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सच्ची आत्मिक जागृति के मुख्य लक्षण

(आत्मिक जागृति पर संदेश ९)
THE MAIN FEATURES OF TRUE REVIVAL
(SERMON NUMBER 9 ON REVIVAL)
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, २८ सितंबर, २०१४ को लॉस एंजिलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord's Day Evening, September 28, 2014


पेंतुकुस्त के दिन पतरस खडा हुआ और योएल की पुस्तक से उद्धरण देने लगा,

''कि परमेश्वर कहता है, कि अन्त कि दिनों में ऐसा होगा, कि मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उंडेलूंगा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियां भविष्यद्वाणी करेंगी और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे, और तुम्हारे पुरिनए स्वप्न देखेंगे। वरन मैं अपने दासों और अपनी दासियों पर भी उन दिनों में अपने आत्मा में से उंडेलूंगा, और वे भविष्यद्वाणी करेंगे।'' (प्रेरितों के कार्य२:१७, १८)

परमेश्वर ''अपनी'' आत्मा आत्मिक जागृति के दिनों में उंडेलता है। वह कहता है, ''मैं अपनी आत्मा में से उन दिनों में उंडेलूंगा।'' कितनी अजीब बात है कि अधिकतम आधुनिक अनुवाद ''में से'' शब्द को छोड देते हैं। यह यूनानी पाठ में तो अवश्य मिलता है। यूनानी में तो हूबहू नकल है। पुरानी जिनेवा बाईबल में भी ''अपनी आत्मा में से'' अनुवाद दिया गया है। किंग जेम्स में भी, ''अपनी आत्मा में से'' दिया गया है। किंतु एन ए एस वी और एन के जे बी भी जो आधुनिक अनुवाद में गिने जाते हैं उनमें ये शब्द नहीं मिलते हैं। इसलिये मैं उन पर भरोसा नहीं करता। इसलिये मैं आपको कहता हूं कि किंग जेम्स बाईबल को प्रयुक्त कीजिये। आप उस पर भरोसा कर सकते हैं। ये पुराने अनुवाद कोई भी शब्दों को छोडते नहीं हैं या फिर उस अर्थ के ''बराबरी का कोई शब्द'' प्रयोग में लायेंगे। ''मैं उन दिनों में अपनी आत्मा में सेउंडेलूंगा।'' उदारवादी कहते हैं, ''यह सप्तुआजिंट है।'' मैं कहता हूं, यह बकवास है! यह यूनानी नये नियम के पेज पर पवित्र आत्मा ने लिखा − और पवित्र आत्मा कभी झूठ नहीं बोलता! जब परमेश्वर का आत्मा बोलता है, तो उसकी प्रेरणा से हू ब हू यूनानी शब्दों का अर्थ ''फूंका जाता'' है। ''अपनी आत्मा में से।'' आखिर ये शब्द इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं? मैं आपको बताउंगा कि ये क्यों महत्वपूर्ण हैं? परमेश्वर अपनी संपूर्ण आत्मा नहीं उंडेलता है। वह उतनी ही आत्मा भेजता है जितना आवश्यक है! जॉर्ज स्मेटन, ने १८८२, में कहा था, ''परम पवित्र के कहे गये शब्दों का अर्थ 'अपनी आत्मा में’ (एपो) का अर्थ जरा भी नहीं खोता है जब यह उस नाप का वर्णन करता है जो (दिया जाता) है मनुष्यों को और उस (असीमित) सोते से जो लबालब भरा है'' (जॉर्ज स्मेटन, दि डाक्टरीन आँफ दि होली स्पिरिट, १८८२; रिपिंटेड बॉय दि बैनर आँफ ट्रूथ, १९७४; पेज २८)।'' प्रेरिताई चर्चेस को बार बार पवित्र आत्मा का अभिषेक मिलता रहता था क्योंकि वे हमेशा उसे बांटते रहते थे! अगर यह ''एपो'' में से से संबंधित है, तो यहां डॉ ए टी रॉबर्टसन (का) कथन इस प्रकार है, ''आत्मा अपने संपूर्ण रूप में परमेश्वर के साथ निवास करता है'' (वर्ड पिक्चर्स इन दि न्यू टेस्टामेंट, वाल्यूम ३, ब्राडमेन प्रेस, १९३०, पेज २६; प्रेरितों के कार्य २:१७ पर व्याख्या) ।

मैं इतना अधिक आशीषित स्वयं को मानता हूं कि मैंने परमेश्वर द्वारा भेजी गई तीन आत्मिक जागृति देखी है। मैं आयन एच मुर्रे से पूर्णत: सहमत हूं, जब उन्होंने कहा, ''किसी आत्मिक जागृति का गवाह बनना निश्चत ही उस बारे में कहना है जो पहले कभी नहीं मिला था'' (आयन एच मुर्रे, पेंटीकोस्टल टूडे? दि बिब्लकल बेसिस फॉर अंडरस्टैंडिग रिवाईवल, दि बैनर आँफ ट्रुथ ट्रस्ट, १९९८, पेज २२) उल्सटर की आत्मिक जागृति जो १८५९ में हुई थी उसके एक गवाह ने कहा था, जो उत्तरी आयरलैंड के निवासी थे, ''मनुष्यों को ऐसा लगा मानो परमेश्वर ने अपना आत्मा उन पर फंका हो। वे पहले तो डर और भय से कांप गये − उसके बाद वे आंसुओं में नहा गये − और उसके बाद बता न सकने वाले प्रेम से भर गये'' (विलियम गिबसन, दि ईयर आँफ ग्रेस, ए हिस्ट्री आँफ दि उल्स्टर रिवाईवल आँफ १८५९, इलियट, १८६०, पेज ४३२) २९ फरवरी, १८६० को रेव्ह डी सी जोंस ने कहा था, ''हमें पहले से कहीं अधिक मात्रा में आत्मा का प्रभाव महसूस हुआ। यह ‘तेज हवा के झोंके के समान आया,’ और......तब आया जब चर्चेस ने इसकी कम अपेक्षा की थी'' (मुर्रे, उक्त संदर्भित, पेज २५) तो इस तरह पहली से लेकर तीसरी बार तक मैंने आत्मिक जागृति को देखा। पवित्र आत्मा इतना अचानक और अनअपेक्षित रूप से नीचे उतर आया कि जब तक मैं जीवित रहूंगा यह अनुभव भूल नहीं पाउंगा!

अब जो बात, आत्मिक जागृति में, ध्यान देने योग्य है कि इसमें कुछ घटनायें उपरी रूप में दिखाई देती हैं, जो केंद्रीय रूप में मौजूद नहीं होती हैं। ये कुछ घटनायें कुछ आत्मिक जागृतियों में, होती हैं। परन्तु हर जागृति का लक्षण नहीं होती हैं। मैं उनमें से कुछ का नाम लूंगा। डॉ ल्योड −जोंस की पुस्तक, जागृति में से कहीं कहीं से कुछ बिंदु लिये गये हैं (क्रास वे बुक्स, १९८७) और कुछ मेरे अपने निजी अनुभव और परीक्षण से जो मैंने आत्मिक जागृति में देखे हैं वर्णन कर रहा हूं।

१. अन्य भाषा में बोलना। पेंतुकुस्त की प्रथम आत्मिक जागृति में, हमें बताया गया है कि वे ''जिस प्रकार आत्मा ने उन्हें बोलने की सामर्थ दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे'' (प्रेरितों के कार्य २:४) हमारे कई पेंटीकॉस्टल मित्र इसे एक केंद्रीय लक्षण प्रगट करते हैं, कि प्रत्येक आत्मिक जागृति में इसे घटना आवश्यक है। किंतु उनके इस दावे को खारिज करने के दो मुख्य कारण हैं: (१) ''अन्य अन्य भाषा'' प्रेरितों के कार्य २ में कोई उन्मादी भाषा का प्रवाह नहीं था। वे तो वास्तव में अपने अपने स्थानों की भाषा बोल रहे थे जो विदेशी भाषायें थी। यह प्रेरितों के कार्य २:६−११ में बहुत स्पष्ट दिया गया है। ''हर एक को यही सुनाईं देता था, कि ये मेरी ही भाषा में बोल रहे हैं।'' (प्रेरितों के कार्य २:६) ''तो फिर क्यों हम में से हर एक अपनी अपनी जन्म भूमि की भाषा सुनता है?'' (प्रेरितों के कार्य २:८)। तब भाषा समूहों की एक लंबी सूची दे रखी है, जो इन शब्दों के साथ समाप्त होती है, ''परन्तु अपनी अपनी भाषा में उन से परमेश्वर के बड़े बड़े कामों की चर्चा सुनते हैं।'' (प्रेरितों के कार्य २:११) इसलिये यह तो बहुत स्पष्ट है कि वे किसी उन्माद में होकर नहीं बोल रहे थे, जैसा आजकल के पंटीकोस्टल और करिश्माई लोग करते हैं। मैं जानता हूं वे इसके लिये दूसरे पदों का भी दावा करते हैं। मैं इस विषय पर यहां नहीं बोलूंगा। मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हूं कि वे लोग पेंतुकुस्त के दिन विदेशी भाषा में बोल रहे थे जो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो, ''आत्मा ने उन्हें बोलने का प्रवाह दिया हो'' (२:४) मुझे इसमें कोई संशय नहीं है कि यह एक चमत्कार था। किंतु फिर भी यह उस जागृति का मुख्य भाग नहीं था, क्योंकि प्रेरितों के कार्य में दूसरी भी जागृतियां बतलाई गई है जहां अन्य भाषा बोलने जैसी घटना नहीं हुई। (२) बीसवीं शताब्दी की प्राटेस्टेंट आत्मिक जागृतियों में ऐसा कोई उन्मादी प्रवाह देखने को नहीं मिला अन्य जागृतियों की तुलना में, बल्कि फिने की सभाओं में भी ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया। निवेदन कर रहा हूं कि मुझे सुनना बंद मत कीजियेगा। बाकि की बातें जो मैं कहने जा रहा हूं उससे आप सहमत हो जायेंगे। जितनी कृत्रिम आत्मिक जागृतियां हुई उसमें सब प्रकार के ''निर्णयवाद'' सम्मिलित हैं, वे न केवल पेंटीकोस्टलवाद और करिश्माई पंथ से संबंधित थी, बल्कि हमारे समय की झूठी ''जागृतियां'' भी उसमें गिनी जाती है। जितनी जालसाजी वाली जागृतियां आज के युग में फैल रही है उन सब की जड इसमें छुपी है कि वे जल्द से जल्द व्यक्ति को ''निर्णयवाद'' पर पहुंचाकर फार्म भरवा लेते हैं। यद्यपि, मैं यह जानता हूं कि कुछ पेंटीकोस्टल और करिश्माई पंथ के लोग भी वास्तव में बचाये गये हैं। किंतु बीसवी शताब्दी के पहले का इतिहास भी गवाह है कि प्राटेस्टेंट आत्मिक जागरण में अन्य अन्य भाषा बोलना कभी एक प्रमुख हिस्सा नहीं रहा है, जैसा कि पेंटीकोस्टल अन्य भाषा के गुण को बढा चढाकर बताते हैं।

२. ''फटी हुई जिव्हा जैसी आग का दिखाई देना'' (२:३) यह सिर्फ एक बार की ही घटना थी। पूरे मसीही इतिहास में, या प्रेरितों की पुस्तक में यह अन्य आत्मिक जागृतियों के वर्णन में दुबारा कभी नहीं घटा।

३. दुष्टात्मायें चीख रही थी जब उन्हें निकाला गया। (प्रेरितों के कार्य ८:७) और कई लोगों को चंगाई मिली (८:७) पेंतुकुस्त के दिन की जागृति में ऐसा कोई लक्षण प्रगट नहीं हुआ! इसलिये, किसी भी आत्मिक जागरण सभा का यह भी मुख्य भाग नहीं है कि दुष्टात्मायें भागेंगी ही। प्रेरितों के कार्य की आत्मिक जागृतियों में भी दुष्टात्माओं के निकाले जाने का कहीं वर्णन नहीं है। मैं यह जानता हूं कि इस प्रकार की ''हास्यास्प्रद आत्मिक जागरण सभायें'' (तथा−कथित) इन सब ढोंग को प्रमुख भाग बनाती हैं, किंतु ऐसा करना सरासर गलत है। मसीही इतिहास में सैंकडों ऐसी जागृतियां प्रगट हुई है जहां ऐसी कोई घटनाये नहीं घटी − और ऐसी कितनी ही जागृतियों का वर्णन स्वयं बाईबल के प्रेरितों के कार्य में है।

४. प्रेरितों के कार्य ४:१−४ में दर्ज बडी आत्मिक जागरण सभा के पश्चात प्रेरितों को जेल में डाल दिया गया। किंतु हर बार सभी जागृतियों के साथ प्रेरितों के कार्य में कैदखाने का वर्णन नहीं मिलता है। कभी कभी मसीही इतिहास में ऐसा घटित हुआ होगा, किंतु हर बार ऐसा हो यह जरूरी नहीं था। इसलिये हम इस निष्कर्ष पर भी पहुंच सकते हैं कि प्रचारकों का जेल में डाला जाना जागृति का मुख्य लक्षण नहीं है।

५. प्रेरितों के कार्य ४:३१ बताता है कि घर हिल गया था। मैं जानता हूं कि इल आँफ लेविस की जागृति के आरंभ में ऐसा भी हुआ था, जहां सन १९४० के उतरार्ध में डंकन कैंपबेल ने प्रचार किया था। किंतु प्रेरितों के कार्य पुस्तक में हर कहीं इसका उल्लेख नहीं है, और न ही जातियों के इतिहास में ये कहीं दर्ज है। इसलिये हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि घर का हिलाया जाना भी आत्मिक जागरण का मुख्य लक्षण नहीं है।

६. प्रेरितों के कार्य १९:१९,२० में इफिसुस में पोथियों के जलाये जाने का वर्णन है। हां, इफिसुस में, आत्मिक जागरण के समय वहां, लोगों ने जादू की पोथियां एकत्रित करके जला डाली, ''यों प्रभु का वचन बल पूर्वक फैलता गया और प्रबल होता गया'' (१९:२०) मैंने वर्जीनिया के फंडामेंटल बैपटिस्ट चर्च में एक जागरण के दौरान ऐसा देखा था। किंतु फस्र्ट चाईनीज बैपटिस्ट चर्च के जागरण के दौरान ऐसी कोई पुस्तकें नहीं जलाई गयी। प्रेरितों के कार्य में अन्यत्र कहीं भी पुस्तकें जलाये जाने का कोई वर्णन नहीं है। इसलिये, मैं यह निष्कर्ष निकालता हूं कि यह भी एक सतही घटना है, न कि आत्मिक जागृति सभा का कोई मुख्य लक्षण है।

७. खुले रूप में पापों का स्वीकारना। हां, लोग सभाओं में लोगों की भीड में अपने पापों को स्वीकार करते हैं। ऐसा कभी कभी होता है − वेल्स की १९०४ की जागरण सभा में ऐसा हुआ, केंटकी के आँसबरी कॉलेज में १९६० में ऐसा हुआ, फस्र्ट चाइनीज बैपटिस्ट चर्च में ऐसा हुआ, और अन्यत्र भी ऐसा हुआ। किंतु पेंतुकुस्त के दिन ऐसा नहीं हुआ, न ही पहली बडी जागृति में ऐसा घटा, न ही अन्य कई जागृति सभाओं में यह घटा। इसलिये, हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिये कि मंडली के समक्ष, खुले रूप में अपने पापों को स्वीकारना भी एक अलग घटना है, जो आत्मिक जागरण का मुख्य भाग नहीं है।

८. चीखना और फर्श पर गिर जाना। हां, ऐसा कुछेक जागरण सभाओं में हुआ जैसे नार्थ हैंपटन में, जोनाथन एडवर्ड चर्च में, दूसरी विशाल जागरण सभा में जब कैंबसलैंग, स्कॉटलैड में उन्होंने विशाल सभा ली वहां कुछ सभाओं में ऐसा हुआ था। किंतु सी एच स्पर्जन ने लंदन में जो तीसरी विशाल जागृति सभा ली उसमें ऐसा कहीं नहीं हुआ। मैं तो बाईबल से बता सकता हूं कि पेंतुकुस्त के दिन भी ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसलिये, चीखना और फर्श पर गिर जाना आत्मिक जागरण का मुख्य लक्षण नहीं है। तीसरी बडी आत्मिक सभा जो लंदन में सी.एच.स्पर्जन की देखरेख में हुई थी वहां भी ऐसा कोई लक्षण परिलक्षत नहीं हुआ। बाईबल से हम पक्का कर सकते हैं कि पेंतुकुस्त के दिन ऐसी कोई घटना नहीं हुई। इसलिये, चीखना और फर्श पर गिरना किसी आत्मिक जागृति सभा का मुख्य लक्षण नहीं है। यह हो सकता है, किंतु यह आत्मिक जागृति के दौरान होना ही है यह आवश्यक नहीं। और इवेंजलिस्ट द्वारा उनके माथे पर छूने के बाद ''वे आत्मा में झकझोर दिये'' जाते हैं यह भी कितनी जागृतियों में देखा जाता है, किंतु ऐसा करना किसी भी मसीही इतिहास में नहीं हुआ (अध्याय छ: आयन एच.मुर्रे की पुस्तक, पेंटीकोस्ट टूडे? दि बिब्लकल बेसिस फॉर अंडरस्टैंडिंग रिवाईवल, बैनर आँफ ट्रूथ, १९९८ पेज १३४−१६९)


मैं यह नहीं कहता कि ये चीजें कभी नहीं होती हैं, किंतु ये मुख्य लक्षण नहीं है, न सदियों से चली आ रही जागृति के बारे में सत्य है। अगर हम इन चीजों को देखेंगे, तो हम यह पायेंगे कि हम ढगे गये हैं, या तो यह मूर्खता है या स्वयं शैतान हमें ढग रहा है! डॉ मार्टिन ल्योड − जोंस ने कहा था, ''आप को किनारे पर उपस्थत बातों को प्राथमिक और प्रमुख लक्षण नहीं बनाना चाहिये'' (रिवाईवल, क्रास वे बुक्स, १९८७, पेज ६०) एक सबसे भददी सभा मैंने आत्मिक जागरण के नाम से फलोरिडा, में देखी थी जिसे ''हंसने वाली सभा'' का नाम दिया गया वहां सभी हंस रहे थे और यह सिद्ध करना चाह रहे थे कि हंसना आत्मिक जागरण सभा का एक भाग है! डॉ आर्थर बी हॉक और मैंने एक रात पासादेना में ''जागृति'' का एक और खतरनाक उलट रूप देखा, जहां लोग शेर की तरह गुर्राते थे और बंदरो की तरह चीखते थे! मैं तो समझ नहीं पाया कि ऐसा करने से उन्हे क्या हासिल हो रहा था! ये और कुछ नहीं सिर्फ निम्न स्तर का भीड का पागलपन था! निश्चत ही इन सबमें मसीह कहां था?

९. आप आत्मिक जागरण को जबरदस्ती नहीं ''बुला'' सकते हैं। यह तो ''निर्णयवाद'' से जन्म लेता है। यहां तक कि उपवास और प्रार्थना भी जागृति का होना संभव नहीं बना सकते। चाल्र्स जी फिने ने (१७९२−१८७५) में जो शिक्षायें दी उसमें मसीहियों के किया कलापों ने आत्मिक जागरण का ऐसा रूप बना दिया। इस शिक्षा ने इतनी हानि पहुंचाई कि लोग ऐसा सोचने लगे कि आत्मिक जागरण उन पर निर्भर करता है बजाय परमेश्वर के। यह तो परमेश्वर के अधिकार और इच्छा की बात है कि वह कब मनुष्यों के बीच आत्मिक जागृति भेजेगा। हम जागृति के बारे में जरा सा भी आश्वासन नहीं दे सकते हैं। यह तो पूर्णत: परमेश्वर के हाथों में है। ''सामर्थ परमेश्वर की है।'' भजन ६२:११ (देखें आयन एच. मुर्रे, पेंटीकोस्ट टूडे?, दि बेनर आँफ ट्रुथ ट्रस्ट,१९९८,पेज ८−१६)


तो फिर, एक सच्ची आत्मिक जागृति में क्या होता है? ऐसी जागृति के लक्षण क्या हैं? डॉ ल्यॉड जोंस ने ऐसी कई बातों की सूची दी है जिससे हम सच्ची आत्मिक जागृति को पहचान सकते हैं। उन्होंने अपनी महान पुस्तक, रिवाईवल में, पंतुकुस्त के दिन पर आधारित कुछ बातों के अध्ययन से पहचाना है, कि इसके मुख्य लक्षण कौन−कौन से हैं (उक्त संदर्भित, पेज २०४−२११)

१. परमेश्वर स्वयं इस सभा में उतर आता है। प्रत्येक जन उसकी उपस्थति को महसूस करता है, उसे महिमा, और सामर्थ प्रदान करता है। ऐसा होता है, कुछ हद तक, कुछ सीमा तक, चर्च ने अभी तक जितनी भी सच्ची आत्मिक जागृतियां देखीं है। (आपको बताये जाने की आवश्यकता नहीं है कि परमेश्वर वहां है। आप तो स्वयं जानते हैं कि वह वहां है! यह मेरा अपना अनुभव है जो मैंने जागृति के समय देखा है। इन सभाओं में आश्चर्य और अदभुत बातों का अहसास होता है। लोग आश्चर्य से भर जाते हैं, पवित्र परमेश्वर की उपस्थति को महसूस करते हैं)

२. चर्च को यही प्राप्त होता है, जो परिणाम होता है, एक बडा भरोसा किसी महान सत्य का! लोग बाईबल के सत्यों के प्रति पूर्ण रूप से निश्चंत हो जाते हैं। आत्मिक जागृति का यही वैश्विक अनुभव है।

३. चर्च बडे आनंद और प्रशंसा के भाव से भर जाता है। लोग एकाएक जान जाते हैं कि प्रभु उनके बीच में उपस्थत है। ''लोगों के चेहरे का नूर यह बात बता देता है। वे मानो रूपांतरित हो जाते हैं। स्वर्गिक तेज उनके चेहरों पर प्रगट होने लगता है, जो उन्हें और अधिक आनंद मग्न और प्रशंसा से भरपूर दिखाता है....उनके संपूर्ण व्यक्तित्व से आत्मा का प्रकाश झांकने लगता है, और 'बता न सकने वाले' आनंद प्रगट होता है, जो केवल परमेश्वर की महिमा से भरा होता है'' (ल्योड जोंस, उक्त संदर्भित, पेज २०६)

४. जब जागृति आती है तो आपको लोगों को चर्च आकर आराधना करने और प्रचार सुनने के लिये प्रेरित नहीं करना पडता है। वे तो स्वयं आना चाहते हैं। वे तो हर रात संख्या में बढते जाते हैं, और घंटो तक रूके रहते हैं, जैसा पेंतुकुस्त के दिनों में हुआ था।

५. एक नयी सामर्थ और हियाव प्रचार के दौरान देखने को मिलता है। सुसमाचार का सामर्थवान प्रचार सभी सच्ची और वास्तविक आत्मिक जागृतियों का मुख्य लक्षण है। प्रचार के समय एक नयी सामर्थ का अनुभव होता है। लोग ऐसे सुनते हैं जैसे उनका जीवन इस पर ही निर्भर करता है। जब आत्मिक जागृति आती है तो प्रचार स्वयं हजारों की भीड को खींच लेता है।

६. जब जागृति फैलती है तो लोग खुद ब खुद पाप के बोध में आ जाते हैं। जो खोये और भटके लोग होते हैं वे पाप के बोध से व्यथित होकर पीडा महसूस करते हैं। मैं सोचता हूं यह सबसे बडा प्रमाण है कि परमेश्वर ने चर्च में जागृति भेजी है। जो लोग अभी तक ठंडे और बेअसर थे अब वे कुछ ''चौक जाते हैं'' अपने पापों के बारे में सतर्क हो जाते हैं (ल्योड−जोंस, उक्त संदर्भित, पेज २०९) यह इस बात का प्रमाण है कि पवित्र आत्मा उन्हें पापों का बोध देने उपस्थत हुआ ''उनके पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय में''' (यूहन्ना १६:८) पेंतुकुस्त के दिन वे इतने अधिक पाप के बोध से बोझिल हो गये कि रोने लगे, ''हे भाइयों हम क्या करें'' (प्रेरितों के कार्य २:३७) लगभग हर सच्ची आत्मिक जागृति में यही होता है। अगर जिस जागरण सभा में पाप का बोध नहीं हो लोगों के मन न छिदें तो समझ लीजिये कि वह जागृति सभा नकली है। पापों का बहुत गहरा बोध होना आवश्यक है जोसभी सचची जागृति में देखने को मिलता है (ल्योड−जोंस, उक्त संदर्भित, पेज २०९)

७. लोग मसीह पर विश्वास करेंगे और पापों की क्षमा प्राप्त करेंगे। वे एकाएक पायेंगे कि यीशु के द्वारा ही उद्धार की आशा है। वे केवल ''निर्णय ही नहीं लेते'' है बल्कि पूर्ण आश्वस्त हो जाते हैं। वे मसीह की शरण में आते हैं और नया जीवन ''प्राप्त करते हैं'', वे पुराना जीवन त्याग देते हैं क्योंकि अब वे यीशु के द्वारा बचाये गये हैं। वे मसीह के प्रेम और मसीह के रक्त के बारे में अधिक बात करते हैं। मसीह के द्वारा हमारे लिये रक्त बहाया जाना सभी सच्ची जागृतियों का मुख्य भाव होना चाहिये।

८. नये परिवर्तित लोग चर्च आने लगते हैं वे ''चर्च में मिला लिये जाते है'' (प्रेरितों के कार्य २:४७) किसी भी आत्मिक जागरण में लोगों के ''पीछे लगे रहने'' की आवश्यकता नहीं होती है। नये परिवर्तित लोग खुद ब खुद चर्च में आने लगते हैं − आप उन्हें चर्च की सभाओं में भी आने से रोक नहीं पाओगे! मैंने इसे पहली जागृति सभा में देखा था जिसका मैं गवाह था, और दूसरी सभाओं में भी देखा था। आपको परिवर्तितों के पीछे नहीं जाना पडता है। वे तो परमेश्वर की सामर्थ से स्वयं चर्च की संगति पाने के लिये खिंचे चले आते हैं। डॉ ल्योड−जोंस ने कहा था, ''जब पवित्र आत्मा अपनी सामर्थ में उतर कर आता है तो एक घंटे में भी वह घटित हो जाता है जो आपके कार्यों या मेरे कार्यो द्वारा पचास यहां तक कि सौ वर्षो में भी नहीं हो पाया....तो परमेश्वर से दुआ मांगिये कि वह हम पर दया करे, तरस खाये, और अपनी पवित्र आत्मा का तेज पुन: हम पर चमकाये'' (ल्योड−जोंस, उक्त संदर्भित, पेज २१०, २११)


अजीज मित्रों, अब अपने चर्चेस में जागृति का समय नहीं है, किंतु पवित्र आत्मा स्वयं आज भी लोगों को यीशु के पास खींच रहा है। मैं कितनी प्रार्थना करता हूं कि आप जल्द ही यीशु पर विश्वास लाये। यीशु आपके पापों से आपको मुक्ति देने के लिये कूस पर मरा। उसने अपना बेशकीमती लहू आपके समस्त पापों से शुद्ध करने के लिये बहाया। वह मरे हुओं में से जी उठा ताकि हमें अनंत जीवन मिल सके। मैं आपसे विनती करता हूं कि आप अभी यीशु पर विश्वास लाये, आत्मिक जागरण के आने के पहले भी आप ऐसा कर सकते हैं। डॉ चान, दुआ में हमारी अगुवाई कीजिये। आमीन!

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें द्वारा: प्रेरितों के कार्य ८:५−८
संदेश के पूर्व बैंजामिन किन्केड गिफिथ द्वारा एकल गीत गाया गया:
''जीवन की सांस'' (बेसी पी हेड,१८५०−१९३६)