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परमेश्वर की इच्छा को कैसे जाने

HOW TO KNOW THE WILL OF GOD
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, १५ मई, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में किया गया प्रचार संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Morning, May 15, 2016

''परन्तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं'' (याकूब १:२२)


ए डबल्यू पिंक (१८८६ – १९५२) का कथन है, ''वचन को सुनने वाले बहुत होंगे, नियमित सुनने वाले भी होंगे, बडी रूचि से सुनने वाले भी होंगे। पर खेद का विषय। सुनना जीवन को (प्रभावित नहीं करता): सुनना जीवन को (नियंत्रित) नहीं करता। परमेश्वर का कथन है जो वचन पर चलने वाले नहीं वे स्वयं को धोखा देते हैं!...... आपके मानस में परमेश्वर के प्रति अगर बढता हुआ समर्पण नहीं तो आपका बढता हुआ सांसारिक ज्ञान केवल आप पर दंड ही लायेगा......परमेश्वर ने अपना वचन हमें दिया...... उस वचन में हमारे लिये जीवन जीने के निर्देश हैं: जिससे पता चलता है वह हमसे क्या चाहता है'' (आर्थर डबल्यू पिंक, ''दि स्क्रिप्चर्स ऐंड ओबिडियंस'' इन प्रोफिटिंग फ्राम दि वर्ड, फ्री ग्रेस ब्राडकास्टर, समर २०१५, पेज १, २)

''परमेश्वर ने अपना वचन हमें दिया...... उस वचन में हमारे लिये जीवन जीने के निर्दश हैं'' मैं मि. पिंक के साथ पूरी तरह सहमत हूं। जब मेरे हृदय का बदलाव नहीं हुआ था, हटिंगटन पार्क के बैपटिस्ट चर्च में जहां में किशोर वय में जाया करता था, मुझे यह सीख पढायी गयी थी, वह चर्च अन्य बातों में गलत हो सकता है पर इस बिंदु पर कदापि गलत नहीं था। हमें यह सिखाया गया था कि परमेश्वर अपनी इच्छा केवल धर्मशास्त्र के माध्यम से प्रगट करता है। मैंने भावनाओं पर निर्भर रहकर परमेश्वर की इच्छा जानना नहीं सीखा है। मैंने ऐसी शिक्षा डॉ तिमोथी लिन और डॉ जे वर्नान मैगी से सीखी है। परमेश्वर का अनुग्रह जो मुझ पर बरसा है, उसमें मैं भी भजनकार के साथ स्वर मिला कर कह सकता हूं, ''तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।'' (भजन ११९:१०५) नीतिवचन ६:२२ परमेश्वर के वचन के विषय में कहता है, ''वह तेरे चलने में तेरी अगुवाई और सोते समय तेरी रक्षा और जागते समय तुझ से बातें करेगी।'' इसलिये हमारा पद कहता है, ''परन्तु वचन पर चलने वाले बनो और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।'' (याकूब १:२२) यह पद हमें बताता है कि कैसे परमेश्वर की इच्छा को जाने।

१. यह पद हमें उन लोगों के लिये बताता है जो परमेश्वर की इच्छा के विषय में स्वयं को धोखा देते हैं ।

मैं इस पर के दूसरे भाग पर पहले व्याख्या करूंगा जहां लिखा है ''अपने आप को धोखा देना।'' वचन पर चलने से इंकार करना ही अपने आप को धोखा देना है। फिर उसके जीवन के लिये परमेश्वर की क्या इच्छा है मनुष्य यह नहीं जान पाता। आज के चर्चेस में बैठे लोगों की यही दशा है। वे उनके जीवन में परमेश्वर की क्या इच्छा है इससे अनभिज्ञ रहना चाहते हैं। फलस्वरूप स्वयं से छल कर रहे हैं।

वे यह भूल जाते हैं शैतान उन से बडा छल करने वाला है। बाइबल कहती है शैतान संसार के देशों को धोखा देता है (प्रकाशितवाक्य २०:३) । वह उसे ''इब्लीस, शैतान और सारे संसार का भरमाने वाला'' कहता है (प्रकाशितवाक्य १२:९)। ''शैतान'' अर्थात शत्रु या विरोधी। सदैव परमेश्वर का विरोधी। उसकी पुरानी चालाकियां है लोगों को धोखा देना। संपूर्ण ''संसार को भरमाना।'' ''धोखा देना'' के लिये यूनानी शब्द है ''प्लेनाओं''। अर्थात ऐसा कहें ''पथभ्रष्ट'' ''लुभाना'' ''गुमराह करना'' ''लुभाना और भटकाना।'' जगत सृष्टि के आरंभ में शैतान ने यही किया। आदम और हवा को पथभ्रष्ट करने का काम शैतान का था। उसने जगत के आदि माता पिता से छल की बातें की, फुसलाया और परमेश्वर द्वारा मना करने के उपरांत, बगीचे में लगे फल को खाने के लिये पथभ्रष्ट किया। अच्छे मसीही होने का दावा करने वाले लोग सोचते हैं कि वे अपने जीवन के लिये परमेश्वर की इच्छा जानते हैं। पर वास्तव में शैतान उनको भरमाता है। कईयों को लगता है पवित्र आत्मा उनका मार्गदर्शन कर रहा है जबकि शैतान उनका संचालन कर रहा है। आप को यह कभी नहीं भूलना चाहिये। यही बात प्रेरित पौलुस मसीहियों को कहता है जब उन्हें चेताता है, ''सचेत हो (निगरानी रखो) और जागते रहो (मुस्तैद बनो) क्योंकि (तुम्हारा विरोधी) शैतान...... इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए।'' (१ पतरस ५:८) डॉ मैगी का कथन है, ''मैं नहीं सोचता कि आप अकेले शैतान का सामना कर सकते हैं......आप को विश्वासी भाइयों की जरूरत होगी जो आप के साथ प्रार्थना कर सके'' (थ्रू दि बाइबल; १ पतरस पर व्याख्या) मेरे विचार से वह एकदम सही कह रहे हैं। पर अगर आप अकेले खडे हैं या उद्वारहीन भाई बहिनों की निकटसंगति में हैं तब शैतान आप को भरमा सकता है। यहां बाइबल का कथन बिल्कुल सटीक है,

''बुद्धिमानों की संगति कर तब तू भी बुद्धिमान हो जाएगा परन्तु मूर्खों का साथी नाश हो जाएगा।'' (नीतिवचन १३:२०)

स्कोफील्ड की व्याख्या ''मूर्ख'' के लिये बिल्कुल सही है। (पेज ६७८) पर यह कहती है धर्मशास्त्र में ‘मूर्ख’ कभी भी मानसिक रूप से दोषपूर्ण व्यक्ति को नहीं बताया गया है। बल्कि एक अभिमानी और अपनी मद में जीने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है। जो अपने जीवन को ऐसे क्रम देता है मानो कोई परमेश्वर है ही नहीं।'' चर्च में भी ऐसे दंभी मूर्ख व्यक्ति मिल जायेंगे। सुनिश्चित करें कि आप मनीषी जनों की संगति में रहें मूर्खो की नहीं! शैतान मूर्खो का उपयोग करता है कि आप को परमेश्वर की इच्छा से दूर ले जाये।

आप भी झूठे मसीही जनों द्वारा छले जा सकते हैं। इन अंत के दिनों के लिये यह बिल्कुल सत्य है। बाइबल कहती है,

''और दुष्ट और बहकाने वाले धोखा देते हुए (फैलते जायेंगे) और धोखा खाते हुए बिगड़ते चले जाएंगे'' (२ तीमुथियुस ३:१३)

झूठे मसीही आप को धोखा देंगे और भरमायेंगे। २ तीमुथियुस ३:१३ का उत्तर पद १४ व १५ में है। इन बुरे दिनों में परमेश्वर का वचन निश्चित मार्गदर्शक है। जो लोग बाइबल को मानते है, उनकी संगति में बने रहिये। उन लोगों की मत सुनिये जो ''धोखा खाते और धोखा देते'' हैं।

आप इस बात से भी छले जा सकते हैं कि आप को पवित्र आत्मा की अगुआई हो रही है। आजकल के नये इवेंजलिस्ट के लिये यह बडा जाल सिद्व हो रहा है। वे सोचते हैं कि उनके दिमाग में जो भी विचार आया वह पवित्र आत्मा की ''देन'' है। इसकी चर्चा लोग बढ चढकर करते हैं। वे कहते हैं, ''परमेश्वर ने मुझे ऐसा करने के लिये कहा'' या ''मुझे वैसा करने के लिये प्रेरित किया'' उनके मुख से यह चर्चा आप बार बार सुनते हैं। सुनने में बडा आध्यात्मिक लगता है। आप को लगेगा कि यह व्यक्ति कितना मजबूत मसीही जन है। पर बाइबल ऐसे लोगों को ''मूर्ख'' ठहराती है। बाइबल कहती है,

''जो अपने ऊपर भरोसा रखता है वह मूर्ख है'' (नीतिवचन २८:२६)

आप उन्हें लोगों के बीच में यह कहते पायेंगे, ''परमेश्वर ने मुझे यह करने के लिये कहा'' ''परमेश्वर मुझे यहां लेकर आया'' ''परमेश्वर मुझे यहां से जाने को कह रहा है।'' जब जब आप ऐसे शब्द सुनते हैं तो आप ये शब्द किसी ''मूर्ख'' से सुन रहे हैं।

''जो अपने ऊपर भरोसा रखता है वह मूर्ख है'' (नीतिवचन २८:२६)

बाइबल सीधे तौर पर कहती है, ''अपनी (स्वयं की) समझ पर भरोसा मत करना (नीतिवचन ३:५) जब लोग अपनी समझ पर भरोसा करने लगते हैं, तो स्वयं को धोखा दिये जाने के लिये तैयार कर लेते हैं और वे बाइबल के उस पद पर पहुंच जाते हैं,

''परन्तु वचन पर चलने वाले बनो और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं'' (याकूब १:२२)

२. दूसरा, यह पद उनके लिये कहता है जो वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को खोजते हैं।

''परन्तु वचन पर चलने वाले बनो और केवल सुनने वाले ही नहीं......'' (याकूब १:२२)

परमेश्वर का वचन सुनने के लिये और उससे मार्गदर्शन लेने के लिये आप को जो सुना गया उसे मानने के लिये तैयार होना चाहिये। सुनने की शर्त पहले वाले पद याकूब १:२१ में दे रखी है।

''इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके उस वचन को नम्रता से ग्रहण कर लो जो हृदय में बोया गया और जो तुम्हारे प्राणों का उद्धार कर सकता है'' (याकूब १:२१)

और स्पष्टत: से यह आधुनिक अनुवाद में दिया गया है।

''इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके उस वचन को नम्रता से ग्रहण कर लो जो हृदय में बोया गया और जो तुम्हारे प्राणों का उद्धार कर सकता है'' (एनआयवी)

एक व्यक्ति को सारी नैतिक मलिनता से शुद्व होना चाहिये उस दुष्टता से दूर रहना चाहिये जो आजकल चहुओर प्रबल है। इसमें पोर्नोग्राफी और कटु स्वभाव भी आता है। कुछ लोग परमेश्वर की मनसा जानने की इच्छा तो रखते हैं पर दूषित विचार उनके मन में पलते रहते हैं। कुछ लोग परमेश्वर की मनसा जानने की इच्छा तो रखते हैं पर अपने माता पिता, अपने पास्टर्स और चर्च में अपने अगुओं के प्रति कडवे विचारो से भरे होते हैं। उनके मन द्वेष से भरे होते हैं। कुछ लोगों के संसार में लिप्त लोग से निकटस्थ संबंध होते हैं। वे उस व्यक्ति के इतने नजदीक होते हैं कि भूल जाते हैं कि''जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है'' (याकूब ४:४)। कुछ लोग घमंड और जलन से भरे होते हैं। आप को इन दुर्गुणों को परमेश्वर के सामने रखकर अपने दिल से निकालने के लिये कहना चाहिये। जब दिल में नम्र होंगे तब ही आप के भीतर परमेश्वर का वचन कार्य करेगा। जीवन में आप का मार्गदर्शक बनेगा। तभी आप ''वचन पर चलने वाले बनेंगे और केवल सुनने वाले ही नहीं।'' इस पद पर व्याख्या करते हुये महान स्पर्जन ने कहा था, ''यह लगभग तय बात है कि जब (मसीही होने का दावा करने वाले लोग तर्क करने लग जायें) और पवित्र आत्मा का निर्देशन बतलाने लगे तब उनके जीवन में कुछ गुप्त बुराई होती है जिसे वे अपने विवेक से ढांपने लगते हैं। तब शैतान उन्हें अपनी सेवकाई पर दोष लाने के लिये उकसाता है क्योंकि सुसमाचार उन्हें कुरेदता है और उनके पापों से व्यथित करता है। अगर आप परमेश्वर का वचन आनंद और अपने लाभ के लिये सुनते हैं तो आप को ‘सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करना चाहिये क्योकि ये चीजें आप को परमेश्वर से दूर ले जाती हैं'' (सीएच स्पर्जन, ''बिफोर सर्मन एट सर्मन ऐंड ऐफ्टर सर्मन'' एमटीपी, संख्या १८४७) अगर परमेश्वर के वचन से लाभ उठाना है तो अपनी सारी मलिनता को दूर करना आवश्यक है। तभी ''वचन पर चलने वाले कहलाओगे।'' वचन मानने से ही परमेश्वर की इच्छा अपने जीवन के लिये जान पाओगे। मैं आपको छ तरीके बताता हूं जिससे आप बाइबल में से परमेश्वर की इच्छा जान सकते हैं।

१. पुन: कहता हूं परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये अपने मन पर निर्भर नहीं रहें। जैसा मैंने पहले भी कहा, बाइबल सीधे तौर पर कहती है,

''जो अपने ऊपर भरोसा रखता है वह मूर्ख है'' (नीतिवचन २८:२६)

यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि,

''मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है उस में असाध्य रोग लगा है उसका भेद कौन समझ सकता है?'' (यिर्मयाह १७:९)

इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि जो व्यक्ति अपने मन पर भरोसा रखता है वह ''मूर्ख'' है

२. परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये आप को परमेश्वर की इच्छा मानने के लिये तैयार होना चाहिये, न कि अपनी इच्छा।

''यदि कोई उस की इच्छा पर चलना चाहे तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की ओर से है या मैं अपनी ओर से कहता हूं'' (यूहन्ना ७:१७)

डॉ जोन आर राइस ने कहा, ''इसका यह अर्थ है कि अगर मनुष्य परमेश्वर की इच्छा मानने का चुनाव कर ले तो परमेश्वर स्वत: अपनी इच्छा उस पर प्रगट भी करेंगे।'' (दि सन ऑफ गाड, कमेंटरी ओन दि गोस्पल ओफ जोन, सोर्ड ओॅफ दि लोर्ड पब्लिशर्स, १९७६, पेज १६२) हैनरी एम मौरिस ने कहा था, ''यह पढा जा सकता है: ‘अगर एक व्यक्ति गंभीरता से उसकी इच्छा पूरी करने के लिये तैयार रहे तो वह व्यक्ति जान भी जायेगा...... इसलिये किंन्ही संदर्भ में पहली आवश्यकता है परमेश्वर की इच्छा मानने के लिये तैयार रहना...... विशुद्व मन से परमेश्वर की इच्छा मानने के लिये तत्पर रहना, भले ही वह बात हमारी इच्छा के विरूद्व हो'' (दि डिफेंडर स्टडी बाइबल; यूहन्ना ७:१७ पर व्याख्या)

३. परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये आप को आपके पापों को मानना व उन्हें त्यागना होगा।

''जो अपने अपराध छिपा रखता है, उसका कार्य सुफल नहीं होता परन्तु जो उन को मान लेता और छोड़ भी देता है उस पर दया की जायेगी। परन्तु जो अपना मन कठोर कर लेता है वह विपत्ति में पड़ता है।'' (नीतिवचन २८:१३‚१४)

४. परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये आप को अपने अलौकिक पिता के निर्देशों को व्यर्थ नहीं जानना चाहिये।

''मूढ़ अपने पिता की शिक्षा का तिरस्कार करता है परन्तु जो डांट को मानता वह चतुर हो जाता है।'' (नीतिवचन १५:५)

''बुद्धिमान पुत्र पिता की शिक्षा सुनता है परन्तु ठट्ठा करने वाला घुड़की को भी नहीं सुनता।'' (नीतिवचन १३:१)

५. परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये आप को अपने चर्च के अगुओं की बात माननी होगी।

''अपने अगुवों की मानो जो (मार्गदर्शन देते हैं, स्कोफील्ड) और उनके आधीन रहो क्योंकि वे उन की नाईं तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते जिन्हें लेखा देना पड़ेगा कि वे यह काम आनन्द से करें न कि ठंडी सांस ले लेकर...... '' (इब्रानियों १३:१७)

इब्रानियों १३:१७ के संदर्भ में रिफार्मेशन स्टडी बाइबल कहती है, ''चर्च के विश्वसनीय अगुए ऐसे चरवाहे या रखवाले हैं जो खतरा देखते ही शहर को संकेत देते हैं। अगुओं की देखभाल बहुत गहरी और सच्ची होती है क्योंकि वे परमेश्वर की ओर से नियुक्त होकर अपना लेखा परमेश्वर को देंगे। अगर उनकी सेवकाई में बाधा आती है तो प्रत्येक जन उसका परिणाम भोगेगा।''

६. परमेश्वर की इच्छा जानने के लिये आप को अपने जीवन को पवित्र करना होगा और इस संसार के सदृश बनने से बचना होगा।

''इसलिये हे भाइयों‚ मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं‚ कि अपने शरीरों को जीवित‚ और पवित्र‚ और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो‚ परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल − चलन भी बदलता जाए‚ जिस से तुम परमेश्वर की भली‚ और भावती‚ और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो'' (रोमियों १२:१‚२)

''जो मस्तिष्क नया बनाया जाता है वह परमेश्वर के वचन से भरपूर और नियंत्रित होता है'' (मैकआर्थर स्टडी बाइबल; रोमियों १२:२ पर व्याख्या)


मेरा निवेदन है कि खडे होकर पेज पर अंकित गीत संख्या ४ गायें।

परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जब हम चलते हैं‚
   कितनी महिमा वह हम पर उडेलता है!
जब हम उसकी इच्छा में बने रहते हैं वह हम में बना रहता है‚
   बना रहता उन सबके साथ जो मानते उसकी आज्ञा।
विश्वास करो भरोसा रखो उस पर नहीं कोई दूजा मार्ग
   विश्वास करो भरोसा रखो यीशु में आनंदित रहने के लिये।

उसके प्रेम की रस लहरियों को हम सिद्व नहीं कर सकते
   जब तक उसकी वेदी पर स्वयं को अर्पण न कर दें;
जो अनुग्रह वह दिखाता और आनंद वह लुटाता‚
   वह उनके लिये जो विश्वास और भरोसा रखते।
विश्वास करो भरोसा रखो उस पर‚ नहीं कोई दूजा मार्ग
   विश्वास करो भरोसा रखो यीशु में आनंदित रहने के लिये।

उसकी मधुर संगति में हम उसके पैरों तले बैठते‚
   तब उसके साथ साथ हम चलते;
जो वह कहेगा हम मानेंगे‚ जहां भेजेगा हम जायेंगे;
   कभी डरेंगे नहीं‚ केवल विश्वास करेंगे और भरोंसा रखेंगे।
विश्वास करो भरोसा रखो उस पर‚ नहीं कोई दूजा मार्ग
   विश्वास करो भरोसा रखो यीशु में आनंदित रहने के लिये।
(''विश्वास करो भरोसा रखो'' जोन एच सामिस‚ १८४६−१९१९)

निवेदन करता हूं कि खडे ही रहिये।

रोमियों १०:१६ में पौलुस कहता है‚ ''उन्होंने सुसमाचार को नहीं माना'' डॉ मार्टिन ल्योड जोंस कहते हैं‚ ''देखिये पौलुस किस प्रकार इस बात को रखता है वह यह नहीं कहता है कि सबने सुसमाचार पर विश्वास नहीं किया‚ पर उन्होंने आज्ञा नहीं मानी वह ऐसा कहता है......सुसमाचार प्रतिक्रिया मांगता है। कुछ काम किया जाना आवश्यक है......आज्ञा मानना काम है। सुसमाचार तो एक व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को बदल देता है। यह जीवन का मुख्य भाव है‚ नियंत्रक है। जो मनुष्य के संपूर्ण नजरिये को प्रभावित करता है। आज्ञाकारिता से यही तात्पर्य है...... आज्ञाकारिता आवश्यक है क्योंकि पाप का गूढ अर्थ परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानना है'' (''गाडस गास्पल ऐंड ओबिडियंस'') ।

मसीह आप को पापों से प्रायश्चित करने के लिये आमंत्रित करते हैं। वह क्रूस पर आप के पापों का दंड भरने के लिये मरे। वह सुसमाचार का पालन करने के लिये आप को बुलाते हैं − अपनी आज्ञा माने जाने के लिये आप को बुलाते हैं। अगर आप उनके पास आने से इंकार कर देते हैं तो आप आप उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने वाले ठहरे। आप को संपूर्ण रूप में स्वयं को मसीह के सामने समर्पित कर देना चाहिये। ''यह सुसमाचार के प्रति आज्ञा कारिता कहलायेगी इसी से आप मसीह कहलायेंगे'' (ल्योड जोंस उक्त संदर्भित) । अगर आप सुसमाचार के प्रति आज्ञा कारी बनने और सच्चे अर्था में उद्वार पाना चाहते हैं तो कैगन नोहा सांग और जोन कैगन के साथ भवन के पिछले हिस्से में चले जाइये। प्रत्ये क आंख बंद होगी और आप उनका अनुसरण करते हुये निकल जाइये। वे आपको पूछताछ कक्ष में ले जायेंगे और आप से बातें करते हुये प्रार्थना करेंगे। आमीन।


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(संदेश का अंत)
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या उन्हें दूरभाष कर सकते हैं (818)352-0452

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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र पढ़ा गया: याकूब १:२१−२५
संदेश के पूर्व बैंजमिन किंकेड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
''विश्वास करो भरोसा रखो'' (जोन एच सामिस, १८४६−१९१९)


रूपरेखा

परमेश्वर की इच्छा को कैसे जाने

HOW TO KNOW THE WILL OF GOD

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

''परन्तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं'' (याकूब १:२२)

(भजन ११९:१०५; नीतिवचन ६:२२)

१. पहला, यह पद हमें उन लोगों के लिये बताता है जो परमेश्वर
की इच्छा के विषय में स्वयं को धोखा देते हैं, प्रका २०:३;१२:९;
१पतरस ५:८; नीति १३:२०; २तीमु ३:१३; नीति २८:२६;३:५

२. दूसरा, यह पद उनके लिये कहता है जो वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को
खोजते हैं, याकूब १:२१; ४:४: नीति २८:२६; यिर्म १७:९; यूह ७:१७;
नीति २८:१३,१४; १५:५; १३:१; इब्रा १३:१७; रोमियों १२:१‚२;
रोमियों १०:१६