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मसीहा के आंसू

THE TEARS OF THE SAVIOUR
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, ४ अक्टूबर, २०१५ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में
प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Morning, October 4, 2015

''वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुखी पुरूष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उस से मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और, हम ने उसका मूल्य न जाना'' (यशायाह ५३:३)


अभी अभी मैंने एक विडियो देखा जिसमें एक प्रचारक अपने चर्च के बाहर पापी कहलाये जाने वाले लोगों के समूह को संबोधित कर रहा था। वह उन पर चिल्लाये जा रहा था, ''तुम लोग नरक में जा रहे हो!'' ''तुम सदैव नरक की आग में जलते रहोगे!'' मैंने विडियों बंद किया और ऐसा देखने से मुझे अपने आप में अच्छा नहीं लगा। प्रचारक ने लोगों को एक भी शब्द दया का नहीं कहा, न उसके पास आई भटकी हुई भीड के लिये उसने कोई दुख प्रगट किया, न ही यीशु का जो इस खोये हुये संसार के प्रति प्रेम था उसने उसे व्यक्त करना उचित समझा।

मुझे एक भी ऐसा उदाहरण बाइबल में दिखाई नहीं देता जहां यीशु ने खोये हुये लोगों की भीड को इस तरह संबोधित किया हो। हां यीशु ने भी कठोर शब्द कहे थे। हां उन्होंने भी मनुष्यों से कहा था कि वे नर्क जा रहे हैं। लेकिन यीशु के वे शब्द शास्री और फरीसियों के लिये थे − जो यीशु के समय के झूठे धार्मिक गुरू कहलाते थे। मैने प्रचारकों को उनके कैपस में आये मार्मन्स, कैथोलिक, मुस्लिम, गुमराह व्यक्तियों और यहां तक कि छात्रों पर भी चीखते चिल्लाते हुये देखा है। पर जितना मै उम्रदराज होता जाता हूं, मैं सोचता हूं कि उनका इस तरह का प्रचार मसीह का उदाहरण सामने प्रस्तुत नहीं करता। उम्र बढने के साथ साथ मैं और अधिक यह सोचता जाता हूं कि बल्कि यीशु हमारे समय के धार्मिक अगुओं को कठोरता से झिडकेंगे। जो फरीसियों के समान धार्मिकता का प्रचार करते हैं बजाय सुसमाचार प्रचार करने के, जो फुलर जैसी सेमनरी में बाइबल पर प्रहार करते हैं, जो पैसो के लिये प्रचार करते हैं, जो स्व सहायक मनोविज्ञान पर आधारित प्रचार करते हैं, जो ''नाम लो और दावे से मांगो'' के सिद्वांत का प्रचार करते हैं, जो जल्द धनी बनने वाले संदेशों का प्रचार करते हैं, और जो लोग प्रचार करते हैं कि उद्वार केवल कुछ शब्दों को दोहरा देने वाली ''पापियों वाली प्रार्थना'' करने से आ जायेगा। हां! मैं सोचता हूं कि अगर यीशु यहां होते तो वह यहां यह प्रचार कर रहे होते, ''कि तुम नर्क जा रहे हो।'' पर उनका यह कहना हमारे समय के झूठे प्रचारकों और शिक्षकों के लिये होता! − उन लोगों के लिये होता जो रविवार शाम की आराधना बंद कर देते हैं, जो अपने जवानों को ऐसे ही छोड देते हैं जिससे उनके पास शाम की संगति के लिये कोई आराधना नहीं बचती, जो बाइबल के एक − एक पद को लेकर शुष्क − सा प्रचार करते हैं, जो केवल प्रति रविवार को ही आने वाले धार्मिक खोये हुये लोगों को ही लक्ष्य बनाकर प्रचार करते है, जो रॉक आधारित गीत चर्च में ले आये हैं − जिन्होंने सुसमाचारिय प्रचार अपने चर्च से − बाहर कर दिया है, जो कहते हैं कि यीशु का रक्त खत्म हो चुका हैं और अब भटके हुये पुरूषों और स्त्रियों के उद्वार करने के लिये उपलब्ध नहीं है! मै सोचता हूं कि यीशु उनके चर्चेस, में पैसों की मेजों को, उलट देंगे और उनसे कहेंगे,

''हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो: न तो आप ही उस में प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करने वालों को प्रवेश करने देते हो'' (मत्ती २३:१३, १४)

''हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर असंयम से भरे हुए हैं।'' (मत्ती २३:२५)

''हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हिड्डयों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।'' (मत्ती २३:२७)

''हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे?'' (मत्ती २३:३३)

हां, मै सोचता हूं कि मसीह का यह प्रचार आज के दिन और समय के झूठे प्रचारकों और झूठे शिक्षकों के लिये होता!

लेकिन उन्होंने ऐसा प्रचार उस भीड के लिये कभी नहीं किया जो भटकी हुई थी और उन्हें सुनने आती थी। उनके लिये वह ऐसे थे मानों ''वह दुखी पुरूष थे, रोग से उसकी जान पहिचान थी'' उन्होंने कुंए पर मिली उस महिला से बहुत नरमाई से बात की यद्यपि वह पांच बार विवाह कर चुकी थी और जब यीशु उससे मिले तब भी व्यभिचार का जीवन व्यतीत कर रही थी। जो लोग बीमार और मर रहे थे वह उनसे भी नरमाई से बात करते थे, ''और जितनों ने उन्हें (उसके वस्त्र छुए) छूआ, वे चंगे हो गए'' (मत्ती १४:३६) जो महिला व्यभिचार में पकडी गई थी यीशु ने उससे भी नरमाई से कहा, ''मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना'' (यूहन्ना ८:११ ) जो चोर उनके बगल में कूस पर टंगा था, उससे उन्होंने कहा, ''कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा'' (लूका २३:४३) पक्षाघात से ग्रस्त व्यक्ति से उन्होंने कहा, ''कि हे पुत्र, ढाढ़स बान्ध; तेरे पाप क्षमा हुए'' (मत्ती ९:२) वह पापिनी स्त्री जिसने उनके पैरों को चूमा था उसको उन्होंने कहा, ''तेरे पाप क्षमा हुए'' (लूका ७:४८)

क्या यीशु कभी हंसे थे? वह हंसे होंगे, लेकिन यह बाइबल में दर्ज नहीं है। धर्मशास्त्र के पन्नों पर हमें बताया गया है कि वह ''वह दुखी पुरूष थे, रोग से उनकी जान पहिचान थी'' (यशायाह ५३:३) धर्मशास्त्र के पन्नों पर हमें बताया गया है कि वह तीन बार रोये थे और हमारे पद में यह बताया गया है कि यह उनके व्यक्तित्व का भाग था − और यह एक महत्वपूर्ण भाग था। शांत बुद्व को रोते हुए देखने की कल्पना करना कठिन होगा − रोमी देवताओं को भावना शून्य समझना मुश्किल होगा, या इस्लाम के धीर अल्लाह को, रोते हुये देखने की कल्पना करना कठिन होगा। यीशु के आंसू उनके हृदय की करूणा को प्रगट करते हैं जो मनुष्य के दुखी होने के के कारण उमडती थी।

आप में से अनेक लोग जानते हैं कि मेरे मन में विंस्टन चर्चिल के लिये बहुत आदर है। पर द्वितीय विश्व युद्व के समय जैसा लोगों ने उन्हें जाना था वैसा आप उन्हें नहीं जानते।

St. Paul's Cathedral
सेंट पॉल कैथेड्रल, लंदन, बमबारी के दौरान

युसुफ कर्श द्वारा ली गई इस प्रसिद्व तस्वीर में आप को उनका चेहरा केवल सख्त दिखाई पडेगा। पर जब लंबे समय तक लंदन हिटलर द्वारा की गई बमबारी से जल रहा था और बेहद दुखी था तब लोगों ने उन्हें एक अलग रूप में देखा। बमबारी की एक ऐसी ही रात मे लोगों ने उन्हें बरबाद हो चुके घरों के अवशेषों के बीच देखा और उस समय उनके गालों पर आंसू बह रहे थे।

Sir Winston Churchill
लंदन में बमबारी के दौरान चर्चिल

वह एक नष्ट हो चुके आश्रय में गये जहां एक रात पहले चालीस की संख्या में बडे और बच्चे मौत के मुंह में समा गये थे। जब चर्चिल अपनी आंखों से आंसू पोंछ रहे थे तब एक भीड उनके चारों ओर जमा हो गई। भीड चिल्ला उठी, ''हमने सोचा था आप अवश्य आयेंगे'' एक बूढी स्त्री ने कहा देखों, ''वह सचमुच फिकमंद इंसान है वह रो रहा है'' फिर भीड से दूसरी आवाज आई ''हम इसे सहन कर सकते हैं! आप हिटलर से कह दो, हम इसे सहन कर सकते हैं!'' हिटलर बमबारी करके उनके घरों और शहरों को नष्ट कर सकता है लेकिन वह उनकी आत्माओं को नहीं हरा सकता। ऐसा कहा जाता है कि नाजी संग्राम में प्रयुक्त मशीनों की ताकत को झेलने में चर्चिल के आंसुओं की बहुत बडी भूमिका रही इससे लोगों को हिम्मत मिली कि दुख में वे अकेले नहीं हैं। वह रो पडे जब उन्होंने उस तबाह हो गये रिहायशी स्थान की गली में कतार में, खडे लोगों को अपनी कनेरी चिडिया के दाने खरीदने का इंतजार करते देखा। वह रोये जब उन्होंने बच्चे बडों के शवों को जब मलबे में पडे देखा। वह भय से कभी नहीं रोये लेकिन अपने देशवासियों के दुख पर अवश्य रोये।

चर्चिल सैंद्वांतिक रूप से मसीही नहीं थे। पर उन्होंने अपनी मैथोडिस्ट आया, मिसिस एवरेस्ट से मसीहियों जैसी भावनायें सीखी। जब तक वह जिंदा थे उस वृद्ध आया की तस्वीर उनके बिस्तर के पास टंगी हुई थी। तो मेरा मानना है, कि हमारे समय के नेताओं से कहीं बढकर उनके भीतर, मसीही होने की भावनाये मौजूद थी। आपके लिये यह कल्पना करना कठिन होगा कि आप अयातुल्लाह खोमैनी, व्लादिमिर पुतिन या बराक ओबामा को उनके लोगो के दुखी होने पर तरस से रोते हुये देखे। तरस एक मसीही गुण है − जिसे प्रथम शताब्दी में यीशु जिंन्हें कहा गया था, ''वह दुखी पुरूष थे, रोग से उनकी जान पहिचान थी;'' उन्होंने निष्ठुर रोमी संसार को सिखाया था। (यशायाह ५३:३)

''दुखी पुरूष,'' कैसा नाम,
   परमेश्वर का पुत्र जो भेजा गया,
नष्ट हुये पापी को भी आशा है!
   हैल्लेलुयाह! कैसा मसीहा है!
(''हैल्लेलुयाह! कैसा मसीहा है!'' फिलिप पी ब्लिस, १८३८−१८७६)

धर्मशास्त्र में तीन बार हमें कहा गया है कि वह रोये।

१. पहली बार, यीशु शहर की दुर्दशा देखकर रोये।

वह घोडे पर सवार होकर एक सुबह यरूशलेम पहुंचे। लोगों की एक बडी भीड होसन्ना के नारे लगाती हुई उनके पीछे हो ली, ''कि दाऊद की सन्तान को होशाना; धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है, आकाश में होशाना'' (मत्ती २१:९) यह खजूर के रविवार के दिन यीशु का ''विजयी प्रवेश'' कहलाता है।

The Triumphal Entry
''खजूर के रविवार'' के दिन यीशु का विजयी प्रवेश

पर हमें बहुत ही कम जानकारी मिलती है कि वह दिन कैसे समाप्त हुआ,

''जब वह निकट आया तो नगर को देखकर उस पर रोया।'' (लूका १९:४१)

डॉ डब्ल्यू ए किसवेल उन तीन महान प्रचारको में से एक हैं जिनको मैंने सुना। वह लगभग साठ सालों तक टेक्सास के बैपटिस्ट चर्च डलास, में पास्टर रहे। अपने संदेशों में, डॉ किसवेल ने एक पास्टर के बारे में बताया जो एक बडे शहर के चर्च में पास्टर बन कर गये।

     ''जब उनके लिये प्रचार करने का समय आया तो वह वहां नहीं थे। एक डीकन को कहा गया कि उन्हें खोज कर लाये। उसने उन्हें अपने आफिस में पाया, वह खिडकी पर खडे हुये थे, और फैलते शहर में बसे उन गरीब बस्तियों वाले क्षेत्र को देख रहे थे। उन गरीब बस्तियों को देखकर पास्टर रो रहे थे। डीकन ने कहा, 'सर, लोग आपका इंतजार कर रहे हैं और आप के लिये प्रचार करने का समय हो गया है।' पास्टर ने उत्तर दिया, ‘मैं तो इन लोगों के दुख हताशा टूटन और नाउम्मीदी को देखकर उस पर केंदित हो गया हूं। जरा देखो तो सही देखो तो सही’ − पर डीकन ने उत्तर दिया, ‘हां सर, मै जानता हूं। पर जल्द ही आपको इसकी आदत हो जायेगी आप के लिये तो प्रचार करने का समय हो गया है।'''

और तब डॉ किसवेल ने कहा,

''इसी चीज का मुझे मेरे लिये चर्च के लिये और अन्य चर्चेस के लिये भय रहता है।'' हम इसके आदी हो चुके हैं। लोग जो भटक रहे हैं − उनका क्या होगा। उनके पास कोई आशा नहीं है − तो उनका क्या होगा? और आखिर में हम इसके इतने आदी हो जाते हैं − कि उसकी उपेक्षा करके निकल जाते हैं। इस मामले में हम मसीह से अलग है। 'जब वह निकट आया तो नगर को देखकर उस पर रोया।''' (डब्ल्यू ए किसवेल, पी एच डी, दि कंपेशनेट क्राइस्ट, किसेंडो बुक पब्लिकेशंस, १९७६, पेज ५८)

उस दिन जब यीशु ने जैतून पर्वत के उपर खडे होकर उस शहर को देखकर विलाप किया था तब किसने सोचा होगा कि चालीस सालों बाद यह शहर नहीं बचेगा? किसने सोचा होगा कि एक पीढी के पश्चात रोमन जनरल टायटस की सेनायें दरवाजों और दीवारों को गिरा डालेंगी और परमेश्वर के मंदिर को आग लगा डालेगी? कुछ भी नहीं बचा सिवाय एक पत्थर की दीवार के जो पवित्र मंदिर को घेरे हुये थी। यीशु शहर के नष्ट होने पर रोया।

कोई कहता है, ''कि तो पास्टर हम क्या कर सकते हैं?'' हम सभी लोगों को तो नहीं बचा सकते। हम तो अधिकतम लोगों को भी नहीं बचा सकते। पर हम कुछ लोगों को बचा सकते हैं। आप सुसमाचार के लिये बुधवार और गुरूवार की रातों को आ सकते हैं। आप सुसमाचार प्रचार के लिये शनिवार की रात को आ सकते हैं! आप जा सकते हैं और रविवार की दोपहर को उन्हें ला सकते हैं! आप यह कर सकते हैं! किसी दिन हमारा शहर मलबे धुंए रक्त और मृत्यु से पटा होगा। किसी दिन ऐसा होगा कि किसी को बचाने में देर हो जायेगी। पर, अब इस घडी में, कूस के सिपाहियों जैसे और मेम्ने के अनुयायियों जैसे जाइये। अब वह घडी है कि गरीबों की मदद करें, खोये हुये पापियों को मसीह को खोजने दें, उन्हें क्षमा पाने दें, और आशा पाने दें! ''जब वह निकट आया, तो नगर को देखकर, उस पर रोया।''

२. दूसरा, यीशु सहानुभूति से रोते हैं।

उन्होंने अपने चेलों से कहा, ''हमारा मित्र लाजरस........मर चुका है'' (यूहन्ना ११:११,१४) उन्होंने कहा, ''मैं जाता हूं कि उसे जगाउं'' − कि, उसे मुरदों में से जी उठाउं। तो इसलिये वे लाजरस के घर, बैतनियाह गये। गैर-ईसाई क़ब्रिस्तान कहते हैं। ईसाई ''सेमिटेरी'' कहते हैं − जो एक यूनानी शब्द है जिसका अर्थ है सोने का स्थान जहां हम अपने मुरदों को तब तक रखते हैं जब तक मसीह उनको जगाने न आये। यही तो यीशु लाजरस के लिये करने जा रहे हैं। परंतु यीशु ने इसे करने के लिये चार दिन लिये ताकि अपनी सामर्थ और महिमा प्रगट करे और लोग उनके उपर विश्वास लाये।

अब यीशु लाजरस की कब्र पर पहुंचे। जब यीशु नजदीक आते हैं तो मरियम लाजर की बहन उनसे मिलती है।

''जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।'' (यूहन्ना ११:३३)

मूल यूनानी में इसका तात्पर्य है कि यीशु पूरी रीति से टूट चुके थे, उनकी छाती क्रंदन कर रही थी, वह हांफ रहे थे, धक से रह गये थे (एमब्रीमाओमाई) − गहराई से व्यथित थे, किसी समुद्र में आये तूफान की तरह उत्तेजित लग रहे थे, गहन व्याकुल थे, बहुत अशांत थे (तारासो) । क्या आपने महसूस किया है कि जब आप का कोई बहुत निकट का जन मरता है? मैंने किया है। मैं टूटा हूं, मैंने क्रंदन किया है, मैं धक से रह गया, और मैं हांफने लगा था। मैंने इतना अधिक दर्द और भारीपन अपने जीवन में दो तीन बार ही महसूस किया है − पर उतना अनुभव पर्याप्त था कि मैं यह महसूस कर सकूं कि यीशु ने क्या सहा होगा। मैंने ऐसा तब महसूस किया जब मेरी प्यारी दादी, मॉम फ्लाउअर, मरी। मैंने ऐसा तब महसूस किया जब मेरा जीवन उदारवादी दक्षिणी बैपटिस्ट सेमनरी में बंधक बन गया था। मैंने ऐसा तब महसूस किया जब मेरी मां, सेसिलिया, का देहांत हुआ। ऐसा दुखी होना गलत नहीं है। यीशु हमें, अपने दुख के द्वारा भी दिखाते हैं, कि कभी कभी दुख महसूस करना भी कोई पाप नहीं है। वह मरियम, मार्था, और लाजर के मित्रों के दुख को देखकर बहुत तरस से भर गये।

यीशु जानते हैं कि वह लाजर को कुछ मिनटों बाद जिला देंगे। पर वह टूट चुके हैं और मौत की इस सत्यता से वेदना में हैं और व्यथित हैं कि यह दुख लाती है। और तब यूहन्ना के ग्यारहवें अध्याय में दो पद के बाद संपूर्ण बाइबल में पाया जाने वाला सबसे छोटा पद हमें मिलता है। अपनी वेदना और रूदन, के दौरान यीशु ने कहा, ''तुमने उसे कहां रखा हैं?'' उन्होंने उनसे कहा, कि प्रभु आइये, और देखिये।'' तब सबसे छोटा पद हमारे सामने आता है,

''यीशु रोया'' (यूहन्ना ११:३५)

उन्होंने मार्था और मरियम का दुख बांटा, क्योंकि वह उनके भाई लाजर से भी प्रेम रखता था।यीशु हमारे दुखों और विषाद को भी बांटते हैं। मुझे आपकी जवान पीढी पर दया हो आती है। अब बहुत से चर्चेस में लोग पुराने गीत नहीं गाते है − जो दिल को छू लेते थे और आत्मा को विश्राम देते थे। आजकल के बच्चे तो उनको जानते तक नहीं, और इसलिये दुख की घडी में उन गीतों की शरण में भी नहीं जा सकते। पर मेरे अनुभव में तो पुराने गीत ही हैं जो मेरी आत्मा को अंधकार के क्षणों में से बाहर निकालने में सहायक सिद्व हुये।

यीशु क्या ही मित्र प्यारा,
   पाप और दुख उठाने को!
उसकी शरण हम ले सकते.....
   पाप का बोझ जो हम पर हो,
सच्चा मित्र ऐसा कौन है,
   जो संभाले हमें दुखों में?
सारी निर्बलता वह जानता,
   उससे जाकर सब कहें।
(''यीशु क्या ही मित्र प्यारा'' जोसेफ स्क्रीवेन, १८१९−१८८६)

''यीशु रोया'' (यूहन्ना ११:३५)

यीशु के वे कीमती आंसु। यीशु का वह तरस से भर जाना। यीशु की उस सहानुभूति के लिये धन्यवाद।

जब मैं एक छोटा लडका था तब डॉ हैनरी एम मैकगावन मुझे अपने परिवार के साथ पहली बार बैपटिस्ट चर्च ले गये। उन्होंने एक बार मुझे कहा था कि मैं उनके लिये उनके पुत्र समान था। मैं और मेरा परिवार उनसे मिलने वर्नान टेक्सास कई बार गये। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उन्होंने मुझे एक छोटी बिना तुकबंदी वाली कविता सौंपी जो बहुत सारी बातें कहती थी। यह कविता एक मेरी स्टीवेंशन नामक एक छोटी १४ साल की लडकी द्वारा लिखी गई थी:

एक रात मैंने यह सपना देखा।
एक रात मैंने यह सपना देखा जब मैं प्रभु के साथ चल रही थी।
काले आकाश में चमकी बिजली ने मेरे जीवन के कुछ दृश्य दिखाये।
हर दृश्य में, रेत में मुझे दो जोडी पैरों के निशान दिख पडे
एक जोडी मेरे पैर के निशां एक मेरे प्रभु के।

जब मेरे सामने मेरे जीवन का अंतिम दृश्य चमका,
मैंने पीछे मुडकर रेत में बने दूसरे पैरो के निशां को देखा।
मैंने घ्यान से देखा मेरे जीवन के कई मार्गो में,
विशेषकर बहुत कठिन और उदास क्षणों में,
मुझे एक जोडी पैरो के निशां ही दिखाई दिये।

इसने मुझे सचमुच परेशान कर दिया, मैंने पूछा तब प्रभु से।
''प्रभु, आपने एक बार कहा था कि आप मेरे साथ चलेंगे,
तो आप मेरे साथ पूरे रास्ते चलते आये।
मैंने ध्यान से देखा मेरे जीवन के बहुत कठिन और उदास क्षणों में,
केवल एक जोडी पैरो के निशां ही दिखाई दिये।
मैं समझी नहीं प्रभु ऐसा क्यों, जब मुझे आपकी बहुत जरूरत थी, आप मुझे छोड गये।''

प्रभु फुसफुसाये, ''मेरे अनमोल बच्चे, मैं तुमसे प्रेम करता हूं व कभी न छोडूंगा।
कभी भी नहीं, तुम्हारी किसी भी परीक्षा व संकट की घडी में।
जो तुमने एक जोडी पैरों के निशां देखे,
वह मैं था जो तुम्हें गोद में थामे चल रहा था।''
(''रेत में बने पैरो के निशां'' मेरी स्टीवेंशन, १९२२−१९९९; १९३६)

यीशु हमारे शहरों की दुर्दशा पर रोते हैं − जो भटके हुये हैं, नाउम्मीदी में। यीशु हमारे साथ सहानुभूति से रोते हैं − जब हम कठिन समय से गुजर रहे होते हैं।

३. तीसरा, यीशु हमारे पापों का प्रायश्चित करते हैं इसलिये रोते हैं।

इब्रानियों कहता है ५:७ कहता है,

''उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई।'' (इब्रानियों ५:७)

यह यीशु थे, जो कूसीकरण की रात के पहले, गैतसेमनी बाग में रो रहे थे। इस विषय पर डॉ किसवेल कहते हैं,

गैतसेमनी में पीडा का क्या तात्पर्य है? जब वह अपनी प्रार्थना में गहनतम वेदना के क्षणों में थे ''उनका पसीना मानो लोहू की बड़ी बड़ी बून्दों की नाईं भूमि पर गिर रहा था।'' (लूका २२:४४) .......भविष्यदर्शी यशायाह ने कहा था, ''कि परमेश्वर अपनी आत्मा को पाप के लिये बलिदान करके चढायेंगे।'' यशायाह ने कहा था, ''वह अपने प्राणों का दुख उठा कर उसे देखेगा और तृप्त होगा।'' यद्यपि यह एक रहस्य ही है जो मानवीय बुद्वि से परे हैं कि परमेश्वर ने हमारे पाप अपने उपर ले लिये। और हमारे सारे पापों का भार और बोझ सहने के कारण, वह गहन वेदना में जाकर आंसुओं मे भरकर प्रार्थना करने लगे, ''हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले'' (पूर्वोक्त, पेज ६०)

यीशु भारी वेदना के साथ आंसुओं में भरकर, गैतसेमनी में परमेश्वर से उनके जीवन को बचाने के लिये, प्रार्थना कर रहे थे, ताकि वह हमारे पापों को अपने शरीर में लेकर अगले दिन कूस पर चढ सकें। तब प्रभु ने क्रूस पर चिल्लाकर कहा, ''पूरा हुआ'' (यूहन्ना १९:३०) − और प्रभु ने सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये। गहरी वेदना और आंसुओं के साथ प्रभु हमारे पापों का पूरा दंड भरने के लिये क्रूस पर कीलों से ठोंक दिये गये।

उस कलवरी पर्वत पर, एक भयानक सुबह,
   क्लांत और निढाल मेरे मसीहा चलकर आये;
कूस पर पापियों के बदले मौत सही,
   ताकि वह हमें अनंत हानि से बचा सके।
धन्य मसीहा! अनमोल मसीहा!
   अब भी मैं उन्हें कलवरी क्रूस पर देखता हूं;
घायल और रक्तरंजित, पापियों के लिये विनती करते हुये−
   बेखबर और बेपरवाह − मेरे लिये मरते हुये!
(''धन्य मसीहा'' एविस बर्जसन किश्चयनसन, १८९५−१९८५)

मैं आपसे यीशु के उपर विश्वास लाने के लिये कहता हूं, जिन्होंने बहुत आंसु बहाये, और अपना लहू क्रूस पर उडेला ताकि आपको पाप और न्याय से बचा सके। वह अब स्वर्ग में हैं, और परमेश्वर के दाहिने हाथ विराजमान हैं। साधारण विश्वास के साथ आइये और परमेश्वर पर भरोसा रखिये। उनका बेशकीमती लहू आप को सारे पापों से शुद्ध करेगा − और आप को अनंत जीवन देगा। आमीन। डॉ चान, प्रार्थना में आप की अगुआई करे।


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र से पढा गया: लूका २२:३९−४४
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गान गाया गया:
''धन्य मसीहा'' (एविस बर्जसन किश्चयनसन, १८९५−१९८५)


रूपरेखा

मसीहा के आंसु

THE TEARS OF THE SAVIOUR

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

''वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुखी पुरूष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उस से मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और, हम ने उसका मूल्य न जाना'' (यशायाह ५३:३)

(मत्ती २३:१३, २५, २७, ३३; १४:३६; यूहन्ना ८:११;
लूका २३:४३; मत्ती ९:२; लूका ७:४८)

१. पहला, यीशु शहर की दुर्दशा देखकर रोये, मत्ती २१:९; लूका १९:४१

२. दूसरा, यीशु सहानुभूति से रोते हैं, यूहन्ना ११:११, १४, ३३, ३५

३. तीसरा, यीशु हमारे पापों का प्रायश्चित करते हैं इसलिये रोते हैं, इब्रानियों ५:७; लूका २२:४४; यूहन्ना १९:३०