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चेलों का भय

THE FEAR OF THE DISCIPLES
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, २२ मार्च, २०१५ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)


हमने पिछली रात के संदेश में (शनिवार रात) में देखा कि प्रभु यीशु मसीह गलील से यरूशलेम जा रहे थे। वह जानते थे कि वहां उनका आमना सामना विरोधी लोगों से होगा। होगा। जैसा डॉ जॉन गिल ने कहा, ''वह कई शत्रुओं व शैतानों के (साथ) मल्ल युध्द करने के लिये, एक दर्दनाक शर्मनाक अभिशप्त मौत मरने जा रहा था। किन्हीं भी बातों ने उसे डिगाया नही, किंतु (दृढ़तापूर्वक) वह (वहां) तक पहुंचने के लिये पक्का रहा।'' (जॉन गिल, डी डी, एन एक्सपोजिशन आफ दि न्यू टेस्टस्मेंट, दि बैपटिस्ट स्टैंडर्ड बियरर, १९८९ पुर्नमुद्रण, वॉल्यूम १, पेज ५८९; लूका ९:५१ पर व्याख्या)

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)

एन आय वी ''चेले'' शब्द जोडते हुए कहती है, ''चेले अचंभित हुए जिनका पीछा किया गया वे डर गये थे'' परंतु ''चेले'' शब्द यूनानी मूलपाठ टैक्सस रिसेप्टस में नहीं है। इससे हमें यह पता चलता है कि चेले अचंभित थे जिनका पीछा किया गया था वे डर गये थे। केजेवी इसे स्पष्ट करते हुए कहती है कि न केवल बारह चेले परंतु यीशु के अनुयायियों का समूचा समूह अचंभित और डर गया था। १५९९ की जिनेवा बाईबल भी इस पर प्रकाश डालती है,

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)

नये अनुवादों पर, रहस्यवादी अनुपयोगी मूलपाठों का प्रभाव, है यह स्पष्टता के स्थान पर संभ्रम उत्पन्न करता है इसलिये हम केजेवी से ही प्रचार करते है।

अब मैं बाईबल के पदों से दो साधारण बिंदु सामने रखना चाहता हूं: पहला चेलों का भय, दूसरा उनके भयभीत होने के कारण।

१. पहला चेलों का भय

हमारा पद कहता है, ''वे अचंभित हुए और जिनका पीछा किया गया था वे डर गये थे'' यूनानी शब्द ''विस्मित'' के स्थान पर ''आश्चर्यचकित'' अनुवादित किया गया है। १५९९ की जिनेवा बाईबल में इसे कष्टमय ''अनुवादित'' किया गया है। विचार यह था कि वे ''विस्मित'' आश्चर्यचकित और गहरे रूप में कष्ट में थे। वे डरे हुए आतंकित और सतर्क थे ''डरे हुए'' का यूनानी अनुवाद ''फिबे'' किया गया। जिससे अंग्रेजी का शब्द ''फोबिया'' मिलता है। इसका यह अर्थ था कि वे सब यरूशलेम जाने के लिये बेहद डरे हुए थे। वे यीशु के पीछे यरूशलेम तक जाने के लिये बहुत आश्चर्यचकित और गहरे रूप में डरे हुए थे।

उनके भय का मूल कारण यह था कि उन्होंने अभी तक सुसमाचार को नहीं समझा था। कुछ महिने पहिले यीशु ने चेलों से पूछा था, ''तुम मुझे क्या कहते हो? और शिमौन पतरस ने जवाब दिया, तू मसीह है जीवते परमेश्वर का पुत्र। यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।'' (मत्ती १६:१५−१७; मरकुस ८:२९) यह प्रगट करता है कि पतरस को कुछ प्रकाशन पहले से था। कुछ परमेश्वर प्रदत्त समझ पहले से थी कि यीशु कौन था। परमेश्वर ने पतरस को यह प्रकाशन पहले से दिया था कि यीशु मसीह है, परमेश्वर का पुत्र। थोड़ी ही देर बाद हम मत्ती १६:२१−२३ से पढ़ेगे,

''उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगा, कि मुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूं। इस पर पतरस उसे अलग ले जाकर झिड़कने लगा कि हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा। उस ने फिरकर पतरस से कहा, हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है।'' (मत्ती १६:२१−२३)

डॉ जे वर्नान मैगी ने यह विवेचना दी थी,

पहली बार यीशु चेलों के सामने अपनी मौत और पुनरूत्थान के विषय में घोषणा करते हैं अपने क्रूसीकरण से लगभग छ महिने पहिले का यह समय था। इतनी महत्वपूर्ण घोषणा करने के लिये यीशु इतना इतंजार क्यों करते हैं प्रत्यक्ष रूप से, उनके चेले, उस समय, इस बात के लिये तैयार नहीं थे और वे उनके हिसाब से प्रतिकिया दे रहे थे। यीशु ने पांच बार दोहराया था कि वह यरूशलेम मरने के लिये जा रहे हैं (मत्ती १६:२१); १७:१२; १७:२२−२३; २०:१८−२९; २०:२८) इतने सघन निर्देश के बाद भी चेले इसका महत्व समझने में असफल रहे --- जब तक कि वह फिर से मर कर जी नहीं उठे। जे वर्नान मैगी, टीएचडी, थु दि बाईबल, थॉमस नेल्सन पब्लिशर्स, १९८३ वाल्यूम ४ पेज ९३ मत्ती १६:२१ पर व्याख्या)

परमेश्वर ने पतरस को प्रकाशित कर दिया धा कि यीशु मसीहा थे। परमेश्वर के पुत्र थे। पतरस तो सुसमाचार को जानता भी नहीं था, उसे इस सत्य का प्रकाशन स्वयं दिया, यहां तक कि यीशु ने भी उससे कहा था, ''मुझे अवश्य है कि यरूशलेम को जाऊं....... और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूं।'' (मत्ती १६:२१) इसलिये पतरस यीशु को झिड़कता है कि वह क्यों कहता है कि वह मारा जायेगा (मत्ती १६:२२) डॉ मैगी ने कहा, ''कि मूलतत्त्व यह है कि पतरस ने कहा था ‘तुम तो मसीहा हो, तुम तो परमेश्वर के पुत्र हो। तुम् तो कूस पर नहीं चढ़ सकते या चढ़ना आवश्यक नहीं है!’ कूस शिष्यों की सोच में नहीं था, आप देख सकते हैं।'' (उक्त संदर्भित मत्ती १६:२२ पर व्याख्या)

''परंतु उस ने फिरकर पतरस से कहा, हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है।'' (मत्ती १६:२३)

डॉ मैगी ने कहा, ''कि यह कितनी शैतानी बात है कि कोई सुसमाचार के तथ्यों का इंकार करे कि यीशु हमारे पापों के लिये मरे गाड़े गये और मरे हुओं में से जी उठे....... हमारे प्रभु ने पतरस से कहा, ‘हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो’ कल्पना कीजिये: यहां पतरस है जिसके द्वारा परमेश्वर की पवित्र आत्मा ने यह कहलवाया कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, और अगले ही क्षण में शैतान ने उसे छल लिया!'' (उक्त संदर्भित मत्ती १६:२२ पर व्याख्या)

अब मुझे पक्का निश्चय हो गया कि यह बराबर वर्णन करता है कि क्यों चेले यरूशलेम जाने से डर रहे थे।

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)

२. दूसरा, उनके भय का कारण।

उन्हें सांत्वना देने के बजाय, यीशु उन्हें बार बार वही याद दिलाते रहे जिससे उनका भय उत्पन्न हुआ था। निवेदन करता हूं कि आप खड़े होकर यह पद मरकुस १०:३२, ३४ जोर से पढ़े,

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे, तब वह फिर उन बारहों को लेकर उन से वे बातें कहने लगा, जो उस पर आने वाली थीं। कि देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं, और मनुष्य का पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा, और वे उस को घात के योग्य ठहराएंगे, और अन्यजातियों के हाथ में सौंपेंगे। और वे उस को ठट्ठों में उड़ाएंगे, और उस पर थूकेंगे, और उसे कोड़े मारेंगे, और उसे घात करेंगे, और तीन दिन के बाद वह जी उठेगा'' (मरकुस १०:३२,३४)

अब आप बैठ सकते हैं।

अब आप बैठ सकते हैं। हम कैसे इस सत्य को उदघाटित कर सकते हैं कि पतरस और अन्य चेले जानते थे कि यीशु मसीहा थे फिर भी यह नहीं जानते थे कि वह क्रूस पर मरने जा रहा है और तीसरे दिन मरे हुओं में से जीवित निकले? चक मिसलर यह विवरण देता है,

         जब कोई इजरायल के मसीहा के प्रगट होने के बारे में अनेक भविष्य कथनों का विश्लेषण करता है हमें (प्रकट रूप से) दो विरोधाभासी प्रस्तुतीकरण दिखाई देते हैं। कई वाक्य उसे दुख उठाने वाला सेवक प्रस्तुत करते हैं; जबकि अन्य उसे शासन करने वाले राजा के रूप में मानते है। इन अनेक वाक्यों से यह भी परिणाम निकलता है कि कि दो मसीहाओं के होने का पूर्वानुमान लगता है: मसीहा बेन जोसेफ, दुख उठाने वाला सेवक; मसीहा बेन डेविड, शासन करने वाले राजा।
         जब यीशु ने अपना प्रगटीकरण किया तब बेन डेविड के प्रगट होने की धारणा बहुत प्रबल थी वह शासन करने वाला राजा जो इजरायल को दुष्ट शासकों से छुटकारा दिलायेगा − इस धारणा के प्रचलन में होने के कारण उन्होने उसे पहचाना नहीं! दो भिन्न प्रकार के ''आगमन'' में एक मसीहा को पहचानना इस बात को अब स्पष्ट रूप में कुछ पुरातनपंथी विद्वान पहचानने लगे हैं।
          यहां तक कि अति आदरणीय रब्बी रब्बी इतजक कादुरी ने भी यह आकस्मिक उदबोधन दिया कि दोनों मसीहा एक में निहित होते हैं और वह है योशवा यीशु.......उसके उपर लगा लेख मौत के बाद खुली कब्र इन सबने उस समय के इजरायल के यहूदी समाज को भी काफी घबराहट में डाल दिया इजरायल टूडे अप्रैल ६ २००७ (चक और नैंसी मिसलर, दि किंगडम, पॉवर एंड ग्लोरी, किंग हाइवे मिनिस्टृीज, संस्करण २०१०, पेज ३१७)

इजरायल की यहूदी जाति के समान चेलों ने भी यही अपेक्षा की थी कि कोई मसीहा बेन मसीहा दाउद का पुत्र हमें रोमन सरकार के अत्याचार से छुडायेंगे। उन्होंने मसीहा बेन जोसफ एक दुख उठाने वाले सेवक से यह अपेक्षा नही की थी। उन्होंने यह नही जाना था कि मसीहा पहले दुख उठायेगा − और उसके पश्चात अपने द्वितीय आगमन पर इस संसार पर राज्य करेगा। मैं सोचता हूं इसीलिये यहूदा ने यीशु को धोखा दिया जब उसको यह अहसास हुआ कि प्रभु यीशु तो इजरायल के शासक नहीं बनने वाले हैं − उस समय काल में। और मैं यह भी मानता हूं कि यहीं मनोवैज्ञानिक कारण था कि पतरस ने यीशु को यह कहने पर झिड़का था कि वह मारा जायेगा (मत्ती १६:२२) । और मैं यह भी मानता हूं कि यही मनोवैज्ञानिक कारण था कि चेले यीशु के यरूशलेम तक साथ जाने के लिये डर रहे थे जहां उन्होने कहा था कि वह मारे जायेंगे। वे साधारण सी बात नहीं समझ सके कि ''दो मसीहा जिनकी चर्चा है वे एक में ही निहित है और उसका नाम योशवा है'' − यीशु! (मिसलर उक्त संदर्भित)। वे दुख उठाने वाले मसीहा में विश्वास करना ही नहीं चाहते! वे तो संपन्नता चाहते थे दुख सहन किया जाना नहीं! यही मनोवैज्ञानिक व्याख्या

है।

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)

तौभी उनके भय का एक और अन्य महत्वपूर्ण कारण है जो आत्मिक कारण कहा जा सकता है।यह हमें लूका १८:३१−३४ में मिलता है। निवेदन करता हूं कि खड़े होकर इन पदों को जोर से पढे़।

''फिर उस ने बारहों को साथ लेकर उन से कहा; देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं, और जितनी बातें मनुष्य के पुत्र के लिये भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा लिखी गई हैं वे सब पूरी होंगी। क्योंकि वह अन्यजातियों के हाथ में सौंपा जाएगा, और वे उसे ठट्ठों में उड़ाएंगे; और उसका अपमान करेंगे, और उस पर थूकेंगे। और उसे कोड़े मारेंगे, और घात करेंगे, और वह तीसरे दिन जी उठेगा। और उन्होंने इन बातों में से कोई बात न समझी: और यह बात उन में छिपी रही, और जो कहा गया था वह उन की समझ में न आया'' (लूका १८:३१−३४)

आप बैठ सकते हैं। मैं चाहता हूं आप विशेष ध्यान पद ३४ पर देवें,

''और उन्होंने इन बातों में से कोई बात न समझी: और यह बात उन में छिपी रही, और जो कहा गया था वह उन की समझ में न आया'' (लूका १८:३४)

''यह बात उन में छिपी रही।'' जैसे परमेश्वर ने पतरस के समक्ष यह प्रकाशित किया था कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है − वैसे ही अब परमेश्वर ने ''उनसे यह बात छिपा ली'' कि मसीह को दुख उठाना अवश्य है। ध्यान दीजिए, पद ३१ में हम ध्यान से पढ़ते हैं, कि यीशु ने कहा कि वह यरूशलेम इसलिये जा रहे हैं कि ''भविष्यवक्ताओं की कही बात पूर्ण कर सकें।'' यहां वह यशायाह ५३ और भजन २२ में वर्णित दुख उठाने वाले मसीहा से संबंधित भविश्यवाक्यों के बारे में संकेत दे रहे थे।

''यह बात उन में छिपी रही'' − इसलिए वे ''डर गये थे''। जैसा कि डॉ मैगी ने कहा, ''यीशु ने उनके सामने पांच बार दोहराया कि वह यरूशलेम मरने जा रहे है (किंतु) चेले उस दिन तक यह बात नहीं समझे जब तक कि मसीह मर कर जी नहीं उठे..........शिष्यों की सोच में भी कूस बिल्कुल नहीं था'' (उक्त संदर्भित)

''यह बात उन में छिपी रही'' जैसा कि डॉ मैगी ने कहा तब तक, जब तक ''मसीह मर कर जी नहीं उठे''। यीशु उस शाम जब मर कर जी उठे, चेलों के सामने प्रगट हुए,

''तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी। और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।'' (लूका २४:४५−४६)

इसी समय यूहन्ना का सुसमाचार भी कहता है,

''और यह कहकर उस ने अपना हाथ और अपना पंजर उन को दिखाए: तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।'' (यूहन्ना २०:२२)

डॉ मैगी ने कहा, ''मैं व्यक्तिगत रूप से विश्वास करता हूं कि जिस क्षण प्रभु यीशु ने उनके उपर पवित्र आत्मा फूंका होगा और कहा होगा ये पवित्र आत्मा प्राप्त करो इन लोगों ने विमोचन (नया जन्म) प्राप्त किया होगा। इस दिन के पहले तक उनके भीतर पवित्र आत्मा का अन्तर्निवास नहीं था।'' (जे वर्नान मैगी, टीएचडी, उक्त संदर्भित, पेज ४९८; यूहन्ना २०:२१ पर व्याख्या) मैं डॉ मैगी से अधिक सहमत नहीं हो सकता था! लगभग दस वर्षो तक १९६० में अपने काम पर जाते समय मैं प्रतिदिन उनका रेडियों संदेश सुना करता था। उन्हें आप www.thruthebible.org इंटरनेट पर सुन सकते हो। मैं मानता हूं कि उन्होंने हमें बहुत गहरी परख प्रदान की है, जिसे कई लोगों को समझने में परेशानी होगी। ईस्टर की शाम आने तक चेलों ने नया जन्म नहीं प्राप्त किया था!

आपकी दशा भी उन चेलों के समान हो सकती है, आप धर्मशास्त्र पढ़ सकते हैं, उन्हें याद कर सकते हैं, पर आप भी, उनके समान भयभीत और अविश्वासी ही बने रहेंगे जब तक परमेश्वर का आत्मा आपको आपके पापों के विषय में बोध न करवाये, और यीशु के पास खींच कर न लायें, आपकी निर्जीव आत्मा में प्राणों का संचार न करे एवं मसीहा के रक्त से आपके सारे पापों को धो न दे (१ यूहन्ना १:७) हमारी प्रार्थना है कि यह अनुभव आपको शीघ्र ही हो। अब निवेदन करता हूं कि अपने स्थानों पर खड़े होकर रिचर्ड मंट का लिखा गीत यीशु का दुख गाने के पत्रक संख्या २ में से गाये।

वह नियत दिन आ पहुंचा है! देखों यीशु का इच्छापूर्ण त्याग,
यीशु हमें पापों से मुक्ति देने उस शर्मनाक कूस की मौत को गले लगाते है।

यीशु, जो आप के लिये जन्म लेते हैं, उस तिरस्कार पूर्ण कूस को सहन करते हैं,
हर कष्ट भयानक यंत्रणा को सहते हुए, ताकि आप के जीवन की उदासी खत्म हो?

किसमें इतना रक्त बहाने की ताकत होगी, दर्द में डूबा, दर्द के प्याले को पीना,
कमजोर शरीर मे कांटो का ताज, कीलें और भाले का भेदा जाना?

पवित्र यीशु हमें अपना अनुग्रह दें, आप के त्याग मयी बलिदान मे विश्वास रखें
कि हमारा जीवन नया हो जाए, पापों से मुक्ति मिल जाये, भले की प्रतिज्ञा प्राप्त करें।
   (रिचर्ड मंट का लिखा गीत ''यीशु का दुख'' १७७६−१८४८; इटस मिडनाईट व
      आँन आलिव ब्रा की धुन पर आधारित)

डॉ चान निवेदन है कि हमारे लिये प्रार्थना कीजिए। आमीन।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा प्रार्थना की गई: मरकुस १०:३२−३४
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''जीजस सॉरो'' (रिचर्ड मंट, १७७६−१८४८)


रूपरेखा

चेलों का भय

THE FEAR OF THE DISCIPLES

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

''और वे यरूशलेम को जाते हुए मार्ग में थे, और यीशु उन के आगे आगे जा रहा था: और वे अचम्भा करने लगे और जो उसके पीछे पीछे चलते थे डरने लगे...'' (मरकुस १०:३२)

१. पहला चेलों का भय, मत्ती १६:१५−१७, २१−२३

२. दूसरा, उनके भय का कारण, मरकुस १०:३२−३४;
लूका १८:३१−३४; २४:४५−४६; यूहन्ना २०:२२