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गैतसेमनी का दुख

THE SORROW OF GETHSEMANE
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, १८ मार्च, २०१७ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में दिया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Saturday Evening, March 18, 2017

‘‘उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई'' (इब्रानियों ५:७)


क्रूस पर मारे जाने के पहले, रात्रि को यीशु अपने चेलों को लेकर गैतसेमनी बाग में पहुंचे। मध्यरात्रि की बात थी। यीशु ने आठों चेलों को गैतसेमनी के बगीचे के कोने में छोड़ दिया और वह पतरस और याकूब और यूहन्ना को अपने साथ ले गये। और ‘‘बहुत विस्मित (बहुत ही अधीर) और उदास (व्याकुल) होने लगे'' (मरकुस१४:३३)। ‘‘मेरा मन बहुत उदास है (गहन रंज) में है, यहां तक कि मैं मरने (मरण के अंत) पर हूं'' (मरकुस १४:३4) । वह कुछ कदम आगे बढ़े और जमीन पर गिर पड़े। उन्होंने घनी पीड़ा के साथ प्रार्थना की कि अगर संभव हो तो यह घड़ी उनसे टल जाये'' (मरकुस १४:३५) । गैतसेमनी के बगीचे में प्रार्थना का पूर्ण समय एक घंटें के लगभग का था – क्योंकि जब यीशु ने उन्हें वापस आकर सोते हुए पाया तो कहा कि, ‘‘क्या वे एक घंटे भी नहीं जाग सके?'' (मत्ती २६:४०) ।

यीशु के साथ कुछ भयावह घटा था – गैतसेमनी के उस बगीचे में कुछ भयावह बात बीत रही थी यीशु ने कहा कि, ‘‘मेरा मन बहुत उदास है, यहां तक कि मैं मरने पर हूं'' (मत्ती २६:३८) इस घटना के वर्णन में यूनानी शब्द ‘‘पेरीलूपोस'' प्रयुक्त हुआ है, इस का अर्थ है ‘‘दुखों से घिरा होना।’’ वह भजनकर्ता के समान कह सकते थे, ‘‘मैं अधोलोक की सकेती में पड़ा था’’ (भजन ११६:३)। यीशु दुखों की लहरों और तरंगों में वह डूब गये थे। उनके उपर, नीचे, आसपास, बाहर, भीतर – सब कुछ दुख ही दुख था - मरने तक का दुख - यह ऐसा दुख था जिसने उन्हें लगभग मार ही डाला था! और ‘‘उनका पसीना मानो लोहू की बड़ी बड़ी बून्दों की नाईं भूमि पर गिर रहा था’’ (लूका २२:४४)।

मध्य रात्रि थी जैतून पेड़ के माथे पर
   देर रात देर रात तारों की रोशनी मंद हो रही थी;
मध्य रात्रि बगीचे में अब
   कष्ट भोगता मसीहा अकेला प्रार्थना कर रहा था

मध्य रात्रि थी; सब दूर नीरवता थी,
   मसीहा अकेला अपने डरों से लड़ता है;
यहां तक कि जिस चेले को जिससे वह बहुत प्रेम रखता था
   उसे भी अपने मालिक के दुख या आंसुओं का ख्याल नहीं आया
(‘‘इट इज मिडनाईट एंड ऑलिव ब्रो’’ विलियम बी तप्पन, १७९४ – १८९४)

बाइबल हमें बताती है कि यीशु ‘‘दुखी पुरूष थे और दुख से उनकी पहचान थी’’ (यशायाह ५३:३) । परंतु वह पूरे समय मुंह लटकाये दुखी नहीं घूमते थे। वह दुख को जानते थे । कष्ट को पहचानते थे। वह इतनी सारी दावतों में जाते थे] जिसके लिये फरीसी शिकायत करते थे। फरीसी कहते थे, ‘‘देखो पियक्कड़ मनुष्य, महसूल लेने वालों और पापियों का मित्र’’ (मत्ती ११:१९) । यीशु का यह भाव प्रगट करता है कि सच्चे क्रिश्चियन को सदा प्रसन्नचित्त रहना चाहिये। कभी कभी हम हताशा में प्रवेश कर जाते हैं। पंरतु मसीह द्वारा मत्यु पर विजय पाने को स्मरण करते ही हम पुनः शांति का अनुभव कर सकते हैं!

पंरतु गैतसेमनी के बगीचे में सब कुछ बदल चुका था। यीशु की शांति छिन चुकी थी। उनका दुख, तीव्र दुख में बदल गया था, ‘‘पैरीलोपास'' – अर्थात दुख द्वारा घिरा हुआ; मर जाने की दशा तक का कष्ट सहना! जैसे कोई मनुष्य पाप के बोध से व्यथित होता है, यह व्याकुलता ऐसी ही कुछ थी।

यीशु ने अपने संपूर्ण जीवन काल में बड़ी मुश्किल से दुख और हताशा का कुछ जिक्र किया होगा। परंतु गैतसेमनी के बाग में अब पूरा दृश्य ही बदला हुआ था। वह परमेश्वर को पुकार उठे, ‘‘यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए'' (मत्ती २६:३९) । इसके पूर्व उन्होंने कभी शिकायत नहीं की थी। परंतु अब, ‘‘और भी ह्रृदय वेदना से प्रार्थना करने लगे; और उनका पसीना मानो लोहू की बड़ी बड़ी बून्दों की नाईं भूमि पर गिर रहा था'' (लूका२२:४४) । क्यों? क्यों? किस बात ने यीशु को इतना व्याकुल बनाया?

डॉ जॉन गिल ने कहा क्योंकि शैतान उस बगीचे में आया था। हमारे समय की मूवी में मेल गिब्सन ने ‘‘पैशन ऑफ क्राइस्ट'' में रात्रि की उस घड़ी में यीशु को यंत्रणा देने के लिये शैतान को बगीचे में सर्प की नाई प्रवेश करते हुए दिखाया है। डॉ गिल और मेल गिब्सन दोनों यहां गलत थे। शैतान गैतसेमनी के बगीचे में नहीं था। बाइबल में ऐसा कोई वर्णन नहीं है। कुछ लोग लूका २२:५३ का उद्वरण देते हैं जब यीशु ने सैनिकों से कहा, ‘‘यह तुम्हारी घड़ी है, और अन्धकार का अधिकार है'' (लूका २२:५३) वे यह सही कहते हैं कि यह कथन शैतान की ओर संकेत देता है। पंरतु ध्यान दीजिये कि यीशु ने यह बात उन्हें बंदी बनाने आये सैनिकों से उनकी प्रार्थना पूरी हो जाने और रक्तिम पसीना बह जाने के बाद कही थी। बगीचे में उनकी व्याकुलता समाप्त हो जाने के बाद उन्होंने सैनिकों से कहा था, ‘‘यह तुम्हारी घड़ी है (न कि गैतसेमनी में बिताये पूरे समय के लिये कहा था), और अन्धकार का अधिकार है।'' इसलिये शैतान मसीह के द्वंद समाप्त होने के बाद बगीचे में आया था। यहूदा को शैतान ने (दुष्टात्मा के अधीन) कुछ दिन पूर्व अपने वश में कर लिया था। हमें लूका २२:३ में पढ़ने को मिलता है, ‘‘और शैतान यहूदा में समाया।'' शैतान यहूदा में समाकर, गैतसेमनी में मसीह की मनोदशा में संघर्ष समाप्त होने के बाद आया और साथ में सैनिकों को लाया ताकि यीशु के साथ बुरे से बुरा व्यवहार कर सके।

और, हमें अभी भी आश्चर्य होता है कि क्यों यीशु बगीचे में इतने व्याकुल हुए कि प्रार्थना के समय उनको रक्तिम पसीना निकला और उन्होंने उस प्याले को हटाने के लिये प्रार्थना की? जो उत्तर हमारे पदों में दिया गया है उससे मैं सहमत हूं। बगीचे में यीशु ने प्रार्थना की थी, ‘‘हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो'' (मत्ती २६:३९) । यह कौनसा ‘‘प्याला'' था? अगर यह अगले दिन क्रूस पर दुख भोगने की बात थी, तो यीशु की प्रार्थना का उत्तर नहीं दिया गया था। अगर यह ‘‘प्याला'' उस रात शैतान की पकड़ से छुटकारे के लिये था, तो उनकी प्रार्थना का उत्तर नहीं मिला था, क्योंकि शैतानी मनुष्य उस रात उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिये पकड़ कर ले गये थे। इब्रानियों ५:७ में हमें इसका उत्तर मिलता है। निवेदन करता हूं कि अपने स्थान पर खड़े होकर इसे पढ़िये।

‘‘उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई'' (इब्रानियों ५:७)

अब आप बैठ सकते हैं। अब, यह पद हमें बताता है कि यीशु ने यह प्रार्थना की थी ‘‘अपनी देह में रहने के दिनों में'' – जब कि वह इस पृथ्वी पर ही रह रहे थे। उन्होंने ‘‘प्रबलता के साथ आंसुओं के साथ'' मृत्यु से बचाये जाने के लिये प्रार्थना की थी - तो यह प्रार्थना क्रूस पर चढ़ाये जाने के पहिले की गयी प्रार्थना थी। यह पद हमें बताता है कि उनकी यह प्रार्थना सुन ली गयी थी और परमेश्वर ने उन्हें गैतसेमनी के बगीचे में से बचा लिया! डॉ जे. आलिवर बुसवेल, एक प्रसिद्व धर्मविज्ञानी ने यह कहा था,

जैसे लूका में वर्णन किया गया था कि (गैतसेमनी के बगीचे में) अत्यधिक पसीना निकलना गहन धक्का पहुंचने की स्थिति का परिचायक है जिसमें दुख उठाने वाले को एकदम ही समाप्त हो जाने का खतरा हो और यहां तक कि उसकी मृत्यु हो जाने का अंदेशा हो ...... हमारे प्रभु यीशु मसीह ने शारीरिक रूप में अत्यधिक धक्का पहुंचने की स्थिति में मृत्यु से छुटकारा मिलने की प्रार्थना की थी, ताकि वह क्रूस पर उनके उददेश्य को पूर्ण कर सकें (जे आलिवर बुसवेल, पी एच डी, सिस्टमेटिक थियोलॉजी ऑफ दि क्रिश्चियन रिलीजन, जोंदरवन पब्लिशिंग हाउस, १९७१, भाग ३, पेज ६२)

डॉ जॉन आर राईस ने लगभग यही बात कही,

यीशु बहुत दुखी महसूस कर रहे थे, आत्मा में व्याकुल थे ‘‘इतना मानों प्राण ही निकले जा रहे हों'' यथाशब्द कहें तो अपार दुख की घड़ी उनके उपर आयी हुई थी......यीशु उस घड़ी प्रार्थना की कि मृत्यु का प्याला उस रात्रि उनके सामने से टल जाये ताकि अगले दिन वे क्रूस पर प्राण दे सकें। (डॉ जॉन आर राईस, दि गास्पल अकोर्डिंग टू मैथ्यू, सोर्ड ऑफ दि लार्ड, १९८०, पेज ४४१)

डॉ बुसवेल ने कहा,

यह व्याख्या इब्रानियों ५:७ के साथ सुसंगत है और मुझे लगता है कि केवल यही व्याख्या सुसंगत है (उक्त संदर्भित)

डॉ राईस ने कहा,

इब्रानियों ५:७ में इसे स्पष्ट किया गया है जहां कहा गया है कि यीशु ने ‘‘ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई।'' गैतसेमनी बगीचे में ही उनके प्राण न निकल जायें, उस मृत्यु के प्याले को हटाने के लिये उन्होंने प्रार्थना की ताकि अगले दिन वे क्रूस पर प्राण दे सकें। और लिखा है कि ‘‘उनकी प्रार्थना सुनी गई''। परमेश्वर ने उनकी प्रार्थना का उत्तर दिया (उक्त संदर्भित) ।

‘‘उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर, और आंसू बहा बहा कर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई'' (इब्रानियों ५:७)

परमेश्वर पुत्र का दुख भोगना देखो,
   छटपटा रहा, कराह रहा, रक्तिम पसीना बहा रहा!
अनुग्रह की अनंत गहराई!
   यीशु कितना अदभुत आप का प्रेम!
(‘‘दाईन अननोन सफरिंग्स'' जोसेफ हार्ट, १७१२–१७६८)

परंतु हमें अभी यह समझाना भी आवश्यक है कि क्यों मसीह ने उस रात्रि अपार वेदना सहन की। मैं जो मानता हूं कि उस रात यीशु के साथ क्या घटा होगा, वह इस प्रकार है। मैं मानता हूं कि उस रात यह हुआ कि

‘‘यहोवा ने ......हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया'' (यशायाह ५३:६)

‘‘निश्चय उसने हमारे ही दु:खों को उठा लिया'' (यशायाह ५३:४)

परंतु उन्होंने कब उन पापों को अपने उपर लिया? गैतसेमनी बगीचे में उन्होंने अपने उपर पापों को लाद लिया और अगली सुबह उन्हें क्रूस पर ले गये।

‘‘वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गये'' (१ पतरस २:२४)

उस रात्रि गैतसेमनी बगीचे में हमारे पाप ‘‘उनकी देह'' में अभ्यारोपित किये गये। हमारे पापों को लेकर गैतसेमनी बगीचे से कू्रस तक की यातनादायक यात्रा को उन्होंने पूर्ण किया! परमेश्वर के क्रोध को शांत किया। उस क्रोध को उन्होंने आत्मसात कर लिया।

अकेले मसीहा ने गैतसेमनी के अंधकार में प्रार्थना की;
   अकेले उस पीड़ादायक प्याले को पी लिया, और मेरे लिये दुख भोगा;
अकेले, अकेले, उन्होंने सब सहन किया;
   स्वयं को दे दिया हमें बचाने को;
उन्होंने दुख भोगा, रक्त बहाया और अकेले ही मर गये
      (‘‘अलोन'' बेन एच प्राईस, १९१४)

महान डॉ जॉन गिल (१६९७ – १७७१) ने सही कहा था,

अब उन्हें पिता के द्वारा कुचला गया और वे अपार दुख में पड़ेः उनके दुखों की अब शुरूआत हुई, दुख यहां समाप्त नहीं हुए बल्कि क्रूस पर उनका अंत हुआ......उन पापो का बोझ बहुत भारी था; लोगों के पापों का बोझ, और परमेश्वर के स्वर्गिक क्रोध के बोध, ने मसीह को इस तरह कुचल डाला कि उनकी सामर्थ लगभग चुक गयी, देह में लगभग अचेत अवस्था आने लगी; प्राण निकले ही जा रहे थे उनका हृदय कार्य करना बंद कर ही रहा हो......उनकी आत्मा लोगों के पाप को उठा लेने के बाद आक्रांत हो गयी थी, इन सब ने यीशु को जकड़ लिया था......मृत्यु का दुख और चारों ओर नर्क समान स्थितियों से उन्हें घेर लिया था......कि थोड़ा सा भी विश्राम उन के भीतर नहीं पहुंच पा रहा था......दुख से उनकी आत्मा विहवल होती जा रही थी, उनका विशाल हृदय चूर चूर होने के लिये तैयार था; साक्षात मृत्यु उनके सामने खड़ी थी; उनके दुखों ने उन्हें नहीं छोड़ा, जब तक कि उनकी आत्मा और देह अलग नहीं हो गये (जॉन गिल, एन एक्सपोजिशन ऑफ दि न्यू टेस्टामेंट, दि बैपटिस्ट स्टैंडर्ड बियरर, वाल्यूम १, पेज ३३४)

इस तरह हम सीखते हैं कि यीशु ने हमें परमेश्वर के क्रोध से, हमारे पापों के न्याय से और नर्क में अनंत दंड से बचाने के लिये क्या किया। उन्होंने हमारे स्थान पर दुख भोगा। हमारे प्रतिनिधि बनकर दुख उठाने का आरंभ गैतसेमनी के बगीचे में प्रारंभ हुआ, जहां उन्होंने हमारे पापों को उठा लिया और अगली सुबह क्रूस पर उन्हें ले चले ।

मेरे मित्रों हम ईस्टर संडे की ओर बढ़ रहे हैं, वह दिन, जब मसीह कब्र में से जीवित बाहर आये थे। उनके मृतकों में से जीवित होने का अर्थ आप के लिये तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक आप गैतसेमनी व क्रूस पर उनके द्वारा उठाये गये अपार दुख को समझ न सकें। यीशु आप के प्रतिनिधि बनें इसके लिये आप को क्या करना चाहिये? आप को उनके पैरो पर गिरना आवश्यक है और उन पर विश्वास करना चाहिये!

जब मैं उस अदभुत क्रूस को देखता हूं,
   जिस पर महिमा का राजकुमार मरा था,
अपने बहुमूल्य लाभ को भी हानि जानता हूं,
   अपने अभिमान को निंदा जानता हूं।

इसे रोक देना प्रभु, जब मैं फूलने लगूं,
   मसीह के मरण में मेरा उद्वार है मेरे प्रभु,
जो व्यर्थ चीजें मुझे सबसे ज्यादा लुभाती हैं,
   यीशु के रक्त में उसको अर्पित करता हूं।

देख उसके सिर, हाथ और पैरो के घाव को,
   जैसे प्रेम और दुख मिल बह निकले;
क्या ऐसा दुख और प्रेम मिल सकता है,
   जो कांटों के ताज को पहने?

मैं क्या दे सकता हूं उसे जो दूं,
   जो दूं वह बहुत अल्प है;
प्यार उसका इतना अदभुत, इतना स्वर्गिक,
   मेरी आत्मा, मेरा जीवन और सब कुछ मांगता।
(‘‘वेनआय सर्वे दिवंडरस क्रास''आयजक वाटस, डी डी, १६७४ –१७४८)

यीशु पर आज विश्वास लाइये तो आप के पाप का दंड उनके द्वारा दुख उठाने और मरने से भर दिया जायेगा – क्रूस पर। जिस क्षण आप विश्वास लाते हैं उसी क्षण आप के पाप उनके क्रूस पर बहे रक्त से शुद्व हो जायेंगे!


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व बाइबल पाठ का पठन नोहा सोंग द्वारा किया गया: मरकुस१४:३२–३८
संदेश के पूर्व बैंजामिन किंकैड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
‘‘मध्य रात्रि थी जैतून पेड़ के माथे पर’’(विलियम बी तप्पन,१७९४–१८४९)