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परमेश्वर जिन लोगो को आत्मिक जाग्रति में उपयोग में लाता हैं

(जाग्रति पर संदेश संख्या १२)
THE PEOPLE GOD USES IN REVIVAL
(SERMON NUMBER 12 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, १९ अक्टोबर, २०१४ को लॉस एंजिलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Evening, October 19, 2014

“परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है‚ कि ज्ञान वालों को लज्ज़ित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है‚ कि बलवानों को लज्ज़ित करे।” (१कुरूंथियों१:२७)


आत्मिक जाग्रति के बारे में एक बहुत ही ध्यान देने वाली बात इसमें बताई गई हैं। परमेश्वर मूर्खो को चुनता हैं ताकि जगत में विद्वान‚ और बलवान कहलाये जाने वाले लोगों को लज्जित व हक्का बक्का कर दें। जो बाईबल पढ़ते हैं वे इसे स्पष्ट समझते हैं। जब मसीह पैदा होने वाले थे‚ तब परमेश्वर ने एक गरीब परिवार की कुंवारी कन्या का चयन किया ताकि वह प्रभु की माता कहलायी जा सके। जब मसीह का जन्म हुआ, तब परमेश्वर ने गरीब गड़रियों को उनकी आराधना करने भेजा। परमेश्वर ने राजा हेरोद‚ या इजरायल के शासकों को मसीह का अभिवादन करने नहीं भेजा। उनके स्थान पर दूर देवताओं के देश से तीन ज्योतिषयों को भेजा। जब यीशु मसीह ने अपनी सेवकाई प्रारंभ की तब उनके लिये घोषणा किसी महापुरोहित द्वारा नही की गई। बल्कि एक गरीब भविष्यदर्शी‚ यूहन्ना बपतिस्मादाता ने यह घोषणा की। जब यीशु मसीह उनके लिये बारह चेलों का चुनाव करने वाले थे, तो उन्होंने वे चेले सन्हेंदिन‚ या महासभा में से नहीं चुने। बल्कि उनके स्थान पर, मामूली से मछुआरों को चुना। जब यीशु मसीह ने यहूदा के स्थान पर तरसुस के शाउल का चुनाव किया तो हम जानते हैं कि वह स्वयं को ''सबसे बड़ा पापी'' बेहद दुष्ट आदमी कहता है! तो मसीह के जीवन से यह स्पष्ट है,

''परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्ज़ित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुनलिया है, कि बलवानों को लज्ज़ित करे।'' (१कुरूंथियों१:२७)

पुराने नियम में भी यह विषय बार बार उठता है। परमेश्वर ने कैन के बदले हाबिल को चुना, यद्यपि कैन बड़ा भाई था‚ और इसलिये उसका स्थान प्रमुख था। परमेश्वर ने एसाव के बदले याकूब को चुना, यद्यपि एसाव बड़ा भाई था, और उत्तराधिकारी भी। ने परमेश्वर ने ग्यारह भाइयों में से युसुफ जो सबसे छोटा भाई था, और कमजोर भी उसे चुन लिया। परमेश्वर ने फिरौन के बजाय मूसा को चुना। एक समय उसने धरती पर सबसे शक्तिशाली मनुष्य के उपर एक चरवाहे को चुना। इजरायल को मिद्यानियों के हाथ से बचाने के लिये गिदोन को चुना − जबकि गिदोन ने कहा था, देख, मेरा कुल मनश्शे में सब से कंगाल है........फिर मैं अपने पिता के घराने में सब से छोटा हूं।'' (न्यायियों ६:१५) परमेश्वर ने महापुरोहितों के दो लड़कों के बजाय, छोटे शमुएल को चुना। परमेश्वर ने एक शक्तिशाली राजा शाउल के उपर एक चरवाहे को दाउद को चुना। मसीहत के इतिहास‚ मे यह बात बार बार‚ दोहराई गई और सत्य भी है। ।

''परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्ज़ित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्ज़ित करे।'' (१कुरूंथियों१:२७)

प्रारंभिक मसीही जन गरीब और एकाकी थे। कई तो गुलाम थे। रोमन सम्राट ने उन्हें मौत के घाट तक उतार डाला था। पर कोई उन को स्मरण नहीं करता (नीरो को छोड़कर)‚ यद्यपि वे बड़े शक्तिशाली राजा थे। लोग शहीदों को उनके बलिदानों को स्मरण रखते हैं जब पोप शुभ शुक्रवार के दिन कलोसियम में प्रति वर्ष मिस्सा करते है ! उन शहीद गुलामों ने मरकर भी प्राचीन रोम की ताकत और अधिकार पर विजय हासिल की!

लूथर के विषय में सोचिये। देखिये डॉ मार्टिन ल्योड जोंस ने उनके विषय में क्या कहा था:

मार्टिन लूथर जो एक अज्ञात भिक्षुक थे, उनकी आशा कितनी बड़ी थी? वह संपूर्ण चर्च सत्ता के विरूद्व उठ खड़े हुए‚ और.....बारहवीं व तेरहवीं शताब्दी में चर्च की अर्थहीन परंपराओं के विरूद्व उठ खड़े हुए? देखने में यह बड़ी अशिष्टता लगती है कि एक व्यक्ति उठ खड़ा हो और संपूर्ण चर्च से कहे कि, ''मै अकेला सही हूं और तुम सब लोग गलत हो।” आज उनकी कही हुई बात याद की जाती हैं। और यह वह व्यक्ति था जिसके साथ प्रभु का आत्मा कार्य कर रहा था। और वह खड़ा रहा‚ अकेले खड़ा रहा‚ और प्रभु के आत्मा ने उसे सम्मान दिया। प्राटेस्टेंट सुधारवाद आया‚ और निरंतर जारी रहा‚ एवं वैसा ही बना रहा.....मैं जो कहने जा रहा हूं उसका अर्थ यह हैं कि जब परमेश्वर अपने चर्च में कार्य करना आरंभ करता है‚ और आत्मिक जाग्रति के लिये रास्ता तैयार करता है‚ तो वह कार्य निरंतर जारी ही रहता हैं। वह इस कार्य के लिये कुछ लोगों को अलग करता हैं‚ और उनके मन में बोझ उत्पन्न करता हैं फिर ऐसे लोगों का झुंड एक साथ संगति करता हैं, अज्ञात में, बिना रूकावट के‚ क्योकि ऐसे लोग इस बोझ का महत्व जानते हैं। (मार्टिन ल्योड−जोंस, एम डी, रिवाईवल, १९८७, क्रासवे बुक्स, पेज २०३‚१६७)

और सपूर्ण इतिहास में जाग्रति के लिये आपको यही व्यवस्था मिलेगी। जेम्स मेककिल्कन नामक उस व्यक्ति ने दो अन्य लोगों से बातचीत प्रारंभ की, और उन्होंने सारी बात समझी तब वे तीनों लोग एक संकरी गली में स्थत एक छोटे से स्कूल के कमरे में मिलने लगे। जब मै उत्तरी आयरलैड में था तब मुझे उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। क्योकि मैं इस प्रकार की जगह देखना चाहता था, उन लोगो ने अपनी बुलाहट प्रार्थना के लिये महसूस की थी। (मार्टिन ल्योड−जोंस, एम डी, उक्त संदर्भित, पेज १६५)

और‚ बेशक उत्तरी आयरलैंड में आत्मिक जाग्रति फैली‚ जब इन तीन लोंगो ने पवित्र आत्मा का आर्शीवाद भेजे जाने के लिये प्रार्थना की। तब डॉ ल्योड−जोंस ने कहा‚ “मेरा विश्वास कीजिए मेरे मित्रों‚ जब अगली जाग्रति आयेगी‚ तो यह सबको बहुत आश्चर्यचकित कर देने वाली बात होगी‚ विशेषकर जो इसके होने मे लिये प्रार्थना कर रहे थे। यह बहुत (विनम्र व बिना अधिक विचार) किये बिना रूकावट के होगी। शांति से लोग इस ओर खिंचे चले आयेंगे, जैसे कि, उनके उपर प्रार्थना करने का बोझ हो‚ वे स्वयं को असहाय महसूस कर रहे थे‚ क्योंकि वे इसके बगैर रह ही नहीं सकते थे। वे ऐसे लोगो की संगति में रहना चाहते हो‚ जो उनके समान ही परमेश्वर को पाने के लिये रो रहे हों।” (ल्योड−जोंस‚ उक्त संदर्भित‚ पेज१६५−१६६)

डॉ ल्योड−जोंस यह भी कहते गये कि, ''आप लोगो को मेथोडिज्म की तमाम शाखाओं की कहानी के बारे में पता होगा। यह कैसे प्रारंभ हुआ.......? यह बिल्कुल उसी तरह हुआ, जैसे वैस्ली ब्रदर्स के साथ हुआ, और वाईटफील्ड के साथ हुआ, और दूसरों के साथ हुआ, अन्य लोगो के साथ हुआ जो चर्च आँफ इंग्लैंड के सदस्य थे.......क्योकि कुछ समय तक तो कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा था, वे सब तो इसलिये मिल रहे थे, क्योंकि वे सब एक ही सामर्थ की ओर खिचे चले आ रहे थे।'' (उक्त संदर्भित‚ पेज १६६)

हम सब जार्ज वाईटफील्ड और जॉन और चाल्र्स वैस्ली को जानते हैं। किंतु उसके बाद कोई उन्हें नहीं जानता। वे सब साधारण जवान लोग थे जिन्होंने एंगलिकन चर्च का निर्जीव रूप देखा था। और, अब वे मसीह के साथ जीवंत अनुभव के बाद परमेश्वर को महिमामंडित देखना चाहते थे।

किसी ने, मैं सोचता हूं बिशप राईल ने‚ कहा था कि जॉन वेस्ली को केंटरबरी का आर्कबिशप बनाया जाये, जो चर्च आँफ इंग्लैंड का प्रमुख होता हैं । पर, बेशक उनको इस सर्वोच्च पद के उपयुक्त माना ही नहीं गया। इसके स्थान पर‚ उनका मखौल उडाया गया। उन्हें कहा गया कि वह आँक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में दुबारा प्रचार नहीं कर सकेंगे‚ जहां से वे स्नातक हुए थे, कयोंकि उन्होंने वहां के विद्यार्थयों और अध्यापकों को कहा कि उन्हें नया जन्म लेना आवश्यक है। उन की माताजी, सुसन्ना वेस्ली, भी उनके प्रचार से बहुत अधिक खफा थी, जब तक उनका भी परिवर्तन नहीं हुआ था - वह उन्हें ''अति उत्साही'' - और पागल कहा करती थी। लगभग तिरपन वर्षो तक, वेस्ली इंग्लैड के खुले मैदानों मे बड़ी भीड़ को जो उन्हें सुनने के लिये आती थी दिन में तीन बार संबोधित करते थे। पर उनके डिनोमिनेशन के लोग उनका मखौल उड़तो रहे, एवं ऐसे महान सेवक का तिरस्कार करते रहें। अपने बुढापे की अस्सी वर्ष की आयु तक पहुंचकर भी उन्हें सम्मान नहीं मिला। इसी दौरान, उनकी सेवकाई के कार्यकाल में, छ: लोग केंटरबरी का आर्कबिशप बनाये गये। उनके नाम क्रमानुसार इस प्रकार हैं‚

जॉन पॉटर (१७३७−१७४७)
थॉमस हेरिंग (१७४७ −१७५७)
मैथ्यू हटटन (१७५७− १७५८)
थॉमस सेकर (१७५८ −१७६८)
फ्रेडरिक कार्नवालिस (१७६८− १७८३)
जॉन (१७८३−१८०५)

मुझे ताज्जुब हैं कि “महान” कहलाये जाने वाले इन छ: लोंगो के नाम भी किसी एंगलीकन इतिहासकार ने लिये होंगे। जबकि हर मसीही जन जॉन वेस्ली को जानता हैं। और उनके भाई‚ चाल्र्स, का नाम भी इस संसार के समस्त डिनोमिनेशन के लोग अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि उनके लिखे भजन हर चर्च में गाएं जाते हैं। वाइटफील्ड और दोनों वेस्ली भाई, छोटे व अज्ञात थे जब उन्होंने नये साल की शाम‚ सन १७३८ में पवित्र आत्मा का आर्शीवाद भेजे जाने के लिये प्रार्थना करना आरंभ किया, इसके बाद तोसंपूर्ण अंग्रेजी भाषी जगत में पहली बार महान आत्मिक जाग्रति उतर आई।

“परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है‚ कि ज्ञान वालों को लज्ज़ित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है‚ कि बलवानों को लज्ज़ित करे।” (१कुरूंथियों १:२७)

यह पद बताता हैं कि क्यों जवान लोग इस जाग्रति के प्रमुख कहलाये। चर्च में जवान लोग ही प्रथम रूप में पवित्र आत्मा का संचार महसूस करते हैं और प्राय: जवान लोग ही धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं‚ व वास्तविक रूप में जाग्रति और परमेश्वर के अभिलाषी होते है।

पर्वतों में गर्मी के कैंप में चाइनीज बैपटिस्ट चर्च के जवानों के मध्य पहली जाग्रति मैंने देखी। एक सुबह जब वे प्रार्थना करने के लिये कैंप में एकत्रित हुए, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा का अवतरण इतनी सामर्थ के साथ हुआ कि यह जाग्रति उनके कैंप से लौटने‚ के उपरांत रविवार तक चलती रही। जाग्रति रविवार पूरे दिन और रात में भी चलती रही। मुझे उन जवानों की प्रार्थना आज भी याद हैं। मुझे उन जवानों का विस्मय व भय से प्रार्थना करना‚ उनका पश्चाताप करना‚ स्वीकारोक्ति व प्रार्थना में लीन रहना‚ और उन सभाओं में परमेश्वर के नजदीक बने रहना अच्छी तरह याद हैं।

वर्जीनिया के बैपटिस्ट चर्च में जाग्रति के समय मैंने देखा‚ कि तीन लड़कियां गाने के लिये खड़ी हुई। वे अपने पाप के बोध से इतनी विहल हो गई कि वे रोती जा रही थी‚ एवं पूरा चर्च इस भाव से भर गया कि − “परमेश्वर हमारे बीच उतर आया।”

“हेरनहट‚ सेक्सोनी में १३ अगस्त के दिन जवानों के मध्य जबरदस्त देखी गई।” 29 अगस्त के दिन से, “रात दस बजे से लेकर दूसरे दिन एक बजे तक, एक वास्तव में प्रभावित करने वाली बात देखी गई‚ कि लड़कियों ने (तीन) घंटे गाते हुए, प्रार्थना करते हुए, व रोते हुए बिताये। लड़के अन्य स्थान पर प्रार्थना करने में लौलीन थे। उनकी प्रार्थना करने की लगन व मिन्नते करने की आत्मा इतने सामर्थ के साथ दी गई कि उसका बखान करने के लिये शब्द नहीं हैं।” (जॉन ग्रीनफील्ड पॉवर फ्राम आँन हाइवल्र्डवाइड रिवाइवल प्रेयर मोमेंट, १९५०‚ पेज ३१)।

बोर्नियों के बारियों में एक जूनियर सेकेंडरी स्कूल में अक्टोबर १९७३ मे विद्यार्थयों में आत्मिक जाग्रति प्रारंभ हुई। दो लड़को ने प्रार्थना करना आरंभ किया जल्द ही पूरा स्कूल प्रार्थना करने लगा, और यहां तक कि स्कूल के प्रमुख भी जो पहले विरोध किया करते थे, पश्चाताप में सम्मिलित हो गये। (शर्ली ली‚ डस्क फ्राम डॉन‚ ओवरसीज मिशनरी फैलोशिप‚ १९७९‚ १८५ − १८९)

बॉयन एच एडवर्ड ने कहा‚ “आत्मिक जाग्रति के बारे में जो महत्वपूर्ण बात है......कि जवानों को विशेषकर के चुनौती मिलती हैं और वे इसे स्वीकार करते हुये बदल भी जाते हैं‚ और कई दफे तो उन के मन में ही वह हार्दिक इच्छा छिपी होती है कि उन्हें यीशु मिल जायें.....यह जाग्रति का एक विशेष पहलू हैं कि जो इसकी तीव्र इच्छा रखते हैं वे इसे पा जाते हैं‚ और यह अधिक विश्लेषण करने वालों को प्राप्त नहीं होती'' (बॉयन एच एडवर्ड‚ रिवाइवल! ए पीपल सेचुरेटेड विथ गॉड‚ इवेजलिकल प्रेस‚ संस्करण १९९१‚ पेज१६५)

“परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है‚ कि ज्ञान वालों को लज्ज़ित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है‚ कि बलवानों को लज्ज़ित करे।” (१कुरूंथियों १:२७)

एमी कार्माइकल ने भारत में पवित्र आत्मा के कार्य का वर्णन इस प्रकार किया‚

सुबह की सभा समाप्त हो रही थी कि एकाएक वह क्षण आ पहुंचा। जो बोल रहा था, वह बोलते बोलते ठहर गया, वह उसके भीतर घटने वाली आत्मिक बातों से, अभिभूत हो गया था। प्रार्थना कर पाना भी मुश्किल लग रहा था। एक छोटे लड़के ने प्रार्थना करने का प्रयास किया, पर वह आंसुओं में फूट कर रोने लगा, उसके बाद दूसरे की भी यही दशा हुई, उसके बाद दूसरा, फिर सब लड़के, विशेषकर बड़े लड़के सबसे पहले रोने लगे। उसके बाद दूसरे छोटे सब लड़के बुरी तरह से रोने लगे और क्षमा मांगने लगे। यह स्त्रियों में भी फैल गया। यह इतना चौंका देने वाला और विस्मयकारी था - कि मैं कोई दूसरा शब्द इस्तेमाल कर ही नहीं सकता - मैं वर्णन नहीं कर पा रहा हूं। जल्दी ही सब फर्श पर लोटने लगे, प्रभु को पुकारने लगे, हर लड़का लड़की, स्त्री पुरूष, एक दूसरे से बेखबर (भूलकर) होकर आत्मिक अनुभूति में लीन हो गये। वह स्वर लहरो के स्वर के समान था और जैसे पेडो से तेज हवा का झोका टकराया हो.......पहले तो ऐसा लगा कि केवल नया जन्म पाये लड़के ही हैं, स्कूल वाले लड़के ही परिवर्तित हुए हैं, या हमारे खुद के बच्चे ही हैं.......या कलीसिया के जवान ही हैं। सात महिने बाद उसने रिपोर्ट दी, ''हमारे लगभग सभी (जवान लड़के) पूर्ण रीति से परिवर्तित हो चुके हैं। (जे एडविन ओर‚ पी एच डी‚ दि फलेमिंग टंग, मूडी प्रेस, १९७३, पेज १८, १९)

इन शब्दों पर ध्यान दीजिए‚ “पहले तो ऐसा लगा कि केवल नया जन्म पाये लड़के ही हैं, स्कूल वाले लड़के ही परिवर्तित हुए हैं.......या कलीसिया के कुछ जवान ही हैं” इसी तरह अक्सर चर्च में रिवाइवल आती है। मैंने स्वयं अपनी आंखों से तीन जाग्रतियां देखी हैं − जब परमेश्वर ने लॉस ऐंजिलिस, सेन फ्रांसिस एरिया, और वर्जीनिया बीच में जवान लड़कों के उपर अपनी आत्मा में से शक्तिशाली सामर्थ भेजी।

अब, आज की रात मैं अपने जवान लड़कों से कहता हूं। हम आपको इस संदेश की छपी हुई प्रति साथ ले जाने के लिये देंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि आप इसे पढेगे, और अगले हफते तक बार बार पढ़ते रहेंगे। और मैं उम्मीद करता हूं कि आप इस संदेश में लिखी बातों के होने के लिये लगातार प्रार्थना करेंगे, व हमारे चर्च में भी जाग्रति फैलें ऐसी दुआ करेंगे।

आप ऐसा सोचेंगे कि, “डॉ हिमर्स हमारे चर्च में ऐसा नहीं होने देंगे।” मैं ऐसा मानता हूं कि मैं जाग्रतियों के बारे में पर्याप्त जानता हूं और आत्मा को बुझाउंगा नहीं और और उसके अभिषेक को उतरने से रोकूंगा नही, अगर परमेश्वर अपने संपूर्ण बल के साथ उतरे तो! आप अपनी प्रार्थनाओं में यशायाह नबी के शब्दों को भी जोड़ सकते हैं,

''भला हो कि तू आकाश को फाड़कर उतर आए और पहाड़ तेरे साम्हने कांप उठे।” (यशायाह ६४:१)

डॉ चान, निवेदन हैं कि प्रार्थना में अगुवाई कीजिए।

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें द्वारा: कुरूंथियों१:२६−३१
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''मुझे प्रार्थना करना सिखा” (अल्बर्ट एस रिटज,१८७९−१९६६)