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क्यों आत्मिक जागृति नहीं! सच्चा उत्तर!

(जागृति पर संदेश संख्या १०)
WHY NO REVIVAL? THE TRUE ANSWER!
(SERMON NUMBER 10 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, ५ अक्टूबर, २०१४ को लॉस ऐंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Evening, October 5, 2014

''क्योंकि वह उनसे दूर हो गया है।'' (होशे ५:६)

''जब तक वे अपने को अपराधी मान कर मेरे दर्शन के खोजी ना होंगे तब तक मैं अपने स्थान को लौटूंगा.....'' (होशे ५:१५)


होशे के पांचवे अध्याय का विषय है परमेश्वर की उपस्थति का अलग हट जाना− स्कोफील्ड की बाईबल के प्रारंभिक अध्याय में यह वर्णन दे रखा है। परमेश्वर ने इजराएलियों के अहंकार और उनके पाप के कारण उनसे मुंह मोड लिया।

मैं जानता हूं कि परमेश्वर ने अमेरिका के साथ वाचा नहीं बांधी थी। उसने इस धरती पर इजरायल के साथ वाचा बांधी, और कोई दूसरे देश के साथ नहीं। पर ध्यान दीजिये, इस पद में लिखा है, कि परमेश्वर ने कहा था कि वह वाचा बंधे लोगों से भी मुख फेर लेगा अगर वे अपने अहंकार और पापों को नहीं त्यागेंगे। अगर वह वाचा में बंधे इजराएलियों से मुह फेर सकता है, तो सोचिये वह अमेरिका को कितना त्याग सकता है, और दूसरे पश्चिमी संसार को भी! डॉ जे वर्नान मैगी ने कहा था,

मुझे ऐसा बोध होता है कि अमेरिका परमेश्वर का न्याय झेल रहा है .......हम हमारे उपर उस न्याय का प्रभाव होते देख रहे हैं, जैसे इजरायल ने महसूस किया था (जे वर्नान मैगी, टी एच डी, थू दि बाईबल, वॉल्यूम ३ थॉमस नेल्सन पब्लिशर्स, १९८२, पेज ६३३; व्याख्या होशे ५:२)

अब हम अपने पद पर आते हैं,

''जब तक वे अपने को अपराधी मान कर मेरे दर्शन के खोजी ना होंगे तब तक मैं अपने स्थान को लौटूंगा.......'' (होशे ५:१५)

यहां परमेश्वर एक पापी देश को आगाह करता है कि वह उन्हें इस तरह सजा देगा कि अपनी उपस्थति उनके बीच में से हटा लेगा, ''मैं (तुम्हारे बीच में से) अपने स्थान को लौटूंगा'' यिर्मयाह बरोज (१६००−१६४६) जो महान प्यूरीटन कमेंटेटर थे उन्होंने इस पद की व्याख्या इस प्रकार की,

'मैं अपने स्थान में फिर लौट जाउंगा,’ अर्थात, मै फिर से स्वर्ग चला जाउंगा.....जब मैं उन्हें क्लेश दे चुका होउंगा तब मैं फिर से स्वर्ग चला जाउंगा, और मै वहीं बैठूंगा......जैसे मैंने उन्हे कभी जाना ही नहीं यिर्मयाह बरोज, (एन एक्सपोजिशन आँफ दि प्राफेसी आँफ होशे, रिफार्मेशन हेरीटेज बुक्स, २००६, पेज ३०५; होशे ५:१५ पर व्याख्या)

मुझे निश्चय है कि यही वह वजह है जिसके कारण १०० वर्षों से उपर समय में भी कोई बडी जागृति पश्चिमी जगत में नहीं आई। परमेश्वर हमसे विमुख हो गया। परमेश्वर ने कहा था, ''जब तक वे अपने को अपराधी मान कर मेरे दर्शन के खोजी ना होंगे तब तक मैं अपने स्थान को लौटूंगा.......'' आप इस बात पर असहमत हो सकते हैं, यह भी कह सकते हैं कि मैं तो मात्र एक मिशनरी हूं, मैं आपके ध्यान दिये जाने के योग्य नहीं हूं। तो, तब, क्या आप महान प्रचारक, डॉ मार्टिन ल्योड−जोंस की बात सुनेंगे? उन्होंने यह कहा था,

परमेश्वर जानता है कि मसीही चर्च लंबे समय से जंगल में भटकने जैसी अवस्था में चल रहा है। अगर आप १८३० या १८४० के पहले का चर्च का इतिहास पढोगे तो यह पाओगे, कि कई देशों में हर दस सालों में नियमित आत्मिक जागरण फैलता था। किंतु अब ऐसा नहीं हो रहा है। वर्ष १८५९ के बाद केवल एक विशाल जागृति आई। सचमुच हमने कितना अनउपजाउ समय बिताया....लोगों ने अपना विश्वास जीवित परमेश्वर में खो दिया उसके हमारे एवज में बलिदान देने पर से खो दिया और विद्वता, दर्शन शास्त्र और सीखने की ओर मुड गये। हम चर्च के एक लंबे समय तक के बांझ समय के गवाह रहे हैं.....हम अभी तक उसी निर्जन में चल रहे हैं। आप को कोई भी सलाह दे कि आप चर्च के इस बांझ समय से बाहर निकल आये हैं, तो विश्वास मत कीजिये हम अभी तक बाहर नहीं निकले हैं। (डी मार्टिन ल्योड−जोंस, एम डी, रिवाईवल, १९८७, क्रासवे बुक्स, पेज १२९)

यह शब्द आपको, मुझ एक छोटे सेवक से नहीं मिले हैं, किंतु एक प्रसिद्ध विद्वान ने सौंपे हैं, बीसवीं सदी के दो या तीन महान प्रचारकों में से एक ने सौंपे हैं! परमेश्वर ने अपनी उपस्थति हटा ली, और इसीलिये, ''लगभग १८५९ के बाद से केवल एक विशाल आत्मिक क्रांति हुई है,'' यद्यपि, ''१८३० या १८४० के पहले तक......हर दस सालों में नियमित जागृतियां होती रहती थीं'' (उक्त संदर्भित)

अगर हम सचमुच आत्मिक जागृति होने का सत्य जानना चाहते हैं तो हमें १८३० और १८४० के बीच का समय ध्यानपूर्वक देखना होगा। उसके पहले हमारे चर्चेस में हर दस सालों में एक बार जागृति आती थी। उसके पश्चात ऐसा हुआ−१८५९ के बाद केवल एक ही बडी आत्मिक क्रांति हुई! तो १८३० और १८४० के बीच कुछ तो घटा होगा जिससे परमेश्वर ने ''अपनी उपस्थति हटा ली'' (होशे ५:६) और ''(अपने स्वयं के) स्थान पर लौट गया'' (होशे ५:१५)

अगर आप इवेंजलीकल मसीहत का इतिहास जानते हैं, तो आपको यह स्पष्ट होगा कि क्या घटा होगा! चाल्र्स जी फिने! वह यह कारण है जिसके कारण यह घटा! इतिहासकार डॉ विलियम जी मेकलफलीन, जूनियर ने लिखा था,

उन्होंने अमेरिकन आत्मिक जागृति के नये युग का उदघाटन किया.....उन्होंने इवेंजलीज्म का समस्त दर्शन और प्रकिृया ही बदल कर रख दी (विलियम जी मेकलफलीन, जूनियर, पीएचडी, आधुनिक जागृतिवाद: चाल्र्स जी फिने से बिलिग्राहम तक, रोनॉल्ड प्रेस, १९५९, पेज ११)

फिने के पहले तक, प्रचारक विश्वास करते थे कि आत्मिक जागृति परमेश्वर भेजता है, और प्रत्येक मन परिवर्तन एक चमत्कार है जो परमेश्वर ही करता है। जोनाथन एडवर्डस ने १७३५ में जागृति को नाम दिया ''परमेश्वर का चकित कर देने वाला कार्य।'' फिने सन १८३५ में कहने लगा था कि जागृति ''किसी भी प्रकार से चमत्कार नहीं है। यह तो निवेश किये गये साधनों के सही उपयोग का शुद्धतम दार्शनिक परिणाम है।'' अर्थात, ''आत्मिक जागृति कोई चमत्कार नहीं है। यह तो हमने कुछ तरीके इस्तेमाल किये थे उसका स्वाभाविक परिणाम है।'' यह उसने आधुनिक अंग्रेजी भाषा में कहा था।

जोनाथन एडवर्ड और फिने के बीच एक बडा अंतर देखा गया।एडवर्ड प्राटेस्टैंट था, जबकि फिने पाखंडी था, एक पेलाजियानिस्ट था जो यह मानता था कि मनुष्य अपने खुद के प्रयासों से पापों से मुक्ति प्राप्त करता है, बजाय परमेश्वर के अनुग्रह और सामर्थ के। इसलिये फिने को मेथोडिस्टों के समान आर्मीनियन कहना गलत होगा। पूर्वी मेथोडिस्टों के आर्मीनियज्म से कहीं बिल्कुल अलग हटकर फिने का विश्वास था। फिने का एक बडा प्रसिद्ध संदेश था, ''पापी अपना मन स्वयं परिवर्तित कर सकते हैं'' (१८३१) परमेश्वर को उसने बाहर कर दिया, और मनुष्य, स्वयं के प्रयास से, मानवीय निर्णय लेते हुये अपना मन परिवर्तन स्वयं कर सकता है। फिने के पहले मेथोडिस्ट, इस बात को नहीं मानते थे। आयन एच मुर्रे ने निष्कर्ष दिया कि फिने की विचारधारा न्यू इंग्लैंड के उदारवादी जैसे नथानियल टेलर से प्रेरित थी, न कि पूर्वी मैथोडिस्टों से (आयन एच मुर्रे, रिवाईवल एंड रिवाईवलिज्म, बैनर आँफ ट्रूथ, २००९ संस्करण, पेज २५९−२६१) मेथोडिस्ट ने यह कभी नहीं कहा कि, ''पापी अपना मन स्वयं परिवर्तित कर सकते हैं''! जॉर्ज स्मिथ ने हिस्ट्र आँफ वेस्लीयन मेथोडिज्म, में आत्मिक जागृति की निम्नलिखत परिभाषा दी,

एक जागृति, आखिरकार, परमेश्वर के आत्मा का अनुग्रह होता है जो मनुष्यों पर बरसता है; और, अपनी प्रकृति में, पवित्र आत्मा के साधारण नियमित तरीकों से इस बात में अलग होता है, कि यह मनुष्य को प्रदीप्त और परिवर्तित करता है, जिसका प्रभाव व्यापक और अति गहराई लिये हुये होता है (जॉर्ज स्मिथ, रिवाईवल, वॉल्यूम २, १८५८, पेज ६१७)

यह मेथोडिस्ट की आत्मिक जागरण और मन परिवर्तन के लिये दी गई परिभाषा है। यह परिभाषा फिने के पहले किसी भी प्राटेस्टेंट या बैपटिस्ट डिनोमिनेशन से दी गई थी किंतु पाखंडी और झूठे फिने की गलत परिभाषा इतनी प्रसिद्ध हो गई कि उसने तस्वीर से परमेश्वर को ही बाहर कर दिया। फिने के आगमन के पश्चात, वे यह तक नहीं पहचान पाये कि वे ''निकम्में, परेशान, गरीब, दृष्टहीन, और निर्वस्त्र थे'' (प्रकाशितवाक्त ३:१७) फिने के बाद, वे यह तक नहीं पहचान पाये कि परमेश्वर ने ''अपनी उपस्थति हटा ली'' और ''अपने स्वयं के स्थान'' पर वापस लौट गया।

जॉर्ज स्मिथ का कथन बताता है कि पूर्वी मैथोडिस्ट यह मानते थे कि प्रत्येक जन का मन परिवर्तन और आत्मिक जागृति पूर्णत: परमेश्वर के अनुग्रह का परिणाम है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा घटित होता है। फिने के द्वारा इवेंजलिज्म को नष्ट करने के कालखंड के पहले प्राटेस्टेंट और बैपटिस्ट तो यही विश्वास करते थे। विशाल डिनोमिनेशंस का प्राचीन नजरिया फिने के पेलाजियानिस्ट मत से कहीं अलग था, जो उसने अपने संदेश में प्रचार किया था, ''पापी अपना मन परिवर्तन स्वयं कर सकते हैं।'' आप कैसे यह कर सकते हो? मैंने तो सात सालों तक कोशिश की! यह नहीं हो सकता है। मैं अपने अनुभव से यह जानता हूं!

फिने वह आदमी था जिसने आगे बुलाने की आँल्टर कॉल की पद्धति को आरंभ किया, उसने भटके हुये पापियों को कहा कि वे ''आँन द स्पॉट'' त्वरित निर्णय ले सकते हैं जो उनकी अपनी इच्छा से प्रेरित होगा। जैसा कि डॉ मेकलफलीन ने कहा, फिने ने ''इवेंजलिज्म को पूरी प्रकिृया और दर्शन को ही बदल कर रख दिया'' (उक्त संदर्भित)। आज, इवेंजलिज्म की तमाम शाखायें भटके हुयी भीड से हाथ खडा करवा रही है जो कि एक मानवीय कृत्य है, उन्हें कहती है कि ''पापियों वाली दुआ को दोहराओ,'' या उन्हें सभा स्थल में आगे बुलाती है यह कहकर कि ''यही निर्णय की घडी'' है। यह ''निर्णयवाद'' की खोज एक पाखंडी, विधर्मी आदमी चाल्र्स जी फिने की शिक्षाओं का प्रभाव है!

यह आगे जाना और निर्णय लेने की पद्धति जंगल में आग की तरह फैली और बडी प्रसिद्ध हो गई ''जल्दी और शीघ यीशु को ग्रहण करें।'' पवित्र आत्मा का कोई कार्य नहीं कि वह लोगों के मन में पापों का बोध उत्पन्न करे, तब मसीह के पास उस व्यक्ति को खींच लाये। फिने ने पूरे इवेंजलिज्म को एक विशाल भीड में बदल दिया जो नये ''मसीही'' कहलाने लगे किंतु भीड से निकला ''उत्पाद'' कभी मसीही नहीं हो सकता! इसलिये उसके बाद आने वाले विशाल प्राटेस्टैंट और बैपटिस्ट डिनोमिनेशंस नष्ट हो गये! प्रत्येक ''उदारवादी'' ने बिना बचे ही निर्णय ले लिया! यह प्राटेस्टैंट उदारवाद इस तरह पैदा हुआ!

आयन एच मुर्रे ने कहा था, ''यह विचारधारा कि मन परिवर्तन मनुष्य के प्रयासों का फल है (हिस्सा है) इवेंजलिज्म का हिस्सा बन गया, जैसे मनुष्य यह भूल गया कि उसे पुर्नजीवन देना परमेश्वर का कार्य है, वैसे ही आत्मिक जागृति भी परमेश्वर के आत्मा का कार्य है यह विश्वास ही गायब हो गया। (यह) सब सीधे सीधे फिने के धर्मविज्ञान का असर था'' (रिवाईवल एंड रिवाईवेलिज्म, बैनर आँफ ट्रुथ, १९९४, पेज ४१२−४१३)

''शीघ्र आओ शीघ्र पाओ'' वाली पद्धति को परमेश्वर ने कभी आशीष नहीं दी। और इसके बदले, नकली रूप से बचे लोगों से प्राटेस्टैंट और बैपटिस्ट चर्च भरते चले गये। अभी भी प्राटेस्टेंट चर्चेस में भटके लोगों की इतनी भीड बढ गई है कि कई प्रचारकों को लगता है कि रविवार की संख्या का चर्च ही बंद कर दिया जाये।

मैंने एक पास्टर की पत्नी से पूछा कि उनके पति ने शाम की आराधना क्यों बंद कर दी। उसने बताया, ''लोगों ने धमकी दी थी कि वे नहीं आने वाले हैं।'' उनके चर्च के भटके लोग झगडते रहते थे जिसका परिणाम था कि वे धमकियां देने लगे थे यह भीड पूर्णत: ''निर्णयवाद'' का उत्पाद थी। ईश्वर ऐसे लोगों को माफ करे! बिना प्राचीन तरीके के, बाईबल पर आधारित मन परिवर्तन की पद्धति के, हमारा नाश होना तय है! हम खुद को नहीं बचा सकते। केवल परमेश्वर आत्मिक जागृति भेज सकता है। निर्णयवाद ने परमेश्वर का इंकार किया है और मनुष्य को सिंहासन पर बैठा डाला। प्रभु परमेश्वर ने कहा,

''जब तक वे अपने को अपराधी मान कर मेरे दर्शन के खोजी ना होंगे तब तक मैं अपने स्थान को लौटूंगा.......'' (होशे ५:१५)

यही वास्तविक कारण है कि अमेरिका या युनाईटेड किंगडम में सौ सालों में कोई विशाल आत्मिक जागरण नहीं फैला!

पापी को परमेश्वर के सामने अपने मन में दीन बनना होगा। निर्णय लेना सामने जाना किसी भी जन को नम्र नहीं बनाता है। पापी ऐसे ''सामने'' चला जा रहा है जैसे कोई योद्धा हो, बहादुर कार्य करने के लिये जा रहा हो। न उसका दिल टूटा है, न आंसू बहे, न आत्मा बैचेन हुई, न अपने किये का कोई पछतावा हुआ। बिलीग्राहम की अंतिम क्रूसेड केलीफोर्निया, के पासादेना में, नवंबर, २००४ में हुई मैंने और मेरी पत्नी ने देखा बिलीग्राहम के आँल्टर कॉल देने पर लोग हंसी खुशी बातें करते हुये आगे भागे चले जा रहे हैं और वहां आगे उनका नाम पता भरने वालों की भीड भी उतनी मुस्तैदी से तैयार खडी है। प्राचीन दिनों की आत्मिक जागृति से यह कितना अलग रूप दिखाई देता है, जब फिने नामक पाखंडी नहीं हुआ था। सन १८१४ में मेथोडिस्ट की एक सभा का वर्णन सुनिये।

अगली रात, एक ओर प्रार्थना सभा में, कईयों के मन पाप का अहसास होने से जकड गये, और उनकी आत्मा में ऐसा दर्द पैदा हुआ और लंबे समय तक प्रार्थना कर करके उन लोगों को मसीह की शरण में शांति मिल गई......वे पुरूष और स्त्रियां और जवान जो अभी तक ईश्वरविहीन जीवन बिता रहे थे अब अपनी आत्मा पर पडे सैंकडो मन बोझ से व्यथित थे और तब उन्हे उनके मन में यह लगने लगा कि परमेश्वर उनके साथ रहना चाहता है वह उन्हें यीशु मसीह की अच्छाइयों के आधार पर पापों से मुक्ति देना चाहता है (पॉल जी कुक, फायर फ्राम हेवन, ई पी बुक्स, २००९, पेज ७९)

क्या आपको कभी ''आपके पापों ने कचोटा है?'' क्या आपने कभी ''अपनी आत्मा में भयंकर बैचेनी और दर्द'' महसूस किया है और आपको तब जाकर ''मसीह की शरण में शांति मिली'' है? रेव्ह ब्रायन एच एडवर्ड ने कहा,

यह जैसे पापों के गहरे बोध से प्रारंभ हुआ......लोग अनियंत्रित होकर रोने लगे जैसे बिल्कुल असहाय हों......बिना अपने पापों के असहाय हो जाने और उस पर दुखित होने के कोई आत्मिक जागृति कभी नहीं होती.......बिना आत्मा में व्याकुलता, बैचेनी और पाप से निकलने की गहरी इच्छा के......आत्मिक जागरण नहीं होता। एक चश्मदीद ने चीन की १९०६ की आत्मिक जागृति सभा का वर्णन किया: ''पूरा सभा स्थल मानो आत्मिक द्वंद में फंसा हुआ था और आत्मायें यीशु की दया पाने के लिये रो रही थीं'' (ब्रायन एच एडवर्ड, रिवाईवल: ए पीपल सेचुरेटेड विथ गॉड, इवेंजलीकल प्रेस, १९९१ संस्करण, पेज ११५,११६)

आप में से कुछ अभी ''सीख'' रहे होंगे कि कैसे बचा जाये। अजीजों, उद्धार पाना सीखा नहीं जा सकता! यह तो अनुभव किया जाना आवश्यक है, यह महसूस किया जाना जरूरी हैं, यह आपके साथ होने वाला अनुभव है इसलिये आपको इसे जानना चाहिये। अगर आप इसके बारे में जानते हैं, तो आपको उद्धार के विषय में महसूस करना आना चाहिये। और सबसे पहले तो आपको खुद से पूछना आना चाहिये कि क्या मैं पापी हूं अपने आपको पापी मानने का अहसास गहराई से पैदा होना चाहिये। तब आपका मन चीत्कार उठना चाहिये,

''मैं कैसा अभागा मनुष्य हूं! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?'' (रोमियों ७:२४)

डॉ ल्योड−जोंस ने कहा कि यह एक बैचेन और अपने पापों को स्वीकारने वाले पापी की चीत्कार है− मैं इस चीख से सहमत हूं! मैंने स्वयं अपनी आंखों से लोगों की आत्मा की चीत्कार को महसूस किया है जब परमेश्वर अपना आत्मा व्यक्तियों के मन परिवर्तन के लिये भेजता है।

फस्र्ट चाइनीज बैपटिस्ट चर्च में १९६० के उत्तरार्ध में जो आत्मिक जागृति फैली, तब डॉ तिमोथी लिन ने हमसे लगातार यह गीत गवाया,

''ओह पिता, मुझे खोज, मेरे मन को जान ले:
मेरे विचारों को जांच ले मुझे खोज:
मेरे मन को जान ले पिता;
मुझे जांच और मेरे विचारों को खोज;
देख ले पिता मेरे अंदर कितनी दुष्टता भरी है,
अब उसे बाहर कर और अनंत मार्ग पर ले चल।''
   (भजन १३९:२३, २४ विस्तारित)

निवेदन है अपने स्थान पर खडे होकर इसे गायें। यह गाने की पुस्तिका में ८ संख्या पर है। जब आपको अपने दिमाग और मन में अपने पापों का गहराई से बोध होगा तो मसीह के लहू से पापों की सफाई आपको स्वयं को महत्वपूर्ण महसूस करवा देगी! डॉ चान, निवेदन है प्रार्थना में हमारी सहायता करें। आमीन!

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें द्वारा: होशे ५:६−१५
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''परमेश्वर के नजदीक चलना'' (विलियम कूपर, १७३१−१८००)