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तार्किक उत्साह

LOGIC ON FIRE!
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, ११ अक्टूबर, २०१५ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में
प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Morning, October 11, 2015

''मैं ने उस से कहा; हे स्वामी, तू ही जानता है: उस ने मुझ से कहा; ये वे हैं, जो उस बड़े क्लेश में से निकल कर आए हैं; इन्होंने अपने अपने वस्त्र मेम्ने के लोहू में धो कर श्वेत किए हैं।'' (प्रकाशितवाक्य ७:१४)


डॉ डब्ल्यू ए किसवेल टेक्सास के फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च डलास, में महान पास्टर रहे। वह वहां लगभग साठ वर्षो तक प्रचार करते रहे। अस्सी की उम्र आते आते इस सफेद बालों वाले दक्षिण बैपटिस्ट कन्वेंशन के संरक्षक ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के अंत के बारे में भविष्यवाणी की। डॉ किसवेल ने कहा था,

हम नैतिकता के परम आदर्श से हट चुके हैं........सरकार और राजनीतिज्ञ हत्याओं झूठ और चोरी को न्यायसंगत ठहराते हैं.......प्राध्यापक (हमारे कालेज के) स्वछंद संभोग को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर न्यायसंगत ठहराते हैं। पुल्पिट के पास्टर, परमेश्वर के वचन पर असंख्य (प्रहार) को, सिद्वांतक स्वतंत्रता के नाम पर क्षमा कर देते हैं; हम स्वयं इसे अपनी (दक्षिणी बैपटिस्ट) सेमनरी और युनिवर्सिटीज में करते हैं। अश्लीलता, हिंसा और अनैतिकता गीत, नाटकों, रेडियो और टीवी में स्वीकार कर लिये गये हैं। यह पीढी और आने वाली पीढियां भौतिकतावाद औेर सुखवाद ओैर आमोद प्रमोद में डूब जायेंगी....... संपूर्ण (पश्चिमी) ससांर १२५००० की दर से प्रतिदिन अमसीही बनते जा रहे हैं (डब्ल्यू ए क्रिसवेल, पी एच डी, ग्रेट डाक्ट्रिन आफ द बाइबल, वाल्यूम ८, जोंडरवन पब्लिशिंग हाउस, १९८९, पेज १४८ ,१४७)

चूंकि डॉ क्रिसवेल ने यह दुखद रिपोर्ट पेश की कि दक्षिणी बैपटिस्ट खत्म होते जा रहे हैं

हर साल उनकी संख्या गिरती जा रही है। पिछले साल अकेले २००००० दक्षिणी बैपटिस्टों ने उनके चर्चेस को कभी न वापस लौटने के लिये छोड दिया है। प्रतिवर्ष इस देश में अकेले १००० दक्षिणी बैपटिस्ट चर्च अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। पिछले साल दक्षिणी बैपटिस्टों को अपने ८०० मिशनरियों को संसार भर फैले विदेशी मिशन से वापस बुलाना पडा। मिशन के लिये दान की राशि इतनी अपर्याप्त हो गई कि उन्हें सहायता भेजना मुश्किल होने लगा। और हमारे स्वतंत्र बैपटिस्ट चर्च भी इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। असेंबली आफ गॉड के एक पास्टर ने बताया कि उनका डिनोमीनेशन भी इतनी अच्छी प्रगति नहीं कर रहा है। दूसरे अन्य डिनोमीनेशंस की हालत भी बदतर हो जा रही है। मेरे हाथ में ये दो किताबें हैं जो यह हालत बयां कर रही हैं। एक का नाम है, दि ग्रेट इवेंजलीकल रिसेशन: ६ फेक्टर्स दैट विल केश दि ऐमेरिकन चर्च (जॉन एस डिकरसन, बेकर बुक्स, २०१३) दूसरी किताब का शीर्षक है, दि कमिंग इवेंजलीकल क्राइसिस (जॉन एच आर्मस्ट्रॉंग, जनरल एडीटर, मूडी प्रेस,१९९६) जो भी किताब मैं पढता हूं, या जो भी लेख देखता हूं, वे सब इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हमारे इवेंजलीकल चर्च बडी परेशानी में है। जो जवान बच्चे चर्च में बडे हुये वे ही चर्च छोडकर जा रहे हैं, और चर्च उनको इस संसार से वापस लौटा लाने के लिये समर्थ नहीं है। जॉन डिकरसन का कथन है, ''कि हम नये चेले बना पाने में असमर्थ है हमारे पहले से ही मौजूद चेले भी सामान्यत: अपनी जीवन शैली में इतने फलदायी नहीं हैं और विचारों में इतने परिवर्तित नहीं हैं।'' (पूर्वोक्त, पेज १०७,१०८) पर उन्होंने इस समस्या के हल बतौर बहुत सारी बातें भी बताई। मैंने उन सब पर अमल किया, पर यही पाया कि वे कारगर नहीं हैं। क्यों? क्योंकि वे समस्या की जड तक नहीं जाती हैं।

मेरा ही उदाहरण ले लीजिये। एक किशोर के रूप में मैं मानो एक पके फल की भांति था, जिसे लोग तोडने को तैयार हो जाते हैं। मैं चर्च जाना चाहता था। मैं एक टूटे परिवार से था। मैं अपने माता पिता के साथ नहीं रहता था। मैं सचमुच चर्च का हिस्सा होना चाहता था। परंतु श्वेत लोगों के हंटिगटन पार्क, कैलीफोर्निया के (कोकेशियन) चर्च ने मुझे नहीं लिया! इसके कई कारण थे − उस चर्च की आराधना मध्य वय की महिलाओं को प्रसन्न करने के लिये आयोजित की जाती थी, न कि एक खोये हुये किशोर को लेने के लिये। चर्च में आने वाले लोगों की भी मुझमें कोई रूचि नहीं थी। यहां तक कि पास्टर भी मुझमें इतनी रूचि नहीं रखते थे। आखिरकार मैं सिर्फ एक किशोर था जिसके पास कोई पैसा नहीं था, और मेरे घर का वातावरण भी बुरा था। इसके अलावा वहां प्रचार भी किया जाता था। जब तक मैं वहां था मैंने तीन पास्टर्स का कार्यकाल देखा। मैंने उनको सुनने का भरसक प्रयास किया लेकिन सच कहूं तो मुझे उनके प्रचार की कोई बात याद नहीं रही! पहले दो पास्टर्स का कहा तो बिल्कुल भी याद नहीं रहा। अंतिम वाले ने भी ऐसा कुछ खास नहीं कहा। उनके संदेशों ने मुझसे कभी बात ही नहीं की। उन संदेशों ने मुझे कभी प्रेरित ही नहीं किया। उन्होंने कभी मुझे चुनौती नहीं दी। उन संदेशों ने मुझमें मेरे पाप के प्रति बोध ही उत्पन्न नहीं किया।

हमारी समस्या की जड यहां है − प्रचार में! जब तक हमारे प्रचार करने में बदलाव नहीं आयेगा तब तक कुछ आशा नहीं है − बिल्कुल भी नहीं − हमारे चर्चेस के लिये! मैंने जॉन जे मरे द्वारा लिखित बैनर आँफ ट्रूथ में फरवरी २०१४ में छपा एक लेख पढा था। उन्होंने सात बिंदु दिये थे ''उन दशाओं के उपर जिनसे हमें छुटकारा चाहिये था।'' मैं उनके द्वारा दिये गये सभी बिंदुओं पर सहमत हूं, पर जिस क्रम में वे दिये गये हैं उस पर असहमत हूं। उन्होंने ''सामर्थशाली प्रचार'' किया पर सातवीं बात का क्रम बदलने की आवश्यकता है। मैं इससे असहमत हूं। मैं सोचता हूं कि यह पहली बात होना चाहिये। उन्होंने कहा कि हमें ''सामर्थशाली प्रचार की कमी से छुटकारा'' पाये जाने की आवश्यकता है। उनका कहना था, ''कि प्रचार आजकल इतना प्रसिद्व नहीं है।'' क्यों नहीं हैं? क्योंकि यह उबाउ लगता है। यह सीधी सी बात है! उन्होंने कहा, ''कि परमेश्वर के वचन सुनने का अकाल पडता जा रहा है।'' सुनने का अकाल क्यों पडता जा रहा है? क्योंकि प्रचार उबाउ हो गया है। सीधी सी बात है! लेकिन आजकल का प्रचार इतना उबाउ क्यों होता जा रहा है? इसके कई कारण है।

पहले स्थान पर, कई प्रचारको को ''प्रचार के लिये बुलाहट'' ही नहीं मिली है। हम तो यह सोचते भी नहीं है कि ''प्रचार के लिये बुलाहट'' भी कोई आवश्यक बात है। कई प्रचारक का तो नया जन्म भी नहीं हुआ है। जिन्होंने नया जन्म पाया है उन्हें प्रचार के लिये कोई बुलाता नहीं। अधिकतम प्रचारकों के पास भटके हुये लोगों के लिये कोई बोझ ही नहीं है, न कोई डर है, न कोई अभिषेक, न वे खोये हुये लोगों के लिये तरस से भरे हुये हैं। उनमें से अधिकतर तो शिक्षा और प्रचार के बीच अंतर भी नहीं जानते! कई वर्षो तक डॉ तिमोथी लिन मेरे पास्टर रहे। उन्होंने बताया कि एक सेमनरी प्राध्यापक ने यह टिप्पणी की थी, ''कि शिक्षा और प्रचार के बीच कोई अंतर नहीं है।'' डॉ लिन का कथन था, ''कि एक सेमनरी प्राध्यापक होने के नाते वह शिक्षा और प्रचार के बीच भी अंतर नहीं बता पाये। क्या उनके विद्यार्थी प्रचार कर पायेंगे? उत्तर स्पष्ट है ‘नहीं’'' (दि सीक्रेट आफ चर्च ग्रोथ, पेज २०)

जॉन मेकआर्थर को सुनिये। क्या वह प्रचार कर रहे हैं? जॉन पाइपर को सुनिये। क्या वह प्रचार कर रहे हैं? क्या ये सब प्रचार कर रहे हैं? क्या ये लोग जानते भी हैं कि प्रचार क्या होता है? उनमें से कुछ तो अच्छे लोग है हां वे अच्छे लोग हैं, पर मैं नहीं मानता कि वे जानते हैं कि वास्तविक प्रचार क्या होता है। डॉ मार्टिन ल्योड जोंस ने कहा था, ''प्रचार क्या है? तार्किक उत्साह! तार्किक उत्साह प्रचार वह प्रचार है इसमें जोशीला प्रचारक धर्मसिद्वांत से होता हुआ प्रचार करता हैं'' (प्रीचिंग ऐंड प्रीचर्स, पेज ९७) जिन लोगों के नाम मैंने लिये क्या उनमें वह उत्साह है? क्या उन्होंने कभी किसी प्रचारक के बारे में भी सुना है जो उत्साह और लौ से भरा हो? ऐसा एक ही व्यक्ति था जो रेडियो पर प्रचार करता था और जिनका देहांत हुये ३० साल बीत गये! आज कौन आलिवर बी ग्रीन के समान प्रचार कर सकता है? हां, ''प्रचार वह धर्मसिद्वांत है जिसे अति उत्साह से भरा जन प्रचार करता हैं'' − जैसे लूथर के समान व्यक्ति, वाईटफील्ड के समान व्यक्ति, हॉवेल हैरिस के समान, डेनियल रॉलैंड, डब्ल्यू पी निकलसन, डॉ जॉन सुंग, स्पर्पन के समान, मैकेने के समान, जॉन सैनिक या जॉन नॉक्स के समान।

इसी बैनर आफ ट्रूथ मैगजीन में जॉन नॉक्स के उपर एक लेख था (पेज २९, ३०) । लेख कहता था कि नाक्स ''सामर्थ'' के साथ प्रचार करते थे। उनका संदेश ''आकाश से बिजली चमकने के बल के साथ'' सुनाया जाता था। लेख के सारांश में यह लिखा था, ''कि अगर चर्च को इन दिनों में फिर से पुर्नजागरण देखना है तो ऐसे जोशीले प्रचारको की आवश्यकता है......प्राचीन समय के नॉक्स के समान, उन्हें परमेश्वर की तरफ से प्राप्त पूर्ण सम्मति का (चाहे वह) प्रसिद्व हो या नहीं हो, बिना रूकावट व झिझक के खुलकर, प्रचार करना चाहिये।'' जॉन नॉक्स के समान सुसमाचार प्रचार का तरीका मेरा भी तरीका हो; जिसने संपूर्ण स्कॉटलैंड को थरथरा दिया था और अब वह दुबारा इंग्लैंड को थरथरा दे।'' (आँटोबायोग्राफी, वाल्यूम १, पेज १६२)

ऐसे प्रचारकों से दूर हटिये जो अपने नर्म शब्दों से हमको सुला देते हैं और जिनके संदेश में स्त्रियोचित नरमाई हो! ये हमें उबा देते हैं! ये जीवन के अंत तक हमें उबा देते हैं! तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं कि हमारी युवा पीढी उनको सुनना पसंद न करे! ''प्रचार वह धर्मसिद्वांत है जो जोशीले व्यक्ति के द्वारा प्रगट किया जाता है!'' तो ऐसे प्रचारक किससे डरते हैं? जरा सोचिये! किसी न किसी से तो डरते होंगे! कौन हैं ये लोग? मैं आप को बताता हूं ये आधुनिक प्रचारक किससे डरते है? ये उन मध्य वय की संसारी स्त्रियों से डरते हैं जो उनके चर्च को चलाती हैं। वे कैसे चर्च को नियंत्रित करती हैं? ''अगर आप ऐसा प्रचार करेंगे तो हम नहीं आयेंगे उनका ऐसा कहना बहुत असरकारी होता है!'' मैं जानता हूं यह धमकी कितना काम करती है! उन्होंने ऐसी कोशिश हमारे यहां भी की थी! मैंने तो अपना प्रचार जारी रखा जैसा मैं हमेशा करता हूं − जब तक कि मैंने उन्हें रूकने के लिये तैयार न कर दिया! जॉन नाक्स कभी भी निर्दयी मेरी से नहीं डरे − तो हमें भी इन संसारी बातों वाली चर्च में आँरगन बजाने वाली या संडे स्कूल की अध्यक्षा से नहीं डरना चाहिये! मेरे विचार से हमें इन्हें प्रचार करना चाहिये तब अच्छे जवान बच्चे चर्च आने लगेंगे! तब उबाउ वातावरण नहीं होगा! इससे जवान लोगो का ध्यान चर्च में लगेगा! तब जाकर ऐसे जवानों का समूह तैयार होगा जो परमेश्वर के लिये जोश से भरे हो − जैसे आज रविवार सुबह हमारे चर्च में ऐसे युवा मौजूद हैं! भय खाना छोड दीजिये और जॉन नौक्स के समान प्रचार कीजिये।

प्रचार करना केवल सूचनायें देना भर नहीं है! आजकल के ''व्याख्यात्मक संदेशों'' से दूर हो जाइये। उनसे दूर रहिये! डॉ ल्योड जोंस केवल एक या दो पद ही प्रचार करते थे, जैसा कि प्यूरीटंस करते थे। उनका कथन था, ''कि प्रचारक पुल्पिट पर मात्र ज्ञान और सूचनायें देने के लिये ही नहीं है वह उन्हें प्रेरित करने के लिये है, उनमें जोश भरने के लिये है, उनमें साहस भरने के लिये है, और उन्हें आत्मा में आनंदित करके विदा करने के लिये है'' (दि प्यूरीटंस, पेज ३१६)

''दि डाक्टर'' ऐसा कहता हैं कि ''प्रचार,'' ऐसा होना चाहिये कि वह लोगो के लिये कुछ करे'' (ल्योड जोंस, प्रीचिंग ऐंड प्रीचर्स, पेज ८५) प्रचार को लोगों के लिये क्या करना चाहिये? तो, पहले स्थान पर, यह लोगों को नाराज करेगा या भयभीत! नाराज इसलिये करेगा क्योंकि आप उनसे कह रहे हैं कि आप का मन अपवित्र या विद्रोही है! इसलिये नाराज करेगा क्योंकि आप उन को बता रहे हैं कि आप इतने चुस्त और सुंदर नहीं हैं जितना आप सोचते हैं। क्योंकि वे चुस्त हैं इसलिये अविश्वासी बने हुये हैं? उनमें से एक भी डॉ चान जैसा चुस्त नहीं है। उनमें से एक भी डॉ कैगन जैसा चुस्त नहीं है। उनमें से एक भी मेरे जैसा चुस्त नहीं है, यह मेरा अपना ढंग है, और मैं इसे जानता हूं। इसलिये मैं ऐसे लोगों से डरता नहीं हूं! रॉन रीगन ने पिछले सप्ताह टीवी पर कहा, ''कि मैं रॉन रीगन हूं। मैं जीवन भर आस्तिक रहा हूं। मैं नर्क में जलने से डरता नहीं हूं।'' क्या वह कुत्सित, बीमार, बैले नर्तक वास्तव में ऐसा सोचता है कि वह अपने पिता, रोनॉल्ड रीगन से अधिक चुस्त है? उसने अपने पिता के लिये कभी एक मोमबत्ती नहीं जलाई होगी। ऐसा व्यक्ति न तो अच्छा लेखक हो सकता है, न अच्छा वक्ता, न इस स्वाधीन संसार का नेता, जैसे २० सदी के उत्तरार्ध में उसके पिता थे एक महानतम राष्ट्रपति! वह एक विचित्र बैले नर्तक से उपर कभी कभी नहीं उठ पायेगा (जो वह था) − और जो वह बैले नर्तक ही रहा है ताकि केवल अपने मरे पिता के नाम से पैसा कमा सके! नहीं वे अविश्वासी नहीं है क्योंकि वे चुस्त हैं मैं कहता हूं कि वे अविश्वासी हैं क्योंकि वे इस सत्य का सामना करने से बचते हैं कि उनका दुष्ट हृदय अविश्वास से भरा है उनका हृदय अपने बनाने वाले के प्रति विद्रोही विचारों से भरा है ''ऐसा मत कहिये आप उन्हें डरा देंगे!'' तो, मैं ऐसा प्रचार कर सकता हूं कि एक जन डर जाये पर यह दो को भी डरा कर भीतर ला सकता है − कहने का तात्पर्य हम इसी रीति से तो आगे निकलेंगे! अगर मैं इस तरह प्रचार नहीं करूं तो कोई भी नहीं बचेगा। मुझे अपने प्रचार में बताना पडेगा कि आप का हृदय मैला, अशुद्व, विचित्र, और विद्रोही है! और मुझे आप को यह भी बता ना होगा कि प्रभु यीशु ने कहा था कि आप अपने पापों के कारण नर्क में जा पडोगे। रॉन रीगन नर्क से नहीं डरता क्योंकि वह इतना बडा मूर्ख है जो स्वयं को प्रभु यीशु से, और अमेरिका के राष्ट्रपति से भी बढकर होशियार समझता है। ऐसे मूर्ख जन की आप कोई सहायता नहीं कर सकते। मूर्खो के विषय में बाइबल कहती है ''मूर्ख ने अपने मन में कहा है, कोई परमेश्वर है ही नहीं।'' (भजन १४:१) वह अब इतना उम्रदराज हो गया है कि अब बैले नर्तक भी नहीं हो सकता। वह अपने पिता के विश्वास का मखौल उडा कर केवल पैसा कमा सकता है। कितना गिरा हुआ आदमी है! अब तो वह बूढी औरत जैसा दिखने लगा है! एक सांसारिक गिरा हुआ आदमी!

जिनके हृदय परमेश्वर के प्रति विद्रोह से भरे हैं नर्क उनका इंतजार कर रहा है! प्रभु यीशु मसीह ने कहा था,

''तब राजा ने सेवकों से कहा, इस के हाथ पांव बान्धकर उसे बाहर अन्धियारे में डाल दो, वहां रोना, और दांत पीसना होगा। क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं'' (मत्ती २२:१३, १४)

हां, नर्क की ज्वाला ऐसे लोगों का इंतजार कर रही है जो अभी तक विद्रोही बने रह कर प्रभु यीशु मसीह का इंकार कर रहे हैं!

परंतु ''(परमेश्वर) नहीं चाहते, कि कोई नाश हो'' (२ पतरस ३:९) । इसलिये उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को पापियों के स्थान पर, उनके एवज में, क्रॉस पर मरने के द्वारा पापों का दंड भरने के लिये भेजा।

इस तरह यह हमको, अपने पद पर, पुन: लौटा लाता है। शिष्य यूहन्ना को स्वर्ग का दर्शन मिला था। वह देखते हैं कि ''एक ऐसी बड़ी भीड़, हर एक जाति, और कुल, और लोग, वह देखते हैं कि अलग भाषा वाले लोग (जो) जिसे कोई गिन नहीं सकता था सिंहासन के साम्हने और मेम्ने के साम्हने खड़ी है.........ये वे हैं, जो उस बड़े क्लेश में से निकल कर आए हैं; इन्होंने अपने अपने वस्त्र मेम्ने के लोहू में धो कर श्वेत किए हैं हो'' (प्रकाशितवाक्य ७:९, १४। जो स्वर्ग में हैं वे यीशु के लहू से शुद्व किये गये हैं, क्योंकि ''उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है'' (१ यूहन्ना १:७) । डॉ एंड्रयू मरे (१८२८−१९१७) ने कहा था,

मैं मृत्यु से पूरे आत्म विश्वास से मिल सकता हूं − मुझे स्वर्ग जाने का भी अधिकार है.......वे कौन होंगे जिन्हें परमेश्वर के सिंहासन के सामने जगह मिलेगी? ''उन्होंने अपने वस्त्र मेम्ने के लोहू में धो कर श्वेत किए हैं हो''.......अगर आप ने मेम्ने के उस बेशकीमती लहू में धुलकर पापों से शुद्धता नहीं पायी है तो आप स्वयं को स्वर्ग जाने की झूठी आशा में मत रखिये। बिना यह जाने कि यीशु ने उनके बेशकीमती लहू से आपके पापों को शुद्ध कर दिया है मृत्यु से मिलने का साहस मत कीजिये। (एंड्रयू मरे, डी डी, दि पॉवर आँफ दि ब्लड आँफ जीजस, सी एल सी पब्लिकेशंस, २००३ संस्करण, पेज २२१)

मैं आज सुबह आपको यीशु पर विश्वास लाने के लिये चुनौती देता हूं। जिस क्षण आप एकमात्र यीशु पर विश्वास लायेंगे आप उनके पवित्र लहू में धुलकर शुद्व हो जाते हैं! तब आप एक सच्चे मनुष्य बनते हैं! तब आप क्रॉस के सच्चे सिपाही बनते हैं!

हमारे चर्च में अभी अभी परिवर्तित कुछ लोगों की गवाही सुनिये। ये सच्चे जवान हैं जो आज सुबह यहां आपके साथ गवाही बांटना चाहते हैं। एक जवान लडकी ने अपनी गवाही दी,

डॉ हिमर्स ने मुझसे पूछा था ''क्या आप यीशु पर विश्वास करेंगे?'' ''घुटने के बल बैठ जाइये और उस पर विश्वास लाइये।'' मैंने किया। मैंने यीशु पर विश्वास किया। मैंने स्वयं को यीशु के हवाले कर दिया। यीशु मुझसे प्रेम करते हैं! यीशु मुझसे प्रेम करते हैं! कोई प्रश्न शेष नहीं रहा था और किसी आश्वासन की जरूरत नहीं थी.......यीशु मुझसे प्रेम करते हैं! उन्होंने क्रॉस पर लहू बहाया और अपना बलिदान दिया ताकि यह बलिदान देने के द्वारा मेरे पापों का दंड चुका सके.......उनका प्रेम कितना अदभुत है! मैं परमेश्वर का धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने अपने पुत्र की ओर मुझे खींचा। मैं यीशु से प्रेम रखती हूं क्योंकि उन्होंने मुझसे पहले प्रेम रखा।

यहां कालेज के लडके की ओर से एक गवाही और है,

जिस सुबह मैं बचाया गया था। उस दिन डॉ हिमर्स ने प्रचार किया था कि शैतान किस रीति से उन लोगो को अंधा कर देता है जो बिना मसीह के होते हैं। उन्होने बताया कि शैतान की एक युक्ति यह है कि वह भटके हुये इंसान के मन में इस तरह काम करता है कि वह व्यक्ति विचार करने लगता है कि उसके भीतर आश्वासन पैदा होना आवश्यक है ताकि वह काउंसलर से कुछ कह सके। मैंने अपने आप में सोचा, ''यही तो मेरे साथ होता है! मैं बिल्कुल यही तो सोच रहा था''....... मैं ऐसे चक्र में फंसा हुआ था और एक बार भी यीशु की ओर नहीं देखा। वहां जीवन मेरे लिये, इंतजार कर रहा था, और मैं यहां सोच रहा था कि यीशु के साथ जीवन बिताने में कोई खतरा तो नहीं है......कैसे मै उनको पुन अस्वीकार कर सकता हूं?'' मैं पाप में कैसे डूबा रह सकता हूं और यीशु की ओर नजर न उठाउं? वह जो मेरी आत्मा से प्रेम रखता है? ओह, कितनी बेसब्री से मुझे से मुझे उनकी आवश्यकता थी कि यीशु मेरे कंधो से पाप का बोझ उतार ले। एक ओर मेरे मन का अंधकार जोर मार रहा था और दूसरी ओर यीशु की सुंदरता और धार्मिकता थी.....अब मैं शैतान के झूठ और अधिक सहन नहीं कर सकता था। अब मुझे और अधिक इंतजार नहीं करना चाहिये! इंतजार करना अर्थात बंधन में पडे रहना, और शैतान के गुलाम बने रहना। मुझे यीशु के पास अपने पापों से मुक्ति पाने के लिये जाना ही था। इसलिये मैं उनके पास गया!... धन्यवाद हो परमेश्वर पिता का कि उन्होंने अपने पुत्र यीशु को मुझे बचाने को भेजा कि वह अपने लहू से मेरे पापों को क्षमा करें!

और यहां एक ओर गवाही है। ये सब सच्चे जवान बच्चे हैं। इनमें से एक इसी चर्च में पले बढे हैं। अन्य दो कालेज जाने वाले युवक हैं जो सुसमाचार सुनाने के लिये यहां लाये गये हैं। इनमें से एक वह जवान है जो कभी चर्च नहीं गये इसके पहले कि हम उन्हें अपने यहां लेकर कर आये। उनका कथन है,

     मैंने इस संसार के बारे में इतना नहीं सोचा था लेकिन हाई स्कूल के बाद मैंने इसमें बहुत बदलाव पाया। मैं केवल समय व्यतीत करने के उददेश्य से जीवन जी रहा था। स्कूल से स्नातक हो जाना, अच्छी नौकरी, और अच्छा परिवार प्रारंभ करना। यह मेरा आदर्श भविष्य था पर यह सब मेरे लिये अर्थहीन था। उस समय किसी ईश्वर पर मेरा कोई विशेष विश्वास नहीं था − केवल उन पर जिनके नैतिक आदर्श अच्छे माने जाते थे। अलग अलग धर्मो की बात मेरे लिये बहुत रूचिकर थी। यद्यपि यीशु मेरे लिये उस समय एक धार्मिक व्यक्ति से बढकर कुछ नहीं थे। उनका क्रूसीकरण मेरे लिये बस एक कहानी से अधिक नहीं थी।
     सुसमाचार सुनने के बाद मेरे अंदर जिज्ञासा जागी, कि यीशु कौन हैं। मेरे पापमयी स्वभाव में रहकर, मैं सोचने लगा कि कैसे बाइबल पढकर और अन्य लोगों को देखकर मैं स्वयं को बचा सकता हूं। हर बार जब मैंने यीशु पर विश्वास करने का प्रयत्न किया मैं असफल हो गया, और जब मैंने सोचा कि मैं बच गया हूं तो वह मैं स्वयं ही था जो अपने प्रयासों से मुक्ति पाने का प्रयास कर रहा था। यीशु तो मुझसे प्रतिदिन दूर और दूर ही दिखाई दे रहे थे। जितना मैं उनके पास पहुंचने का प्रयास करता उतना उनके और मेरे बीच फासला बढ जाता।
     ७ जून २०१५ को मुझे डॉ हिमर्स और डॉ कैगन दोनों के द्वारा कहा गया कि मैं अभी भी भटका हुआ हूं। मुझे ऐसा कई बार कहा गया था कि मैं भटका हुआ हूं लेकिन इस बार कुछ बदलाव दिखाई दिया। परमेश्वर की उपस्थिति मेरे साथ थी। मेरे पापों ने मेरे भीतर भारीपन और बैचेनी उत्पन्न की जैसी मैंने पहले कभी नहीं महसूस की थी, और मैं स्वयं को धिक्कारने लगा कि मैं क्यों प्रभु यीशु का बारंबार इंकार कर रहा हूं। मैंने अपने लिये तो सारी उम्मीदें छोड थी, लेकिन उस समय, एक चमत्कार हुआ। यीशु मेरे लिये वास्तविक हो गये! जब मेरे आंसू बह रहे थे मेरे सामने मैं यीशु का प्रेमपूर्ण बलिदान देख पा रहा था, मैंने प्रार्थना की और उनके प्रेम के लिये उनको धन्यवाद दिया। उन्होंने अपार यातना से होकर स्वयं को गुजर जाने दिया और मेरे पापों से मुझे मुक्ति दिलाने के लिये क्रास पर अपना लहू बहाया। यह कितनी सुखदायी बात है कि पापियों को मुक्ति दिलाने के लिये उन्होंने अपना प्रेम उडेल दिया। यीशु के अतिरिक्त और कोई ऐसा नहीं कर सकता था। और बदले में वह केवल इतना चाहते हैं कि हम उन पर विश्वास लायें। सचमुच यीशु को जानना कितना अदभुत है। मैं अब अकेला नहीं रहा, मेरे पास यीशु हैं जिनसे मैं बात कर सकूं। मैं अब भटका हुआ प्राणी नहीं रहा, क्योंकि अब यीशु मुझे मार्गदर्शन देने के लिये उपलब्ध है। वह मेरे मित्र हैं मेरे परमेश्वर हैं मेरे मसीहा है।

अब मेरे मित्रों क्या आप यीशु पर विश्वास लायेंगे और आपके सारे पापों से उनके लहू से शुद्व होना चाहेंगे? जब आप मसीहा पर विश्वास करेंगे तो आप स्वयं यह गाने लगेंगे,

यह मुझे मसीहा का प्यार बताता है, जो मुझे मुक्ति देने के लिये मरा;
   मुझे कीमती लहू के लिये बताता है, जो पापी की सिद् याचना है।
ओह, मैं यीशु से कितना प्रेम रखता, सचमुच, मैं यीशु से कितना प्रेम रखता,
   ओह, मैं यीशु से कितना प्रेम रखता, उन्होंने मुझसे पहले प्रेम किया!
(''सचमुच, मैं यीशु से कितना प्रेम रखता '' फ्रेडरिक वाइटफील्ड, १८२९−१९०४)

डॉ चान, मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप प्रार्थना में हमारी अगुवाई करें। आमीन।


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र से पढा गया: प्रकाशितवाक्य ७:९−१७
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गान गाया गया:
     ''सचमुच, मैं यीशु से कितना प्रेम रखता हूं'' (फ्रेडरिक वाइटफील्ड, १८२९−१९०४)