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इस प्रकार का

(पुर्नजागृति पर संदेश १)
THIS KIND
(SERMON NUMBER 1 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की शाम, २०जुलाई, २०१४ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, July 20, 2014

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती।'' (मरकुस ९:२८−२९)


आज मैं आत्माओं और शैतान पर प्रचार करने जा रहा हूं, जिस के उपर डॉ.जे.आई.पैकर ने कहा था ''यह हमारे वर्तमान चर्च की दशा है'' और इसी कारण अमेरिका में १८५९ से कोई बडी जाग्रति नहीं देखी गई। मैं डॉ.मार्टिन ल्यॉड जोंस के संदेश की रूपरेखा में से ले रहा हूं − लंदन में १९५९ में वेस्टमिंस्टर चैपल में उन्होंने जो संदेश दिया था। मैं शब्दश: −उनका − संदेश नहीं दे रहा हूं, मैं उसमें कई विचार जोड़ रहा हूं, किंतु मुख्य विषय और रूप रेखा ''दि डॉक्टर'' से ली गई है।

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती।'' (मरकुस ९:२८-२९)

मैं चाहता हूं आप इन दो पदों के उपर विचार कीजिये। मैं वर्तमान में पश्चिमी दुनियां व अमेरिका के ''बिखरे हुये'' चर्चेस के लिये परमेश्वर द्वारा भेजी जाने वाली जागृति की आवश्यकता के उपर ये दो पद लागू कर रहा हूं।

मैं जानता हूं वर्तमान में लोग ''जागृति'' शब्द से फिर चुके हैं। वे इसके बारे में सुनना नहीं चाहते। इसके पीछे शैतान की भूमिका है! यह वह विषय है जिसके बारे में शैतान नहीं चाहता कि लोग विचार करें। इसलिये मैं विनती करता हूं कि आप समस्त चर्चेस और हमारे चर्च की जो सबसे बड़ी आवश्यकता है उसके विषय में ध्यानपूर्वक सुनें।

यह वह विषय है जिसमें हममें से प्रत्येक की रूचि होनी चाहिये। जब तक कि हम चर्चेस की इस शौचनीय दशा के प्रति भावना नहीं रखते हम गरीब मसीही कहलायेंगे। सच में, अगर सच्ची जाग्रति में आपकी रूचि नहीं है तो आपको अपने आप से यह पूछना चाहिये कि आप मसीही भी हो या न हो अगर चर्च के प्रति आपकी कोई सदइच्छा नहीं है, तो सचमुच आप एक जोशीले मसीही नहीं हैं! मैं फिर दोहराता हूं, सच्ची जागृति वह चीज है जिसमें हममें से प्रत्येक की गहन रूचि होना चाहिये।

तो मरकुस नौ में वर्णित इस घटना से शुरू करते हैं। बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। क्योंकि पवित्र आत्मा ने बड़ी सावधानी से चार सुसमाचारों में से तीन मत्ती, मरकुस और लूका में इसका वृतांत सुनाया है। मि. प्रुद्योमे ने लूका का पाठ पढ़ा, मैं मरकुस के दो पद पढ़ रहा हूं। उसी अध्याय के प्रारंभिक भाग में मसीह, पतरस, याकूब और यूहन्ना को लेकर पहाड़ पर गया जहां उसका रूप परिवर्तित हुआ था। जहां उन सब ने एक अदभुत घटनाक्रम देखा था। किंतु, जब वे पहाड़ से नीचे आये, चेलों को बड़ी भीड़ ने घेर लिया और वाद विवाद करने लगी! चेले जो यीशु के संग नीचे उतरे यह समझ नहीं पाये कि क्या बात हुई है। भीड़ में से एक मनुष्य बाहर निकल कर आया और यीशु से कहा उसके पुत्र को दुष्ट आत्मा ने जकड़ा है और उसके मुंह से झाग निकल रहा है और जबड़े भींचे हुये हैं। तब उस मनुष्य ने कहा, ''और मैं ने चेलों से कहा कि (वे उसे निकाल दें) परन्तु वे निकाल न सके।'' (मरकुस ९:१८) चेलों ने कोशिश की, पर असफल रहे।

यीशु ने उस मनुष्य से कुछ प्रश्न पूछे। फिर उसने शीघ्र उस दुष्ट आत्मा को लड़के में से निकाल दिया और वह उसी घड़ी अच्छा हो गया। तब मसीह घर में गया और चेले भी उसके साथ गये। जब वे घर में थे चेलों ने उससे पूछा, ''हम उसे क्यों नहीं निकाल सके?'' (मरकुस ९:२८) उन्होंने उसे निकालने की बहुत कोशिश की थी। इसके पहले वे कई बार दुष्टात्मायें निकालने में सफल भी रहे। किंतु इस समय वे बिल्कुल नाकाम रहे। जबकि मसीह ने सिर्फ इतना कहा , ''उसमें से बाहर निकल आ'' और लड़का चंगा हो गया। उन्होंने पूछा, ''हम उसे क्यों नहीं निकाल पाये?'' मसीह ने उत्तर दिया, ''यह जाति बिना प्रार्थना और उपाय से निकल नहीं सकती।'' (मरकुस ९:२९)

आज इस घटना का प्रयोग मैं हमारे चर्चेस की समस्या उजागर करने के लिये करूंगा। लड़का अर्थात आज के संसार के लोग। चेले हमारे चर्च का प्रतिनिधत्व करते हैं। क्या यह प्रतीत नहीं होता कि हमारे चर्च जवान बच्चों की सहायता करने में नाकाम रहे हैं? जॉर्ज बारना बताते हैं कि हम हमारे चर्च में बड़े हुये, ८० प्रतिशत जवानों को खो चुके हैं। हमारे चर्चेस आत्मा रहित होते जा रहे हैं और तेजी से असफल हो रहे हैं। सदर्न बैपटिस्ट प्रति वर्ष १००० चर्चेस को खो रहे हैं! यह उनका अपना आंकड़ा है! हमारे स्वतंत्र चर्च भी कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। कोई भी इन आंकडों को देखकर कह सकता है कि हमारे आधे चर्च भी इतने मजबूत नहीं रहे जितने सौ वर्ष पूर्व थे। इसलिये डॉ.जे.आई.पैकर ने कहा कि ''हमारे आज के चर्चेस की दशा बिखरी हुई है।''

चेलों के समान, हमारे चर्चेस सभी प्रयास कर रहे हैं किंतु तब भी असफल हो रहे हैं। वे बुरी तरह से असफल हैं जैसे चेले उस लड़के की मदद करने में असफल रहे। हम भी यह प्रश्न पूछ सकते हैं, ''हम क्यों नहीं उस दुष्ट आत्मा को निकाल सके?'' इस असफलता का कारण क्या है?

मरकुस के नवें अध्याय में, मुझे लगता है मसीह भी इसी प्रश्न का उत्तर उन्हें देता है। जो उत्तर उसने दिया वह आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उन दिनों में था।

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती'' (मरकुस ९:२८−२९)

इस पद को तीन बिंदुओं में विभक्त किया जा सकता है।

१. प्रथम बिंदु ''इस प्रकार की।''

हम उसे क्यों नहीं निकाल सके? मसीह ने उत्तर दिया, ''इस प्रकार की आत्मा और किसी रीति से नहीं, परन्तु केवल प्रार्थना व उपवास से ही निकल सकती है।'' उसने कहा इस प्रकार की घटनाओं में भी अंतर होता है। पहले, मसीह ने उन्हें प्रचार करने व दुष्ट आत्माऐं निकालने भेजा था − और वे गये और प्रचार भी किया, दुष्ट आत्माऐं भी निकाली। वे आनंदित होकर लौटे। उन्होंने कहा वे दुष्ट आत्माऐं उनके वश में थी।

इसलिये जब यह मनुष्य अपने पुत्र को उनके पास लेकर आया वे निंश्चत थे कि इस बार भी वे उसी रीति से दुष्ट आत्मा निकाल देंगे। किंतु वे पूर्ण रूप से असफल रहे। बजाय इसके सारे प्रयास करके भी वे लड़के को चंगा नहीं कर सके, उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि ऐसा क्यों हुआ। तब मसीह ने कहा, ''इस प्रकार की''। ''इस प्रकार की'' दुष्ट आत्मा और जिसे वे पहले निकालते थे उसमें बड़ा अंतर था।

एक तरह से, समस्या समान है। चर्च का कार्य है जवान बच्चों को शैतान व दुष्ट आत्मा के बंधन से छुटकारा देना, ''उन्हे अंधेरे से प्रकाश में लाना, शैतान के चंगुल से मुक्त करवा के परमेश्वर की उपस्थति में लाना'' (प्रेरितों के कार्य २६:१८) यह हर संस्कृति और युग की बात है। चर्चेस को सदैव शैतान व दुष्ट आत्मा से सामना करना ही पडता है। किंतु इन दुष्ट आत्माओं में भी अंतर पाया जाता है। ये सब समान नहीं होती। प्रेरित पौलुस ने कहा था क्योंकि ''हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२) उसने कहा इन दुष्ट आत्माओं के भी प्रकार है, इनका प्रमुख शैतान स्वयं है, ''आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है'' (इफिसियों २:२) शैतान अपने पूरे बल से प्रहार करता है। उसके अधीन अन्य कम स्तर वाली दुष्ट आत्मायें हैं। चेलों ने कमजोर दुष्ट आत्माओं को तो निकाल डाला। परन्तु, इस लड़के में, अधिक बल वाली आत्मा समाई हुई थी। ''इस प्रकार की'' आत्मा भिन्न प्रकार की थी, इसलिये अधिक समस्या उत्पन्न कर रही थी। पहली बात हमें पता लगाना चाहिये कि यह ''किस प्रकार की'' दुष्ट आत्मा है जिससे हमें आज भी जूझना है।

अगर हम उन शब्दों को देंखे ''इस प्रकार की'' तो मुझे आश्चर्य होता है कि बहुत से पास्टर्स तो यह जानते भी नहीं हैं कि हम एक आत्मिक युद्ध लड़ रहे हैं। मुझे आश्चर्य है कि कई पास्टर्स ऐसा सोचते भी होंगे कि उनका कार्य शैतान और दुष्ट आत्माओं से युद्ध करना भी है। सेमनरीज, और बाईबल कॉलेज मानवीय तरीके से दुष्ट आत्मा निकालने पर ज्यादा जोर देते हैं। किंतु वे प्रचारकों को यह नहीं सिखाते कि खास समस्या तो आध्यात्मिक क्षेत्र में है।

इसलिये वे ऐसे तरीके इस्तेमाल करते हैं जो पूर्व में काम में लाये गये हों। वे यह नहीं सीखना चाहते कि पुराने तरीके से ''इस प्रकार की'' दुष्ट आत्मा को नहीं निकाल सकते! हर कोई जानता है कि जरूरत तो है। किंतु प्रश्न यह है − कि वास्तव में जरूरत क्या है? जब तक कि हमें वास्तविक आवश्यकता की जानकारी नहीं होगी, हम चेलों के समान उस लड़के में से दुष्ट आत्मा निकालने में असफल ही रहेंगे।

२. दूसरा बिंदु वह तरीका है जो असफल हो चुके हैं ।

मैं देखता हूं कि हमारे चर्च वे ही चीजें कर रहे हैं जो भूतकाल में सहायक सिद्ध होती थी, किंतु अब ''इस प्रकार की'' चीजों पर चर्च के ये तरीके असफल साबित हो रहे हैं। चूंकि हम पुराने तरीके ही अपना रहे हैं, हम लगभग हमारे जवान लोगों को खोते जा रहे हैं और मुश्किल से ही कोई व्यक्ति का नया जन्म हो पाता है। भले ही लोग मुझे गलत समझें, किंतु मैं संडे स्कूल को इस श्रेणी में रखता हूं। एक समय लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व यह बहुत प्रभावकारी हुआ करता था। आज भी इसकी थोड़ी कीमत तो है। ऐसा ही मैं उद्धार के पर्चो के बारे में भी कहूंगा। एक समय लोग सचमुच उनको पढ़ते थे और चर्च आया करते थे। किंतु मैं किसी भी पास्टर से एक साधारण सी बात पूछूंगा, ''क्या आपके चर्च में ऐसा कोई जवान आया तो पर्चे पढ़ने के पश्चात बचाया गया और चर्च आने लगा?'' मैं सोचता हूं पुराने तरीकों से ''आज इस प्रकार की आत्माऐं'' जो चर्च में पाई जाती हैं, निकल नहीं सकती। मैं घर घर भेंट को भी इसी श्रेणी में रखता हूं। पहले यह बहुत प्रभावकारी हुआ करती थी, किंतु अब ''इस प्रकार की आत्मा'' के व्याप्त होने से हम घर घर जाकर जवान बच्चों को चर्च लाने में भी असफल रहे हैं।

''इस प्रकार की'' आत्मा ने, आज कई चीजों को अनुपयोगी बना दिया है। दूसरे शब्दों में, मानो मसीह हमसे कह रहे हैं, ''तुम जैसे दूसरे कार्यो में अपनी सामर्थ से सफल हो जाते थे, यहां तुम असफल रहे हो।'' आप इस लड़के को चंगा करने में सामर्थहीन रहे क्योंकि यह ''इस प्रकार की'' आत्मा के प्रभाव में था।

मैं जानता हूं ऐसे कई पास्टर्स हैं जो जानते हैं कि पुराने समय की बहुत सारी बातें अब अनुपयोगी हो चुकी हैं। किंतु वे केवल प्रकिृया वादी हैं न कि शैतान की ''युक्तियों'' को समझने वाले'' (२कुरंथियों २:११) − वे एकदम से नये तरीकों पर झपट पड़ते हैं जो पुराने तरीकों से भी बेअसर साबित होते हैं − जवान बच्चों को चर्च के स्थायी सदस्य बनाने के लिये उनके तरीके काम नहीं आते हैं। उदाहरण के लिये, हमारे पास कुछ लोग हैं जो यह कहते रहते हैं कि जवान बच्चों के सामने उत्पत्ति में जगत की रचना को सही ''प्रमाणित'' कर दें और विकासवाद को गलत, तो यह भी उन्हें लुभाने का अच्छा तरीका है। ऐसे प्रचारक सोचते हैं कि विकासवाद को गलत प्रमाणित करने से दुनियां भर से लोग निकल कर आयेंगे और जवान बच्चे भी परिवर्तित हो जायेंगे जब वे उत्पत्ति में जगत की रचना की सत्यता को जान लेंगे। उनके विचार से इस प्रकिृया को अपनाने से वे वर्तमान से निपट सकेंगे।

डॉ.ल्यॉड-जोंस ने कहा था, ''यह अठारहवीं शताब्दी के समान ही तरीका अपनाया जा रहा है, जब लोग अपना विश्वास (एपोलोजेटिक्स) पर केंदित कर रहे हैं। लोगों को इस प्रकार की धार्मिक शिक्षा − में यह सिखाया तो जाता है कि मसीहत सत्य है, किंतु कैसे सत्य है इसको देखना नहीं सिखाया जाता। ''इस प्रकार की आत्मा'' इन − शिक्षाओं के प्रभाव से भी दूर नहीं होती।

दूसरी प्रकिृया जो असफल सिद्ध हुई है, वह है आधुनिक अनुवाद करते जाने की प्रकिृया। हमसे कहा जाता है कि जवान बच्चे किंग जेम्स बाईबल नहीं समझते हैं। हमें आधुनिक भाषा में बाईबल चाहिये। तब जवान उसे पढ़ेंगे, और कह उठेंगे ''यह मसीहत होती है'' − और वे झुंड के झुंड हमारे चर्चेस में चले आयेंगे। किंतु आज तक ऐसा नहीं हुआ। असल में, इसके विपरीत ही हुआ है। मैं तो जवानों के साथ लगभग ५५ सालों से काम कर रहा हूं। मैं जानता हूं कि बाईबल का आधुनिक अनुवाद भी जवानों को आकर्षित नहीं कर पाएगा। देखा जाये तो, मैंने उन्हे यह कहते हुए सुना है, ''यह ठीक नहीं लगता। यह तो बाईबल जैसा लगता ही नहीं है।''

मैंने कभी आधुनिक अनुवाद से नहीं पढ़ाया, और न कभी पढ़ाउंगा। जवान बच्चे तो, चाहे हमारे चर्च में हो, या संसार में कहीं भी हो, वे मन परिवर्तन कर रहे हैं। उनका उद्धार हो रहा है। चाहे कितने ही बाईबल अनुवाद करवा लो, समस्या का हल इससे निकलने वाला नहीं है। वे अनुवाद ''इस प्रकार'' की जाति को निकालने का रास्ता नहीं बता पाते।

अब अगली कोशिश उनकी क्या रहती है? सचमुच, वह आधुनिक शोर शराबे वाला संगीत बजाते है ''हमारे चर्च में अच्छा संगीत बजता है इसलिये जवान बच्चे इस प्रलोभन से चर्च में आएगें और फिर नया जन्म प्राप्त करेंगे।'' कितनी सुखद सोच है। क्या मैं सचमुच इस पर टिप्पणी करूं? एक सदर्न बैपटिस्ट चर्च है जो लॉस एंजीलिस में किराये के स्थान पर चलता है। इसका पास्टर ''टी शर्ट'' पहनता है और स्टूल पर खड़ा होता है। उसके छोटे से संदेश के पहले एक घंटे की संगीतमय आराधना चलती है। हमारे चर्च का एक व्यक्ति उनकी आराधना में गया। तो चकित हो गया। उसने कहा आराधना में मूल भाव उदासी का था जो आत्मिक बिल्कुल नहीं था और इस उदास भाव को उन्होंने रॉक संगीत के शोर से पाटने का प्रबल प्रयास किया। वे लोग आत्मा नहीं जीतते, वे तो हमारे यहां के जवानों जैसे एक घंटे की प्रार्थना भी नहीं कर पाते। एक घंटे केवल प्रार्थना? भूल जाइये एक घंटे की प्रार्थना को! आज कल के चर्च में रॉक संगीत की तर्ज पर आराधना के गीत भी इस प्रकार'' की जाति वाली आत्मा को नहीं निकाल सकते।

३. तीसरी बात यह है कि हमें कुछ ऐसी चीज की आवश्यकता है जो शैतानी ताकत की जड़, को हिला सके, और जो यह कर सकता है, वह परमेश्वर की ताकत है!

डॉ.ल्यॉड−जोंस ने कहा था, ''हमें यह महसूस करना सीखना होगा कि ‘इस प्रकार’ की ताकत से भी बढ़कर परमेवर की अनंत अतुल्य ताकत है, हमें सिर्फ ज्ञान, समझ, अलग अलग शिक्षाएं, (नये अनुवाद, चर्च में रॉक संगीत की धुन वाले गीत इन की कतई जरूरत नहीं है) बिल्कुल − भी नहीं, हमें जरूरत है एक ताकत की जो मनुष्यों की आत्माओं में प्रवेश कर बुरी आत्माओं को कुचल डाले और उन्हें नम्र बनाए फिर से नया बनाये। यही जीवित परमेवर की ताकत कहलायेगी।'' यह हमको फिर से इस पद की ओर ले चलती है,

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती'' (मरकुस ९:२८−२९)

प्रार्थना और उपवास जरूरी है। हमारे चर्च जो ''इस प्रकार'' की ''शैतानी आत्मा के प्रभाव में है उनको कोई नहीं बचा सकता। हमारे चर्च जवानों तक भी नही पहुंच पा रहे हैं।''इस प्रकार की जाति बिना प्रार्थना के और किसी उपाय से नहीं निकल सकती।''

इस संसारी ज्ञान के कुछ ''विद्वान'' कहेंगे, ''कि उत्कृष्ट हस्तलिपियों में तो यह नहीं लिखा है'' ''और उपवास के भी।'' किंतु ये ''विद्वान'' आत्माओं के बारे में कितना जानते हैं? वे मूर्तिपूजकों को और हमारे शहर के कॉलेज कैंपस से जवानों की आत्माऐं बचाने के बारे में क्या जानते हैं? वे आत्मिक जागृति के बारे में क्या जानते हैं - ऐसी जागृति जो आजकल चीन में महसूस की जा रही है? वे इन सब बातों के बारे में कुछ नहीं जानते। मैं पापों के बंधन से मुक्त करने वाली आत्मिक जागृति सभा का तीन बार गवाह रहा हूं। मैं सोच कर इतना चकित हो जाता हूं कि मुझे इन जागृति सभाओं में प्रचार करने का अमूल्य अवसर मिला। वे सुसमाचारीय सभाऐं नहीं थीं। यह वह समय था जब परमेश्वर की ताकत ने मनुष्यों की आत्माओं में प्रवेश किया, उन्हे कुचला, तोड़ा और दीन बनाया, इस तरह मसीह में उन्हे नया प्राणी बनाया!

तो, हम दो प्राचीन हस्तलिपियों का अनुसरण नहीं करेंगे जिसमें से रहस्यवादी नकल नवीसों ने ''उपवास'' शब्द निकाल दिया। हम जानते हैं मसीह ने कहा था, ''और उपवास के।'' हम कैसे कह सकते हैं? दो कारणों से हम यह जानते हैं। पहला, चेले पूर्व में जब भी दुष्टात्मा निकालते थे तो जाहिर था कि प्रार्थना किया करते थे। इसलिये अब इसके साथ कुछ और भी जुड़ना था। वह कुछ और जो आवश्यक था − वह उपवास है! केवल प्रार्थना करना पर्याप्त नहीं है। हम इसे अनुभव से जानते हैं। क्योंकि हमने उपवास किया है और अपनी आंखों से देखा है कि परमेश्वर क्या नहीं कर सकता है जब हम प्रार्थना और उपवास में अपने दिलों को उसके सामने उड़ेल देते हैं।

अब मैं डॉ.मार्टिन ल्यॉड−जोंस के एक अन्य उद्धरण से संदेश को समाप्त करूंगा। वे भी कितने अदभुत प्रचारक थे! क्या दिव्य ज्ञान उनके अंदर था! मैं उनके लिये परमेश्वर को धन्यवाद देता हूं। एक और स्थान पर उन्होंने कहा था,

''मुझ आश्चर्य है कि क्या हमने कभी उपवास करने के प्रश्न पर गौर किया है? सत्य तो यह है, कि क्या यह सही नहीं है, कि हमारे जीवन से, हमारी मसीही सोच से उपवास जैसा विषय ही निकल गया है?''

और शायद यही कारण है कि, हम ''इस जाति की'' आत्मा को नहीं निकाल पा रहे हैं।

मैं अगले शनिवार शाम ५ बजे तक हमारे चर्च में उपवास का आहवान करता हूं। उस समय हम यहां चर्च में आऐंगे और इसके पहले कि सुसमाचार प्रचार में जाऐं, हम साधारण सा भोजन लेंगे। हम उन जवान बच्चों के लिये प्रार्थना करेंगे जो चर्च में आ रहे हैं लेकिन उनका नया जन्म नहीं हुआ है। हम और हमारे अधिक जवान लडके चर्च में आऐं इसके लिये प्रार्थना और उपवास करेंगे।

अब मैं इस सभा को बिना यीशु को संबोधित किये समाप्त नहीं करूंगा। जो हमें चाहिये वह सब यीशु में निहित है। इब्रानियों की पुस्तक कहती है,

''पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे। इस कारण उस को चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिस से वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वास योग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित्त करे।'' (इब्रानियों२:९−१७)

आमीन!

यीशु परमेश्वर के पुत्र, जो पापियों के स्थान पर मरे, पापियों के एवज में बलिदान हुये। जिस क्षण आप यीशु को स्वयं को समर्पित करते हो, आपके पाप उसके क्रूस पर मौत द्वारा समाप्त किये जाते हैं। जिस क्षण आप स्वयं को मसीहा के सामने समर्पित कर देते हो, आपके पाप परमेश्वर के लेखे से, मसीह के कीमती लहू से शुद्ध होकर, मिट जाते हैं। हम कितनी प्रार्थना करते हैं कि आप प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करो और उसके द्वारा पाप से मुक्त किये जाओ। आमीन और आमीन। निवेदन है कि खडे होकर गीत की पुस्तिका से अंतिम गीत गायें।

जैसा मैं हूं बिन योग्यता,
   पर करके आसरा लहू का,
और सुनकर तेरा नेवता मसीह,
   मसीह मैं आता हूं आता हूं!
(जैसा मैं हूं बिन योग्यता, शार्लेट इलियट, १७८९−१८७१)

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें द्वारा: लूका९:३७−४५
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''प्राचीन समय की ताकत'' (पॉल रादर,१८७८−१९३८)


रूपरेखा

इस प्रकार का

(पुर्नजागृति पर संदेश १)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती'' (मरकुस ९:२८−२९)

(मरकुस ९:२८)

१. प्रथम बिंदु ''इस प्रकार'' की, प्रेरितों के कार्य २६:१८;इफिसियों ६:१२;२:२

२. दूसरा बिंदु वह तरीका है जो असफल हो चुके हैं, २कुरंथियों २:११

३. तीसरी बात यह है कि हमें कुछ ऐसी चीज की आवश्यकता है जो शैतानी ताकत की जड़, को हिला सके, और जो यह कर सकता है, वह परमेश्वर की ताकत है! इब्रानियों २:९,१७