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सतत प्रार्थना करते रहे − जब तक आप को जो मांगा है मिल न जाये!

PRAYING THROUGH – ‘TILL YOU GET WHAT YOU ASK FOR!
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, ९ अगस्त, २०१५ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में
प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Evening, August 23, 2015


लूका के सुसमाचार में यीशु ने जोर देते हुये कहा ''प्रार्थना करते रहो'' − अर्थात, किसी निश्चित चीज के लिये तब तक प्रार्थना करते रहो जब तक उसका उत्तर न मिल जाये, भले ही आपको उत्तर मिलने से पहले लंबे समय तक प्रार्थना करना पडे। ''प्रार्थना करते रहो'' का यह वास्तविक अर्थ है। डॉ जॉन आर राइस ने कहा,

     जब हम ''प्रार्थना करते रहो'' कहते हैं तो इसका अर्थ है कि हम एक मसीही जन की बात कर रहे हैं जो अपनी (समस्या) को परमेश्वर के पास ले जाता है और इंतजार करता है कि उसे उत्तर मिल जाये....हम परमेश्वर की इच्छा का दृढ़ प्रमाण कभी नहीं पा सकते, कि हमने जो मांगा है वह हमें मिल ही जाये, इसके लिये हमें बाट जोहनी होगी....... बाइबल के कुछ उदाहरणों पर ध्यान देंगे जहां लगातार प्रार्थना ही गई है....... नहेमायाह ने निर्जन और उजडे हुये यरूशलेम के लिये उपवास रखकर प्रार्थना की जो अपने शत्रुओं की बंधुआई में चला गया था। उसने कहा, ''ये बातें सुनते ही मैं बैठकर रोने लगा और कितने दिन तक विलाप करता; और स्वर्ग के परमेश्वर के सम्मुख उपवास करता और यह कह कर प्रार्थना करता रहा'' (नहेमायाह १:४).......उसने परमेश्वर से अनुनय की....... (अंतत: प्रार्थना का उत्तर) उसे मिल गया। राजा का दिल पसीज गया और परमेश्वर ने को शहर की दीवालें उठाने के लिये भेज दिया.....क्योंकि उसने सतत प्रार्थना की थी.....।
     पर्शिया में रानी ऐस्तर के समय में यहूदियों ने उपवास और प्रार्थना की कि परमेश्वर उनके जीवनों को बचा
     ले जब उनके (जीवन नष्ट होने वाले) थे। उन्होंने तीन दिन और रात सतत उपवास करके प्रार्थना की और यहूदियों को छुटकारा मिला। जबकि उनके शत्रुओं को बदला मिला।
      नीनवे के लोगों ने उपवास और प्रार्थना की और परमेश्वर ने उनके शहर पर दया की और (छोड दिया) । उनके (शहर को नष्ट नहीं किया बल्कि बदले में एक बडी आत्मिक जाग्रति भेजी) ।
     नये नियम में भी ऐसा ही (हुआ)। पेंतुकुस्त के (पहले)....... चेले (एक कमरे में साथ साथ प्रार्थना कर रहे थे। परमेश्वर ने उनकी प्रार्थना सुनी और उन्हें उत्तर दे दिया। कई दिनों की प्रार्थना के पश्चात परमेश्वर ने उन्हें पेंतुकुस्त के दिन बहुत विशाल आत्मिक जाग्रति का अनुभव दिया। जब तीन हजार यहूदी आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तित हुये। यह घटना प्रेरितों के काम १ व २ में दर्ज है। यह किसी बात के लिये सतत प्रार्थना करने का विशेष उदाहरण है जब तक कि जो परमेश्वर से मांगा वह नहीं मिला) .....
         यह घटना प्रेरितों के काम का १२ अध्याय जिसके १ से १७ पद जिसमें मसीहियों का समूह एकत्रित होकर मरियम के घर प्रार्थना कर रहे थे....... वे तब तक प्रार्थना करते रहे जब तक कि पतरस जेल में एक स्वर्गदूत द्वारा नहीं छुडाया गया। (वे तब तक प्रार्थना करते रहे जब तक कि पतरस आश्चर्यजनक रूप में जेल से छुडाया नहीं गया)। ये बहुत लंबे समय तक चलने वाली, लौ लगाकर की जाने वाली, टूटे दिलों की प्रार्थना थी। और हर जगह नये नियम के मसीहियों का यही उदाहरण था। जॉन आर राइस, डी डी, प्रेयर आस्किंग ऐंड रिसीविंग, सोर्ड आफ दि लोर्ड पब्लिशर्स, १९८१ पुर्नमुद्रण पेज २०३, २०६−२०९, डॉ हिमर्स की टिप्पणी कोष्टक में है।)

यीशु ने लूका में सतत प्रार्थना करने के दो उदाहरण दिये। उनमें से पहला लूका ११:५−८ में दर्ज है। कृपया खडे होकर इन चार पदों को जोर से पढें यह स्कोफील्ड स्टडी बाइबल में पेज १०९० पर है।

''और उस ने उन से कहा, तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास आकर उस से कहे, कि हे मित्र; मुझे तीन रोटियां दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है। और वह भीतर से उत्तर दे, कि मुझे दुख न दे; अब तो द्वार बन्द है, और मेरे बालक मेरे पास बिछौने पर हैं, इसलिये मैं उठकर तुझे दे नहीं सकता मैं तुम से कहता हूं, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्ज़ा छोड़कर मांगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा'' (लूका ११:५−८)

आप बैठ सकते हैं। पद ८ को देखिये। यह मुख्य पद है,

''आग्रह'' शब्द अब प्रयोग में नहीं है और आधुनिक अनुवाद में भी नहीं समझा गया है। इसका अर्थ है ''दवाब बनाकर आग्रह करते'' रहना। डॉ राइस ने कहा कि ''यह गद्यांश प्रामाणिक रूप से एक (मसीही) की तरफ इशारा कर रहा है जो सामर्थ चाहता है (कि उसका मित्र परिवर्तित हो जाये)। एक मसीही के पास परमेश्वर के पास जाने का अधिकार होता है कि वह दूसरों (के लिये) जीवन की रोटी मांगे........पापियों के लिये जीवन की रोटी केवल उन्हीं को दी जाती है जो यह रहस्य जानते हैं कि उन्हें 'आग्रह करके' मांगना है। (तब तक प्रार्थना करते रहे जब तक कि उसके खोये हुये मित्र को मन फिराने वाला अनुग्रह न प्राप्त हो जाये)........एक मसीही जो (अपने मित्र को परिवर्तित करने के लिये) अलौकिक, आश्चर्यकर्म करने वाला पवित्र आत्मा का बल चाहता है उसे परमेश्वर के लिये बांट जोहने का अधिकार है, (वह तब तक प्रार्थना करे जब तक उसका मित्र परिवर्तित न हो जाये)।'' (राइस, पूर्वोक्त पेज २०९)

''तौभी उसके ''दवाब बनाकर (आग्रह करना, हठ) के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा।'' (लूका ११:८)

फिर से, यीशु हमें लूका १८:१−८ में सिखाते हैं। खडे होकर ये आठों पद जोर से पढिये। ये स्कोफील्ड स्टडी बाइबल में पेज ११०० पर हैं।

''उस ने इस के विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए उन से यह दृष्टान्त कहा कि किसी नगर में एक न्यायी रहता था; जो न परमेश्वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था। उसी नगर में एक विधवा भी रहती थी; जो उसके पास आ आकर कहा करती थी, कि मेरा न्याय चुकाकर मुझे मुद्दई से बचा। उस ने कितने समय तक तो न माना परन्तु अन्त में मन में विचारकर कहा, यद्यपि मैं न परमेश्वर से डरता, और न मनुष्यों की कुछ परवाह करता हूं। तौभी यह विधवा मुझे सताती रहती है, इसलिये मैं उसका न्याय चुकाऊंगा कहीं ऐसा न हो कि घड़ी घड़ी आकर अन्त को मेरा नाक में दम करे। प्रभु ने कहा, सुनो, कि यह अधर्मी न्यायी क्या कहता है? सो क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात−दिन उस की दुहाई देते रहते; क्या वह उन के विषय में देर करेगा मैं तुम से कहता हूं; वह तुरन्त उन का न्याय चुकाएगा; तौभी मनुष्य का पुत्र जब आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?'' (लूका १८:१−८)

अब आप बैठ सकते हैं।

इस दृष्टान्त का मुख्य भाग है सतत प्रार्थना करते रहना। पहले पद में ही यह बात लिखी है,

''उस ने इस के विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए उन से यह दृष्टान्त कहा'' (लूका १८:१)

हमें ''नित्य प्रार्थना करना और हियाव नहीं छोड़ना चाहिए।'' ''हियाव छोड़ना'' अर्थात ''हार मान लेना'' ''साहस छोड देना।'' हमें नित्य प्रार्थना करना और हिम्मत नहीं हारना चाहिये हियाव नहीं छोड़ना चाहिए। इसका यह अर्थ है कि जब हम किसी बात के लिये प्रार्थना करना आरंभ करते हैं तो उसके मिलने तक प्रार्थना करते रहें। हार नहीं मानें, साहस न छोडे, जब तक कि सतत प्रार्थना द्वारा वह चीज हमें मिल न जायें।

मुझे प्रत्येक वर्ष अनेक पुरूषों और महिलाओं से किसमस कार्ड मिलते है जो पचास वर्ष पूर्व फर्स्ट बैपटिस्ट चाइनिज चर्च में मेरे संडे स्कूल के शिष्य रहे। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि मैं उनमें से हरेक के लिये प्रार्थना किया करता था जब तक कि वे परिवर्तित नहीं हो गये। यह देखकर मैं बहुत प्रफुल्लित होता हूं कि वे आज पचास सालों बाद भी अच्छे मसीही जन हैं। मैंने उनमें से कईयों को डॉ मर्फी लुम के अंतिम संस्कार में पिछले सप्ताह देखा था। यह देखकर मैं बहुत खुश हुआ कि वे अभी भी बहुत अच्छे मसीही जन हैं!

चाइनिज चर्च में मेरे कार्यकाल में वर्ष १९६० में मैं चर्च में आत्मिक जागरण की जरूरत को महसूस करके बहुत विचलित हो गया था। डॉ मर्फी लुम ने दो तीन साल पहले मुझे याद दिलाया कि मैं चर्च में सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करते समय आत्मिक जागरण के लिये भी प्रार्थना करना नही भूलता। यहां तक कि जब मुझे चर्च में भोजन के लिये दुआ करने के लिये कहा जाता तो भी मैं परमेश्वर से आत्मिक जागरण भेजने के लिये कहता। और मैं अक्सर अपनी व्यक्तिगत प्रार्थना में भी चर्च में आत्मिक जागरण के लिये प्रार्थना करना नहीं भूलता। दूसरे भी इसके लिये प्रार्थना कर रहे धे लेकिन मैं ईमानदारी से कह सकता हूं कि मैं तो इसके लिये अभिभूत और प्रयुक्त हो गया धा। मैंने बडी गहराई और लगन से प्रार्थना की कि परमेश्वर अपना कार्य करे। १९६९ की गर्मियो का समय था जब परमेश्वर ने आत्मिक जागरण भेजना प्रारंभ किया जो लगातार चार सालों तक‚ बीच में चलता और रूकता‚ रहा। २९ अगस्त १९७० में एक सुसमाचार्य सभा में मेरे प्रचार के बाद चालीस जवान आंखों मे आंसू लिये‚ सुबकते हुए सामने आये। (''टू गॉड बी ग्लोरी'' २० वीं वर्षगांठ पर बुकलेट‚ एफसीबीसी‚ मार्च १९७२‚ पेज २८)

चर्च के प्रथम बीस सालों में १५० की सदस्यता में ४० लोगों का परिवर्तन हो जाना एक मुख्य घटना के ''प्रमुख अंश'' की सूची में रखे जाने जैसा है। मैंने चर्च रिकार्ड से देखा है उन सारे चालीसों लोगों ने दो अलग अलग बैपटिस्म संस्कारों में उपस्थित रहकर बपतिस्मा ले लिया था (''टू गॉड बी ग्लोरी'' पेज २९)। रिकार्ड में उनके नाम अंकित हैं। आज उनमें से लगभग सभी मसीही हैं। मैंने उनमें से कई को इस महिने की शुरूआत में डॉ मर्फी लुम के अंतिम संस्कार में देखा था। परमेश्वर ने दीर्घ काल तक लगातार की जाने वाली प्रार्थना का उत्तर भी दे दिया था जब हमने बडी सामर्थशाली आत्मिक जाग्रति भेजे जाने के लिये प्रार्थना की थी जो बैपटिस्ट चाइनीज चर्च में १९६० के उत्तरार्ध और ७० के पूर्वाद् में आयी थी। उन प्रार्थनाओं के उत्तर बतौर लगभग सैकडों जवान चर्च में आने लगे।

पूर्वी तट पर स्थित कॉकेश़न चर्च में मैंने बडी गहराई से आत्मिक जाग्रति भेजे जाने की जरूरत को महसूस किया। मैं पूरे दिन उपवास रखकर प्रार्थना की। मैं कांपता हुआ पुल्पिट पर गया और एक साधारण सा उद्वार का संदेश दिया। चर्च के सहयोगी पास्टर का बेटा स्वयं आंसुओं में भरकर आगे आया और कहा मैं भटक चुका हूं और मुझे मन परिवर्तन की घोर जरूरत हैं। उस दिन आमंत्रण रात ११ बजे तक चला। लगभग ७५ लोग आल्टर पर रोते हुये आये। एक बूढा जन तो घुटने और हाथों के बल रेंगते हुए रोते रोते यह कहता हुए आया कि‚ ''मैं भटका हुआ हूं! मैं भटका हुआ हूं!'' वे किशोर जो पूरे समय चर्च आते रहे वे भी आंसुओं से रो रहे थे। डॉ आयन पैसले का पुत्र‚ काइल‚ मेरी पत्नी और पुत्रों के समीप खडा हुआ था। उसने मेरी पत्नी के कानों में फुसफुसा कर कहा कि‚ ''मैंने इस प्रकार का दृश्य कभी नहीं देखा!'' तीन महिनों तक लगभग पांच सौ लोग इसी प्रकार गंभीरता पूर्वक‚ कई तो अश्रुपूर्ण अवस्था में एवं कुछ तो रोते हुये आते रहें। बाद में पास्टर ने थोडे ही समय में सैंकडों लोगों को बपतिस्मा दे दिया। बीतें दिनों में एक प्रसिद् रूढिवादी प्रचारक ने कहा कि उन्होंने ऐसी आत्मिक जाग्रति कहीं नहीं देखी। मैं परमेश्वर का धन्यवाद देता हूं कि मैंने सतत प्रार्थना के उत्तर के रूप में − आत्मिक जाग्रति का दो बार अनुभव किया है अगर हम सतत प्रार्थना करते रहें और ''निर्णयवाद'' जैसी बेवकूफी न करें तो मैं मानता हूं कि परमेश्वर पुन: आत्मिक जागरण भेंजेंगे − जैसा उन्होंने प्राचीन समय में किया था।

मैं जानता हूं कि परमेश्वर उत्तर देते हैं जब हम सतत प्रार्थना में लगे रहते हैं। मेरी मां ८० साल की थी और अभी भी उनका मन परिवर्तन नहीं हुआ था। उनको ऐसा आघात आया था जो उनकी जान भी ले सकता था। वह नर्क पहुंच सकती थी, किंतु मैंने उनके लिये चालीस साल, तक प्रतिदिन प्रार्थना की। अंतत:, एक दिन ऐसा आया, कि मैं जान गया कि मैं उनके लिये सतत प्रार्थना कर चुका हूं। मैं न्यूयार्क में प्रचार कर रहा था। मैंने डॉ कैगन को फोन किया। मैंने डॉ कैगन को फोन किया, और उनसे कहा कि वह प्रार्थना के द्वारा मेरी मां को प्रभु यीशु के पास लेकर आये। वह जाने में डरते थे क्योंकि मेरी मां ने उन्हें बहुत पहले की स्पष्ट कर दिया था कि वह ''बचाये जाने'' को लेकर बिल्कुल भी उत्सुक नहीं हैं। किंतु मैंने डॉ कैगन से कहा कि मैंने लगातार प्रार्थनायें की हैं और अब मैं अपने मन में जान रहा हूं कि मां उस दिन बचायी जायेगी। डॉ कैगन उस दोपहर उनके कमरे में गयें − और उस दिन यह बडी आसानी से हो गया! मां एकाएक परिवर्तित हो गई। मैंने ४ जुलाई को डॉ वालड्रिप के चर्च में, एक संयुक्त बपतिस्मा आराधना में बपतिस्मा दिया। उस क्षण से मां यीशु में एक नया सृजन बन गईं। ८० साल की उम्र में, उनका मन परिवर्तन हुआ।

मैं जानता हूं कि आप व्यक्तियों को भी बचाने के लिये प्रार्थनारत रह सकते हैं! मैं जानता हूं कि आप स्थानीय चर्च में आत्मिक जाग्रति भेजे जाने के लिये प्रार्थना कर सकते हैं, और आप को उत्तर मिल सकता है। मैं जानता हूं कि आप स्थानीय चर्च में एक भटके हुये मित्र के लिये प्रार्थना कर सकते हैं। आप भी यह सत्य जान जायेंगे − अगर आप यहां आने वाली खोई हुई आत्माओं के लिये प्रार्थनारत रहेंगे और जब तक परमेश्वर आप को उत्तर न दे दें तब तक मांगने से पीछे न हटें! आमीन!

हम अगले शनिवार पुन: प्रार्थना और उपवास करने जा रहे हैं। अगर आप हमारे साथ इसमें सम्मिलित होते हैं तो शुक्रवार के शाम के भोजन के पश्चात शनिवार को यहां चर्च में आकर शाम तक ५:३० बजे भोजन के समय तक कुछ भी मत खाइये। यहां फिर से सूची दे रखी है जिसमें दर्शाये गये बिंदुओं के उपर आप को प्रार्थनारत रहकर उपवास रखना है। इस संदेश के अंत में सूची दे रखी है। हम आपको घर ले जाने के लिये इसकी एक प्रति भी देंगें।

मुझे आप पर बहुत गर्व है! आप महान लोग हैं! मैं मानता हूं कई जवान लोग बचाये जायेंगे जब आप उनके लिये प्रार्थना और उपवास करेंगें! डॉ चान निवेदन है कि प्रार्थना में हमारी अगुआई कीजिये।


१.  अपने उपवास को गुप्त रखिये (जितना अधिक संभव हो) लोगो पर जाहिर मत करते रहिये (अपने रिश्तेदारों पर भी नहीं) कि आप उपवास कर रहे हैं।

२.  बाईबल पढने में समय बिताइये। अगर प्रेरितो के काम को पढेंगे (अच्छा होगा उसके प्रारंभिक भागों को पढें)।

३.  शनिवार के उपवास के दिन यशायाह ५८:६ को स्मरण कीजिये।

४.  प्रार्थना कीजिये कि परमेश्वर हमारे चर्च में दस और नये लोग दें जो हमारे चर्च में ठहरे रहें।

५.  उन जवानों के नाम लेकर परिवर्तन के लिये प्रार्थना कीजिये परमेश्वर से ५८:६ में कही बातों को उनके लिये करने के लिये मांगिये।

६.  प्रार्थना कीजिये कि आज (रविवार) को जो आगंतुक पहली बार आये हैं वे अगले रविवार भी आयें। संभव हो तो उनके नाम लेकर प्रार्थना कीजिये।

७.  परमेश्वर से प्रार्थना कीजिये कि मुझे मार्गदर्शन दें कि मैं अगले रविवार को क्या प्रचार करूं − सुबह और संध्या को।

८.  निमंत्रण के लिये प्रार्थना करें − केवल जवानों के प्रार्थना समूह के लिये (हमारे यहां उनमें से तीन समूह है)। अगर आप चाहें तो जॉन सेम्यूएल कैगन के लिये प्रार्थना करें।

९.  खूब मात्रा में पानी पीजिये। हर घंटे में एक एक गिलास पीजिये। अगर आपको रोज सुबह कॉफी पीने की आदत है तो प्रारंभ में ही एक बडा कप भरकर कॉफी पी लीजिये। शीतल पेय या स्फूर्ति देने वाले पेय पदार्थ मत पीजिये।

१०. अगर अपने स्वास्थ्य के लिये चिंतित हैं तो उपवास के पहले मेडिकल डॉक्टर से चर्चा कर लीजिये। (आप डॉ क्रेटन चान या डॉ जूडिथ कैगन को जो हमारे चर्च में हैं उन्हें दिखा सकते हैं) उपवास मत कीजिये अगर आप को कोई गंभीर विकार है तो जैसे डायबिटिज या उच्च रक्तचाप आदि। आप शनिवार का उपयोग इन निवेदनों के उपर प्रार्थना करने में भी बिता सकते हैं।

११. अगले दिन शनिवार की संध्या ५:३० तक चर्च में मिलने वाले भोजन के अतिरिक्त खाने में कुछ ग्रहण मत कीजिये।

१२. स्मरण रखिये कि सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हमारे चर्च में जवान भटके हुये लोगों के मन परिवर्तन के लिये प्रार्थना करना − एवं जो नये लोग इस दौरान चर्च में आ रहे हैं वे हमारे साथ स्थायी रहें।


अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स को इस पते पर ई मेल भेजिये rlhymersjr@sbcglobal.net (यहां क्लिक कीजिये)। यह भी उन्हे लिखें कि आप किस देश से हैं। आप डॉ हिमर्स को किसी भी भाषा में ई मेल भेज सकते हैं पर अंगेजी भाषा में भेजना उत्तम होगा।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा बाइबल पाठ पढा गया: लूका १८:१−८
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''मुझे प्रार्थना करना सिखायें'' (अल्बर्ट एस रिटर्ज, १८७९−१९६६)