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जब कभी आप डॉ हिमर्स को लिखें तो अवश्य बतायें कि आप किस देश में रहते हैं। अन्यथा वह आप को उत्तर नहीं दे पायेंगे। डॉ हिमर्स का ईमेल है rlhymersjr@sbcglobal.net.




द्वंद का जीवन

A LIFE OF CONFLICT
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, ३ अप्रैल, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में किया गया प्रचार संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles Lord’s Day Evening, April 3, 2016

''क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२)


द्वंद का जीवन

A LIFE OF CONFLICT
(Hindi)

डॉ आर एल हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, ३ अप्रैल, २०१६ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल
में किया गया प्रचार संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles Lord’s Day Evening, April 3, 2016

''क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२)

आज सुबह हमारा समय बहुत अच्छा व्यतीत हुआ। चर्च में पुन जीवन का संचार हो रहा है। पर इसका एक गंभीर पहलू भी है। हम को तब तक विजय नहीं मिलेगी, जब तक हम यह नहीं जानेंगे कि गंभीर होना क्या हैं और खुश होना क्या है।

डॉ हैनरी एम मोरिस ने कहा, ''कि अदृश्य वस्तुओं पर से जब थोडा परदा हटता है तो यह हमें संक्षिप्त झलक दिखाता है कि परमेश्वर के लोगों को एक प्रभावशाली आध्यात्मिक शक्ति उन्हें घेरे रखती है। परमेश्वर की सृष्टि स्वर्गदूतों की सेना के रूप में प्रगट होती है परमेश्वर ने 'लाखों स्वर्गदूतों की सेना का निर्माण किया है' (इब्रानियों १२:२२) और इन निर्मित आत्माओं में से कम से कम एक तिहाई शैतान के साथ है जो परमेश्वर और उनके लोगों के विरूद्व लंबे समय से युद्वरत है (प्रकाशितवाक्य १२:४) ये (नारकीय ताकतें) संगठित होकर ताकत के बल पर इस संसार में अंधकार का शासक बन बैठती हैं'' (हैनरी एम मोरिस, पीएचडी, दि न्यू स्टडी डिफेंडर बाइबल, वर्ड पब्लिशर्स २००६; इफिसियों ६:१२ पर व्याख्या)।

''क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२)

यह पद बताता है कि मसीही जीवन द्वंद का जीवन है। पर अनेक मसीही इस बात को भूल चुके हैं और हमारे चर्च में भी कुछ हैं, जो इसे भूले हुये हैं। डॉ मार्टिन ल्योड जोंस ने कहा, ''मसीही जीवन को हम कितना एक युद्व या संग्राम के समान समझते हैं?'' ..........मेरी सलाह है कि मसीही चर्च ने नये नियम के गहन सत्य का दर्शन खो दिया है......मुझे डर है कि (हममें में से अनेक) मसीहियों ने मसीही जीवन द्वंद का जीवन है ऐसा दर्शन खो दिया है...... अगर हम लडते नहीं हैं तो हम नष्ट (हार जायेंगे) हो जायेंगे हम शत्रु के अधीन होकर रह जायेंगे'' (मार्टिन ल्योड जोंस, दि मिरेकल ऑफ ग्रेस एंड अदर मैसेजस, बेकर बुक हाउस, १९८६, पेज १०५, १०६)

हमारी एक प्रव्रति है कि हम सोचते हैं कि परिवर्तन ही सब कुछ है। हम सोचते हैं कि परिवर्तन के बाद मसीही जीवन ''एक निष्क्रिय और आराम की अवस्था'' है – जैसा डॉ मार्टिन ल्योड जोंस ने कहा (उक्त संदर्भित पेज १०५) । सत्य से बढकर कुछ भी नहीं! बाइबल बताती है कि हम सतत शैतान और उसकी सेना के साथ संघर्षरत हैं।

कभी कभी मैं प्रसन्न होता हूं कि मैं संसार से मन फेरकर परिवर्तित हो गया। बच्चे जो चर्च में बडे हुये उन्हें यह बहुत आसान प्रतीत होता है। हर वस्तु उन्हें तैयार मिली है। उन्हें संघर्ष नहीं करना पडता है कि चर्च में अपना स्थान बनाये। अगर मैं चर्च में ही बडा होता तो मैं अपने उपर इतनी निगरानी नहीं रख पाता कि मैं इतने खतरनाक द्वंद में से होकर गुजर रहा था − और अकेले इस संघर्ष का सामना करने के लिये मैं अपने आप को बहुत ही कमजोर पाता! इसीलिये मेरे जीवन का पद अति शीघ्र मेरे उपर लागू हो गया कि, ''जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' (फिलिप्पियों ४:१३) इस पद के द्वारा मैं यह समझता था कि मैं शैतान के साथ अपने संघर्ष, लडाई व युद्व में बेहद कमजोर हूं। केवल मसीह मुझे लडाई के लिये ताकत देता है कि मैं दूसरी लडाई को भी लडूं। किसी ने मुझसे कहा कि मैं स्वयं लडाई को आमंत्रण देता हूं। पर यह सच नहीं है। सच यह हैं कि मैं अन्य प्रचारकों के समान भागता नहीं हूं। और स्वाभाविक है कि जब मैं भागता नहीं हूं तो मैं अनेक संघर्षो से होकर गुजरता हूं। क्यों? क्योंकि शैतान वास्तविक रूप में उपस्थित है! कई बार मैं इतना कमजोर और असहाय हो जाता हूं कि लगभग असफल होने की कगार तक आ जाता हूं। उस समय मैं केवल यह पद बुदबुदाता हूं और अपने कमजोर व दुर्बल विश्वास के साथ ही बाइबल के इस पद से चिपका रहता हूं, ''जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं'' केवल मेरे जैसा कमजोर व्यक्ति ही इस पद की कीमत को जान सकता है!

लेसली ने मुझसे मेरे जीवन का वृत्तांत लिखने का आग्रह किया था। मैंने १५० पेज लिखे − तब मैं रूक गया और इसे एक तरफ रख दिया। मैंने सोचा कि कोई इसे पढने में रूचि नहीं रखेगा क्योंकि उन्हें यह निराशाजनक पुस्तक लगेगी − क्योंकि इसमें द्वंद की कहानी मिलेगी कितने मानसिक युद्व का वर्णन होगा और लगभग हार जाने की स्थिति आयेगी − जीवन के लंबे समय तक किये मेरे संघर्ष की कहानी होगी जिसमें बहुत ही कम अच्छे समय का वर्णन मिलेगा! मैने परमेश्वर से कहा यह पुस्तक तब तक पूरी नहीं होगी जब तक हमारे चर्च में आत्मिक जागरण नहीं आयेगा − इसलिये अंतत: पुस्तक का अंत तो सुखद ही होगा। ऐसा लगता है परमेश्वर मुझसे कह रहें हो, ''ठीक है राबर्ट इसे एक तरफ रख दो और आत्मिक जागरण आने का इंतजार करो और अगर मैं इसे नहीं भेजता हूं तो तुम्हें इसे समाप्त करने की भी जरूरत नहीं है।''

पर मैं कभी कभी खुश होता हूं कि मैं एक सुसमाचार प्रचार करने वाले चर्च में बडा नहीं हुआ। एक खोये हुये, सुनसान संसार से निकल कर आने के कारण मैं इस योग्य बन पाया कि लंबे समय तक संघर्ष में टिक पाउं। क्योंकि मैं प्रारंभ से यह बात जानता था कि एक मसीही होने का जीवन मेरे लिये बहुत कडी परीक्षा होगी और हर एक कदम जो मैंने उठाया वह केवल मसीह की दी हुई ताकत से उठाया है अन्यथा मैं कब का भटक गया होता! इसलिये मैं पास्टर बन गया। जब मेरा मन परिवर्तित हुआ मैंने सोचा कि मुझे इस संघर्ष में निरंतर बने रहना होगा। अगर मैं लगातार आत्मा में संघर्ष रत नहीं रहूंगा तो मैं परमेश्वर से दूर चला जाउंगा। जब मैं बीस साल का था तब ही से मैंने इसे जान लिया था। दूसरे आरामदायक जीवन जीते रहें पर मुझे तो लगातार आत्मा में संघर्षरत रहना था − यीशु के समान, पौलुस के समान और इब्रानियों में वर्णित विश्वास के अन्य पहरेदारों के समान! मैं जानता हूं कि पौलुस का क्या तात्पर्य था जब उसने जवान तिमोथियुस को यह कहा,

''विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़ और उस अनन्त जीवन को धर ले, जिस के लिये तू बुलाया गया, और बहुत गवाहों के साम्हने अच्छा अंगीकार किया था'' (१ तिमोथियुस ६:१२)

और फिर प्रेरित पौलुस उस जवान से कहते हैं,

''मसीह यीशु के अच्छे योद्धा की नाईं मेरे साथ दुख उठा'' (२ तिमोथियुस २:३)

मुझे कठिन जीवन सहन करना पडा। मुझे विश्वास की अच्छी लडाई लडना पडी − मसीह यीशु के एक सैनिक के रूप में! इसके अतिरिक्त मसीही जीवन में सफल होने का कोई अन्य तरीका नहीं था। अधिकतर समय हम बाइबल के ढंग से सोचने के स्थान पर मनोवैज्ञानिक ढंग से सोचते हैं। अगर हम बाइबल से समझेंगे तो जान पायेंगे कि हमें आत्मा में लडने की आवश्यकता क्यों है।

एक रात हमारे एक जवानों में से एक मुझसे बोला कि आप अपने बारे में अधिक बात करते हैं। फिर उसने कहा, ''शायद आप अपने बारे में इसलिये अधिक बताते हैं क्योंकि यह जवान लोगो का चर्च है।'' सच में उसने यह समझदारी की बात कही। मैं अक्सर अपने जवानी के दिनों में लौट जाता हूं ताकि अपने अनुभव से चर्च के जवानों को कुछ सीख दे सकूं। मैं पुल्पिट पर खडे होकर धर्मविज्ञान पर व्याख्यान नहीं देता − या एक दो पदों को लेकर व्याख्या नहीं करता। मैं यह दिखाता हूं कि धर्मशास्त्र मेरे जीवन में कितना स्थान रखते हैं − और आप के जीवन में भी उनका कितना स्थान होना चाहिये। मैं आप के सामने बाइबल का यह पद पढता हूं,

''क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२)

मैं आप को बताता हूं कि इसका तात्पर्य क्या है और फिर मैं आप को बताउंगा कि कैसे यह मेरे जीवन की हकीकत बना। मैं आप से कहता ही हूं, ''कि मसीही जीवन प्रारंभ से अंत तक द्वंद का जीवन है − एक ऐसा आत्मिक युद्व जो शैतान और उसकी सेना के साथ चलता है।'' मैं सोचता हूं कि आप के उद्वार प्राप्त कर लेने के बाद भी आप की परेशानियां समाप्त नहीं हो जाती हैं! यह तो आप के संघर्ष और संग्राम की मात्र शुरूआत है!

लिबर्टी यूनिवर्सिटी के डॉ एच एल विलमिंगटन ने कहा,

पृथ्वी पर यीशु की सेवकाई के समय शैतानी गतिविधियां अपनी चरम सीमा पर थी..........और पौलुस के अनुसार (१ तिमोथियुस ४:१−३) हम हमारे प्रभु के द्वितीय आगमन के समय भी (या पहले) ऐसी ही नारकीय गतिविधियों की अपेक्षा कर सकते हैं। कई प्रसिद्व आंदोलनों के पीछे दुष्टतापूर्ण प्रभाव मौजूद होता है (एच एल विलमिंगटन, डी डी, साइंस ऑफ दि टाईम्स, टिंडैल हाउस पब्लिशर्स, १९८३, पेज ४५)

मुझे संसार भर में दुष्टता पूर्ण गतिविधियां अब अपनी चरमसीमा पर दिखती हैं। जब मैं कालेज में था तब भी बुरा प्रभाव दिखाई पडता तो था। पर अब मैं समझता हूं कि कैसे एक जवान बिना परीक्षा में पडे एक सांसारिक कालेज में प्रवेश ले सकता है जिसे डॉ विलमिंगटन ''शैतानी प्रभाव'' कहते हैं। शैतान का उददेश्य है कि आप को संसारी बना दे और पाप में डूबो दें। ''इसलिये जो समझता है, कि मैं स्थिर हूं, वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़े'' (१ कुरूंथियों १०:१२) अगर हम दुष्ट से नहीं लडेंगे तो हम जल्द ही परमेश्वर से संबंधों में पीछे हटते जायेंगे। अगर आप अपने जीवन में प्रार्थना करने में पीछे हट रहे हैं तो यही वह पहली जगह है जहां आप को स्वयं को जांचना होगा। जैसे आप पहले प्रार्थना करते थे वैसे अगर अब नहीं कर रहे हैं तो निश्चित ही आप किसी प्रलोभन में पडे हुये हैं। डॉ ए डब्ल्यू टोजर को सुनिये, उन्होंने कहा,

पूर्व के दिनों में......... हमारे पूर्वज पाप और शैतान जो एक संयुक्त ताकत हुआ करते थे उसमें विश्वास करते थेI और वे परमेश्वर और उसकी धार्मिकता व स्वर्ग में विश्वास करते थे...... और ये ताकतें बडे गहरे, घोर व कडे रूप में एक दूसरे की विरोधी थी। मनुष्य...... को चुनाव करना होता था − वह निष्क्रिय नहीं हो सकता था। यह चुनाव उसके लिये स्वर्ग या नरक के समान होता था, जीवन या मरण होता था और अगर वह परमेश्वर (की) ओर होने का चुनाव करता था तो उसके शत्रुओं से निश्चित खुला युद्व अपेक्षित होता था। यह युद्व लंबे समय तक चलने वाला होता है मान लीजिये कि जब तक इस धरती पर जीवन है तब तक...... वह कभी नहीं भूल सकता कि किस प्रकार का जीवन उसने धरती पर बिताया − यह युद्व का मैदान था इसमें अनेक लोग घायल हुये और मारे गये...... जब मसीह सुसमाचार के साथ उपस्थित है शैतानी ताकतें भी अपना जोर लगा रही है कि मनुष्य को नष्ट कर दे। मनुष्य को छुटकारा पाने के लिये परमेश्वर पर विश्वास रखकर आज्ञाकारिता के साथ आना ही है। यही हमारे पूर्वजों ने सोचा था, और यही, बाइबल हमें सिखाती है।
     आज का समय कितना अलग है...... मनुष्य संसार को युद्व का मैदान नही परंतु खेल का मैदान समझता है। हम यहां लडने के लिये नहीं परंतु हर्ष उल्लास के लिये (आराम का जीवन जीने आये हैं)....... हम (यही) विश्वास करते हैं यही आधुनिक इंसान (सोचता) है...... यह संसार अब खेल का मैदान है युद्व का नहीं यह विचार बहुत से रूढ़िवादी मसीहियों द्वारा भी अपना लिया गया है (ए डब्ल्यू टोजर, डी डी, ''दिस वल्र्ड प्लेग्राउंड ओर बैटलग्राउंड?'')

अब यह मत सोचियेगा कि इस संसार में हम कोई आनंद ही नहीं उठा सकते हैं! बेशक उठा सकते हैं! हम लोगों के साथ संगति का आनंद उठा सकते हैं! हम भोज और पार्टियों का आनंद उठा सकते हैं! हम पार्क में गेम्स खेल सकते हैं! ये सब गतिविधियां तो चलती रहेगी लेकिन अंत इनमें नहीं है इस सब के पीछे भी स्मरण रखने वाली बात है कि एक आत्मिक युद्व हमेशा जारी है − मसीही जीवन द्वंद और संघर्ष का जीवन है! हम आनंद उठाने के लिये कुछ समय ले सकते है लेकिन हमें फिर युद्व के मैदान में लौट जाना है।

इसलिये हमारे चर्च के जवान लडके हर सप्ताह प्रार्थना में एक साथ एक घंटा बिताते हैं। प्रार्थना बहुत आवश्यक है, अन्यथा शैतान हमें हरा देगा!

इसलिये हम बाहर जाकर भटके हुये लोगों को लेकर आते हैं कि चर्च में उन्हें सुसमाचार सुनाये। सुसमाचार सुनाना अति आवश्यक है, नहीं तो शैतान हमें हरा देगा!

इसलिये मैं पुल्पिट से सामर्थवान संदेश सुनाता हूं क्योंकि शक्तिशाली प्रचार करना अति आवश्यक है, नहीं तो शैतान हमें हरा देगा!

एक बात और है। अभी मैं, अपने संदेश में, अपनी एक कमजोरी से भी रूबरू हुआ हूं, इसके लिये मै आपसे क्षमाप्रार्थी हूं कि मुझे अपनी कमी पहले नहीं पता चल पाई! जैसा मैंने पहले कहा, कि मसीही जीवन में मन परिवर्तन के पश्चात राह आसान नहीं है आत्मा में संघर्ष जारी ही रहता है! सचमुच! मन परिवर्तन के साथ एक युद्व का युग भी प्रारंभ होता है! यीशु कहते हैं, ''जागते और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, पर शरीर दुर्बल है'' (मरकुस १४:३८) । आप चर्च आते हैं आप का मन परिवर्तन होता है आप को उद्वार प्राप्त हो जाता है लेकिन आप अगर प्रार्थना का जीवन व्यतीत नहीं करते हैं, तो आप जल्द ही परीक्षा और शैतान के दुष्चक्र में फंस सकते हैं। आप पुन संसारी बन बैठेंगे और उद्वार का आनंद खो देंगे।

आप में से बहुत से लोग अब गुरूवार रात्रि की प्रार्थना सभा में नहीं आते। सतर्क हो जाइये! आप पहले ही संसारीपन की तरफ एक कदम उठा चुके है! मसीही जीवन जीना इस संसार के साथ एक संघर्ष है, इस देह के साथ एक द्वंद है और शैतान से निरंतर युद्वरत रहने की स्थिति है। इस सत्य से भटके तो शैतान के जाल में फंसे और फिर − आप कब इस संसार के दुष्चक्र में फंसते जायेंगे आप स्वयं ही नहीं जान पायेंगे। कोई कहता है, ''इतना कडवा सत्य मत बोलिये! मत सुनाइये! लोग डर जायेंगे! तो मैं कहता हूं अच्छा है उन्हें डर जाने दीजिये!'' ''बुलाये हुये थोडे हैं, चुने हुये कम हैं'' (मत्ती २२:१४) अगर मैं उन्हें नही डराउंगा, तो संसार की अन्य बातें उन्हें डरायेगीं! मैं संदेश में ऐसी बातें कहूं अथवा न कहूं लेकिन जो चुने हुये हैं वही बचाये जायेंगे!

हमारे चर्च के विभाजन में कई लोग फिसल गये इससे हमारे चर्च जीवन पर गहरा असर पडा था। जैसा उन लोगों ने धोखा खाया, वैसा आप मत खाइये। कुछ भी नहीं बदला है! ''शैतान बड़े क्रोध के साथ तुम्हारे पास उतर आया है; क्योंकि जानता है, कि उसका थोड़ा ही समय और बाकी है'' (प्रकाशितवाक्य १२:१२) जब संसार की तरफ आप का झुकाव अधिक होगा तो शैतान आप के विवेक को अधिक दुख पहुंचायेगा। तब हमारा कहना भी आप को लौटा कर नहीं लायेगा! हमने उस संसार से कोई लौट आया हो ऐसा एक भी जन नहीं देखा! एक भी नही! इसलिये कहा है ''जागते और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, पर शरीर दुर्बल है'' (मरकुस १४:३८)

इसके साथ ही, या तो आप अनुग्रह में बढ रहे हैं या बुराई करने में! निष्क्रिय अवस्था कोई नहीं होती! जैसा डॉ टोजर ने कहा था ''यह संसार युद्व का मैदान है जहां अनेक लोग घात किये जाते हैं'' (उक्त संदर्भित)

''क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं'' (इफिसियों ६:१२)

हां, यह सच है कि वास्तव में शैतान होता है। अगर आप उद्वार प्राप्त नहीं करते हैं तो वह आप के दिमागों को अजीब विचारों से भर देगा। वह आप को यीशु से बचाने के लिये ''इधर'' या ''उधर'' की बातों से बरगलाता है। वह लोगों के मन में यीशु के प्रति भय भर देता है और लोग उस की बात मान भी लेते हैं – तब यीशु को मानने से इंकार कर देते हैं। क्या आप शैतान की परीक्षा से बचेंगे और यीशु के पास आयेंगे। एकमात्र यीशु ही अपने कीमती रक्त से आप के पापों को धोकर शुद्व कर सकते हैं। एकमात्र यीशु ही, आप को देश और विश्व में व्याप्त बुराई से बचा सकते हैं। कृपया, खडे हो जाइये और गीत संख्या निकालकर गाइये।

मसीहियों, क्या आप उन्हें पवित्र भूमि पर देखते हो,
   कैसे अंधकार की ताकतों ने आप को घेरे रखा है?
मसीहियों, उठो उन पर प्रहार करो, नुकसान को लाभ मानो,
   उस ताकत को ले लो जो क्रूस से मिलती है।
आगे बढो, मसीही सैनिको, यह आत्मिक युद्व है,
   यीशु ने क्रूस स्वीकार कर हमसे पहले इसे लडा।

मसीहियों, क्या आप उन्हें आप के भीतर काम करता हुआ पाते हैं,
   प्रयासरत, लुभाते, उकसाते हुआ पाते हैं पाप के लिये?
मसीहियों कभी न कांपों; न हताश महसूस करो,
   सशक्त बनो युद्व के लिये, प्रार्थना और उपवास करते रहो।
आगे बढो, मसीही सैनिको, यह आत्मिक युद्व है,
   यीशु ने क्रूस स्वीकार कर हमसे पहले इसे लडा।

मसीहियों, क्या आप लुभावना कहता हुआ पाते हैं,
   ''सदैव सतर्क रहो उपवास रखो जागते रहो प्रार्थना करो''
मसीहियों, निडर हो उत्तर दो, ''हर सांस के साथ प्रार्थना करता हूं''
   युद्व के बाद शांति, रात के बाद दिन होगा।
आगे बढो, मसीही सैनिको, यह आत्मिक युद्व है,
   यीशु ने क्रूस स्वीकार कर हमसे पहले इसे लडा।

''मैं जानता हूं सचमुच मेरे सेवक मुश्किलें हैं।
   आप थक गये होंगे; मैं भी थक गया था।
पर यह परिश्रम किसी दिन आप को पूर्ण रूप से मेरा बना देगा,
   मेरे सिंहासन के निकट आप के दुखों का अंत हो जायेगा''
आगे बढो, मसीही सैनिको, यह आत्मिक युद्व है,
   यीशु ने क्रूस स्वीकार कर हमसे पहले इसे लडा।
(''मसीहियों, क्या आप उन्हें देखते हो?'' अनुवादित द्वारा जोन
   एम नील १८१८−१८६६ ''आगे बढो, मसीही सैनिको,'' से साभार)


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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा धर्मशास्त्र पढ़ा गया: इफिसियों ६:१०−१८
संदेश के पूर्व बैंजमिन किंकेड ग्रिफिथ ने एकल गान गाया गया:
''सोल्जर्स ओफ क्राइस्ट अराइज'' (चाल्र्स वैस्ली, १७०७−१७८८;
''क्राउन हिम विथ मैनी क्राउंस की धुन से'')