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इवेंजलिस्ट हमारे चर्चेस में लोगों को
क्यों नहीं जोड़ते हैं

(युद्व की पुकार शृंखला संदेश संख्या चार)

WHY EVANGELISTS DON’T ADD PEOPLE
TO OUR CHURCHES
(NUMBER FOUR IN A SERIES OF BATTLE CRIES)
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, ११ फरवरी, २०१७ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में दिया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Saturday Evening, February 11, 2017

‘‘फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।'' (यूहन्ना५:४०)


कुछ समय पहले हमारे चर्च ने एक दूसरे चर्च के साथ मिलकर सुसमाचारिय सभायें आयोजित की। हमने दूसरे पास्टर के चर्च को लोगों से पूरा भर दिया। उन्होंने एक प्रसिद्व इवेंजलिस्ट को आमंत्रित किया था। उन इवेंजलिस्ट ने प्रचार किया। उनके आमंत्रण पर अनेक लोग सामने आये। परंतु उनमें से किसी को उद्वार नहीं मिल सका! दूसरे पास्टर ने जो टिप्पणी की, वह इस प्रकार है:

हमारे चर्च ने इवेंजलिस्ट कार्यक्रम में आडिटोरियम को खचाखच भर दिया था....प्रसिद्व प्रचारक आये थे.... सभा की अंतिम रात्रि को अपार जनसमूह उमड़ आया था। आडिटोरियम में महिलाओं और बच्चों को स्थान देने के लिये सैकड़ों आदमी बाहर खड़े रहकर सुन रहे थे। उनके लिये कोई स्थान नहीं बचा। धन्यवाद हो, हरेक ने सुसमाचार सुना.........जिसमें उद्वार के निमंत्रण की ५४ प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं........ जब मैंने यह महान रिपोर्ट सोर्ड ऑफ दि लार्ड के संपादक को भेजी, तो मुझे तत्काल कड़े शब्दों में कर्टिस हटसन (संपादक सोर्ड ऑफ दि लार्ड) का झिड़की वाला पत्र प्राप्त हुआ। ‘‘आप की हिम्मत कैसे हुई कि आप उन्हें आशापूर्ण उद्वार प्राप्त लोग कहते''। ‘‘यह आप के विश्वास की कमी को दर्शाता है कि आप उन्हें मसीह में नयी सृष्टि कहें।'' मैं उनकी टिप्पणी से चिढ़ गया। किंतु जब मैंने उद्वार पाने वाले लोगों को पत्र लिखें, फोन किये, व्यक्तिगत तौर पर मिलने गया, तो पाया कि वे जिन्होने उस रात्रि सामने बुलाये लाने का निमंत्रण प्राप्त किया था, पापियों द्वारा दोहराई जाने वाली प्रार्थना उच्चारित की थी, वे अब एक भी मुझसे मिलने का इतना इच्छुक नहीं रहा। मैं सहमत हो चला कि (इन लोगों में कोई बदलाव नहीं) आया है........तो बहुत अंतर है, एकाएक अंगीकार करना और उस पर कायम रहना। चाहे कोई आत्मा जीतने का कार्य बाहर रहकर कर रहा हो या आडिटोरियम में सामने खड़े होकर संदेश दे रहा हो। सच्चे रूप में उद्वार पाये व्यक्ति का चर्च में जोड़ना आवश्यक है।

कर्टिस हटसन जैसे व्यक्ति अब विलुप्त होते जा रहे है। बुद्विमान पास्टर ऐसे इवेंजलिस्टों का उपयोग ही नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि ऐसे प्रचारक सच्चे परिवर्तित लोगों को चर्च में जोड़ते ही नहीं हैं। इसलिये पास्टर्स अब उनका अधिकाधिक उपयोग ही नहीं करते हैं।

दूसरे पास्टर ने सही सोचा था। उस रात जितने लोग सामने आये, पापियों वाली प्रार्थना दोहराई, उनमे से किसी को भी उद्वार का अनुभव नहीं हुआ था। अगर ऐसा होता तो वे उनके चर्च आते और उसमें नियमित बने रहते! उन्होंनें अपने पापों से मुंह नहीं मोड़ा था। वे मसीह की ओर मुड़कर नहीं आये थे। उन्हें बिल्कुल उद्वार प्राप्त नहीं हुआ था! जैसे कि पास्टर ने कहा, ‘‘कि बहुत अंतर है........ विश्वास का अंगीकार करना........और उस व्यक्ति का चर्च में जुड़ना।'' उस प्रसिद्व इवेंजलिस्ट को उस रात एक भी जन ऐसा नहीं मिला जिसको उद्वार मिल पाया हो। उस प्रचारक की पद्वति में दोष था!

कर्टिस हटसन (संपादक सोर्ड ऑफ दि लार्ड) ने पास्टर को डांटा, ‘‘आप की हिम्मत कैसे हुई कि आप उन्हें आशापूर्ण उद्वार प्राप्त लोग कहते।'' उन सब को ‘‘मसीह में नयी सृष्टि'' गिना जाना था। वास्तविकता यह थी कि उन में कोई भी नयी सृष्टि नहीं थे। कर्टिस हटसन की पद्वति भी खराब थी!

ऐसे प्रचारक पूरे अमेरिका में हैं − और पूरे संसार में हैं। ये ‘‘निर्णय दिलवाने वाले'' प्रचारक हैं। हमारी पुस्तक, टूडेज एपोस्टोफी (अपने कंप्यूटर पर इसे पढ़ने के लिये यहां क्लिक कीजिये) जो डॉ कैगन और मेरे द्वारा रचित है, उसमें से मैं निर्णयवाद की परिभाषा पढूंगा,

निर्णयवाद वह विश्वास है कि सामने आने से, हाथ खड़ा करने से, प्रार्थना बोलने से, किसी सिद्वांत पर विश्वास करने से, प्रभु से कोई प्रतिज्ञा करने से, या किसी भी ब्राहय मानवीय तरीके से विश्वास का प्रदर्शन, निर्णयवाद कहलाता है।

चर्च या सभाओं में लोग सामने चले आते हैं। वे एक सिद्वांत पर विश्वास प्रगट करते हैं। वे प्रचारकों के कहने से एक प्रार्थना दोहराते हैं। पर इन सब बातों के करने से, वे मसीह के पास नहीं आते हैं! यीशु लोगों से कहते हैं, ‘‘फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।'' (यूहन्ना ५:४०) चूंकि वे मसीह के पास नहीं आये हैं अतः उनका उद्वार नहीं हुआ है। उन्हें पापों से मुक्ति नहीं मिली है। इसलिये वे चर्च नहीं आते हैं। उन्होंने निर्णय तो लिये, परंतु वे सच्चे क्रिश्चियन नहीं हैं। उन्हें उद्वार प्राप्त नहीं हुआ है!

यह प्रचारक (और इसके समान अनेक) न केवल निर्णयवादी है। पंरतु सैंडीमेनियन भी है। सुनिये ये प्रचारक कैसे अपने लेख ‘‘विनिंग दि रिलीजियस पर्सन'' में वर्णन करता है कि ‘‘आत्माओं को कैसे जीते?'' कैसे वह एक महिला को ‘‘यीशु में विश्वास करने पर लेकर आता है''

मैं उस महिला को मानों रोमियों के पथ पर लेकर चला। मैंने अपने उत्तम प्रयास से उसे यह समझाया कि वह पापी है और पाप का दंड हम अपने व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं चुका सकते हैं। मैंने उसे यह दिखाने में सहायता की, कि मसीह ने हमारे लिये वह दंड अपने बलिदान से भर दिया है। अगर मसीह ऐसा नहीं करते तो हमें उद्वार मिलना असंभव होता।

फिर उस प्रचारक ने उस महिला के लिये प्रार्थना की और कहा कि उस महिला ने ‘‘श्रेष्ठ रूप'' में उद्वार पाया है। ध्यान दीजिये कि इस महिला के उद्वार पाने की प्रक्रिया में किस बात की कमी है। इस महिला को पापों का बोध तो हुआ ही नहीं, इस बात का कोई जिक्र ही नहीं है। कोई चर्चा नहीं कि यीशु का लहू उसके पापों को शुद्व करता है। यही सब उसके दिमाग में था। उस प्रचारक ने उसे कुछ बातें समझने में सहायता की और यीशु उसके लिये मरे, यह बताने में सहायता की। जब वह ये बातें समझ गईं और उन चीजों को देखा, तो उसने एक प्रार्थना की और यही सब कुछ उद्वार पाना मान लिया गया।

उस प्रचारक का संदेश और ‘‘आत्मा जीतने'' का कार्य पूर्ण रूप से सैंडीमैनियज्म का प्रतीक था, जो कहता है कि मानसिक विश्वास आप को उद्वार दिलायेगा। जैसे डॉ मार्टिन ल्योड जोंस ने सैंडीमैनियज्म के बारे में कहा, ‘‘आप बौद्विक रूप से यह शिक्षा स्वीकार कर लेते हैं, और ऐसा कहने के लिये तैयार रहते हैं, ताकि ऐसा कहना आप को उद्वार दिलाये (रोमंस, एक्सपोजिशन ऑफ चेप्टर १०, सेविंग फेथ, बैनर ऑफ ट्रूथ, अध्याय १४) इस इवेंजलिस्ट का विचार एक और झूठे शिक्षक आर बी थिमे के समान था, जो एक व्यक्ति के लिये यह मानते थे कि, ‘‘उसे विचार में उन वाक्यों को जमाकर परमेश्वर को यह (बताना) है, कि वह उद्वार पाने के लिये मसीह पर विश्वास कर रहा है। इससे आगे किसी बात की आवश्यकता नहीं है'' (विकिपीडिया)। आप को विचारों के द्वारा परमेश्वर को बताना होगा कि आप मसीह पर विश्वास करते हैं। बस यह पर्याप्त है। जो मेरे इस संदेश को पढ़ रहे हैं या विडियो देख रहे हैं, वे ऐसा कह सकते हैं कि, ‘‘थीम झूठे शिक्षक थे।'' जो थीम ने किया और जो इन प्रचारक ने किया उसमें कोई फर्क नहीं है − और कोई भी प्रचारक जो निर्णय दिलवाने का कार्य कर रहें हो। इन सब में कोई अंतर नहीं है! यह निर्णयवाद है। यह सैंडीमैनियज्म है!

बहुत थोड़े − बहुत बहुत ही थोड़े लोग − अंतिम न्याय के दिन इस पद्वति से उद्वार पाने वाले मिलेंगे। बहुत थोड़े − बहुत बहुत ही थोड़े लोग − इस प्रकार के इवेंजलिज्म की पद्वति से उद्वार पाने वाले मिलेंगे। इसने हमारे चर्चेस को बर्बाद करके रख दिया है। इस पद्वति से दूर हो जाइये! हजारों नकली उद्वार पाये लोगों की तुलना में एक सच्चा परिवर्तित व्यक्ति अधिक उत्तम है!

इस प्रकार के इवेंजलिज्म में व्यक्ति को मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है, किंतु व्यक्ति को अपने पाप का प्रबल बोध नहीं हो पाता है। मसीह से उसकी मुठभेड़ नहीं होती। स्वयं मसीह के उपर विश्वास नहीं होता। मसीह ने जो उसके लिये किया, व्यक्ति सिर्फ इस सत्य पर राजी हो जाता है। केवल एक मानसिक राजीनामा। कि मसीह ने हमारे लिये यह किया। चूंकि लोग अपने पाप के प्रति प्रायश्चित ही नहीं करने पाते, तो मसीह के पास आने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि व्यक्ति का उद्वार हो गया है। कितने ही लोग अनंत जीवन से वंचित रहेंगे। जैसे हमारे धर्मशास्त्र कहते हैं,

‘‘फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।'' (यूहन्ना ५:४०)

अब मैं उस प्रचारक से ध्यान हटाकर आप से सीधे बात करता हूं। क्या आप उस प्रचारक से ज्यादा अच्छे हैं? क्या आप ने जो उद्वार पाया है, वह उसके कहे अनुसार से बढ़कर है? नहीं, बिल्कुल नहीं!

बिल्कुल भी त्रुटि मत कीजिये, आप को उद्वार पाने की आवश्यकता है। जब परमेश्वर आप को नीचे देखते हैं, तो वह क्या देखते हैं? वह आप को पाप से ढंका हुआ पाते हैं! बाइबल कहती है, ‘‘यहोवा की आंखें सब स्थानों में लगी रहती हैं, वह बुरे भले दोनों को देखती रहती हैं'' (नीतिवचन १५:३) परमेश्वर ने अपने लेखे मे आप के सब पाप दर्ज कर रखे हैं। अंतिम न्याय के समय आप परमेश्वर के समक्ष खड़े होंगे और ‘‘उन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया'' (प्रकाशितवाक्य २०:१२) । यहां तक कि आप के गुप्त पाप भी सामने आयेंगे। बाइबल कहती है, ‘‘क्योंकि परमेश्वर सब कामों और सब गुप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा'' (सभोपदेशक १२:१४) । तब आप ‘‘आग की झील में'' डाले जायेंगे (प्रकाशितवाक्य २०:१५) ।

आप को आवश्यकता है कि परमेश्वर आप को अलग से देंखे। परमेश्वर जब आप को नीचे देंखे तो आप के पाप को न देंखे। परमेश्वर को आप में मसीह का लहू दिखाई देवे। आप को यीशु की आवश्यकता है क्योंकि, ‘‘परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है'' (१ तिमोथियुस २:५) । आप को यीशु को अपना मध्यस्थ बनाने की आवश्यकता है। आप के लिये आवश्यक है कि यीशु आप के मध्यस्थ हों, जो आप के पापों का मूल्य चुकाते है, और आप के व परमेश्वर के बीच खड़ें हैं।

परंतु आप तो उद्वार कैसे पाया जाये, यह सीख रहे हैं। जबकि यह सीखने की चीज नहीं है। आप सैंडीमैनियन निर्णयवादी हैं। एक लड़के ने कहा कि, ‘‘मैं यीशु पर विश्वास लाने का प्रयास करूंगा। अपनी भावनाओं की पूर्ति के स्थान पर, मैं उन पर विश्वास करने की कोशिश करूंगा।'' जब वह ‘‘विचारों में सहमत हो जायेगा'' कि मसीह उसके पापों के लिये मरे, तो उस मानसिक सहमति को ही उद्वार पाना समझ बैठेगा। इस लड़के के पास अपने पापों की लिखी हुई सूची है, परंतु इसे उन पापों का मन के भीतर से बोध पैदा ही नहीं हुआ। वह यीशु पर विश्वास करना, एक कार्य को खत्म करने के रूप में देखना चाह रहा है।

जिस दिन यीशु क्रूस पर मरे, उस दिन उनके साथ एक चोर को भी क्रूस पर चढ़ाया गया था। वह तो नहीं जानता था कि यीशु पर ‘‘कैसे'' विश्वास करें − बस उसको विश्वास हुआ। उसको अपने पाप का बोध हुआ, यीशु की आवश्यकता हुई − और उसने यीशु पर विश्वास किया।

एक दिन मसीह एक घर में भोजन ग्रहण कर रहे थे, एक स्त्री सरकते हुए उनके पैरों के पास पहुंची और उन्हें चूमा। वह तो नहीं जानती थी कि कैसे यीशु पर विश्वास किया जाये − वह तो स्वतः उनके पास आयी। मसीह ने उस स्त्री से कहा, ‘‘तुम्हारे पाप क्षमा हुए।'' (लूका ७:४८)

आप में से बहुत इस भ्रम में पड़े हुए हैं कि यीशु के विषय में विचारों में यह मान लेना कि वे हमारे लिये क्रूस पर मरे एवं इस सत्य को जान लेना − एक ही बात है। ये तो आप ने अपने विचारों में माना कि आप मसीह पर विश्वास करते हैं। आप इसे अपने मुंह से दोहराते हैं। धर्मशास्त्र में यही सच्चाई तो मसीह कहते हैं,

‘‘फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।'' (यूहन्ना ५:४०)

आप ने मसीह नाम की शख्सियत पर विश्वास नहीं किया। आप उनके पास आये भी नहीं। आप अपने विचारों में चल रही बातों पर राजी हो गये हैं। आप मुंह से अंगीकार करते हैं। परंतु इससे ही उद्वार नहीं मिल जाता है। कुछ सोचते हैं कि उद्वार पाने के विषय में सीख लिया जाये, इससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर दे देंवे तो हमें पापों से मुक्ति मिल जायेगी। एक छात्र के समान सीखना और उत्तर देना आप को पापों से उद्वार नहीं दिलायेगा। इसीलिये मसीह कहते हैं, ‘‘फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।'' (यूहन्ना ५:४०)

समस्या यह है कि आप का मन अपने पापों के बारे में सोचकर छिन्न भिन्न नहीं होता। आप कहते तो हैं कि मसीह हमारे लिये मरे, किंतु रटे रटाये अंदाज में। परंतु अपने पापों के बारे में सोचकर, आप का मन चीर नहीं जाता है। तो कैसे होगा सच्चा मन परिवर्तन। भीतर से स्वार्थी बने बैठे हैं। भीतर से परमेश्वर की भूख नहीं है। आप तो सिर्फ अपने को चाहते हैं। आप हर वह बुरी चीज करते हैं। इसके पीछे आप को पापमय स्वभाव है। आप को स्वयं से नफरत हो जानी चाहिये। अपने आप से थक जाना चाहिये। तब आप यीशु के बारे में सुनकर प्रसन्न होंगे जो आप से प्रेम करते हैं और अपना लहू आप के लिये बहाया।

सच में आप मसीह के लहू पर विश्वास नहीं करते हैं। आप विचारों में उस लहू के बारे में सोचते हैं, उस के बारे में बोल सकते हैं, क्योंकि आप ने संदेशों में सुना है। यही सब आप करते हैं। परंतु आप एक दोषी, असहाय पापी के रूप में, मसीह के पास नही आते − कि उसके पास आयें और वह आप को अपने लहू से धो देवे। आप हर प्रकार से पापों से छुटकारा पाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर आप सिर्फ मुंह से अंगीकार भी कर रहे हैं, तो भी मसीह का लहू आप को उद्वार नहीं देवेगा। अपने दिल में आप मसीह के इस गीत से सहमत नहीं होते हैं,

मेरी आशा नहीं किसी बात पर टिकी है
   सिवाय यीशु के लहू और धार्मिकता के।
मैं हिम्मत नहीं करूंगा कि अपने (विचारों और भावनाओं में बंधू)
   परंतु पूर्ण रूप से यीशु की ओर झूकूंगा।
मसीह जो, मेरी दृढ़ चटटान है, मैं खड़ा होता उन पर,
   बाकि के मैदान तो फिसलती रेत हैं;
बाकि के मैदान तो फिसलती रेत हैं।
   (‘‘दि सोलिड रॉक'' द्वारा एडवर्ड्र मोट, १७९७−१८७४)

आप अत्यधिक पापी हैं। परंतु यीशु आप से प्रेम करते हैं। इसीलिये उन्होंने आप के लिये प्राण दिये। अगर आप उनके पास आते हैं तो वह आप के पापों को क्षमा करेंगे। आप के पापों को अपने लहू से धो देंगे। अगर आप यीशु पर विश्वास करेंगे तो वह आप को पापों से बचायेंगे! यीशु के विषय में आप हमसे बात करना चाहते हैं तो आइये हम आप से बात करेंगे और आप के लिये प्रार्थना करेंगे। आमीन।


अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स आप से सुनना चाहेंगे। जब आप डॉ हिमर्स को पत्र लिखें तो आप को यह बताना आवश्यक होगा कि आप किस देश से हैं अन्यथा वह आप की ई मेल का उत्तर नहीं दे पायेंगे। अगर इस संदेश ने आपको आशीषित किया है तो डॉ हिमर्स को इस पते पर ई मेल भेजिये उन्हे आप किस देश से हैं लिखना न भूलें।। डॉ हिमर्स को इस पते पर rlhymersjr@sbcglobal.net (यहां क्लिक कीजिये) ई मेल भेज सकते हैं। आप डॉ हिमर्स को किसी भी भाषा में ई मेल भेज सकते हैं पर अंगेजी भाषा में भेजना उत्तम होगा। अगर डॉ हिमर्स को डाक द्वारा पत्र भेजना चाहते हैं तो उनका पता इस प्रकार है पी ओ बाक्स १५३०८‚ लॉस ऐंजील्स‚ केलीफोर्निया ९००१५। आप उन्हें इस नंबर पर टेलीफोन भी कर सकते हैं (८१८) ३५२ − ०४५२।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व बैंजामिन किंकैड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
‘‘कम अनटू मी'' (चार्ल्स पी जोंस, १८६५−१९४९)