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अंतिम दिनों में उपवास और प्रार्थना

FASTING AND PRAYER IN THE LAST DAYS
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, २४ अप्रैल, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में किया गया प्रचार संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, April 24, 2016


मेरे साथ मत्ती २४:१२ निकाल लीजिये। पचास सालों से यह पद मुझे दिलासा देता आया है। कृपया इसे जोर से पढिये।

''और अधर्म के (बढ़ने) से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा'' (मत्ती २४:१२)

यह विस्मयकारी पद मुझे दिलासा क्यों देता है? क्योंकि यह स्पष्टत: अंत समय के चर्चेस की दशा को बताता है। सच्चे मसीहियों को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यीशु ने यह पहले ही बता दिया था कि अंत के दिनों में ऐसा होगा। ''अधर्म'' का अनुवाद है ''अराजकता।'' यह ''एनोमिया'' कहलाता है − इसका अर्थ है नये नियम के नियमों का ''उल्लंघन'' और ''आज्ञालंघन।'' इसका तात्पर्य है कि अंतिम दिनों के चर्च बाइबल की शिक्षाओं का अनुसरण नहीं करेंगे। ऐसे अधर्मीपन के कारण ''बहुतों का प्रेम ठण्डा (हो) जाएगा।'' एक ओर आधुनिक अनुवाद इसे और अधिक मजबूत बनाता है ''अधिकतम का प्रेम ठण्डा (हो) जाएगा'' (एनआयवी) । अनुवादित किया गया ''प्रेम'' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है यह यूनानी ''अगापे'' शब्द से लिया गया है − यह शब्द विशेषत: मसीही प्रेम के लिये ही प्रयुक्त किया गया है। वाइन इसे ''मसीहत का लक्षण प्रगट करने वाला'' शब्द कहते हैं। हैनरी एम मौरिस ने अंतिम दिनों के लौदिकियन चर्चेस के उपर दी गयी व्याख्या में कहा है, ''विशाल और धनाढय चर्चेस की तो जैसे बाढ आयी हुयी है, जहां सुसमाचार व बाइबल से प्रचार कम होता है.....ऐसे चर्च आत्मिक रूप से गरीब होते हैं।'' (दि डिफेंडर स्टडी बाइबल; प्रकाशितवाक्य ३:१७ पर व्याख्या) । ऐसे धनाढय चर्चेस के लिये प्रकाशितवाक्य ३:१७ में कहा गया है, ''यह नहीं जानता कि तू अभागा, और तुच्छ और कंगाल और अन्धा और नंगा है।''

वर्तमान चर्चेस में एक साधारण सा टेस्ट किया जा सकता है − क्या उनमें ''अगापे'' प्रकार का प्रेम पाया जाता है? क्या वे चर्च में होना पसंद करते हैं? क्या वे मसीह में अपने भाई और बहिनों की संगति में रहना पसंद करते हैं? हम देखते हैं अधिकतर चर्च सदस्य पसंद नहीं करते हैं। हमारे बैपटिस्ट चर्चेस की एक त्रासदी यह है कि वे आजकल रविवार रात्रि की आराधना का परित्याग कर रहे हैं। यह इतनी आम बात हो गयी है कि डॉ कैगन को डलास, टैक्सास में एक भी चर्च ऐसा नहीं मिला जहां रात्रि की आराधना होती हो! हो सकता है कि एक भी हो पर उन्हें तो नहीं मिला! डॉ डब्ल्यू ए क्रिसवेल के महान कहलाने वाले प्रथम बैपटिस्ट चर्च में अब रात्रि की आराधना नहीं होती है। डॉ जिमी ड्रेपर के डलास के उपनगर के विशाल चर्च में अब रात्रि की आराधना नहीं होती है। डॉ जे फ्रेंक नौरिस के महान बैपटिस्ट चर्च में अब रविवार की रात्रि आराधना नहीं होती है। डॉ जोन आर राईस के विशाल गलीली बैपटिस्ट उपनगरीय चर्च डलास ने रात्रि की आराधना बिल्कुल समाप्त कर ली है। डॉ कैगन ने कहा, ''कितने आश्चर्य की बात है कि − बाइबल बैल्ट कहलाये जाने वाले डलास टैक्सास में मसीहत को इतना कम स्थान प्राप्त है।''

यहां तक कि कितने ही मूलभूत चर्चेस में यही प्रक्रिया दोहराई जा रही है। मुझे अभी सुनकर धक्का पहुंचा कि एक प्रसिद्व बुनियादी बैपटिस्ट चर्च ने अपनी रात्रि कालीन आराधना को त्याग दिया। सुबह की आराधना के बाद अब वे सैंडविच देते हैं और १:३० बजे उनकी बाइबल स्टडी होती है। एक प्रचारक ने कहा, ''उनको बाइबल का बहुत ज्ञान मिलता है'' − जैसे ''बाइबल ज्ञान मिलना'' ही चर्च जाने का एकमात्र कारण हो! पुराने समय के बैपटिस्ट संध्या की सुसमाचारीय आराधना करते थे जिसमें उनके इवेंजलिस्ट, भटके हुये लोगों को सुसमाचार सुनाने के लिये लेकर आते थे। पुराने समय के बैपटिस्ट संध्या की बडी महान संगति किया करते थे। मुझे बूढा होने के बाद भी यह याद है। अधिकतर लोगों का मानना है कि चर्च जाना अर्थात बाइबल का अधिक ज्ञान मिलना। अगर वे घर पर रूककर जे वर्नान मैगी को भी रेडियो पर सुन ले तो उन्हें बाइबल का इससे अधिक ज्ञान ''मिल'' जायेगा! मत्ती २४:१२ यह नहीं कहता है कि, ''अधर्म के बढ़ने से बहुतों को बाइबल का ज्ञान कम मिलेगा'' नही! नहीं! बल्कि ऐसा लिखा है, ''और अधर्म के (बढ़ने) से बहुतों का (अगापे) प्रेम ठण्डा हो जाएगा।'' रविवार रात्रि की आराधना बंद कर देने वाले चर्चेस में असल में अगापे प्रकार के प्रेम का भाव गायब हो चुका है। कुछ समय के भीतर ही ये बैपटिस्ट चर्च भी ऐसे निर्जीव और अनुपजाऊ हो चुके होंगे जैसे युनाइटेड मैथोडिस्ट और युनाइटेड प्रेसबिटेरियंस चर्च। जिन्होंने ५० सालों पहले ही रविवार रात्रि की आराधना को त्याग दिया था। उन्होंने सोचा कि ऐसा करके उन्होंने बहुत अच्छा कार्य किया लेकिन इसी ने उन्हें मार डाला! साल बीतते गये और उन्होंने लाखों सदस्यों को खो दिया। इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि दक्षिणी बैपटिस्टों ने पिछले साल २‚५०‚००० सदस्यों को खो दिया! क्योंकि वहां न कोई संगति है, न प्रेम, न ऐसा कोई कारण कि लोग उनके यहां चर्च में आयें। ये बुनियादी बैपटिस्ट भी इतनी अच्छी उन्नति नहीं कर रहे हैं।

ये सब बातें चर्च में उस समय घट रही हैं जब अमेरिका का नैतिक और आत्मिक रूप से पतन हो रहा है। शैतान की ताकत और दुष्टता हमारे देश में राज्य कर रही है और बैपटिस्ट चर्च अपनी रात्रि कालीन आराधनायें बंद कर चुके है ताकि लोग रविवार रात को टी वी पर फिजूल की बातें देखे और जल्द सोने चले जायें! सचमुच प्रभु हमारी सहायता करे! प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में सात चर्च पूर्णत: मुस्लिमों द्वारा नष्ट कर दिये गये थे। मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा अगर मुस्लिम यहां आयें और हमारे सभी बैपटिस्ट चर्चेस को भी उसी प्रकार नष्ट कर देंवे! उन्हें रोकने का क्या उपाय है? जो लोग रविवार रात्रि को चर्च जाने के लिये इतने सुस्त हो जाते हैं वे आक्रमणकारियों को नहीं रोक सकेंगे! कैसे रोक सकते हैं?

शैतानी ताकतों ने अमेरिका और यूरोप की गर्दन दबोच कर रखी है! वे हमारे चर्चेस को निष्क्रिय बनाने पर तुले हुये हैं! २ रा तीमुथियुस ३:१−५ में अंत के दिनों के मसीही लोगों का वर्णन है उनमें इस प्रकार के अवगुण पनप जायेंगे।

''पर यह जान रख‚ कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे। क्योंकि मनुष्य अपस्वार्थी‚ लोभी‚ डींगमार‚ अभिमानी‚ निन्दक‚ माता पिता की आज्ञा टालने वाले‚ कृतघ्न‚ अपवित्र। दयारिहत‚ क्षमारिहत‚ दोष लगाने वाले‚ असंयमी‚ कठोर‚ भले के बैरी। विश्वासघाती‚ ढीठ‚ घमण्डी‚ और परमेश्वर के नहीं वरन सुखविलास ही के चाहने वाले होंगे। वे भक्ति का भेष तो धरेंगे‚ पर उस की शक्ति को न मानेंगे ऐसों से परे रहना।'' (२ रा तीमुथियुस ३:१−५)

यीशु के शिष्य कहलाने वाले कुछ तथाकथित ''क्रिश्चियंस'' अमेरिका एवं पश्चिम की नैतिक बनावट को खोखला कर रहे हैं। वे बागी‚ अहसानफरामोश और अपवित्र हैं। उनके भीतर ईश्वर की सच्ची सामर्थ नहीं बल्कि ओढी हुई क्रिश्चियनिटी है।

२ रा तीमुथियुस ३:१२−१३ को जरा सुनिये।

''पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे। और दुष्ट‚ और बहकाने वाले धोखा देते हुए और धोखा खाते हुए बिगड़ते चले जाएंगे''। (२ रा तीमुथियुस ३:१२‚ १३)

ऐसे लोगों के हृदय परिवर्तन के लिये मसीह की सामर्थ लेकर हम चर्च में प्रयास करते हैं! अपने बलबूते पर हम यह कैसे कर सकते हैं! यह मनुष्य की ताकत से परे बात है कि हम किसी का हृदय परिवर्तन करें! हम अपने दिल से जतन करते हैं कि वे चर्च आयें − लेकिन उनके मन विडियो गेम्स और विचित्र फिल्में देखकर ऐसे सुन्न हो गये हैं कि प्रारंभ में जब वे चर्च आये तो मेरे संदेश के समय वे निगाह भी नहीं उठा पाये। वे सिर्फ अपने हाथों को खालीपन से घूरते रहते थे। उनकी उंगलियां फडकती रहती थी क्योंकि उनके पास खेलने को सेल फोन नहीं! एच जी वेल्स की ''टाईम मशीन'' के मर्लोक की तरह उनके दिमाग खाली हैं। देर रात टीवी पर देखे जाने वाले जोंबीज की तरह उनके दिमाग भी जोंबीज बन गये हैं!

अब लूका का अध्याय ४:१८−१९ निकाल लीजिये। आज के युवा जो पाप में पडे हैं उन्हें इस दलदल से निकालने के लिये ही तो यीशु इस धरती पर आये। यहां मैं बाइबल में से पढूंगा। यीशु ने कहा‚

''कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है‚ इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है‚ और मुझे इसलिये भेजा है‚ कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं। और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूं।'' (लूका ४:१८‚ १९)

यीशु युवाओं के लिये यही सब काम आज करना चाहते हैं। किंतु शैतान की ताकत इतनी प्रबल है कि यीशु का बचाने वाला अनुग्रह उन तक नहीं पहुंच पाता। हमें परमेश्वर की उपस्थिति की सामर्थ को प्राप्त करना होगा तभी हमारा बचाव हो पायेगा! नहीं तो हम एक के बाद एक व्यक्तियों से भरे वाहन चर्च में लेकर आते रहेंगे − लेकिन कुछ को ही बचाने वाली सामर्थ का अनुभव हो पायेगा! कुछ की ही आत्मा उद्वार प्राप्त कर पायेगी − जब तक शैतान से बढकर‚ ईश्वर की सामर्थ‚ हमारे चर्च में न भेजी जाये!

इसलिये उपवास और प्रार्थना की आवश्यकता है! मरकुस अध्याय नौ में यीशु के शिष्य कुछ भी नहीं कर पाये थे। बालक दुष्टात्मा से जकडा हुआ था − जैसे हम कुछ बच्चों को चर्च में सुसमाचार सुनाने के उददेश्य से लेकर आते हैं। बालक दुष्टात्मा से जकडा हुआ था। बाइबल कहती है हरेक भटका हुआ युवा जिसकी आत्मा को बचाने के लिये हम चर्च में लेकर आते हैं − उनमें से हरेक किसी स्तर तक शैतान द्वारा अंधा किया जाता है व नियंत्रित होता है − ''आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है'' (इफिसियों २:२) । मरकुस ९ का जवान भी दुष्टात्मा से ग्रसित था। चेलों में ईश्वरीय सामर्थ की कमी थी। मरकुस ९:२८‚२९ अध्याय निकाल लीजिये और इन दो पदों को खडे होकर उंची आवाज में पढिये।

''जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, हम उसे क्यों न निकाल सके? उस ने उन से कहा, कि यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती'' (मरकुस ९: २८‚२९)

अब आप बैठ सकते हैं। (शैतान की) यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से निकल नहीं सकती''

मैं इस बात से सहमत हूं कि हम बहुत से जवान लोगों को प्रार्थना द्वारा बचा नहीं सकते। कारण कि ''यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपवास के निकल नहीं सकती।'' आप पूर्ण रूप से निंश्चित हो सकते हैं कि इस पद में ''और उपवास'' शब्द यूनानी हस्तलिपि में प्रयुक्त हुआ है। कितु उस प्राचीन समय के दुष्टात्मा ग्रस्त आस्तिक भिक्षुकों ने इन दो शब्दों को हटा दिया था। आधुनिक चर्च भी आधुनिक बाइबल का उपयोग करते हैं जिसमें ये दो शब्द नहीं मिलते हैं। क्यों? अंत समय में शैतान इन जवान बच्चों को ईश्वर की सामर्थ पाने से वंचित करना चाहता है − यही कारण है!

''यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपवास के निकल नहीं सकती।'' (मरकुस ९:२९)

अब आप बैठ सकते हैं।

आमीन! इसलिये हमें उपवास रखना और प्रार्थना करना है! मसीह की सामर्थ पाने का यही रास्ता है! भटके हुये लोगों को परिवर्तित करने का यही उपाय है। परमेश्वर की सामर्थ और अनुग्रह को खोलने का यही तरीका है! शैतान और उसकी दुष्टात्मा की सेना पर विजय पाने का यही रास्ता है!

''यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपवास के निकल नहीं सकती!!''

हाल्लेलुयाह! परमेश्वर ने हमें शैतान को पराजित करने के लिये एक तलवार दी है। और यह तलवार ''उपवास और प्रार्थना'' है। अब यशायाह ५८:६ निकालिये।

''जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूं वह क्या यह नहीं, कि अन्याय से बनाए हुए दासों, और अन्धेर सहने वालों का जुआ तोड़कर उन को छुड़ा लेना, और, सब जुओं को टूकड़े टूकड़े कर देना?'' (यशायाह ५८:६)

अब आप बैठ सकते हैं। यह पद बतलाता है कि परमेश्वर ने उपवास को चुना है जिसके द्वारा भटके हुये पापी सामर्थ पाते हैं। उपवास और प्रार्थना दुष्टता के बंधन को खोल देते हैं, भारी बोझ को हल्का बना देते हैं − कुचले हुये को मुक्त कर देते हैं − और हर शैतानी बंधन को तोड देते हैं! यह उपवास और प्रार्थना ही तो है जो मसीह के गुणों को शैतान द्वारा अंधे किये गये और कुचले लोगों तक पहुंचाते हैं! यीशु के ये वचन थे,

''कि प्रभु का आत्मा मुझ पर है‚ इसलिये कि उस ने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है‚ और मुझे इसलिये भेजा है‚ कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं। और प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष का प्रचार करूं।'' (लूका ४:१८‚ १९)

अत: उपवास और प्रार्थना के द्वारा मसीह के गुणों को शैतान द्वारा नियंत्रित पापियों से परिचित करवाया जाता है!

आर्थर वालिस ने कहा था, ''परमेश्वर ने यशायाह के द्वारा प्रगट किया है कि उपवास का स्वभाव छुटकारा (देना) होता है.......अलौकिक क्षेत्र में निश्चित यह उपयोगी सिद्व होता है। मनुष्य किसी लोहे या स्टील की जंजीरों से पकडा हुआ नहीं है पर ये जंजीरे अदृश्य बुराई की जंजीरें हैं। (जो उपवास करते हैं) वे सामाजिक शोषण से नहीं पर शैतान के शोषण से लडते हैं.......हमारी विवेकपूर्ण दृष्टि यह पहचानती है कि कई लोग जो हमको राह में मिले थे, वे दुष्टात्मा से कुचले हुये, शैतान से ग्रसित थे, ऐसी ताकतों में बंधे थे जिसे वे पहचानते नहीं थे और इसलिये कैसे इससे मुक्त हों यह भी नहीं जानते। (गाड चोजन फास्ट‚ पेज ६३‚ ६४) जो शैतान की जकडन में हैं उपवास और प्रार्थना उनके बंधन को तोडने में बहुत सहायक सिद्व होते हैं। उपवास एक ताकतवार हथियार है जिसे परमेश्वर ने लोगों के मन पर पडे कडेपन के आवरण को तोडने के लिये ठहराया है।

जब हम प्रार्थना करते हैं हमें यह मांगना चाहिये कि लोगों को उनके बुरे कर्मो का गहरा अहसास हो। लोग स्वाभाविक रूप से कभी अपने पाप के प्रति गहरे बोध से नहीं भरते। स्वभावगत: लोग स्वयं को हमेशा ठीक ही ठहराते हैं। ऐसे में पवित्र आत्मा का कार्य आवश्यक होता है। जब पवित्र आत्मा का कार्य जीवन में होता है लोगों को अपने बुरे कर्मो से नफरत हो जाती है और वे ऐसे पापों का परित्याग कर देते हैं। अपने पापी हृदय का अहसास उन्हें हो जाता है। जो लोग ''अपनी आत्मा के बचाये जाने के'' तरीके सीख रहे हैं उन्हें अपने पाप और बागी मन के स्वामी होने का गहरा अहसास होना चाहिये। उपवास और प्रार्थना से यह अहसास मन को कचोटता है। अपने बुरे कर्मो के बोध हुये बिना मसीह का सुसमाचार भी उनके लिये उपयोगी नहीं है। मैं अपने ''चर्च के बच्चों में'' यही गलती पाता हूं। मैंने पिछली रात उनको गिना था। बहुत थोडे ही बच्चे यीशु के अनुयायी हैं। दूसरों को उनके संसारी होने और अपने पाप के प्रति कोई बोध ही नहीं उपजा है। हमें परमेश्वर से उपवासरत रहकर प्रार्थना करना चाहिये कि उनके मनों को तोडें और मसीह के नम्र चेले बनायें!

केवल परमेश्वर का आत्मा लोगों से प्रायश्चित करवा सकता है। उपवास और प्रार्थपा से अक्सर मूर्ख प्राणी अपने पापों को धोने के लिये मसीह के रक्त की आवश्यकता को महसूस करते हैं ताकि पाप से करने वाले परमेश्वर की में शुद्व कहला सकें। उपवास और प्रार्थना ये दो हथियार परमेश्वर ने हमें सौंपे हैं कि हम इनके द्वारा पवित्र आत्मा से मांगे कि वह हमारे मध्य में ईश्वर के प्रति कठोर मन रखने वाले लोगों के भीतर कार्य करे!

डॉ जोन आर राइस ने कहा था‚ ''एक समय ऐसा आता है जब हमें सारी दुनिया से मुंह फेरकर परमेश्वर को खोजना आवश्यक हो जाता है। उन्हीं क्षणों में उपवास और प्रार्थना करना चाहिये'' (प्रेयर: आस्किंग एंड रिसीविंग‚ पेज २१६) मेरे विचार से जो उद्वार को पा चुके हैं वे इस बात को समझते हैं कि हमें हमारे चर्च में और अधिक पवित्र आत्मा की आवश्यकता है। जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमें उसकी उपस्थिति चाहिये। हमारी इच्छा है कि वह हमें बताये कि वह हमारे जीवनों में क्या करना चाहता है। हम चाहते हैं कि वह पास्टर को बताये कि क्या संदेश दिया जाये। हमें वह प्रार्थना योद्वा बनाये। पवित्र आत्मा की उपस्थिति में हम भटके हुये लोगों को लेकर आयें और जब उनका मन परिवर्तित हो जायें तब हम उन्हें संभाल सकें। हम चाहते हैं कि लंबे समय से जो आत्मिक जाग्रति नहीं हुई है पवित्र आत्मा उसे संभव करे। हमें स्वयं के लिये पवित्र आत्मा चाहिये कि वह हमें झुकाये‚ टूटने दे और उसकी इच्छानुसार ढल जाने दें। हम अक्सर गाते हैं‚

जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है
मुझे पिघला दीजिये‚ ढाल दीजिये‚ तोड दीजिये झुका दीजिये।
जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है
   (''जीवित परमेश्वर की आत्मा''‚ डैनियल इवरसंस‚ १८९९−१९७७;
      द्वारा बदला गया)

जब हम उपवास और प्रार्थना करते हैं तब यह छोटा गीत एक सच्ची प्रार्थना बन जायेगा। आप जो आत्मिक मसीही हैं इसे समझते होंगे कि परमेश्वर के आत्मा के नीचे उतर आने की आवश्यकता है ताकि संसारी जवान बच्चों के मन को बदल दें चाहे वे हमारे चर्च के संसारी बच्चे या बाहरी दुनिया के चर्च के बच्चे हों। इसलिये मैं आप से कहता हूं कि अगला शनिवार उपवास व प्रार्थना के लिये के लिये अलग रख लीजिये तत्पश्चात हम चर्च में प्रार्थना सभा के लिये संध्या ५:३० बजे एकत्रित होंगे। प्रार्थना सभा के बाद हम हल्का भोजन लेंगे। अगली शनिवार की रात संदेश नहीं होगा मात्र प्रार्थना होगी। हमने सुसमाचार प्रचार बहुत कर लिया है − लेकिन उसकी तुलना में अभी हमें फल प्राप्त नहीं हुआ है। पोल जी कुक ने अपनी पुस्तक फायर फ्राम हैवन‚ में कहा है‚ ''सुसमाचार प्रचार अकेले इतने स्थायी परिणाम नहीं दे सकता जब तक कि इसके साथ पवित्र आत्मा की गतिशीलता नहीं बनी हुई हो'' (पेज १०८) उन्होंने कहा था कि प्रारंभिक मैथोडिस्ट ''यह बात जानते थे कि उनके चर्चेस की समृद्धि और आशीष परमेश्वर के उनके यहां उतर आने पर निर्भर करती थी।'' उनका कहना था‚ ''ये साधारण विश्वास वाले पुरूष और महिला उनके मध्य में परमेश्वर के अदभुत कार्यो की बाट जोहते रहते थे। उनका विश्वास था कि जब तक परमेश्वर कार्य न करे तब तक उसके नाम में हम कुछ भी प्राप्त करने में असफल ही होंगे। मैथोडिस्टों की गंभीरता पूर्वक प्रार्थना के पीछे भी यही विश्वास छिपा है।'' (पेज १०५) । ''उनका मानना यह भी था कि चर्च की बढोतरी परमेश्वर के अनुग्रह और सामर्थ से होती है। इसीलिये वे अधिकाधिक प्रार्थना में लीन रहते थे।'' (पेज २८)

आइये उपवास और प्रार्थना में लीन हो जायें कि हमारे चर्च के संसारी युवा और बच्चों के मन परिवर्तित होने पायें इसके साथ ही अन्य चर्च के संसारी बच्चे भी हमारी प्रार्थना में जोड लिये गये हैं। अगर आप को अपने स्वास्थ्य संबंधी कोई संशय है कि आप उपवास रख सकते हैं या नहीं तो आप डॉ चान अथवा डॉ जूडिथ कैगन से पहले संपर्क कर सकते हैं। वे आप को बतायेंगे कि आप का स्वास्थ्य उपवास रखने की इजाजत देता है कि नहीं। अगर आप को चाय या काँफी पीने की आदत है तो आप एक या दो कप पी सकते हैं ताकि आप को सिरदर्द न हो। बाकि समय केवल पानी पियें। अगर आप कार्यरत हैं तो पूरे दिन भर अधिक पानी पीजिये। एक घंटे में एक गिलास पानी। आइये खडे होकर गीत संख्या ६ का गीत गायें।

जब हम प्रभु के साथ उसके वचन के प्रकाश चलते हैं‚
   कैसे अपनी आभा वह हम पर बिखराता है!
जब हम उसकी सदइच्छानुसार चलते हैं वह हमारे साथ बना रहता है‚
   सबके साथ रहेगा जो करते हैं उस पर विश्वास।
विश्वास और आज्ञा मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है
   मसीह में प्रसन्न रहें‚ विश्वास रखने व आज्ञा मानने से।

किंतु उसके प्रेम का आनंद तब तक नहीं ले सकते
   जब तक वेदी पर अपना सर्वस्व न रख दें;
किंत उसका प्रोत्साहन और आनंद उन्हीं पर बरसता है‚
   जो रखते हैं विश्वास और मानते आज्ञा उसी की।
विश्वास और आज्ञा मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है
   मसीह में प्रसन्न रहें‚ विश्वास रखने व आज्ञा मानने से।

उसके चरणों में मिलती हमको मधुर संगति
   तब हम उसके साथ चलना आरंभ करते हैं:
जो वह कहेगा हम करना आरंभ करेंगे‚ जायेंगे वहां जहां वह भेजेगा;
   डरना नहीं‚ केवल विश्वास और आज्ञा मानें।
विश्वास और आज्ञा मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है
   मसीह में प्रसन्न रहें‚ विश्वास रखने व आज्ञा मानने से।
(''विश्वास और आज्ञा मानें'' जोन एच सैमिस‚ १८४६−१९१९)

अपने साथ आज की रात यह संदेश ले जायें। अगले सप्ताह हर रात सोने से पहले इसे पढें। सोने से पहले प्रार्थना के समय कोरस या गीत गायें। शनिवार की रात भी इसे पढें और दिन में जब उपवास रखते हैं तो इन गीतों को गायें‚

जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है
मुझे पिघला दीजिये‚ ढाल दीजिये‚ तोड दीजिये‚ झुका दीजिये।
जीवित परमेश्वर की आत्मा‚ नीचे उतर आइये‚ हम प्रार्थना करते है।

अगर आप अभी तक बचाये नहीं गये हैं‚ तो प्रायश्चित करें और यीशु पर विश्वास लायें। उसका रक्त आप को सब पापों से धोकर रख देगा। उसका मरे हुओं में से जी उठना आपको अनंत जीवन देगा। उस पर विश्वास रखो तो वह तुम्हें पाप और आने वाले न्याय से बचायेगा। आमीन।


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र पढ़ा गया: मत्ती १७:१४−२१
संदेश के पूर्व बैंजमिन किंकेड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
''कम माय सोल, दाय सूट प्रीपेअर'' (द्वारा जोन न्यूटन, १७२५−१८०७)