारा ‘‘निरूत्तर ... पाप के लिये'' नहीं गये हो? क्या आपने कभी भी सिमौन पतरस की तरह महसूस किया है जब उसने कहा, ‘‘हे प्रभु, मेरे पास से जा, क्योंकि मैं पापी मनुष्य हूँ''? (लूका 5:8)।

प्रभु की आत्मा का पहला काम है अपराधभाव लाना और अंतःकरण को सचेत करना। इसलिये सुसमाचार प्रचार करनेवालो का पहला काम है प्रभु की आत्मा के साथ काम करे, पापीयों से कहे कि उनमें ‘‘अच्छी वस्तु वास नहीं करती'' (रोमियों 7:18)। मसीह, सबसे, श्रेष्ठ सुसमाचार प्रचारक ने वह वचन कहे जो हम हर रविवार रात पढ़ते है। उनकी ओर फिरे लूका 13:24 में। यह पद जोर से पढ़ीये।

‘‘सकेत द्वारा से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ कि बहुत से प्रवेश करना चाहेंगे, और न कर सकेंगे'' (लूका 13:24)।

मसीह आपसे कहते है प्रयत्न करने, परिश्रम करने ‘‘अंदर प्रवेश करने'' उसे कष्ट दे। क्या आप वो करते हो? क्या आप धार्मिक प्रवचन पढते और फिर से पढते हो? क्या आप प्रभु से प्रार्थना और फिर से प्रार्थना करते हो आपको सचेत और व्याकुल करने? क्या आपने प्रार्थना की, जैसे लुथर कहेंगे, प्रभु के लिये आपको ‘‘निरूत्तर'' करने? और, अगर आप यह नहीं करते हो, क्या आप प्रमाणिकता से कह सकते हो कि आप ‘‘सकेत द्वार से प्रवेश'' पाने के लिये परिश्रम करते थे? और अगर आप प्रयत्न नहीं करते, हा लडते हो, अंदर प्रवेश पाने, आप कैसे आशा करते हो अपने अंत तक आने को? आखिरकार, ‘‘प्रयत्न'' करने का कारण मुक्ति प्राप्त करना नहीं है। नहीं! कदापि नहीं! प्रयत्न करने का कारण है आपको बताना कि आप मुक्ति से कितने दूर हो। प्रयत्न करने का कारण है आपको साबित करना कि आप अपने आपको सही नहीं कर सकते; आपको बताने कि आप परमेश्वर की आज्ञा नही मान सकते, कि आप उनके विरूद्ध द्रोही हो, पाप के व्यसनी और धार्मिकता के लिये मेरे हुए। प्रभु को जो स्तर चाहिये वो आप जैसे पाप के व्यसनी द्वारा पहुँच नहीं पाता!

क्या आपने कभी भी महसूस किया है कि आप मुक्ति से दूर हो? क्या आपने कभी भी महसूस किया है कि आप अपने आप को कभी भी ठीक नहीं कर सकते? क्या आप कभी भी व्याकुल हुए हो क्योंकि आप प्रभु के स्तर तक नहीं पहुँच सकते हो? क्या आपने कभी भी महसूस किया है कि आपका स्वभाव आपका मन, बहुत पाप भरा है प्रभु के समीप जाने?

फिर, अवश्य, आप भटक जायेंगे अगर हमने आपको धोखा दिया है आपसे वो करने को कहते हुए जो आप नहीं कर सकते। कदापि नहीं। हम आपसे करने कहते है जो करना आपके लिये योग्य है। और हम आपको वो करने को कहते है जो आप को बताने के लिये उचित है कि आप ‘‘स्वभाव से'' ‘‘क्रोध की'' संतान हो (इफिसियों 2:3)। र्ज्योज वाइटफिल्ड ने बार बार अपने बडे सुननेवालो से कहा कि वे कभी भी सच्चे मसीही नही बन सकते जब तक वे पूरे अपराधभाव और अपने स्वयं के स्वभाव का तिरस्कार महसूस नहीं करते। क्या आपने अपने अपराधभाव को महसूस किया है? क्या आपने महसूस किया है कि आप को प्रभु के लिये सच्चा प्रेम नहीं है? हा, उसका कोई भय भी नहीं? क्या आपने कभी भी महसूस किया कि आपको ‘‘आशाहीन और जगत में ईश्वर रहित (है) थे''? (इफिसियों 2:12)। क्या आपने कभी भी उस तरह महसूस किया है? और, अगर आपको कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ, तो आप ‘‘सकेत द्वार से प्रवेश'' पाने की इच्छा कैसे रख सकते हो? (लूका 13:24)। जोनाथन एडवर्डस ने कहा,

‘परिश्रम का ऐसा उत्साह और पूर्णता, साधारण अर्थ है कि परमेश्वर इस्तेमाल करते है लोगो के अपने स्वयं की पहेचना में, अपने स्वयं के मन को देखने, उनकी अपनी असहायता का ज्ञान करने, और उनकी अपनी ताकत और धार्मिकता में आशाहीन ... यह हमारा अपना अनुभव है, और जानकारी है की हम क्या है, कि प्रभु साधारण इस्तेमाल करते है हमारा जरिये की तरह (दूर लाने) हमारे सारे आधार से ... यह इसलिये बहुत गलत है (विचार जो किसी को हो) कि ज्यादा करो। उन्हें उस पर ज्यादा आधारित होना पड़ता है। जब कि सच्चाई इससे विपरित है; जितना ज्यादा वे करते है, या ज्यादा पूर्णता से वे परिश्रम (प्रयत्न) करते है, उन्हें अपने परिश्रम से कम आधार करना पडेगा और जल्दी वे देखेंगे जो उन्होंने किया है उसका जूठा अभिमान (जोनाथन एडवर्डस, वर्क्स, ध बेनर अॉफ ट्रूथ ट्रस्ट, भाग 1, पृपृष्ठ. 656 - 657; संदेश का शिर्षक इस भाग से लिया गया है।)''

सुसमाचार पापो की माफी से ज्यादा देता है। मसीह ने आपको अंदर से बदलना ही चाहिये। आपको ‘‘स्वभाव का बदलाव, अपने आपसे मुक्ति, नया जीवन'' मिलना ही चाहिये (इयान एच. मुरेय, ध ओल्ड इवान्झलीकलीझम, ध बेनर अॉफ ध ट्रूथ ट्र्रस्ट, 2005, पृष्ठ. 13)। क्या आपको अभी भी नया जीवन चाहिये? या क्या आप माफी चाहते हो ताकि आप लौटकर जा सको और आप पहले थे वैसे ही जी सको? क्या आप मसीह में प्रवेश पाने का प्रयत्न करते हो? या आप सिर्फ कलीसिया में स्वीकारे जाने के लिये चाहते हो? क्या आप फिर से जन्म लेने के लिये प्रयत्न करते हो, नये व्यक्ति की तरह जीने के नये तरीको के साथ? या आप सिर्फ खुशी महसूस करना चाहते हो ताकि आप अपने पुराने रास्तो पर लौट सके? महेरबानी करके खडे रहीये और लूका 13:24 जोर से पढ़ीये।

‘‘सकेत द्वारा से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ कि बहुत से प्रवेश करना चाहेंगे, और न कर सकेंगे'' (लूका 13:24)।

आप बैठ सकते हो।

वीलीयम वील्बरर्फोस, जिसने इंग्लेन्ड में गुलामो को मुक्त किया, उनकी परिवर्तन प्रार्थना, ‘‘ओ प्रभु, मुझे मुझसे मुक्त करो!'' के दौरान! क्या आपने कभी भी इस प्रकार प्रार्थना की है? क्या आप ये रविवार के धार्मिक प्रवचन बार - बार पढ़ते हो? क्या आप हर रात अपने पापी - स्वभाव के बारे में सोचते हो? क्या आप मसीह से प्रार्थना करते हो, आपको अपने आपसे मुक्त करने, हर रात सोने से पहले?

‘‘सकेत द्वारा से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ कि बहुत से प्रवेश करना चाहेंगे, और न कर सकेंगे'' (लूका 13:24)।

(संदेश का अंत)
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धार्मिक प्रवचन के पहले श्रीमान प्रुधोम्म द्वारा पढा हुआ पवित्रशास्त्र : रोमियों 3:9-20।
धार्मिक प्रवचन के पहले श्रीमान बेन्जामिन किनकेड ग्रीफिथ द्वारा गाया हुआ गीत :
‘‘अक्षम्य पाप'' (लेखक अनजान; ‘‘ओ सेट ये ओपन अनटु मी' की तर्ज पर)।