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प्रार्थना में क्रम और तर्क भाग −१

ORDER AND ARGUMENT IN PRAYER – PART I
(Hindi)

जोन सेम्यूएल कैगन
by Mr. John Samuel Cagan

शुक्रवार की संध्या, २ सितंबर, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में दिया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Friday Evening, September 2, 2016

''भला होता, कि मैं जानता कि वह कहां मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता! मैं उसके साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता'' (अय्यूब २३:३−४)


निम्नलिखित संदेश सी एच स्पर्जन के संदेश ''प्रार्थना में क्रम और तर्क पर'' आधारित है। स्पर्जन के संदेश साधारण अंग्रेजी भाषा में समाहित हैं। डॉ हिमर्स और डॉ कैगन के सहयोग से मैंने कुछ विचार और बाईबल के पद जोड़े हैं।

जिस पद को अभी पढ़ा गया है उसमें अय्यूब परमेश्वर को ढूंढता और उनसे प्रार्थना करना चाहता है। वह परमेश्वर से साधारण रूप में नहीं बोलना चाहता। अय्यूब के इरादों में कुछ गंभीर बात छिपी हुई थी। वह इस तरह सें बात करना चाहता है: ''मैं उसके साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता'' (अय्यूब २३:४) सचमुच में गंभीर प्रार्थना करने के लिये इस पद से − दो बातें सीखने को मिलती है।

१. पहला, गंभीर प्रार्थना क्रम में − संगठित होती है।

अय्यूब ने कहा, ''मैं उसके साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता'' (अय्यूब २३:४)

सोचिए कि आप किस बात के लिये प्रार्थना करने जा रहे हैं। सोचिए कि आप क्या चाहते हैं। किसी एक बात पर अपना ध्यान केंद्रित कीजिए। यह आपके लिए महत्वपूर्ण होना चाहिये। जोन आर राईस को किसी ने प्रार्थना के लिये निवेदन किया वे इसके लिये तैयार नहीं हुए। इसके बजाय उन्होंने कहा कि मैं परमेश्वर से प्रार्थना करूंगा कि मुझे इस बात के लिये प्रार्थना करने का बोझ दें। बिना लगन और बोझ के की गयी प्रार्थना सच्ची प्रार्थना नहीं कहलायेगी। आप वास्तव में कैसी प्रार्थना चाहते हैं? पता कीजिये कि क्यों चाहते हैं? जानने की कोशिश कीजिये कि यह क्यों नहीं हुआ? सोचकर देखिये कि यह आप की सामर्थ से बाहर की बात क्यों है? अगर आप के पास प्रार्थना करने के लिये लगन की आवश्यकता है तो लगन मांग कर देखिये। आधे अधूरे मन से की गयी प्रार्थना असंगठित होती है। यह उदासीन प्रार्थना कहलायेगी। अगर आप आधे अधूरे मन से कोई कार्य करते है तो इसका अर्थ है कि आप ने तैयारी नहीं की है। प्रार्थना करने के पहले स्वयं को तैयार कीजिये। अगर आप घर या समूह में प्रार्थना करने जा रहे हैं तो बिना योजना बनाये तात्कालिक उपाय पर निर्भर न रहें। आप का मन उस काम में तल्लीन होना चाहिये जो आप ने हाथ में लिया है। आप का ध्यान उस परिस्थिति पर होना चाहिये। आप को कुछ चाहिये आप को उस बात की तीव्र आवश्यकता है। पर आप उसे पा नहीं सकते। यह आप की प्रार्थना से बाहर है। यह आप के नियंत्रण से बाहर है। इसलिये आप यीशु के नाम से इस संसार के रचयिता के पास पहुंचते हैं। आप परमेश्वर को राजी करने के उददेश्य से परमेश्वर के पास पहुंचते हैं। अपनी आवश्यकताओं के लिये उसे सहमत करवाना चाहते हैं। यह एक गंभीर बात है। बिना ठीक ढंग से विचारे आप को ऐसा नहीं करना चाहिये। पहले सोचिए कि आप प्रार्थना किस बात के लिये कर रहे है।

अपनी प्रार्थना को संगठित कीजिए। कुछ लोग सोचते हैं कि प्रार्थना का अर्थ है कि निवेदनों के उस ढेर को बार बार दोहरा दिया जाये। कुछ लोगों के अनुसार प्रतिदिन की प्रार्थना में वही बात दोहराना आवश्यक है। अगर कोई उसी बात के लिये रोज प्रार्थना करता है तो उसके उपर वह सोचता नहीं है। उसने परमेश्वर के आगे अपनी प्रार्थना रखने में स्वयं को झोंका नहीं है। कुछ लोग प्रार्थना करने का अर्थ कुछ धार्मिक शब्दों का प्रयोग करना आवश्यक समझते है। पर गंभीर बातों का स्थान शब्दों के चयन से पूर्ण नहीं किया जा सकता। अगर मुझे आप से कुछ पैसे चाहिये तो मैं बड़े बड़े शब्दों के द्वारा अपने पक्ष को मजबूत नहीं बनाउंगा। अगर मैं एकाएक अपनी शब्दावली बदल दूं तो आप इससे सहमत नहीं होगें और जो मैं कहूंगा वह भी इतना प्रभावशाली नहीं कहलायेगा। एकजुट विचारों का स्थान धार्मिक शब्द नहीं ले सकते।

कुछ लोग प्रार्थना में परमेश्वर से चिल्ला कर कर बात करते हैं। लेकिन अपना पक्ष रखने के लिये व्यक्ति का सुर मायने नहीं रखता। न ही एक के बाद एक चीजों के वर्णन से कुछ होने वाला है। अगर कोई निवेदन आप के लिये आवश्यक है तो इस से कोई अर्थ नहीं निकलता कि आप जल्दी से दूसरे और तीसरे निवेदन पर पहुंच जायें। कुछ लोग साधारण शब्दों में निवेदन करते हैं ''प्रेमी परमेश्वर मेरे चर्च को आशीषित कीजिये भटके हुओं को बचाइये मुझे और मेरे परिवार को आशीषित कीजिये।'' पर ऐसे निवेदन में भी गंभीरता नहीं रहती है। इसमें गंभीरता की कमी दिखाई पड़ती है। यह क्रम से और संगठित प्रार्थना नहीं कहलाती है।

अगर आप कोर्ट में जज से कुछ कहने जा रहे हैं तो आप विचार करेंगे कि क्या कहना है। आप इस पर भी विचार करेंगे कि आप से क्या पूछा जा सकता है। उस का उत्तर किस प्रकार देंगे, आप सोचेंगे कि आप जज को कैसे आप की बातों से राजी करवायेंगे। मैं तो यह कहूंगा कि उस बातचीत की तैयारी में आप का जुड़ाव और तैयारी आप के निवेदन की गंभीरता को भी बढ़ायेगी। अगर आप अपने बॉस से बात करने जा रहे हैं तो आप विचार करेंगे कि क्या कहना है और कैसे अपनी बात रखेंगे। ऐसा ही परमेश्वर से प्रार्थना में कहिये। उथले विचार लेकर परमेश्वर के पास मत पहुंचिये। अधूरे विचारों के साथ परमेश्वर के पास मत पहुंचिये। स्वयं के उपर मेहनत कीजिये।

उस स्थिति के सारे प्रभावों को सोच कर देखिये। वह स्थिति न केवल आप को बल्कि आप के आस पास के लोगों को भी कैसे प्रभावित करेगी। यह स्थिति कैसे परमेश्वर की महिमा करेगी? यह स्थिति परमेश्वर की सेवकाई और उनके राज्य की बढ़ोतरी के लिये कैसे उपयोगी होगी? अगर प्रार्थना नहीं सुनी गयी तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? क्या होगा अगर आप की प्रार्थना को परमेश्वर ग्रहण कर लें? हर स्थिति के बहुत अलग अलग पहलू होते हैं। एक घटना या निवेदन आप के अपने अनुभव के आधार पर ही प्रारंभ या खत्म नहीं होता है। निवेदन महत्वपूर्ण है। यह आप के लिये महत्वपूर्ण है। यह आप के लिये, आप के परिवार के लिये, चर्च के लिये और परमेश्वर के लिये भी महत्वपूर्ण हो सकता है। स्मरण रखिये परमेश्वर सुन रहा है। परमेश्वर किसी जज या अधिकारी से बहुत बड़ा है।

प्रार्थना में आप का नजरिया कैसा रहता है्? केवल ''मिट्टी और राख'' (उत्पत्ति १८:२७) हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम परमेश्वर से कुछ मांगे। पर यीशु के नाम में हम परमेश्वर के ''अनुग्रह के सिंहासन के सामने'' आ सकते है (इब्रानियों ४:१६) । मसीह में होकर मसीह के द्वारा हम परमेश्वर के सामने आ सकते हैं। अगर आप यीशु के नाम में प्रार्थना करेंगे तो वह आप की प्रार्थना ऐसे सुनेगा जैसे अपने स्वयं के पुत्र यीशु मसीह की प्रार्थना को सुनता है। अगर आप ने मसीह के उपर विश्वास किया है तो आप तो मसीह के कारण ही परमेश्वर के बेटे और बेटियां कहलायेंगे। आप प्रिय है और स्वीकार किये गये हैं केवल यीशु के कारण। परमेश्वर आप की प्रार्थना सुनेगा!

सोचिये आप क्या मांगने जा रहे हैं। इस बात को स्पष्ट कीजिये आप क्या चाहते हैं। यीशु ने हमसे प्रार्थना करने को कहा, ''हमारी आज की रोटी आज हमको दीजिये'' (मत्ती ६:११)। अपने चेलों को प्रार्थना के लिये सिखाते हुये यीशु यह उदाहरण देते हैं, ''मित्र, मुझे तीन रोटी दे दो'' (लूका ११:५)

अगर आप किसी बात के लिये प्रार्थना करना चाहते हैं तो उस चीज को प्रार्थना में कहिये। अब्राहम ने प्रार्थना की, ''इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे यही बहुत है!'' (उत्पत्ति १७:१८) स्पर्जन ने कहा था, ''अगर आप इस्माइल कहना चाहते हैं, तो इस्माइल कहो।''

अगर आप किसी के मन परिवर्तन के लिये प्रार्थना कर रहे हैं, तो उसका नाम लेकर प्रार्थना कीजिये। जब आप प्रार्थना में कहीं मुख्य भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं तो परमेश्वर के सामने उस व्यक्ति का नाम अपने विचारों में रखें। किंतु अगर आप से वह बात कहना रह गयी हो तो आप फिर भी परमेश्वर से बिल्कुल वह बात कह सकते हैं जो आप चाहते हैं। परमेश्वर हमारी पीड़ा और दिल से निकली आह को सुन सकता है। अगर कोई निवेदन है तो उस विशेष बात को कहिये। ''मुझे यह नौकरी में मिलने में सहायता कीजिये।'' ''मेरी बीमारी को चंगा कीजिये या (किसी अन्य व्यक्ति की बीमारी को चंगा कीजिये)।'' ''मुझे सुसमाचार कार्य के लिये लोगों के नाम और फोन नंबर्स मिलने में सहायता कीजिये जिनसे मैं आज रात मिलूं उन लोगों के मनों को खोल दीजिये ताकि वे मुझे उनके नाम और फोन नंबर्स दे सके।''

अगर आप प्रार्थना में बिना सोचे समझे बोले जा रहे हैं तो आप ''व्यर्थ दोहराव'' कर रहे हैं। यीशु कहते थे, ''प्रार्थना करते समय अन्यजातियों की नाईं बक बक न करो क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी।'' (मत्ती ६:७) अगर आप घर में या चर्च में, बिना विचार किये व्यर्थ में प्रार्थना को सूची बद्व रूप में दोहरायें जा रहे हैं − तो यह किसी कैथोलिक रोजेरी को जपने जैसा होगा या बुद्विस्ट मंत्र पढ़ने जैसा होगा।

अगर आप हर प्रार्थना सभा में प्रार्थना की औपचारिकता निभाते हैं तो यह भी मंत्र दोहराने के समान होगा। वहां उत्तर मिलने की अपेक्षा मत कीजिये। सोचिये कि आप क्या प्रार्थना करने जा रहे हैं। आप परमेश्वर − एक विशेष व्यक्तित्व − से कुछ मांगने जा रहे हैं। तो परमेश्वर से बोलिये और आप जो चाहते हैं उसे मांगिये।

२. दूसरा, गंभीर प्रार्थनायें पक्ष रखती हैं − कारण प्रस्तुत करती हैं।

अय्यूब कहता है, ''मैं उसके.......... साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता'' (अय्यूब २३:४) ''मैं अपना मुंह उन तर्को से भर लेता कि क्यों परमेश्वर को मुझे वह चीज देना चाहिये।'' किस प्रकार के तर्क − कारण − प्रस्तुत किये जाने चाहिये?

पहले, परमेश्वर के गुण बताने चाहिये − कि वह कैसा है। अब्राहम ने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह सदोम को नष्ट न करे। वह कहता है,

''तब इब्राहीम उसके समीप जा कर कहने लगा, क्या सचमुच दुष्ट के संग धर्मी को भी नाश करेगा? कदाचित उस नगर में पचास धर्मी हों तो क्या तू सचमुच उस स्थान को नाश करेगा और उन पचास धर्मियों के कारण जो उस में हो न छोड़ेगा? इस प्रकार का काम करना तुझ से दूर रहे कि दुष्ट के संग धर्मी को भी मार डाले और धर्मी और दुष्ट दोनों की एक ही दशा हो। यह तुझ से दूर रहे क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?'' (उत्पत्ति १८:२३−२५)

अब्राहम ने परमेश्वर के न्यायी होने के कारण अपील की। वह कह रहा था, ''कदाचित उस नगर में ५० धर्मी हों तो क्या तू सचमुच उस स्थान को नाश करेगा?'' क्या यह उचित होगा? ''क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?'' उसने प्रार्थना में अपील करना जारी रखा जब तक कि १० धर्मी होने पर उस शहर को नष्ट नहीं करने पर परमेश्वर ने सहमति दे दी। ध्यान दीजिये कि अब्राहम लगातार अडिग बना रहा। अब्राहम के पास हिम्मत थी कि वह परमेश्वर के क्रोध के बजाय उनसे कारण जानना चाहता था। अब्राहम के पास विश्वास था वह उनसे करूणा दिखाये जाने की मांग कर रहा था। परमेश्वर के साथ तर्क करते हुए उसका परमेश्वर के गुणों में अगाध विश्वास था। अब्राहम परमेश्वर के साथ अशिष्ट नहीं बना। अब्राहम के मन में परमेश्वर के प्रति इतना सम्मान था कि वह परमेश्वर के व्यक्तित्व की गुणवत्ता से अपनी बात की मांग कर बैठा। अगर अब्राहम को परमेश्वर के न्याय में विश्वास नहीं होता तो वह अपील करने के स्थान पर चुप रहने में भलाई समझता। पर अब्राहम जानता था कि परमेश्वर न्यायी है इसलिये उसने परमेश्वर से बहस की और तर्क प्रस्तुत किये।

परमेश्वर आज भी ऐसा ही है। बाइबल कहती है, ''क्योंकि मैं यहोवा बदलता नहीं'' (मलाकी ३:६) बाइबल कहती है, ''यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एकसा है।'' (इब्रानियों१३:८) परमेश्वर आज भी वैसा ही है जैसे उस समय था। आप परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और वह आप की सुनेगा। जैसे उस समय लोग प्रार्थना करते थे और वह सुनता था। कोर्ट ऑॅफ लॉ में वकील पहले दिये गये निर्णयों का उदाहरण देते हुए भी अपील करते हैं। वे पूर्व निर्णय जो ऐसी ही किसी परिस्थिति में लिये गये होते थे। जब कभी आप बाइबल पढ़ते हैं और उस पर प्रचार सुनते हैं तो स्मरण रखिये कि आप ने क्या पढ़ा है, क्या कहा गया है। सोचिए कि परमेश्वर ने पूर्व में क्या किया था और वह आज भी कर सकते हैं। इस बात पर गौर कीजिये कि परमेश्वर ने आप के जीवन में क्या किया। इसे उदाहरण के तौर पर प्रयुक्त कीजिये कि भविष्य में परमेश्वर क्या कर सकते हैं। ध्यान दीजिये कि परमेश्वर ने आप के आस पास के लोगों के जीवन में क्या किया। यीशु ने अपने चेलों से कहा था कि जागते रहो और प्रार्थना करते रहो। आपकी प्रार्थना के उत्तर में जो असंबंद्व घटनाक्रम है उन्हें परमेश्वर की सामर्थ से सेतु बनाकर जोड़कर देखो। देखिये परमेश्वर के व्यक्तित्व से ये कितना मेल खाता है। स्मरण कीजिये पूर्व में परमेश्वर ने क्या किया था। परमेश्वर से अपील कीजिये। परमेश्वर से वैसे ही प्रार्थना कीजिये जैसे बाइबल में महान लोगों ने की।

दूसरा आप परमेश्वर के अस्तित्व से प्रार्थना कर सकते हैं। एलिय्याह ने बाल के नबियों का सामना किया। परंतु एलिय्याह ने प्रार्थना की कि उसकी होमबलि स्वीकार की जाये। एलिय्याह ने कहा,

''फिर भेंट चढ़ाने के समय एलिय्याह नबी समीप जा कर कहने लगा, हे इब्राहीम, इसहाक और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा! आज यह प्रगट कर कि इस्राएल में तू ही परमेश्वर है, और मैं तेरा दास हूँ, और मैं ने ये सब काम तुझ से वचन पाकर किए हैं। हे यहावा! मेरी सुन, मेरी सुन, कि ये लोग जान लें कि हे यहोवा, तू ही परमेश्वर है और तू ही उनका मन लौटा लेता है।'' (१ राजा १८:३६−३७)

एलिय्याह ने प्रार्थना की कि, ''प्रगट करें कि आप सच्चे परमेश्वर हैं।'' और परमेश्वर ने एलिय्याह को उत्तर दिया। परमेश्वर ने स्वर्ग से आग भेजी और उसकी होमबलि को भस्म किया।

सालों बाद, जब एलिय्याह स्वर्ग में उठा लिया गया उसके चेले एलिशा ने प्रार्थना की, ''प्रभु परमेश्वर आप कहां है?'' (२ राजा २:१४) ''परमेश्वर आप कहां हैं?'' परमेश्वर ने स्वयं को प्रगट किया और एलिशा के लिये यर्दन नदी का पानी विभक्त कर दिया। परमेश्वर ने दिखा दिया कि वह वास्तविक है।

तीसरा परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बारे में कहिये − क्योंकि वह अपने कहे गये वचन के प्रति वचनबद्व रहेगा। २ सेम्यूएल अध्याय ७ में, परमेश्वर ने नबी नातान के द्वारा दाउद से प्रतिज्ञा की थी कि उसे एक पुत्र होगा, जो परमेश्वर का मंदिर बनवायेगा, जो यरूशलेम के सिंहासन पर बैठेगा और इजरायल के लोग उसका राज्य सहन करेंगे। दाउद ने परमेश्वर से कहा,

''और तू ने अपनी प्रजा इस्राएल को अपनी सदा की प्रजा होने के लिये ठहराया और हे यहोवा, तू आप उसका परमेश्वर है। अब हे यहोवा परमेश्वर, तू ने जो वचन अपने दास के और उसके घराने के विषय दिया है उसे सदा के लिये स्थिर कर, और अपने कहने के अनूसार ही कर और यह कर कि लोग तेरे नाम की महिमा सदा किया करें, कि सेनाओं का यहोवा इस्राएल के ऊपर परमेश्वर है और तेरे दास दाऊद का घराना तेरे साम्हने अटल रहे। क्योंकि, हे सेनाओं के यहोवा, हे इस्राएल के परमेश्वर, तू ने यह कहकर अपने दास पर प्रगट किया है, कि मैं तेरा घर बनाए रखूंगा इस कारण तेरे दास को तुझ से यह प्रार्थना करने का हियाव हुआ है। और अब हे प्रभु यहोवा, तू ही परमेश्वर है, और तेरे वचन सत्य हैं, और तू ने अपने दास को यह भलाई करने का वचन दिया है तो अब प्रसन्न हो कर अपने दास के घराने पर ऐसी आशीष दे, कि वह तेरे सम्मुख सदैव बना रहे क्योंकि हे प्रभु यहोवा, तू ने ऐसा ही कहा है और तेरे दास का घराना तुझ से आशीष पाकर सदैव धन्य रहे।'' (२ सेम्यूएल ७: २४−२९)

दाउद ने परमेश्वर से अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरी करने के लिये प्रार्थना की कि ये बातें बीत जायें। बाइबल कहती है, ''वरन परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे'' (रोमियों ३:४) बाइबल कहती है, ''अगर मनुष्य झूठा भी हो परंतु परमेश्वर तो सच्चा है।'' बाइबल कहती है, ''तेरा परमेश्वर यहोवा ही परमेश्वर है, वह विश्वासयोग्य ईश्वर है और जो उस से प्रेम रखते और उसकी आज्ञाएं मानते हैं उनके साथ वह हजार पीढ़ी तक अपनी वाचा पालता और उन पर करूणा करता रहता है।'' (व्यवस्थाविवरण ७:९) परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करता है। आप प्रार्थना में उसकी प्रतिज्ञाओं का उल्लेख कर सकते है। मैं अगले संदेश में इस विषय को जारी रखूंगा।

प्रार्थना में क्रम बनाये रखने और अपने तर्क कहने के लिये बहुत विचार और तैयारी चाहिये होती है। अपने को अलग करके सोचिए कि आप परमेश्वर से वास्तव में क्या चाहते हैं। बहुत ध्यानपूर्वक विचार कीजिये कि आप को इस निवेदन के लिये परमेश्वर से उत्तर मिलने के लिये निर्भर रहना है। जब आप सहमत हो जायें कि इस आवश्यकता को परमेश्वर के सामने रखा जायें तब इस बात पर विचार केंद्रित कीजिये कि ऐसा क्यों होना चाहिये। आप का यह निवेदन क्यों महत्वपूर्ण है? क्यों महत्वपूर्ण है कि आप का निवेदन स्वीकार किया जाये? इस विचार को अपने भीतर अत्यंत तीव्र आवश्यकता और भार के रूप में विकसित कीजिये। आप की इच्छा की तीव्रता आप के भीतर संगठित तर्क को प्रस्तुत करने में सहायता देगी। मजबूत तर्क एक सोचविचार करने वाले मन से ही निकलता है। अपने निवेदन पर सभी दृष्टिकोण से देखिये। आवाज बढ़ाकर की गयी प्रार्थना या व्यर्थ के दोहराव से दूर रहिये। बिना सोचे विचारे प्रार्थना को दोहरायें नहीं। बहुत साधारण रूप में की गयी प्रार्थनाओं की उपेक्षा करें। प्रार्थना में अपनी बात सीधे रखें। अपनी प्रार्थनायें इस बात पर आधारित रखें कि परमेश्वर ने बाइबल में क्या किया है। बार बार शब्द दोहराकर परमेश्वर से उसके उत्तर दिये जाने की अपेक्षा मत कीजिये। यद्यपि परमेश्वर के सामने कारण उपस्थित करते हुए और क्रम के अनुसार प्रार्थना करें। परमेश्वर से तर्क कीजिये। परमेश्वर के गुणों से अपील कीजिये। परमेश्वर के अस्तित्व से अपील कीजिये। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से अपील कीजिये। परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं का सम्मान करेगा। परमेश्वर आप के हृदय से उठती क्रमबद्व प्रार्थनाओं का उत्तर देगा।

''भला होता, कि मैं जानता कि वह कहां मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता! मैं उसके साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता'' (अय्यूब २३:३−४)


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(संदेश का अंत)
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रूपरेखा

प्रार्थना में क्रम और तर्क भाग −१

ORDER AND ARGUMENT IN PRAYER – PART I

जोन सेम्यूएल कैगन

''भला होता, कि मैं जानता कि वह कहां मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता! मैं उसके साम्हने अपना मुक़द्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता'' (अय्यूब २३:३−४)

१.  पहला, गंभीर प्रार्थना क्रम में − संगठित होती है, उत्पत्ति १८:२७;
इब्रानियों ४:१६; मत्ती ६:११; लूका ११:५; उत्पत्ति १७:१८;
मत्ती ६:७

२.  दूसरा, गंभीर प्रार्थनायें पक्ष रखती हैं − कारण प्रस्तुत करती हैं।
उत्पत्ति १८:२३−२५; मलाकी ३:६; इब्रानियों १३:८; १ राजा
१८:३६−३७; २ राजा २:१४; २ सेम्यूएल ७: २४−२९; रोमियों ३:४;
व्यवस्थाविवरण ७:९