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पुर्नजागरण की छ: आधुनिक गलतियां

(पुर्नजागरण पर संदेश १५)
SIX MODERN ERRORS ABOUT REVIVAL
(SERMON NUMBER 15 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, १६ नवंबर, २०१२ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, November 16, 2014


आज की रात मेरा विषय है ''पुर्नजागरण की छ: आधुनिक गलतियां।'' मैं वर्ष १९६१ में पुर्नजागरण में रूचि रखने लगा था। मैंने प्रथम विशाल जागरण के संबंध में बॉयोला के बुक रूम से एक छोटी सी पुस्तक खरीदी। इसमें जॉन वेस्ली के जर्नल के अंश छपे हुये थे और यह मूडी प्रेस में छपी थी। मैं पुर्नजागरण के विषय में निरंतर सोच रहा था आज की रात मेरा विषय है ''पुर्नजागरण की छ: आधुनिक गलतियां।'' मैं वर्ष १९६१ में पुर्नजागरण में रूचि रखने लगा था। मैंने प्रथम विशाल जागरण के संबंध में बॉयोला के बुक रूम से एक छोटी सी पुस्तक खरीदी। इसमें जॉन वेस्ली के जर्नल के अंश छपे हुये थे और यह मूडी प्रेस में छपी थी। मैं पुर्नजागरण के विषय में निरंतर सोच रहा था, और इसके लिये प्रार्थना कर रहा था, लगभग तिरपन सालों तक। बैपटिस्ट चर्चेस में कोई सुसमाचारीय सभायें नहीं हुई, न कोई ''करिश्माई'' चंगाई सभायें हुई। इन चर्चेस में जो पुर्नजागरण आया वह बिल्कुल ऐसा ही था जो हम मसीही इतिहास में पढते हैं। मैंने १९६० के अंतिम सालों में और १९७० के प्रारंभिक सालों में परमेश्वर द्वारा भेजे गये ''जीजस मूवमेंट'' नामक पुर्नजागरण को देखा।

इस विषय पर मैं तिरपन सालों तक पढता और सोचता रहा, मैं पुर्नजागरण विषय पर यद्यपि अपना अधिकार नहीं समझता। मैंने पुर्नजागरण से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण सत्यों के बारे में जानना प्रारंभ किया है।

पिछले समय में मैंने जागरण से संबंधी कुछ त्रुटियां की थी। कुछ दो तीन सालों तक मैं चाल्र्स जीफिने के लेखन के कारण भटक गया था। अब भी मैं इस विषय को बिल्कुल ठीक से पूरा नहीं समझ पाया हूं,

''अब हमें दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है'' (१ कुरिन्थियों१३:१२)

किंतु आज की रात मैं आपको पुर्नजागरण के बारे में छ: गलतियां बताउंगा, जिनको मैं अस्वीकार करता हूं। मेरी विनती है कि ये बिंदु आपकी सहायता करेंगे जब आप परमेश्वर से विनती करेंगे कि वह चर्च में पुर्नजागरण भेजे।

१. प्रथम, आज पुर्नजागरण नहीं हो सकता यह मानना गलती है।

मैं इस विषय पर अधिक समय नहीं बिताउंगा, किंतु मुझे यह बताना भी आवश्यक है क्योंकि कई लोग इस भ्रांति पर विश्वास करते हैं। वे ऐसा मानते हैं, ''कि अब तो आत्मिक जागरण के दिन पूरे हुये। हम तो अंतिम दिनों में पहुंच चुके हैं। अब कोई जागरण नहीं हो सकता।'' आज बाईबल पर विश्वास लाने वाले कई मसीही यही सोच रहे हैं।

किंतु तीन कारणों से मैं यह मानता हूं कि उनका ऐसा सोचना गलत है:

(१) बाईबल कहती है, ''क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा।'' (प्रेरितों के कार्य २:३९) पेंतुकुस्त पर जो विशाल पुर्नजागरण हुआ तब प्रेरित पतरस ने कहा था, कि जगत के अंत में भी परमेश्वर का पवित्र आत्मा उडेला जायेगा!

(२) महान क्लेश के समय ही बडा आत्मिक जागरण या परिवर्तन होगा, और ख्रीष्ट विरोधी के, समय उस युग के अंत में ही होगा (प्रकाशित संदर्भ ७:१−१४)

(३) सुदुर पूर्व के संपूर्ण इतिहास में अभी भी, विशाल जागरण चल रहा है, आज की रात भी, चीन गणराज्य के लोग, और तीसरी दुनियां के लोग मन फिरा रहे हैं। आधुनिक समय की विशाल परिवर्तन लाने वाली जाग्रति अभी भी, इस रात, चल रही है!


इसलिये ये सोचना भारी गलती है कि अब परिवर्तन नहीं हो सकते!

२. द्वितीय, यह सोचना गलत है कि जागरण सुसमाचारीय प्रयत्नों से ही आ सकता है।

दक्षिणी बैपटिस्ट और अन्य द्वारा भी ऐसा सोचना गलत है। उन्होंने यह विचार चाल्र्स जी फिने से लिया है। फिने ने कहा था, ''जैसे फसल खुद ब खुद उग आती है वैसे ही परिवर्तन या जागरण अपने आप स्वाभाविक रूप से ही आयेगा'' (सी जी फिने, लेक्चर्स आँन रिवाईवल, रेवेल, एनडीपी ५) कुछ चर्चेस ऐसा विज्ञापन देते हैं और पर्चे बंटवाते हैं कि ''आत्मिक जागरण'' फलां तारीख को हो − फलां तारीख को खत्म होगा! ये शुद्ध रूप से फिनेइज्म है! परिवर्तन या जागरण हमारे सुसमाचारीय प्रयासों और आत्मा को जीतने वाले अभियानों से नहीं आता!

प्रेरितों के कार्य १३:४८−४९ को सुनिये,

''यह सुनकर अन्यजाति आनन्दित हुए, और परमेश्वर के वचन की बड़ाई करने लगे: और जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया। तब प्रभु का वचन उस सारे देश में फैलने लगा।''

मैं सोचता हूं कि ये दो पद बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं कि परिवर्तन हमारी सुसमाचारीय प्रयत्नों पर निर्भर नहीं करता, यद्यपि सुसमाचार ''उस पूरे क्षेत्र में फैल गया'' किंतु केवल उनके लिये ''जो अनंत जीवन पर विश्वास लाने के लिये अभिषिक्त हुये थे।''

हां, हमें यह कहा गया है कि ''तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो'' (मत्ती १६:१५) − किंतु हर प्राणी भी हम जानते हैं कि विश्वास नहीं करेगा! किंतु जब परमेश्वर का आत्मा उतर आता है तो अधिक से अधिक लोग विश्वास करेंगे − किंतु यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि जागृति अकेले सुसमाचारीय प्रयासों से ही नहीं आती।

३. तीसरा, यह सोचना भी गलत है कि मसीहियों के समर्पित होने से ही परिवर्तन आता है।

मैं जानता हूं कि कई लोग २ इतिहास ७:१४ से उद्धरण देने लगेंगे। किंतु आश्चर्य की बात नहीं है कि वे नये नियम से उद्धरण नहीं देते कि पुन: उस सिद्धांत तक लौटे कि पुर्नजागरण का अर्थ है कि ''परमेश्वर के साथ संबंध सुधारना।'' क्यों यह पद, जो राजा सॉलोमन को दिया गया था, नये नियम के चर्च में आत्मिक जागरण के फामूर्ले के रूप में इस्तेमान किया गया? मैं इसके पीछे और कोई कारण नहीं देखता सिर्फ इसके कि प्रचारक अपने चर्च से कुछ जहाज ये सब लेने को भेजे, ''वे तशींश के जहाज सोना, चान्दी, हाथीदांत, बन्दर और मोर ले आते थे,'' जैसे सॉलोमन ने २ इतिहास ९:२१ में, केवल दो अध्याय बाद में ही किया था!

आयन एच मुर्रे ने कहा था, २ इतिहास ७:१४ के बारे में, ''पहली बात तो जो कहना है कि जो प्रतिज्ञा की गई थी वह (नये नियम) के जागरण की प्रतिज्ञा नहीं थी, क्योंकि वह प्रतिज्ञा समझी जानी थी, उदाहरण के लिये, जिस समय दी गई थी उस संदर्भ में इसका अर्थ समझना था। यह पुराने नियम के इजरायल के विषय में उस देश के संदर्भ में पुन: चंगाई व ठीक कर देने के लिये था'' (मुर्रे, उक्त संदर्भित, पेज१३)

विंस्टन चर्चिल ने एक बार अपने छोटे पोते को लिखा, कि उसे इतिहास अवश्य पढना चाहिये, क्योंकि इतिहास पढना आगे आने वाले भविष्य के बारे में अनुमान लगाने में सहायता करता है। चर्चिल के नारे का अगर अनुसरण करें जो कहता है, ''इतिहास पढो,'' तो हम पाते हैं कि जागरण का भ्रांत विचार कि यह मसीहियों के ''पूर्ण समर्पण'' से ही आता है गलत है। योना भविष्यवक्ता पूर्ण रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं था। योना का आखिरी अध्याय पढें तो ज्ञात होगा कि उसमें बहुत खामियां थीं और विश्वास की कमी थी। पुराने नियम में गैर जातियों में जितनी भी विशाल जाग्रतियां आई, वे सब भविष्यवक्ता के ''पूर्ण सर्मपण'' या ''सिध्द'' होने के कारण नहीं आई। जॉन कॉल्विन एक सिद्व पुरूष नहीं थे। उन्होंने तो मतांतर के कारण एक व्यक्ति को जलाकर मार डाला था - यह तो किसी भी तरह से नये नियम के व्यवहार को प्रगट नहीं करता! तौभी परमेश्वर ने उसकी सेवकाई व लेखन के द्वारा आत्मिक जागरण भेजा। लूथर का गुस्सा बहुत तेज था, उसने एक बार यहूदियों के आराधनालय जला दिये जाने की बात कही। उसके कटु भाषण, और यहूदी विरोधी होने के उपरांत परमेश्वर ने उसकी सेवकाई के द्वारा आत्मिक जागरण भेजा। हम कॉल्विन और लूथर को क्षमा कर देते हैं कि वे मध्ययुगीन प्रचारक थे, और उन पर कैथोलिकवाद का बहुत अधिक असर था। तौभी, परमेश्वर ने उनकी सेवकाई के द्वारा, सामर्थशाली रूप में आत्मिक जागरण भेजा। वाईटफील्ड कभी कभी ''अपनी अंतरात्मा'' की आवाज पर चलने के कारण गलती कर बैठते थे, यह कहकर की उन्होंने इसे परमेश्वर की ओर से समझा था। वैसली (पासा फेंकने के) द्वारा या चिटठी द्वारा परमेश्वर की इच्छा जानना चाहते थे। वाईटफील्ड, वैसली, लूथर ने अपनी सेवकाई के द्वारा विशाल आत्मिक जागरण देखा।

हम देखते हैं, इतिहास में ऐसे उदाहरण से, कि जो प्रचारक इतने सिध्द नहीं हैं, पवित्र और समर्पित भी नहीं हैं जितने होने चाहिये, परमेश्वर के द्वारा सामर्थशाली रूप में प्रयुक्त किये जा सकते हैं। हम यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि फिने और उसके अनुयायी बिल्कुल गलत थे जब उन्होंने यह माना कि केवल पवित्र और समर्पित प्रचारक द्वारा ही आत्मिक जागरण आ सकता है। प्रेरित पौलुस हमें बताता है कि,

''परन्तु हमारे पास यह धन मिट्ठी के बरतनों में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे।'' (१ कुरंथियों ४:७)

मैं इस संदेश को स्तिफनुस के सनहैंदिन में दिये गये भाषण से समाप्त करूंगा हमें विशेषकर कहा गया है कि स्तिफनुस, अनुग्रह और सामर्थ में परिपूर्ण होकर लोगों में बड़े बड़े अद्भुत काम और चिन्ह दिखाया करता था (प्रेरितों के काम ६:८)। तौभी उसके प्रचार से आत्मिक जागरण नही आया। बल्कि उसे पत्थरवाह करके मार डाला गया। वह पवित्र और धर्मी पुरूष था किंतु उसकी सेवकाई स्वत: जागरण उत्पन्न नही कर सकी। हम प्रार्थना और उपवास कर सकते हैं और एक अदभुत मसीही कहला सकते हैं, किंतु इससे हम परमेश्वर पर दवाब नहीं बना सकते कि वह आत्मिक जागरण भेजे। क्यो? प्रेरित पौलुस इसका उत्तर देते हैं,

''इसलिये न तो लगाने वाला कुछ है, और न सींचने वाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है।'' (१ कुरंथियों ३: ७)

हां, हमें निरंतर प्रार्थना करते रहना चाहिये, और कभी कभी जागरण लाने के लिये, उपवास भी रखना चाहिये, और उसी समय हमेशा याद रखें, ''परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है।'' (१ कुरंथियों ३:७) तो यह परमेश्वर की एकमात्र सर्वोच्च ताकत है जो सच्चा जागरण उत्पन्न कर सकता है!

४. चौथा, यह सोचना गलत है कि जाग्रति अपनी प्रचलित दशा में चर्च में होगी जागरण चर्च में होता ही है ।

पेंतुकुस्त के दिन प्रेरितों के उपर पवित्र आत्मा उडेला गया। उन्होंने उनकी भाषा में प्रचार आंरभ शुरू कर दिया। उस सामर्थशाली पुर्नजागरण में तीन हजार लोग परिवर्तित हुये, जिसका विवरण प्रेरितों के कार्य, के दूसरे अध्याय में दिया है। किंतु हम देखते हैं कि उन्हें फिर से पवित्र आत्मा से भरे जाने की आवश्यकता है, जैसा प्रेरितों के कार्य ४:३१ में कहा गया है,

''जब वे प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहां वे इकट्ठे थे हिल गया, और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्वर का वचन हियाव से सुनाते रहे'' (प्रेरितों के कार्य ४:३१)

इससे प्रगट होता है कि पूर्वी कलीसिया में जागरण के कई मौके आये, अर्थात किसी भी समय परिवर्तन हो जाये करते थे। किंतु अन्य मौकों पर कलीसिया के कार्य यथावत चलते रहते थे, तय समय के अनुसार। मैं सोचता हूं कि प्रेरित पौलुस का कहने का यह तात्पर्य था जब उसने कहा, ''समय और असमय तैयार रह,'' (२ तिमुथयुस ४:२) इसका अर्थ है कि हमें प्रचार करना जारी रखना चाहिये और प्रार्थना व गवाही देना भी जारी रखना चाहिये भले ही जागरण हो या न हो। मसीह ने हमें उस महान आज्ञा के पालन हेतु बुलाया है (मत्ती २८:१९−२०), और ''प्रत्येक प्राणी को सुसमाचार सुनाना है'' (मरकुस १६:१५) चाहे जागृति हो अथवा नहीं! कुछ परिवर्तित होंगे भले ही अनपेक्षित रूप में भी परमेश्वर गतिमान हो या न हो।

अगर हम सोचेंगे कि जागरण अपने तरीके से ही होगा परमेश्वर वैसे ही कार्य करेगा, तब तो हम हताश हो जायेंगे। आयन एच मुर्रे ने कहा था,

इस बिंदु पर जॉर्ज वाईटफील्ड को अपने पास्टर मित्र जो कैंबसलैंग (स्कॉटलैंड) से आते हैं, विलियम मैककुलो को उन्हें चेतावनी देनी पडी। १७४९ में मैककुलो निराश हो गये क्योंकि १७४२ में उन्होंने जो जागृति देखी थी वैसी काफी समय से नहीं देखी। वाईटफील्ड का समझाने का यह मकसद था कि १७४२ का वह कोई तय नियम नहीं था कि उसी तरह जागरण आये: ''मैं (कैंबसलैंग) में अन्य जागरण के बारे में सुनकर प्रसन्न हूंगा, परन्तु, प्यारे महोदय, आपने यह चीजें पहले ही देख रखी है जो एक शताब्दी में मुश्किल से एक से अधिक बार देखने को मिलती है।'' मार्टिन ल्यॉड−जोंस ऐसा ही एक ओर उदाहरण बताते हैं जब वेल्श के एक पादरी की ''संपूर्ण सेवकाई नष्ट हो गई'' सिर्फ इसलिये कि वह लगातार अपने पिछले अनुभव १९०४ के जागरण की फिर से अपेक्षा रख रहे थे: ''जब जागरण समाप्त हो गया........वह फिर भी उसके अनेपक्षित ढंग से उतर आने की राह देखते रहे; और ऐसा नहीं हुआ। तो वह निराश हो गये और अपने जीवन के चालीस साल ऐसे ही बिना फल लाये, उदासी और अनुपयोगिता में बिताये'' (आयन एच मुर्रे, उक्त संदर्भ, पेज २९)

अगर परमेश्वर जागरण नहीं भी भेजता है, तो हमें निराश नहीं होना है। हमें तो काम करते जाना है, ''समय (और) असमय तैयार रहना है,'' सुसमाचार प्रचार करते जाओ, पापियों को मसीह के पास एक के बाद एक लाते जाओ। किंतु, उसी समय, इस प्रार्थना में भी लीन रहना चाहिये कि परमेश्वर किसी समय जागरण और परिवर्तन की आशीष देवे। अगर परमेश्वर जागृति भेजता है, तो हम आनंद मनायेंगे। अगर वह जागृति नहीं भेजता है, तो भी हम मसीह के पास एक एक आत्मा को ही भेजना जारी रखेंगे! हम निराश नहीं होंगे! हम हिम्मत नहीं हारेंगे! हम समय असमय तैयार रहेंगे!

५. पांचवा, जागृति आने के लिये किन्हीं शर्तो को पूरा करना आवश्यक है यह सोचना गलत है।

धर्मशास्त्र और इतिहास दोनों गवाह है कि मनुष्य द्वारा सुसमाचारीय प्रयास या मसीही लोगों के पूर्ण समर्पण से जागृति नहीं आती। किंतु कुछ शर्ते अवश्य है जिनका पूरा होना आवश्यक है। प्राथमिक रूप से कुछ सही सिद्धांत है, प्रार्थना है। हमें जागरण, बुलाने के लिये दुआ करते रहना है, और हमारे पास पाप व उद्धार संबंधी सही शिक्षा का होना भी आवश्यक है।

अपनी पुस्तक, रिवाईवल में (क्रास के बुक्स, १९९२), डॉ मार्टिन ल्योड−जोंस के दो अध्याय; इस शीर्षक से हैं ''डॉक्टरीनल इम्प्यूरिटि'' और ''डैड आँर्थोडॉक्सी।'' इन दो अध्यायों में, उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रचार के प्रारंभिक सालों में जागृति देखी थी, और कुछ शिक्षायें प्रचार करना अति आवश्यक है और उस पर विश्वास रखना जरूरी है अगर हम उम्मीद रखते हैं कि परमेश्वर जागृति भेजेगा। उन्होंने जो चार शिक्षायें बताई है उन्हें आपके साथ बांट रहा हूं।


१. पतन और मनुष्य का नष्ट होना − संपूर्ण विनाश

२. पुर्नजीवन मिलना − नया जन्म होना − यह परमेश्वर का कार्य है, न कि मनुष्य का।

३. केवल मसीह में विश्वास द्वारा धर्मी ठहराया जाना − न कि किसी तरह के ''निर्णय'' लेने से बचाया जाना।

४. मसीह के लहू से शुद्ध किये जाने की प्रभावकारिता − दोनों प्रकार के पाप से छुटकारा स्वयं के और आदम के कारण मूल पाप।


इन चारों शिक्षाओं पर चाल्र्स जी फिने, ने प्रहार किया, और इसलिये वे अपमानित भी किये गये और हमेशा के लिये उनकी उपेक्षा की गई। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि १८५९ के बाद से हमने बहुत थोडी जागृति देखी! मैं इसके अधिक विस्तार में नहीं जाउंगा, किंतु यह बहुत आवश्यक शिक्षायें हैं, जिनका प्रचार किया जाना पुन: आवश्यक है अगर हम सोचते हैं कि हमारे चर्च में जागरण आना चाहिये तो। हमारे चर्चेस में अनेक खोये हुये लोग हैं, जो कभी भी परिवर्तित नहीं होंगे अगर हम इन शिक्षाओं को प्रबलता के साथ − और बार बार प्रचार नहीं करेंगे!

डॉ ल्योड −जोंस ने कहा,

जागृति के इतिहास को उठाकर देखो, और आप पायेंगे कि पुरूष और महिला बडा असहाय महसूस कर रहे थे। वे जानते थे कि उनके भले कार्य मैले चिथडे के समान हैं, और उनकी धार्मिकता की सचमुच में कोई कीमत नहीं। और ऐसे लोग, यह सोच रहे हैं कि वे कुछ भी नहीं कर सकते, असहाय है, वे परमेश्वर की दया ओर तरस के लिये चिल्ला रहे हैं। विश्वास द्वारा धर्मी ठहराये जाये। परमेश्वर उनके लिये कार्य करे। ''अगर परमेश्वर उन्हें नहीं बचायेगा,'' तो उनका कहना है, ''हम खोये हुये ही रहेंगे।'' और इसलिये वे परमेश्वर के समक्ष उनका असहायपन महसूस करते हैं। अब वे कोई ध्यान नहीं देते कि चर्च में उनकी उपस्थति साल भर में कितनी है, उन्होंने चर्च में कोई गतिविध में भाग लिया या नहीं, और ऐसी ही, कई बातें अब उन के लिये महत्व नहीं रखती। अब उन्हें चर्च की इन बातों में कोई अच्छाई नजर नहीं आती, यहां तक कि धर्म में भी रूचि नहीं जगती, कुछ भी बातों का महत्व नहीं लगता। परमेश्वर को अधर्मियों पर तरस खाकर बचाना चाहिये। यही संदेश जागृति के हर दौर में, बाहर निकल कर, आता है (मार्टिन ल्योड−जोंस, उक्त संदर्भित, पेज ५५−५६)

''परन्तु जो काम नहीं करता वरन भक्तिहीन के धर्मी ठहराने वाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास उसके लिये धामिर्कता गिना जाता है।'' (रोमियों ४:५) ''जो मसीह यीशु में है: उसे परमेश्वर ने उसके लोहू के कारण एक ऐसा प्रायश्चित्त ठहराया'' (रोमियों ३:२४−२५)

६. छटवीं बात, जागृति आनंद और ठहाके के साथ प्रारंभ होती है।

''हंसने वाली जागृति'' वास्तव में सच्ची जागृति नहीं है। मैंने अपने मित्र डॉ आर्थर वी होक के साथ एक सभा देखी थी। एक सच्ची जागृति का बेहद उलट रूप था। आज जैसा लोग उद्धार को समझते हैं उनके लिये यह ठीक है डॉ जॉन आर्मस्ट्रांग ने कहा, ''लोग (क्या) चाहते हैं, खुशी, भरपूरी और सब साधन संपन्न होने के बाद संतुष्ट'' इसे वैभव का गॉस्पल कहते हैं (ट्रू रिवाईवल, हार्वेस्ट हाउस, २००१, पेज २३१) वे अपने पापों से छुटकारा पाकर उद्धार पाने की तो सोच ही नहीं रहे हैं!

किंतु सच्चे मन परिवर्तन में ऐसा होता है, सच्चा परिवर्तन महत्व रखता है। जागरण में, एक एक परिवर्तन में, ''टूटा मन, मसीह के सामने पापों को मानना और पश्चाताप करना यह सब परमेश्वर की आत्मा के द्वारा करवाये जाने वाले कार्य हैं। कुछ लोग हो.......पाप के गहरे प्रभाव में रोने भी लग जाते हैं'' (आर्मस्ट्रांग, उक्त संदर्भित, पेज ६३)

यह मेरा अनुभव है कि प्रत्येक जन जो वास्तविक रूप में परिवर्तित होता है वह अपने पश्चाताप और पापों के दुख में रोता है। मैं ऐसे लोगों का गवाह रहा हूं जब मैंने कई जागृतियों में लोगों को रोते देखा है। और ऐसी जागृतियां ही इतिहास की मजबूत जागृतियां कहलाई।

हम आपके उपर भी पवित्र आत्मा आये यह प्रार्थना करते रहते हैं। हम कितनी प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर आपको आपके पापों के लिये शोकित करे और रूलाये। हम कितनी प्रार्थना करते हैं कि आप यीशु के बेशकीमती लहू से शुद्ध किये जाये! ''और उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है'' (१यूहन्ना १:७) आमीन। डॉ चान निवेदन है कि आप आकर हमारे चर्च में जागृति भेजे जाने के लिये परमेश्वर से प्रार्थना करें।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया ऐबेल प्रुद्योमे द्वारा: जकरियाह १२:१०; १३:१
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''परमेश्वर अपने कार्य को, पुर्नजीवित कर'' (अल्बर्ट मिडलेने, १८२५−१९०९)


रूपरेखा

पुर्नजागरण की छ: आधुनिक गलतियां

(पुर्नजागरण पर संदेश १५)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स

(१ कुरूंथियों १३:१२)

१. प्रथम, आज पुर्नजागरण नहीं हो सकता यह मानना गलती है,
प्रेरितों के कार्य ४:३१; प्रकाशितवाक्य ७:१−१४

२. द्वितीय, यह सोचना गलत है कि जागरण सुसमाचारीय प्रयत्नों से ही आ
सकता है, प्रेरितों के कार्य १३:४८−४९; मरकुस १६:१५

३. तीसरा, यह सोचना भी गलत है कि मसीहियों के समर्पित होने से ही
परिवर्तन आता है, २ इतिहास ९:२१; २ कुरूंथियों ४:७;
प्रेरितों के कार्य ६:८; १ कुरूंथियों ३:७

४. चौथा, यह विचार गलत है कि जाग्रति अपनी प्रचलित दशा में चर्च में
होगी, प्रेरितों के कार्य ४:३१; तीमुथियुस ४:२; मरकुस १६:१५

५. पांचवा, जागृति आने के लिये किन्हीं शर्तो को पूरा करना आवश्यक है यह
सोचना गलत है, रोमियों ४:५; ३:२४−२५

६. छटवीं बात, जागृति आनंद और ठहाके के साथ प्रारंभ होती है,
१ यूहन्ना १:७