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पापियों के लिये रोटी मांगना - एक नया विचार!

ASKING BREAD FOR SINNERS – A NEW THOUGHT!
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

शनिवार की संध्या, २२ अप्रैल, २०१७ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में दिया गया संदेश

A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Saturday Evening, April 22, 2017


कुछ मिनटों पूर्व जॉन सैम्यूएल कैगन ने लूका ११:५–१३ पढ़ा। परंतु मैं चाहता हूं कि आप इसे फिर से पढ़ें। यह स्कोफील्ड स्टडी बाइबल की पेज संख्या १०९० पर स्थित है। यह एक हठी मित्र की कहानी है। इस दृष्टांत मेंa से मैं कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने लाना चाहता हूं।

पहली बात, इस में तीन व्यक्ति हैं।

‘‘और उस ने उन से कहा, तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास आकर उस से कहे, कि हे मित्र; मुझे तीन रोटियां दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है’’ (लूका ११:५–६)

पहला ‘‘मित्र’’ जिसके पास पर्याप्त मात्रा में रोटी है। वह परमेश्वर पिता हैं। दूसरा व्यक्ति वह मित्र है, जो रोटी मांग रहा है। वह मसीही जन है जिसे रोटी चाहिये। तीसरा जन वह है, जो मसीही जन के पास आता है। वह भटका हुआ जन है, उसने उद्वार प्राप्त नहीं किया है। यह वह व्यक्ति है जिसे रोटी की आवश्यकता है। आप और मैं सच्चे मसीही जन हैं जो परमेश्वर और उद्वार नहीं पाने वालों के मध्य खड़े हैं। इस दृष्टांत में ‘‘रोटी’’ कौन है? पहले हमने विचार किया था कि रोटी पवित्र आत्मा को कहा गया है। परंतु मैं अब सोचता हूं कि यह गलत है। यह सच है कि पद १३ में उत्तर के प्रार्थना के उत्तर स्वरूप, पवित्र आत्मा दिया गया।

‘‘सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़के–बालों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा’’ (लूका ११:१३)

परंतु मैं अब सहमत हूं कि ‘‘रोटी’’ पवित्र आत्मा नहीं है। लूका के इस दृष्टांत के उपर डॉ जॉन आर राईस ने विस्तार से लिखा था, (प्रेयर: आस्किंग ऐंड रिसीविंग, सोर्ड ऑफ दि लार्ड, १९७०, पेज ७०) ‘‘रोटी’’ के संबंध में डॉ राईस ने कहा कि यह यीशु के लिये कहा गया है। ‘‘जीवन की रोटी मैं हूं’’ (यूहन्ना ६:३५) । प्रारंभ में मैंने सोचा था कि यह पवित्र आत्मा के लिये कहा गया है। परंतु मैं गलत था। रोटी स्वयं यीशु हैं। यह नये नियम में स्पष्ट है। लगभग एक पूरा अध्याय यह बताता है कि यीशु ही ‘‘जीवन की रोटी’’ हैं। सुनिये यीशु यूहन्ना पुस्तक के छठवें अध्याय में क्या कहते हैं:

‘‘क्योंकि परमेश्वर की रोटी वही है, जो स्वर्ग से उतरकर जगत को जीवन देती है’’ (यूहन्ना ६:३३)

‘‘जीवन की रोटी मैं हूं’’ (यूहन्ना ६:३५)

‘‘जीवन की रोटी मैं हूं’’ (यूहन्ना ६:४८)

‘‘जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी मैं हूं’’ (यूहन्ना ६:५१)

‘‘जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिये दूंगा, वह मेरा मांस है’’ (यूहन्ना ६:५१)

समय समय से हमें यह कहा गया है कि मसीह ‘‘जीवन की रोटी’’ थे।

फिर क्यों मसीही जन लूका ११:६ में कहते हैं ‘‘मेरा एक मित्र........मेरे पास आया और मेरे पास उसके आगे धरने के लिये कुछ नहीं था?’’ क्योंकि हम सामर्थहीन हैं कि किसी को ‘‘जीवन की रोटी’’ खिला सके! जब हम प्रचार करते हैं और आत्मायें बचाने का प्रयास करते हैं, तो हमारे पास ऐसा प्रताप नहीं जो उन्हें जीवन की रोटी खिला सके! हम बाइबल के वचन को तो जानते हैं परंतु हम महसूस करते है कि हमारे भीतर वह आग नहीं है इसलिये हमारे मुंह से निकल पड़ता है ‘‘मेरा एक मित्र........मेरे पास आया और मेरे पास उसके आगे धरने के लिये कुछ नहीं था?’’ (लूका ११:६)

मैं यह अंगीकार करता हूं – ‘‘मेरे पास किसी को देने के लिये आत्मिक भोजन नहीं है।’’ आज जब अनेक युवा चर्च आते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि उन्हें वहां से कोई आत्मिक भोजन प्राप्त नहीं हो रहा है। अधिकतर चर्चेस में ‘‘युवाओं के सामने रखने के लिये कुछ नहीं है सिवाय कुछ वर्तमान संगीत पर आधारित गीतों के।’’ चर्चेस में ये गीत मुझे भाते नहीं! इन्हें ‘‘आराधना गीतों’’ का नाम तो दिया गया है परंतु इनके भीतर वह जज्बा नहीं है जो एक पापी के मन में यह ललक पैदा कर सके कि उसे मसीह की आवश्यकता है! मेरे पास उनके आगे परोसने को कुछ नहीं है! कुछ नहीं! कुछ नहीं! सिवाय ‘‘थके हुए’’ आराधना गीतों के। कुछ नहीं! कुछ नहीं! उनके आगे परोसने को कुछ नहीं है! कुछ नहीं! कुछ भी नहीं! बस बाइबल के पदों की एक के बाद एक शुष्क सी व्याख्याएं है। कुछ नहीं देने को, सिवाय थके हुए ‘‘आराधना गीत’’ और एक मुरझाया सा बाइबल अध्ययन। आप ने इसके पहले वाली रात एक व्याख्यान सुना होगा! किसी भी स्वस्थ, सामान्य युवा को क्या इस संदेश से मदद मिली होगी! केवल एक जीवंत गीत पॉल राडार का ईस्टर गीत था, ‘‘फिर से जाग जाइये।’’ हम तो मृत प्राय आराधनाओं से इतने सम्मोहित हो गये हैं कि मैं इस गीत को ठीक से गंवाने में जोर जोर से गाते गाते पसीने से तर हो गया! चर्चेस की ऐसे हालात रहेंगे तो हम संसार के उद्वार विहीन लोगों को मुक्ति का मार्ग नहीं दिखा सकते! ९०% युवा तो हम चर्च में ही गंवा देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं मैं जब छोटा था, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे चर्च में ऐसा कुछ नहीं था जो मुझे पसंद आ सके। मृत प्राय, शुष्क और दुर्गंधित। जिस पहले चर्च में जाता था, वहां से भी मुझे कुछ चुनौती नहीं मिली। हर आराधना में मेरा दिमाग खाली हो जाता। इसलिये खाली हो जाता क्योंकि उसमें यीशु नहीं थे। मुझे ऐसा लगता हर आराधना केवल चर्च की महिलाओं को प्रसन्न करने के लिये आयोजित की जाती थी। मेरे सामने रखने के लिये तो चर्च के पास कुछ नहीं था! टी वी पर चार्ल्स स्टेनली और इंटरनेट पर पॉल चैपल को देखिये। कितने शुष्क और अरूचिकर, उनके पास लोगों के पाप, अकेलेपन और अनंत नियति के हल के लिये यीशु मसीह नहीं हैं कि उन्हें लोगों के सामने रखें। ‘‘मेरा मित्र जीवन यात्रा में मेरे पास आया और मेरे पास उसके सामने रखने को कोई आत्मिक भोजन नहीं था।’’ मैं रिक वॉरेन के चर्च में रहा। मैं फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च डलास में रहा। मैं हमारे बी बी एफ आय चर्चेस में रहा! वे भी जैसे बेहोशी की अवस्था में मिले कि उन्हें स्वयं ही होश नही कि उनके पास लोगों को देने के लिये ‘‘कोई आत्मिक भोजन नहीं’’ है।

इसका उत्तर पद ९ और १० में मिलता है।

‘‘और मैं तुम से कहता हूं; कि मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ों तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। तुम में से ऐसा कौन पिता होगा, कि जब उसका पुत्र रोटी मांगे, तो उसे पत्थर दे या मछली मांगे, तो मछली के बदले उसे सांप दे? या अण्डा मांगे तो उसे बिच्छू दे? सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़के–बालों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा’’(लूका ११:१३)

यीशु इस नीतिकथा का अंत हमें यह बताकर करते हैं कि खोजते रहें, खटखटाते रहें और मांगते रहें जब तक कि स्वर्ग से हमारे पिता ‘‘मांगने वालों को पवित्र आत्मा न दें देवे’’ (लूका ११:१३) । (यूनानी भाषा में इसे कहा जाता है) मांगते रहें। खोजते रहें! खटखटाते रहें! मांगते रहें!

आप देखिये कि हमारी आराधनाओं में पवित्र आत्मा को होना बहुत आवश्यक है। हमें यीशु या पवित्र आत्मा का होना इतना महत्वपूर्ण नहीं लगेगा – परंतु यीशु उन आराधनाओं में उपस्थित भी नहीं होंगे! कोई भी जन उद्वार नहीं पायेगा! पद ८ में मसीहा कहते हैं,

‘‘यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्ज़ा छोड़कर मांगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा’’ (लूका ११:८)

केजेवी बाइबल में ‘‘इमपोर्चुनिटी’’ का यूनानी अनुवाद ‘‘शर्म छोड़कर मांगने’’ से है। लगातार मांगने – का तात्पर्य हमें प्रत्येक चर्च आराधना के लिये पवित्र आत्मा को मांगना है। इजरायलियों ने जो ‘‘मन्ना’’ रात भर रख लिया था, वह सड़ गया था। आज भी वही दृश्य है। प्रार्थना सभा और आराधना ‘‘सड़न’’ पैदा करेंगी अगर हम ‘‘शर्म छोड़कर’’ पवित्र आत्मा इन सभाओं के आरंभ होने से पहले नहीं मांगेगे!

हमने अपनी आराधनाओं में से यीशु की उपस्थिति को हटा दिया है – जैसे प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में लौदिकिया के चर्च से उसकी उपस्थिति जाती रही थी। यह गुनगुनी कलीसिया थी। कोई आग नहीं! कोई गर्जन नहीं! कोई स्फूर्तिवान गान नहीं! कोई प्रचार नहीं - केवल एक के बाद एक पद की व्याख्या, निष्क्रिय प्रतीत होती है! आप को व्याख्यात्मक संदेश देना है तो पवित्र आत्मा की आवश्यकता नहीं है! व्याख्यात्मक संदेश सीधे दिमाग से बात करते हैं! शुभ संदेश वाले व्याख्यान सीधे दिल से बाते करते हैं! सीधे दिल से! सीधे दिल से! ‘‘धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता है’’ (रोमियों १०:१०) दिल से बाते करते हैं – दिमाग से नहीं! केवल विचारों से नहीं! मसीह आप के दिल से बातें करें तब आप को उद्वार मिलेगा - नहीं तो पुर्नज्जीवन नहीं मिलेगा- कोई जीवन की रोटी नहीं चख पायेगा! हमारे गुनगुनी सी जोश रहित आराधनाओं से यीशु की उपस्थिति को अपने हाथों से ही हमने विदा कर दिया है! विदा कर दिया है! विदा कर दिया है! यीशु कहते हैं, ‘‘देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं’’ (प्रकाशितवाक्य ३:२०)

क्यों यीशु को चर्च के बाहर खड़े होकर द्वार पर खटखटाना पड़ रहा है? क्योंकि हम ने यीशु की उपस्थिति पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। अगर हम आराधना में पवित्र आत्मा की उपस्थिति के लिये प्रार्थना नहीं करेंगे, तो यीशु कैसे उपस्थित होंगे! जब आराधना में पवित्र आत्मा उपस्थित होता है तभी यीशु आते हैं – पवित्र आत्मा तभी उपस्थित होता है जब हम उनके आने के लिये प्रार्थना करते हैं! केवल तभी जब हम उनके नीचे उतर आने के लिये प्रार्थना करते हैं! केवल तभी जब हम उनके नीचे उतर आने के लिये प्रार्थना करते हैं! हमारी आराधनायें कैथोलिक मास के ही समान है। आप ने इसे देखा है। आप ने इसे देखा है। मैं कहता हूं बल्कि हमारी आराधना तो कैथोलिक मास से भी बढ़कर निष्क्रिय थी! आप जानते हैं मैं सही बोल रहा हूं!

‘‘क्योंकि मेरा एक मित्र मेरे पास........ आया है और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है’’ (लूका ११:६)

उस व्यक्ति ने मध्यरात्रि को जो ‘‘रोटी’’ मांगी, वह कौन सी रोटी थी? जब उसने पड़ोसी का दरवाजा खटखटाया, तो वह क्या चाहता था? जो रोटी उसने खोजना चाही, जिस रोटी के लिये उसने खटखटाया, जिस रोटी को उसने मांगा, वह रोटी स्वयं यीशु थे। पापियों को और क्या चाहिये होता है? पद १३ के अंत में, यीशु ने कहा, ‘‘तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा?’’ (लूका ११:१३) । स्कोफील्ड की व्याख्या में यहां एक बिंदु की कमी है। प्रार्थना योद्वा यहां स्वयं के लिये पवित्र आत्मा नहीं मांग रहा है। वह अपने उस भटके हुए मित्र के लिये पवित्र आत्मा मांग रहा है जो यीशु पर कभी विश्वास नहीं करेगा, जब तक कि पवित्र आत्मा उसके हृदय को न खोल दे और यीशु के पास न लेकर आये!

‘‘क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है’’

सचमुच, अगर परमेश्वर पिता आप की प्रार्थनाओं के उत्तर में पवित्र आत्मा न दे, तो आपके पास अपने भटके हुए मित्रों को देने के लिये कुछ नहीं होगा! डॉ जॉन आर राईस ने सही कहा था

         यीशु मसीह ने इस कहानी के अंत तक सीधे शब्दों में नहीं बताया....कि वह प्रार्थना करने के लिये कह रहे हैं, अपने चेलों को पवित्र आत्मा मांगने के लिये प्रार्थना करना सिखा रहे हैं....आत्मा जो आत्मिक जाग्रति लाता है, पापियों के को व्यथित करता है और उनके मन को परिवर्तित करता है, जो परमेश्वर के जन को बिद्वता, सामर्थ और ने प्रदान करता है! जब हम पापियों के लिये रोटी के लिये प्रार्थना करते हैं, तो हम जानते हैं कि वास्तव में हमें क्या चाहिये......परमेश्वर का आत्मा (राईस, उक्त संदर्भित, पेज ९६)

मैं आप से जो भटके हुए लोग हैं, उनसे कह रहा हूं। इस कहानी में यीशु रोटी हैं। आप को जीवन में सब आवश्यकताओं से बढ़कर केवल यीशु मसीह की आवश्यकता है! चर्चेस में पवित्र आत्मा की उपस्थिति जब नहीं होगी, तब तक चर्च में बैठने वालों को प्रायश्चित नहीं होगा। यीशु ने कहा था,

‘‘और वह आकर संसार को पाप और धामिर्कता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा’’ (यूहन्ना१६:८)

हम पवित्र आत्मा को प्रार्थना में मांग रहे हैं, ताकि आप जैसे खोये हुए लोगों के मन आप के पापों से व्यथित हों, अपने कठोर गहरी पापमय दशा आप को कचोटने लगे। जब तक पवित्र आत्मा आप के भीतर ऐसे व्यथा या कचोट पैदा नहीं करती, आप को मसीह के लिये वास्तविक आवश्यकता महसूस ही नहीं होगी।

तब हमें, परमेश्वर के आत्मा के लिये प्रार्थना करना चाहिये कि वह आप को पूर्ण उद्वार पाने के लिये मसीह के पास खींचकर लाये। क्योंकि मसीहा ने कहा था,

‘‘कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक पिता, जिस ने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले’’ (यूहन्ना ६:४४)

इसलिये, हमें प्रार्थना करके परमेश्वर के आत्मा को मांगना चाहिये, आत्मा ही आप को यीशु के पास खींच कर लायेगा। यीशु ही आप को पाप से मुक्ति देंगे और नर्क की आग से बचायेंगे।

आप ने अभी तक शुभ संदेश सुना है। आप ने केवल सुना होगा कि यीशु आप के पापों का मोल चुकाने के लिये क्रूस पर चढ़ाये गये। आप ने केवल सुना होगा कि यीशु का क्रूस पर बहाया गया लहू आप के पापों को धो देता है। जिससे आप परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरते हैं। आप ने अभी तक सुना होगा कि यीशु तीसरे दिन मरके जीवित हुए। आप ने केवल सुना होगा कि वह स्वर्ग में विराजित हैं और आप के लिये पिता से प्रार्थना करते हैं। आप ने इन सारे सत्यों को केवल सुना है परंतु आप ने उन्हें कभी अपने जीवन में अनुभव नहीं किया है। आप एक रविवार से दूसरे रविवार केवल चर्च में बैठे रहेंगे, अगर आप इन सत्यों को कभी अपने जीवन में अनुभव नहीं करेंगे। यही सत्य का दोहराव आप सुनते जायेंगे। उन सत्यों को सुनने से बढ़कर आप के जीवन में कुछ घटित होना चाहिये। अन्यथा आप कभी उद्वार नहीं पा सकेंगे!

पवित्र आत्मा को नीचे उतर आना चाहिये और आप को पापी होने की व्यथा देना चाहिये।

पवित्र आत्मा नीचे उतर आना आवश्यक है कि आकर आप को यीशु के पास खींच कर लावे। पवित्र आत्मा नीचे उतर आवे और आपको जीवित मसीह का स्वर्गिक और मानवीय अनुभव देवे। आप मसीहा के पास खींचे जायें इसके लिये एक चमत्कार की आवश्यकता है। एक आश्चर्यकर्म की आवश्यकता है कि आप आत्मा में नया जन्म पायें। परमेश्वर का आत्मा ही इस आश्चर्यकर्म को घटित होने देगा। अगर आप की आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये, अगर चर्च के अंदर पवित्र आत्मा उपस्थित नहीं है तो हम केवल यह कह सकते हैं,

‘‘क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है ........और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है’’ (लूका ११:६)

इसलिए हमने आप के उद्वार के लिये प्रार्थना की है। इसलिये हम निरंतर पवित्र आत्मा मांगते रहते हैं। हम निरंतर पवित्र आत्मा खोजते हैं। हम निरंतर पवित्र आत्मा के लिये खटखटाते रहते हैं – और हम तब तक ऐसा करते रहेंगे, जब तक परमेश्वर स्वर्ग न खोल दें और अपना आत्मा, आप के मन को बदलने के लिये न भेज दे। वही आप को अनंत जीवन देता है! यीशु ने कहा था, ‘‘तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न (देगा)’’ (लूका ११:१३) हम आप के लिये प्रार्थना कर रहे हैं। हम परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि आप को मन में पापों के बोध से भर दे, और आश्चर्यजनक रूप से यीशु के पास खींच कर लाये! मसीह तब आप के पापों को अपने लहू से धो देंगे। अपनी धार्मिकता आप को ओढ़ा देंगे। आप को ऐसा हृदय देंगे जो परमेश्वर से प्रेम करता और पाप को नापसंद करता हो। परमेश्वर आप का पत्थर समान हृदय निकाल कर मांस का हृदय देंगे! ‘‘फॉर यू आय एम प्रेयिंग’’ आइये यह गीत गाते हैं!

फॉर यू आय एम प्रेयिंग, फॉर यू आय एम प्रेयिंग,
     फॉर यू आय एम प्रेयिंग,
आय एम प्रेयिंग फॉर यू।
      (‘‘आय एम प्रेयिंग फॉर यू’’ एस ओ मैली क्लो, १८३७–१९१०)

हमने पिछले रविवार पवित्र आत्मा के लिये प्रार्थना की थी। सब चले गये थे। मैं और डॉ कैगन बैठे। तब टॉम जिया आये और उन्होंने उद्वार प्राप्त किया – क्योंकि ऐसी प्रार्थना की थी कि पवित्र आत्मा नीचे उतर आये! आमीन और आमीन!


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व जॉन सैम्यूएल कैगन द्वारा संदेश पढ़ा गया: लूका ११:५–१३
संदेश के पूर्व बैंजामिन किंकैड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
‘‘आय एम प्रेयिंग फॉर यू’’ (एस ओ मैली क्लो, १८३७–१९१०)