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यह अधिकार मुझे भी दो

(जागृति पर संदेश २)
GIVE ME THIS POWER
(SERMON NUMBER 2 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की शाम, २७ जुलाई, २०१४ लॉस एंजीलिस के दि बैपटिस्ट टेबरनेकल में
प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, July 27, 2014

''कि यह अधिकार मुझे भी दो'' (प्रेरितों के काम ८:१९)


सामरिया में ये शब्द बड़ी जागृति के दौरान कहे गये। मैं उस जागृति पर टिप्पणी करने नहीं जा रहा हूं। इससे हमारे विचार उस पद पर से भटक जाऐंगे। इस संदेश में इतना कहना पर्याप्त है कि फिलिप सामरिया गया और वहां मसीह का प्रचार किया, और इसके बाद वहां जबरदस्त आत्मिक जागृति फैली। उस शहर में लगभग हर व्यक्ति ने नया जन्म पाया।

किंतु जादूगर शमौन ने नया जन्म प्राप्त नहीं किया। जब पतरस उस जागृति में फिलिप की मदद करने पहुंचा तो शिमौन आया। वह कहने लगा,

''कि यह अधिकार मुझे भी दो'' (प्रेरितों के काम ८:१९)

उसने यह अधिकार पाने के लिये पैसे देने की भी पेशकश की! पतरस ने उससे कहा, ''मैं देखता हूं, कि तू पित्त की सी कड़वाहट और अधर्म के बन्धन में पड़ा है।'' (प्रेरितों के काम ८:२३) (चाल्र्स शिमौन १७५९−१८३६) ने कहा था,

शिमौन अपने विश्वास में गंभीर प्रतीत हो रहा था, इसलिये फिलिप ने उसे बपतिस्मा दिया था......इसलिये सच्चे मसीही जन उसे अपना मसीही भाई समझने लगे थे: किंतु (फिलिप) ने जल्द ही शिमौन के मन में छिपे छल को पहचान लिया....वह तो वैसा का वैसा ही था, जैसा पहले था, उसके मूल स्वभाव में (अपरिवर्तित दशा में)। इसलिये पतरस ने उसे इन शब्दों से संबोधित किया..... '' मैं देखता हूं, कि तू पित्त की सी कड़वाहट और अधर्म के बन्धन में पड़ा है''... पाप की दशा (में)....दंड पाने की दशा (में) जो कि पाप का परिणाम था (चाल्र्स शिमौन, एक्सपोजिटरी आउटलाईन्स आँन दि व्होल बाईबल जोंडरवन पब्लिशिंग हाउस, १९५५ एडीशन, वॉल्यूम १४, पेज ३३९, ३४०)

पतरस ने शिमौन को उसकी ''दुष्टता से पश्चाताप'' करने के लिये कहा। किंतु शिमौन ने मन नहीं फिराया। वह जैसा था वैसा ही रहा। उसने पतरस से यह कहा,

''कि तुम मेरे लिये प्रभु से प्रार्थना करो कि जो बातें तुम ने कहीं, उन में से कोई मुझ पर न आ पड़े'' (प्रेरितों के काम ८:२४)

डॉ.मैगी ने कहा था,

शिमौन ने स्वयं को बचाये जाने की आशीष नहीं मांगी। उसने उद्धार पाने की प्रार्थना करने के लिये नहीं कहा। उसने सिर्फ यह मांगा कि उस के उपर कोई भयानक बातें न आ पड़े (जे.वर्नान मैगी, टी.एच.डी., थू दि बाईबल, थॉमस नेल्सन पब्लिशर्स, १९८३, वॉल्यूम ५, पेज ५४५, प्रेरितों के काम ८:२४)

डॉ.मैगी ने कहा था, ''उसने नया जन्म नहीं पाया'' (संदर्भित, प्रेरितों के कार्य ८:२१ पर व्याख्या)। दुख की बात है, कि चर्च के धर्मवृद का लेखन यह बताता है कि शिमौन कभी परिवर्तित ही नहीं हुआ था। वास्तव में, तो वे यह बताते हैं कि वह टोने टोटके की शक्ति का प्रमुख अगुवा था और ''चर्च का विरोधी बना'' (दि रिफॉर्मेशन स्टडी बाईबल, लिगोनियर मिनिस्ट्रीज, २००५, पेज १५७२; प्रेरितों के कार्य ८:९ पर व्याख्या)। वह ''ताकत'' में सामर्थवान होना चाहता था, किंतु मसीह स्वयं के उपर उसने विश्वास नहीं किया। उसने कहा,

''कि यह अधिकार मुझे भी दो'' (प्रेरितों के काम ८:१९)

यह बात आज हम पर किस तरह लागू होती है?

१. प्रथम, हमारे समय में व्याप्त आदम के मूल पाप में विश्वास न करने वाली शिक्षा का प्रचलन।

''लोकाचार'' से मेरा यह तात्पर्य है कि यह प्रचलन में होना कि लोग बचाये जाते हैं। क्राइस्टलेस किश्चयनिटी, में डॉ.माईकल हार्टन कहते हैं कि अधिकतर अमेरिकंस इस विचार को मिला देते हैं ''आदम के मूलपाप से पाप दुनिया में आया इस सत्य पर विश्वास नहीं करते हैं और इसलिये स्वयं ही उद्धार पाने के प्रयत्न पर जोर देते हैं। जादू टोने की सामर्थ पर जोर देते हुये अपने भीतर आत्मिक उत्साह भरना चाहते हैं (बेकर बुक्स, २००८, पेज २५१) आज भी लोग सोचते हैं कि वे बचाये जाने के लिये (पेलाजियनिज्म) जैसा कुछ भी कर सकते हैं। वे इसे ''गुप्त'' शक्ति मान कर (रहस्यवादी रूप) में इस पर विचार करते हैं।

मुझे लगता है हम हमारे चर्च में, लगातार गलत विचार धारा की लड़ाई करते रहते हैं। बाहरी लोग और जो चर्च में ही पले बड़े लोग हैं, वे भी इस गलत विचार धाराओं की पकड़ में जीवन बिताते चलते हैं।

आप बाहर निकलिये और दस या पंद्रह लोगों से बात कीजिये, आप पायेंगे कि यह सत्य है। अगर आप उनसे पूछें कि वे स्वयं की पापी दशा मिटाने में असहाय हैं, तो वे आपको अपने कर्म गिनाने शुरू कर देंगे, कि वे इसका निवारण करने मे लगे हैं, कुछ कर रहे हैं, या कुछ करना बंद कर दिया ताकि वे स्वयं को बचा सकें। उनका मानना होगा ''कि मैं अपने पाप धोने के लिये अच्छे से अच्छा प्रयास कर रहा हूं।'' ''मैं किसी से प्रयास करने में पीछे नहीं हूं।'' आप सारे समय यह बातें सुन सकते हैं। वे इस शिक्षा को जानते भी नहीं, किंतु इस शिक्षा का एक नाम है जिस पर वे विश्वास करते हैं − उसे पेलाजियनिज्म कहते हैं। वे सोचते हैं मनुष्य अपने प्रयासों से अपना मोक्ष अर्जित कर लेगा, उसके स्वयं के बल पर वह बच जाएगा। बेशक, यह विचारधारा बाईबल की शिक्षा के प्रतिकूल है। बाईबल कहती है,

''जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे'' (इफिसियों २:५)

''क्योंकि उनकी बुद्धि अन्धेरी हो गई है और उस अज्ञानता के कारण जो उन में है और उनके मन की कठोरता के कारण वे परमेश्वर के जीवन से अलग किए हुए हैं'' (इफिसियों ४:१८)

ये पद बताते हैं कि मनुष्य संपूर्ण रूप से असहाय है − पाप का गुलाम है, एक ऐसा जन जो स्वयं को पाप की गुलामी से बचाने के लिये कुछ नहीं कर सकता − वह पाप से मृत है − और इसीलिये उसका नरक जाना तय है। चर्च के बाहर क्या आपने किसी जन को पाया जो इस पर विश्वास रखता हो? मुझे तो ऐसा कोई नहीं मिला हमारे समाज में कोई भी इस सत्य पर विश्वास नहीं रखता है कि वे पाप के दास हैं। चर्चेस भी तो ऐसा प्रचार नहीं करते हैं! इसलिये चर्च में पले बढ़े लोग भी सोचते हैं, वे अपनी कोशिशों से, उद्धार पा लेंगे। ऐसे लोगों को पेलाजियॉनिस्ट कहते हैं। उन्हें यह जरा भी भान नहीं है कि वे निकम्में लोग हैं जो अपने उद्धार पाने के लिये स्वयं से कुछ भी नहीं कर सकते।

दूसरी बात, वे रहस्यवादी हैं। वे सोचते हैं वे किसी विद्या या शिक्षा को प्राप्त करके स्वयं ही ज्ञान से भर जाऐंगे; और इस ज्ञान को बचाये जाने के लिये प्रयोग कर लेंगे। ऐसे ही लोग तो हमें मसीही समाज में मिलते हैं। हमारे यहां चर्च में कई लोग इस विचारधारा के आते हैं वे कई महिने साल यहां बिताते हैं, सोचते हैं कुछ ''गुप्त''' बात उन्हें पता चल गई है जिसे करके वे मसीह में जीवन बचा सकते हैं। इसको डॉ. हार्टन ने कहा, ''रहस्यवादी रूप में अपने अंतर्मन के अनुभव और उत्साह पर जोर देना।'' मैं उन्हें हर बार, बार बार, कहता हूं कि ऐसी मंडली

''सदा सीखती तो रहती हैं पर सत्य की पहिचान तक कभी नहीं पहुंचतीं।'' (२ तीमुथियुस३:७)

किंतु वे मेरी मानते ही नहीं। वे इस सोच में डूबे रहते हैं कि कुछ ''गुप्त'' रहस्यवादी मंत्र हैं जिससे वे सच्चे मसीही बनना सीख सकते हैं। मैंने लोगों को रोते हुये देखा है, गाल पर आंसू गिर रहे हैं, सिर्फ यही सीखने के प्रयास में, पता लगाने की कोशिश में, कि कुछ ''गुप्त'' मंत्र है जिससे वे स्वयं को बचा सकते हैं! अभी अभी दो जवानों ने सोचा कि उन्होंने यह गुप्त मंत्र ''पता लगा लिया है।'' वे दोनों कहते हैं, ''मैंने कुछ भी नहीं किया − और मैं जान गया कि मेरा नया जन्म हो गया है।'' मैंने उनसे कुछ प्रश्न पूछे और यह पाया कि सचमुच, उन्होंने कुछ नहीं किया! वे सोच रहे थे कि उद्धार पाने के लिये कोई गुप्त रहस्यात्मक बात है। मैंने उनसे कहा कि कोई भी ऐसी सुधारवादी शिक्षा नहीं है, न ही बाईबल का कोई ऐसा सिद्धांत है जो उद्धार दिलाता है। मैंने उन्हें ''शांतपन'' के मतांतर के बारे में भी समझाया जिसे अठारहवीं शताब्दी में वेस्ली और वाईटफील्ड ने बहुत जोर शोर से प्रचार किया था । मैंने उनसे यही कहा कि कुछ तो है जिस को उनको करना अति आवश्यक है। उन्हें मसीह पर विश्वास करना आवश्यक है। बाईबल इस बारे में बहुत स्पष्ट कहती है,

''प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।'' (प्रेरितों के काम ८:१९)

''जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका'' (यूहन्ना ३:१८)

किंतु वे जवान चेहरे पर उलझन का भाव लिये हुये चले गए, अभी भी वे यह सोच रहे थे कि जरूर उन्हें किसी दिन वह रहस्यात्मक ''गुप्त'' मंत्र मिल जाएगा! ऐसी बातें मेरा दिल तोड़ देती हैं! यीशु उनके जैसे सब लोगों से प्रेम रखता है। उनको सिर्फ मसीह पर विश्वास करना चाहिये। किंतु वे तो गुप्त मंत्र पाने के पीछे पड़े हुये हैं! वे यीशु को एक ताकत और सामर्थ के जैसे मानते हैं, जैसे शिमौन कहता था, ''कि मुझे भी यह अधिकार दो'' (प्रेरितों के कार्य ८:१९) शिमौन रहस्यवादी बातों में उलझ गया। सुधारवादी बाईबल अध्ययन के अनुसार,

रहस्यवादिता (यूनानी शब्द रहस्यवाद से निकला है,अर्थात ''ज्ञान'') यह शिक्षा सिखाती है कि एक व्यक्ति को उद्धार मसीह के द्वारा पापियों के लिये क्रूस पर प्राण बलिदान करने से नहीं मिला, किंतु कुछ विशेष ज्ञान के द्वारा उद्धार मिलता है.....(दि रिफॉर्मेशन स्टडी बाईबल, संदर्भ)

जब एक व्यक्ति के दिमाग में ऐसी विचारधारा बैठने लगती है, तो मानवीय तौर पर इससे बाहर आना असंभव होता है। वे मानों हिस्पैनिक कैथोलिक्स के समान होते हैं जो मसीह को बजाय एक प्रेम करने वाले मसीहा के न्यायी (किस्टो) समझते हैं! एक बूढी कैथोलिक महिला गुस्साई हुई चर्च से बाहर चली गई जब मैंने कहा कि यीशु एक न्यायी नहीं, किंतु प्रेम रखने वाला मसीहा है! उस महिला को अपने विचार बदलने में परेशानी थी और यीशु से इस रूप में डरना मंजूर था! और ऐसा ही आज कई इवेंजलीकल प्रचारक कर रहे हैं! वे यीशु को एक रहस्यमय ''ताकत'' के रूप में प्रचार करते हैं ताकि उनके बारे में कुछ गुप्त बातें सीखी जा सके, बजाय यीशु को मसीह मानने के जो एकदम से उस पर विश्वास लाने भर से ही पापों से क्षमा प्रदान कर देता है!सचमुच कितनी दुखद दशा है लोगों की!

क्या आप जानते हैं, यह शैतानी भी है! डॉ.मार्टिन ल्यॉड−जोंस ने कहा था,

ऐसा समय भी आता है जब (शैतान) एक एक मसीही जन पर ध्यान केंदित करता है, मसीही चर्च के कुछ हिस्सों पर, एवं देश देश पर उसकी निगाहें हैं (दि किश्चयन सोल्जर, इफिसियन्स ६:१०−१३,दि बैनर आँफ ट्रूथ ट्रस्ट १९७७, पेज ३०२)

मैं मानता हूं कि अमेरिका और पश्चिमी देश शैतान की ताकत के कब्जे में हैं, यहां तक कि हमारे उत्तम माने जाने वाले चर्च भी शैतानी शिक्षाओं के प्रभाव में हैं। प्रेरित पौलुस ने कहा था,

परन्तु आत्मा स्पष्टता से कहता है, कि आने वाले समयों में कितने लोग भरमाने (पथभ्रष्ट करने) वाली आत्माओं, और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास से बहक जाएंगे। (१तीमुथियुस४:१)

मेरा मानना है कि पेलाजियन और रहस्यवादी मत वाली शिक्षायें, जो आज मसीहत में जोर पकड़ रही हैं, वास्तव में − ''शैतानी शिक्षाऐं'' हैं।

''वर्ड आँफ फैथ'' ऐसा अभियान है जो टी.डी.जैक्स जैसे बड़े नाम वाले लोगों ने चलाया हुआ है, इसमें बैनी हिन, जॉयस मेयर, और जोएल आँस्टन सम्मिलित हैं। वे जगत में समृद्धि का सुसमाचार प्रचार फैला रहे हैं। हमारे बैपटिस्ट चर्च भी इसी शिक्षा के प्रभाव में हैं, इसे जाने बगैर वे इस शिक्षा से प्रभावित हो जाते हैं। डॉ.हार्टन ने कहा था कि ''रहस्यवाद और धन संपदा वाले संदेशों के बीच बहुत सारी समानताऐं हैं'' (उक्तसंदर्भ, पेज ६७) उन्होंने यह भी कहा कि कई चर्चेस तो ''एक (मिश्रित) शिक्षा का प्रचार कर रहे हैं जो स्वज्ञान और रहस्यवादी ज्ञान को ठोस ठहराती है'' (उक्त संदर्भ, पेज ६८)। ''(परमेश्वर) ने कुछ नियम व सिद्धांत दिये हैं जिनके पालन करने से हमें जीवन में जो चाहिये वह मिल सकता है, अगर हम उन नियमों पर चलें, तो जो चाहे वह मिल सकता है'' (उक्तसंदर्भित)। बेशक, स्वज्ञान और रहस्यवाद की शिक्षाओं का मूल भाव यही है। यही तो साधारण लोग मानते हैं कि − अगर आप नियमों को सीखें, और सही शब्दों को कहें, तो जो चाहे वह मिलेगा − उद्धार भी मिलेगा।

जोएल आँस्टन अपने हर प्रसारण के अंत में कैमरे की ओर देखते हुये टी.वी. दर्शकों को बताते है,

सिर्फ इतना कहिये, ''प्रभु यीशु, मैं अपने पापों से पश्चाताप करता हूं। मेरे मन में आइये। मैं आपको अपना प्रभु मेरा मसीहा बनाता हूं।'' मित्रों, अगर आपने इतनी साधारण सी प्रार्थना भी कर ली है, तो हम मानते हैं कि आपका नया जन्म हो गया है।

मि.आँस्टन ने बिना मसीह का जिक्र किये एक संदेश दिया और उपरोक्त प्रार्थना की जिसमें सुसमाचार का कोई जिक्र ही नहीं था! उनके संदेश या प्रार्थना में ऐसा कोई वर्णन नहीं था कि मसीह पापियों के एवज में क्रूस पर मरे! उन्होंने इसका कोई वर्णन नहीं किया कि मसीह का लहू एक खोये हुए व्यक्ति के पापों को धो देता है! दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने सुसमाचार प्रचार तो किया ही नहीं (१कुरंथियों१५:१−४) तौभी जोएल आँस्टन कहते है, ''अगर आपने इतनी साधारण सी प्रार्थना भी कर ली है तो हम मानते हैं आपका नया जन्म हो गया है।'' यहां केवल दो संभावनाऐं हैं − या तो आँस्टन पूर्ण रूप से धूर्त प्रचारक है − या उसकी (अधिक संभावना) है कि उन्होंने ''धोखा देने वाली (छली) आत्माओं, और शैतानी शिक्षाओं पर मन लगा रखा है।''

जो भी हो, पेलाजियनिज्म और रहस्यवाद शैतान ने पूरे संसार में फैला रखा है− विशेषकर अमेरिका में। और आप भी इस पर विश्वास करते हैं इसीलिए आपने अभी तक नया जन्म नहीं पाया है!

२. दूसरा, आपको इन दो शैतानी शिक्षाओं से मुक्त होना आवश्यक है नहीं तो आप कभी भी बचाये नहीं जाओगे!

पहली गलत शिक्षा है पेलाजियनिज्म। यह वह विचारधारा पैदा करती है कि आप कुछ कर सकते हो, या करना रोक सकते हो, तब आप नया जन्म पाओगे। यह ऐसा मतांतर व्याप्त है कि मैं इस विषय पर बोलने के लिये शर्म महसूस कर रहा हूं। आप में से कितने इस शिक्षा को मानते होंगे! क्या आपने बाईबल में इन पदों को नहीं पढ़ा?

''क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे'' (इफिसियों२:८,९)

आप कुछ भी करें वह कर्म आपको नहीं बचा सकता! कुछ भी नहीं! कुछ भी करना बंद कर देना आपको नहीं बचा सकता! कुछ भी नहीं! केवल एक ही बात की आज्ञा खोए हुए पापियों को दी हुई है कि,

''प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा'' (प्रेरितों के काम १६:३१)

आप कहेंगे, ''कि यह तो बहुत आसान है!'' हां, किंतु एक बात है जो खोए हुए पापी जन नहीं करेंगे − चाहे आप उनसे कितनी भी याचना करो! चाहे आप अक्सर कितना ही प्रचार इस विषय परकरते हो! खोए हुए पापी मसीह को अस्वीकार कर देते हैं और कुछ और ही करना चाहते हैं। वे अपनी योग्यता (स्वज्ञान से उद्धार पाना) पर इतना भरोसा रखते हैं कि वह हर बार यीशु पर विश्वास लाने से इंकार कर देते हैं। इसके स्थान पर वह बाईबल के या यीशु के किसी गुण विशेष पर भरोसा रखेंगे, किंतु स्वयं यीशु पर विश्वास नहीं लायेंगे। यीशु स्वयं पर भरोसा नहीं रखेंगे! क्यों? क्योंकि पेलाजियनिज्म एक झूठ है, इसलिये! बिना परमेश्वर के अनुग्रह के एक खोया हुआ पापी कभी यीशु के पास नहीं आ सकता, केवल उस पर विश्वास करे बगैर कोई उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता! वह हर बार सिर्फ यीशु को अस्वीकार करेगा − क्योंकि वह पूर्ण रूप से भटका जीव है!

''और उस ने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे'' (इफिसियों२:१)

दूसरी गलत शिक्षा है रहस्यवाद! इस विचारधारा की खासियत है कि परमेश्वर एक वैयक्तिक ताकत या बल है जिसे किसी ''रीति से प्राप्त किया'' जा सकता है। वे लोग जिन्हें कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त है (यूनानी शब्द ''नोसिस''अर्थात ''ज्ञान'') वे उद्धार प्राप्त करने का मूलमंत्र ज्ञान द्वारा अर्जित कर लेते हैं। यह विचारधारा आज संपूर्ण प्रसिद्ध इवंजलीकल कार्यक्षेत्रों में प्रचलित है। डॉ.हार्टन कहते हैं कि इवेंजलीकल रहस्यवाद हमें इस बात के लिये प्रेरित करता है कि ''हम हमारे भीतर हमारी कल्पना का प्रयोग करके ऐसी आकृति का निर्माण करें जो किसी भी रीति से वश में लाई जा सकती है या उससे समझौता किया जा सकता है'' (संदर्भ, पेज १६७)

जवान लड़के बिना विचार किये इस का अनुसरण करते रहते हैं। यीशु उनके लिये एक काल्पनिक ''ताकत'' हैं जिससे वे जो चाहें सो करवा सकते हैं। क्या शिमौन जादू टोने वाले ने भी यही नहीं चाहा था उसने कहा था, ''कि मुझे यह अधिकार दे दो'' (प्रेरितों के कार्य ८:१९) तो ईश्वर उनके लिये एक ''शक्ति है'' जिसे दिया जा सकता है या मनुष्य द्वारा हासिल किया जा सकता है।

यह रहस्यवादी विचारधारा ''सफेद जादू'' पर जोर देती है। काले जादू में जादू टोने वाले कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करके दुष्ट आत्माओं पर काबू पाते हैं। इस तथाकथित ''सफेद जादू'' में जादू टोने वाला कुछ निश्चत शब्दों का इस्तेमाल करता है, प्रार्थना या मंत्रो का दुहराव करता है ताकि अच्छी आत्माओं को नियंत्रित कर सके − यहां तक कि परमेश्वर को भी!

सिर्फ इतना कहिये, ''प्रभु यीशु, मैं अपने पापों से पश्चाताप करता हूं। मेरे मन में आइये। मैं आपको अपना प्रभु मेरा मसीहा बनाता हूं।'' मित्रों, अगर आपने इतनी साधारण सी प्रार्थना भी कर ली है, तो हम मानते हैं कि आपका नया जन्म हो गया है।

अगर आप ऐसा कहते हैं, तो शक्ति आपके मन के अंदर प्रवाहित होती है! आप ये शब्द दोहराने से स्वयं नया जन्म प्राप्त कर सकते हैं! यह तो विशुद्ध रहस्यवाद है! यह तो विशुद्ध सफेद जादू है! इसका नाम लो और मांग लो! यही तो विश्वास का संदेश है! नाम लो और मांग लो! यह सब इवेंजलीकल्स द्वारा किया जा रहा है यही तो सफेद जादू है! याद रखिये शिमौन जादू टोने वाला था, एक तांत्रिक था (प्रेरितों के कार्य ८:९) रहस्यवाद के जनक में से एक माना जा सकता है! इसीलिये तो उसने कहा था, ''कि मुझे भी ऐसा अधिकार दो।''

निष्कर्ष

यीशु मसीह ऐसा कोई ''बल'' नहीं है जिसे आप नियंत्रित कर सको, खरीद सको, या इसका इस्तेमाल कर सको! वह तो एक मनुष्य है, मानव रूप है। वह हमारे पापों का दंड भरने के लिये क्रूस पर चढ़ गया। आप यह ''अंदाजा नहीं लगा सकते'' या ''सीख नहीं सकते'' कि उद्वार ''कैसे प्राप्त कर सकें'' ताकि वह आपको बचाए! आप जीवन भर कुछ ''गुप्त'' बात सीख सकते हो कि जीवन में पापों से मुक्ति कैसे पाई जा सके − पर आप खोये हुए ही रहेंगे, शिमौन जादू टोने वाले के समान। आपको तो मसीह के पास एक पापी के समान आना चाहिये जो ''कुछ भी पता नहीं लगा सकता''। आपको उसके सामने गिर जाना है और उस पर विश्वास लाना है। आप को क्रूस पर चढाये मसीह के द्वारा पापों से मुक्ति पाना आवश्यक है! आप को उसके कीमती लहू से शुद्ध होना आवश्यक है! पाप से बचने का कोई अन्य तरीका नहीं है! कुछ सीखना शेष नहीं है! ''कोई गुप्त चाभी'' या विशेष शब्द सीखना शेष नहीं है! प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा (प्रेरितों के काम १६:३१)।

आप यीशु पर विश्वास क्यों नहीं करते हैं? उत्तर बिल्कुल आसान है। आपको अपने पापों का बोध ही नहीं हुआ है! आपके पापों ने आपको परेशान ही नहीं किया है और रात भर आपको जगाया भी नहीं है! आपके पापी मन ने आपको कभी डराया ही नहीं!

पापी मन का अहसास जब तक आपको कचोटे नहीं तब तक आप का वास्तविक नया जन्म हो ही नहीं सकता। जब तक कि आदमी अपने पाप से गहराई तक व्यथित न हो जावे उसे यीशु की जरूरत महसूस ही नहीं होती है।

इसलिये तो हम आत्मिक जागृति और सच्चे रूप में नये जन्म के लिये प्रार्थना करते हैं। पर प्रार्थना में हम किस बात पर जोर देते हैं? क्या हम सिर्फ ऐसी प्रार्थनाऐं कर रहे हैं, ''कि हे पिता, और लोगों को विश्वास में लाइये'' - या ''हे पिता, जागृति भेजिए''? अगर ऐसी प्रार्थना है, तो हम सच में वह नहीं मांग रहे हैं जो चाहिये। हम मात्र एक जल्दबाज व अस्पष्ट सी दुआ मांग रहे हैं। परमेश्वर जो आप प्रार्थना में मांगते हैं वह देता है। अगर प्रार्थना साधारण सी है, तो आपको प्राय: कुछ नहीं मिलता चलिये! जो एक चीज सबसे अधिक जरूरी है उसके लिये प्रार्थना करें − पापी मन का बोध हो ऐसी प्रार्थना कीजिये। इसे मेरे साथ दोहरायें − ''पापी मन का बोध हो''। हां बिल्कुल यही प्रार्थना कीजिये! यह हमें सर्वाधिक आवश्यक है! यही हम परमेश्वर पवित्र आत्मा से चाहते हैं! जब तक पापी मन का बोध नहीं होगा, सुसमाचार आपको धुंधला और अस्पष्ट लगेगा! बिल्कुल भी सच्चा नहीं लगेगा!

हम अगले शनिवार शाम ५ बजे तक उपवास व प्रार्थना करेंगे। फिर हम चर्च में आएंगे कुछ और प्रार्थनाऐं करने के उपरांत भोजन भी ग्रहण करेंगे। यही आवश्यक है कि उपवास व प्रार्थना करे − ''कि पापी मन का बोध हो''। जब परमेश्वर ऐसा करता है तो हम और अधिक लोगों को यीशु पर विश्वास रखते हुये पाएंगे! जब ऐसा अधिकाधिक लोग करेंगे, तभी आत्मिक जागृति आएगी! आमीन।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया डॉ. केटन एल. चान द्वारा: प्रेरितों के काम ८:१८−२४
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
      दया की गहराई! क्या मिल सकती है? (चाल्र्स वेस्ली,१००७−१७८८ पास्टर द्वारा बदला गया)


रूपरेखा

यह अधिकार मुझे भी दो

(जागृति पर संदेश २)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

''कि यह अधिकार मुझे भी दो'' (प्रेरितों के काम ८:१९)
(प्रेरितों के काम ८:२३, २४)

१. प्रथम, हमारे समय में व्याप्त आदम के मूल पाप में विश्वास न करने वाली शिक्षा का प्रचलन, इफिसियों२:५; ४:१८; २ तीमुथियुस३:७;
प्रेरितों के काम १६:३१; यूहन्ना ३:१८;१तीमुथियुस ४:१

२. दूसरा, आपको दो शैतानी शिक्षाओं से मुक्त होना आवश्यक है नहीं तो आप कभी भी बचाये नहीं जाओगे! इफिसियों २:८,९; प्रेरितों के काम १६:३१; इफिसियों २:१; प्रेरितों के काम ८:९