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सोइये नहीं - जैसे दूसरे सो रहे हैं!

DON’T SLEEP – AS OTHERS DO!
(Hindi)

द्वारा डॉ. आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की सुबह, २२ जून, २०१४ को लॉस एंजीलिस के दि बैपटिस्ट टैबरनेकल में प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Morning, June 22, 2014

“इसलिये हम औरों की नाई सोते न रहें, पर जागते और सावधान रहे”
(१थिस्सलुनीकियों ५:६)


प्रेरित पौलुस यहां ''प्रभु के दिन'' के विषय में बोल रहा है। यह महान क्लेश का समय होगा और यह ''अचानक विनाश'' के रूप में आ पडेगा और जैसे ''प्रसव पीडा - बच्चा जनने की पीडा'' अचानक महिला को उठने लगती है जब प्रभु का दिन आयेगा, तब लाखों लोग इसके लिये तैयार भी नहीं होंगे हमारे चर्चेस के अधिकतर लोग तो जब प्रभु का दिन आयेगा और क्लेश व पीडा का काल आरंभ होते ही खडे+ न रह सकेगे !

किंतु प्रेरित ने यह भी कहा कि लोग ''अंधेरे मे नहीं हैं।'' वे बाईबल की इस भविष्यवाणी को जानते हैं। वे आने वाले क्लेश और व्यक्तियों के उठा लिये जाने के दिन होंगे। किंतु तभी वह कहता है, ''इसलिये हम औरों की नाई सोते न रहें; पर जागते और सावधान रहें।” वह हमें सत्योपदेश देता है कि हम अज्ञानवश सोते ही न रहें, हम कह सकते हैं कि जो सच्चे रूप में परिवर्तित लोग हैं वे तो ''सोते'' भी रहें तो कोई हानि नहीं है। यह भी निश्चत है कि जो लोग बचाये नहीं गये हैं वे अज्ञान की नींद में सोते पाये जाते हैं। मैं आज सुबह इन दोनों प्रकार के समूह को संबोधित करूंगा।

१. प्रथम, जो लोग नया जन्म पाये हुये हैं वे ऐसा कहें, ''इसलिये हम औरों की नाई सोते न रहें ।''

इसके उपर कोई प्रश्न ही नहीं है। सच्चे मसीह सो सकते हैं। दस कुंआरियों की कहानी इसे स्पष्ट करती है। यीशु ने कहा]

“जब दुल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गई।” ( मत्ती २५ : ५)

मेरे विचार में यह चित्रण कई सच्चे मसीहियों का है। वे गहरी नींद में हैं अचेतन अवस्था में हैं। आज सुबह हमारे चर्च के कुछ मसीहियो की भी यही हालत है।

एक मसीही सोया भी हो सकता है और अपनी इस अवस्था को जानता भी न हो। अगर आप कहते हैं, 'मैं सोया हुआ हूं'' तो यह एक चिन्ह है कि आप सोये हुए नहीं हैं। जो सचमुच में सोये हुये हैं वे इसके बारे में जानते भी नहीं हैं। आप को यहां चर्च में भी नींद आ सकती है और आपको कोई जगा भी नहीं सकता क्योंकि आपके कई मित्र भी चर्च में सो रहे होते हैं। अगर आपको कोई जगाने की चेष्टा करे, तो आप उसे अस्वीकार कर देते हो, या उनका न्याय करते हो और सोचते हो कि वे बहुत अधिक आलोचक हैं।

मसीही जन में सुप्त अवस्था बडी खतरनाक होती है क्योंकि आप जागते रहने का ढोंग रचते रचते सुप्त अवस्था में बहुत कुछ कर सकते हो। कुछ लोग सोते समय बात करते हैं। कुछ सोये हुये मसीहियों की बातें बडी जीवंत व जोशीली होती है। आप उनकी प्रार्थना सुनिये आप पहचान जायेंगे। वे प्रार्थना तो जोश खरोश के साथ करते हैं लेकिन आत्मिक रूप से सोये हुये ही हैं। प्रार्थना में जोर से चिल्लाना यह प्रदर्शित करता है कि वे नींद में, अवचेतन में प्रार्थना कर रहे हैं। बार बार वही शब्दों को दोहराते हैं। उन शब्दों में कोई उत्साह नहीं होता। जब वे प्रार्थना कर रहे होते हैं तो ऐसा लगता है कि वे औरों को भी सुला देते हैं। वे वास्तव में दिल से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं बल्कि प्रार्थना के शब्दों को दुहरा रहे हैं, जैसे कोई नींद में बातें कर रहा हो। जब एक जन प्रार्थना कर रहा होता है तो दूसरों के विचार प्रार्थना में भटक रहे होते हैं। वे प्रार्थना कर रहे व्यक्ति के साथ भी नहीं चलते कि उसके मांगने पर ''आमीन'' शब्द जोडे+। जब कोई सच्चे रूप में पूर्णत: जागा होता है तो उसकी प्रार्थना भी सामर्थवान और सजीव होती है, ऐसे लोगों की प्रार्थना सुनकर सुप्त अवस्था वाले - अचानक चौंक पड+ते हैं।

कई लोग सुप्त अवस्था में गाते भी हैं। जबकि दूसरे लोग दिल से गीत गा रहे होते हैं; सोये हुये लोग शब्दों को बुदबुदाते ही रहते हैं। उनके होंठ तो आवाज करते हैं कितु दिल उसमें नहीं होता। क्वायर का मुखिया उन्हे बार बार याद दिलाता है कि ''गाइये फिर गाइये!'' ऐसे लोगों के लिये बडा कठिन होता है यह जानना कि वे सो रहे हैं। क्योंकि वे प्रार्थना तो कर रहे होते हैं, गाना भी जोश में भर कर गाते हैं, पर दिल में उनके कोई उमंग या उत्साह नहीं, क्योंकि उनकी आत्मिक दशा सोये हुये प्राणी के समान है।

कुछ लोग तो नींद में चलते भी हैं। आपने नींद में चलने की बीमारी का नाम तो सुना होगा जिसे ''सोम्नानुलिज्म'' कहते हैं। कई तो प्रचार करते समय भी सुप्त अवस्था में ही जी रहे होते हैं? क्या आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होता कि क्यों कुछ लोग आत्मा जीतने के लिये निकलते हैं और कई कई नाम वापस लेकर लौटते हैं - जबकि कोई जन जाता है और एक भी नाम लेकर नहीं लौटता? ऐसे लोग सचमुच प्रसुप्त अवस्था में है! जब हम नये लोगों को लेकर चर्च में आते हैं, तो कुछ सदस्य तो उन नये सदस्यों के साथ आत्मीयता व मेलमिलाप का व्यवहार रखते हैं ताकि उन्हें नया वातावरण महसूस न हो − किंतु जो सोये हुये लोग हैं उन्हे इन नये सदस्यों से कोई सरोकार ही नहीं होता है − क्योंकि वे परमेश्वर की बातों से अन्जान रहकर लगभग सोये हुये ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

मुझे तो इस बात से भी डर लगता है कि कितने ही प्रचारक स्वयं भी आज सोये हुये हैं। वे बाईबल अध्ययन के एक के बाद एक पद को समझाते हुये चलते हैं। वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि लोग तो उनकी बातें सुन भी नहीं रहे हैं - और कई लोग, जो प्रत्येक सप्ताह आ रहे हैं, अभी तक खोये हुये ही हैं! ऐसे पास्टर्स वास्तव में उन प्रचारकों से डरते हैं जो लोगों को जगाते हैं! वे नहीं चाहते कि उनके लोगों को जगाया जाये! वे इसी में प्रसन्न रहते हैं कि हर रविवार सोई हुई भेडें आकर चर्च में बैठे और उनके बेजान ''बाईबल अध्ययन'' को सुनें। हे प्रभु हमारी सहायता करें! इसलिये इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इतने चर्चेस निर्जीव अवस्था में हैं! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि दैहिक बातों व पाप का दुप्प्रचार जोरों से चल रहा है! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ चर्चेस इतनी गहरी निद्रा में हैं कि वे प्रार्थना सभाओं का त्याग करके केवल ''सप्ताह के बीच में'' बाईबल अध्ययन'' आयोजित करने तक ही सीमित रह गये हैं। मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि कुछ लोग चर्चेस में इस प्रकार ''प्रार्थना'' करते हैं कि ऐसा लगता और सुनाई पडता है कि कोई भूत बोल रहा हो! ऐसी प्रार्थनायें कैसे सच्ची प्रार्थना हो सकती है! हमारे चर्चेस में ऐसी सच्ची प्रार्थनाओं का अब अभाव है! हमारे यहां से एक व्यक्ति दूसरे चर्च की प्रार्थना सभा में जा रहा है। वह खडा होकर सच्चे मनुष्य की तरह प्रार्थना करना चाहता था, किंतु दूसरे पास्टर ने उसे चुप हो जाने को कहा। वह पास्टर हमारे चर्च के सदस्य से यह अपेक्षा रख रहा था कि जैसे उनके चर्च में मरे हुये जन जैसी प्रार्थना की जाती है, वैसी ही हमारा सदस्य भी प्रार्थना करे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हमारा देश तबाह हो रहा है! इसमें कोई आश्यचर्य नहीं, जैसे जॉर्ज वारना हमसे कहते हैं कि ऐसे चर्चेस के ८८ प्रतिशत युवा २५ वर्ष की उम्र के होते चर्च छोड देते हैं, ''कभी न लौटने'' के लिये। सचमुच परमेश्वर हमारी सहायता करे! वे सोये हुये हैं और स्वयं ही नहीं जानते कि सो रहे हैं! प्रभु करे हमारे यहां के लोग जाग्रत अवस्था में रहे ताकि ऐसी बातें हमारे यहां न घटे! ''हम सोते न रहें, जैसे दूसरे करते हैं'' (१ थिस्सलुनीकियों ५ : ६)

डॉ.कैगन ने मुझे बताया कि पास्टर्स हमारे यहां आकर प्रचार करना पसंद करते हैं ''क्योंकि हमारे यहां लोग अपनी सीट पर आगे झुककर सुनते है, सुनने के पीछे मकसद होता है, कभी कभी वे उंचे स्वर से प्रशंसा करते हैं।'' ऐसा हमेशा होता रहे! ''हम सोये नहीं, जैसा दूसरे सोते हैं!'' एक प्रचारक ने मुझसे कहा था बूढी महिलायें तो उनके चर्च में थोडी सी भी आवाज होने पर छोडकर चली जायें। मैंने सोचा, ''तब तो उन्हें मैथेडिस्ट चर्च जाना चाहिये, वे वहां के लिये अधिक उपयुक्त है! किसी भी ऐपिस्कोपल चर्च में चले जाओ जहां निर्जीव आराधना होती है!''

२. दूसरा, हमारी प्रार्थना है कि जिनका नया जन्म नहीं हुआ है वे कहें, ''हम सोये नहीं, जैसा दूसरे सोते हैं।''

मुझे पहली पंक्ति में बैठे इन छोटे बच्चों को देखकर अच्छा लगता है। मेरी दुआ है वे यहां आते रहें ताकि परमेश्वर का प्रेम और भय दोनों उनके अंदर बना रहे, जबकि वे अभी छोटे ही हैं। किंतु अभी मैं उन्हें नजर अंदाज कर रहा हूं। मैं उन जवान लोगों से बोल रहा हूं जो चर्च तो आ रहे हैं, किंतु अभी तक बचाये नहीं गये हैं। बाईबल आप लोगों से कहती है,

“इस कारण वह कहता है, हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी।” (इफिसियों ५:१४)

यह एक आज्ञा है, और इस आज्ञा का पालन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक परमेश्वर स्वयं आपको न जगाये। मनुष्य तो स्वभाव से ही पापी है। इसका अर्थ है आप स्वयं न तो जान सकते हो न ही समझ सकते हो कि आप कैसे बचाये जाओगे। हम इसे विस्तार में समझा तो सकते हैं, किंतु आप इसे समझ नहीं सकते। आप हजारों बार सरल सुसमाचार सुनते तो हैं, किंतु इसके प्रति आपकी आंखे बंद की बंद ही हैं। प्रेरित ने लिखा था

“परन्तु शारीरिक मनुष्य (अपरिवर्तित) परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।” (१कुरिन्थियों २:१४)

इसीलिये आप में से कितनों को उद्धार का अनुभव कई बार आया होगा, किंतु यह आपके लाभ का नहीं था। हम आपको कहते हैं, ''यीशु के पास आइये।'' आप कहते हैं,'' परन्तु कैसे मैं उसके पास आउं?'' हम कहते हैं,'' आप को यह जानने की जरूरत नहीं है कि कैसे - केवल उस पर विश्वास रखिये।'' आप कहते हैं, ''परन्तु कैसे मैं उस पर विश्वास रखूं?''

मुझे खेद है, मैंने आप से यह बात अनेकों बार कही है किंतु हम आपको वे बातें उस रूप में नहीं समझा सकते जिस तरह वे आपको मदद करेंगी। आपको पवित्र आत्मा द्वारा जाग्रत किया जाना आवश्यक है, नहीं तो हमारे शब्द आपको कभी मदद नहीं करेंगे! पवित्र आत्मा द्वारा आपको मसीह के पास लाया जाना आवश्यक है। आप नहीं सीख सकते कि कैसे उसके पास आया जाये! एन्ड्रयू रीड गीत लेखक ने लिखा था,

पवित्र आत्मा स्वर्गिक प्रकाश,
   मेरे मन पर रोशनी डालिये;
काली रात धब्बों को भगाइये,
   मेरे अंधेरे को उजाले में बदल दीजिये।
(''पवित्र आत्मा, स्वर्गिक प्रकाश'' एन्ड्र रीड, १७८७−१८६२)

द्वितीय महान जाग्रति में, थॉमस चाल्र्स (१७५५−१८१४) ने कहा था, ''इतने अधिक अमान्य लोग जाग्रत किये गये.......उनके अंदर अपने पाप का बोध इतनी तीव्रता से उत्पन्न हुआ कि जैसे वे पागल हो गये हो.......दुख के मारे फूट फूट कर रोते लोग, पाप और उसके खतरे से परिचित लोग, परमेश्वर की दया मांग रहे थे.......उनको अपनी आत्माओं को बचाने की चिंता थी'' (पॉल ई.जी.कुक, फायर फ्राम हैवन, ई पी बुक्स, २००९ ,पेज ३४) परमेश्वर जब जाग्रति भेजता है तब कई लोगों की यह दशा होती है। परंतु एक अकेले व्यक्ति को भी नये जन्म का अनुभव इस तरह से हो सकता है। जब एक खोया हुआ पापी जन दुख के समंदर में घिर जाता है, ''पाप और खतरे के बोझ में दबकर, वह परमेश्वर की दया के लिये पुकार उठता है'' यह दशा बस कुछ ही देर पहले की होती है जब वह मसीह के पास पहुंचता है और बचा लिया जाता है।

यह कैसे होता है? एक गैर मसीह परिवार से जब कोई चर्च में पहुंचता है तब उसका नया जन्म इस प्रकार से होता है। मैं एक पास्टर के नये जन्म के बारे में, उनकी पुस्तक पढ रहा था उसी के कुछ अंश मैं आपको बताउंगा।

चर्च में उस पास्टर की कोई रूचि नहीं थी, किंतु बास्केट बॉल खेलना उसे बहुत पसंद था। उसे एक पास्टर ने चर्च की टीम में सम्मिलित होने के लिये बुलाया। वह चर्च आने के लिये इच्छुक रहा क्योंकि चर्च की टीम से ही उसे बास्केट बॉल खेलना था। चर्च के संदेश में उसे जरा रूचि नहीं थी, किंतु खेल के कारण उसे आना जरूरी था। धीरे धीरे एक समय ऐसा आया कि उसके लिये बास्केट बॉल से बढकर चर्च जरूरी हो गया। कुछ समय उपरांत ''बचाया गया'' शब्द उसके दिमाग में बैठ गया। यह शब्द जो भी था, किंतु वह यह समझता था कि यह शब्द उसके पास नहीं था। वह नहीं चाहता था कि कोई जाने कि उसके मन के भीतर क्या चल रहा है, इसलिये पास्टर के आमंत्रण पर भी वह नहीं गया। उसने एक ''अच्छा'' इंसान बनने का प्रयास किया, इसलिये उसने अभद्र भाषा का प्रयोग करना बंद कर दिया। किंतु एक अच्छा इंसान बनने के उसके जितने भी प्रयास थे वे सब असफल हो गये। वह यह देखकर गहरे दुख में था कि उसके अपने प्रयास सब नाकाम साबित हुये। उसने लिया, ''एक अच्छे इंसान बनने का मेरा प्रथम प्रयास बिल्कुल असफल रहा।'' उसी समय उसने परमेश्वर व यीशु के विषय में सोचना आरंभ किया जो उसने कभी नहीं सोचा था। उदाहरण के लिये, यीशु क्रूस पर क्यों करे थे? इसके पहले उसने यह कभी नहीं सोचा था और न यह बात उसके लिये महत्वपूर्ण थी। उसने लिखा, '' मैंने स्वयं को एक बहुत उलझा हुआ जवान पाया जिसके सामने यह नयी दुनियां खुल रही थी।''

अंत में एक दिन, पाप के गहरे बोध के अंदर, वह एक संदेश के अंत में उठकर परामर्शदाता के पास गया। उसने लिखा है, ''वह बडा भावुक अनुभव था।'' उस रात उसने यीशु पर विश्वास किया। तब पास्टर ने लिखा कि मेरा यह अनुभव लगभग पचास वर्ष पूर्व का है, किंतु वह रात मुझे आज भी याद है, ''जिसने इस जमीन पर मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल कर रख दी और साथ ही मेरा अनंत जीवन भी सुरक्षित कर दिया।'' वह कई सालों से एक सुधारवादी पास्टर है। मैंने आपको वही बताया है जो उसने लिखा था। मेरी प्रार्थना है आप भी ऐसे ही जाग्रत हों जैसे वह बचाया गया था! (स्टीफन स्मॉलमेन, व्हॉट इज ट्रू कन्वर्शन? पी.आर.पब्लिशिंग, २००५ ,पेज ८−१०)

''हम सोते न रहें, जैसे दूसरे करते हैं'' (१ थिस्सलुनीकियों ५ : ६)

जब मैं गवाही पढ+ रहा था मैंने महसूस किया मेरे नये जन्म का अनुभव भी तो इस पास्टर से मिलता जुलता था। मेरे पडोसी अपने बच्चों के साथ मुझे बैपटिस्ट चर्च ले जाया करते थे। वे मेरे प्रति बहुत अच्छा व्यवहार करते थे इसलिये मैं उनके साथ चर्च जाता रहा। मैं संदेश तो नहीं समझ पाता था, किंतु ''बचाया गया'' शब्द सीख लिया था। मैंने अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास किया, सोचा कि पास्टर बन जाउं और सेवकाई करूं, शायद वह मुझे बचा पायेगा। किंतु ऐसा करने से भी कोई लाभ नहीं हुआ, तब मैंने एक मिशनरी बनने का निर्णय लिया और चाइनीज बैपटिस्ट चर्च जाने लगा। किंतु इससे भी मुझे कोई लाभ नहीं हुआ, मैं और अधिक उलझन में पड गया; तब मैं बायोला कॉलेज में पढाई के लिये गया। वहां मैंने डॉ. चाल्र्स जे.वुडबिज का संदेश सुना, और मसीह उस आराधना में प्रगट हुये और मैंने उन पर विश्वास किया, और उनके लहू व धार्मिकता से मैं बचाया गया।

उठकर तो मैं कई बार ''सामने'' गया, किंतु कभी उद्धार प्राप्त नहीं हुआ। मैंने अनेको बार अपना जीवन मसीह को समर्पित किया किंतु कुछ नहीं हुआ। जब यीशु स्वयं मेरे पास आये, उन्होंने अपनी दया व अनुग्रह मुझ पर प्रगट किया, मुझे मेरे पापों से अपने लहू के द्वारा साफ किया, तब मेरा जीवन वास्तव में बचाया गया!

मेरी व सुधारवादी पास्टर की गवाही में क्या समानता है? हम दोनों चर्च आते थे क्योंकि आमंत्रित थे। हम दोनों में से कोई मसीही परिवार का नहीं था। हम दोनों चर्च आते रहे क्योंकि लोग हमारे साथ अच्छा व्यवहार कर रहे थे। हममे से दोनों नहीं जानते थे कि संदेश कैसे जीवन में लागू होना आरंभ हो गया। किंतु हम दोनों जानते थे कि हम ''बचाये नहीं गये हैं।'' हम दोनों ने अपने प्रयासों से अच्छा इंसान बनने का विचार किया। हम दोनों असफल रहे। तत्पश्चात एक दिन पाप के गहरे बोध में, हमें यीशु पर सरल विश्वास रखने भर से शांति व उद्धार दोनों प्राप्त हुये।

हम नव चर्च में आये थे हमारा कोई विश्वास नहीं था। अंतत:, हम खोये हुये पापियों की तरह जगाये गये। पवित्र आत्मा ने हमें यीशु की ओर खींचा। हम दोनों में से कोई नहीं जानता था कि ''यीशु के पास कैसे आया जाये।'' जब हम जगाये गये और पापी होने का तीव्र अहसास हुआ, तभी पवित्र आत्मा हमें खींचकर मसीह के पास लाया। यह सब इतना सरल था और हम जानते थे कि यह प्रभु की दया है, जो पवित्र आत्मा हमें मसीह के पास ले चलता है, और केवल मसीह के लहू से हमारे पापों से हमें छुटकारा मिला!

''हम सोते न रहें, जैसे दूसरे करते हैं'' (१ थिस्सलुनीकियों ५ : ६)

पर उन लोगों का क्या होगा जो मसीही परिवार में ही जन्मे हैं और निरंतर चर्च में बढे हैं? वे कैसे नया जन्म पाते हैं? यहां उन लोगों में से एक की गवाही है। यह उस जवान की गवाही है जो पूरे समय चर्च में ही रहा। असल में, वह शिशु रूप में चर्च में लाया गया था। मैं उस गवाही में से कुछ अंश दे रहा हूं।

     मैं जितना अधिक आराम करने की कोशिश करता, मुझे नींद नहीं आती क्योंकि परमेश्वर मेरी इच्छाओं को ढाल रहा था। जब तक रविवार की सुबह....आयी, मैं मानसिक और आत्मिक संघर्ष करके बहुत थक चुका था, किंतु परमेश्वर के साथ मेरा संघर्ष और गहराता गया। जब संदेश सुनाया गया,मैं शारिरिक रूप से मेरे दोषी होने की भावना जिसने मुझे घेर रखा था, को दबाता रहा। यह भाव मेरे उपर इतना प्रबल था कि मैंने अपने जबडे भींच लिये और आंखे बदं कर ली....मैं जानता था मैं सबसे निकम्मा जन था, किंतु मैंने मसीह की बुलाहट पर उसको अपने आप को समर्पित नहीं किया.....यह संदेश मुझे अंतहीन लगा....मैंने पवित्र परमेश्वर की निगाह में खुद को भंष्ट व अपवित्र महसूस किया। मेरे पापों का बोध बढता चला गया। पास्टर ने आगे आने का आमंत्रण दिया....डॉ.हिमर्स ने (तब)......मुझे मसीह के पास आने के लिये प्रेरित किया, उस पर विश्वास लाने के लिये कहा। मेरी इच्छा तो हुई किंतु तब भी मैं स्वयं नहीं जा पा रहा था। उस क्षण, मैं सोच रहा था मैं कैसे यीशु पर विश्वास रखूं। मेरा सब से बडा पाप यह था कि मैं यीशु को लगातार मानने से इंकार करता रहा। यहां तक कि मेरी कोशिश यह थी कि मैं अपने प्रयासों से मसीह के पास आने का प्रयास कर रहा था, यह भी उसे अस्वीकार करना ही था। जितना मैं यीशु पर विश्वास रखने का प्रयास करता, मैं नहीं रख पाता। मेरे सामने कोई आशा नहीं थी, मैं परास्त महसूस कर रहा था........ यीशु मुझे स्वंय अपने पास बुला रहे थे....किंतु मैं हठी बन कर स्वयं को रोक रहा था। अचानक संदेश के कुछ शब्द मेरे कानों में धीमें से सुनाई दिये, ''मसीह को समर्पित करो! मसीह को समर्पित करो।'' उसी एक क्षण में, मेरे अंदर विचार आया कि मैंने कैसे मसीह को अस्वीकार किया जिसने क्रूस पर मेरे लिये प्राण बलिदान किये उसने मेरे मन को जकड+ लिया। परमेश्वर का पुत्र स्वयं स्वर्ग से उतर कर मेरे लिये जान देने के लिये आया, यद्यपि मैं उसका शत्रु ही था। इस विचार ने मुझे अंदर ही अंदर कचोटना आरंभ कर दिया। और एक ही क्षण में मैंने मसीह पर विश्वास किया और उसके सामने समर्पण किया। मैंने अपने भीतर जितना विरोध था सब बह जाने दिया और सरल मन से यीशु पर विश्वास किया....यीशु ने मुझे अपना बना लिया। यीशु ने मुझे ले लिया। उसने मुझे अस्वीकार नहीं किया जैसा मैंने उसे किया था। मैं जिस बडे संघर्ष से गुजरा था वह इसलिये नहीं था कि मसीह के लिये मुझे बचाना कोई कठिन कार्य था और मेरे पापों को क्षमा करना भी कठिन था। बल्कि मैं मसीह को सतत अस्वीकार करता रहा इसमें बडा संघर्ष था। यह बिल्कुल ऐसा था, जैसे ही मैंने, यीशु को मेरे जीवन में आने के लिये ''अनुमति दी'' वह एकदम से मेरे पास आया और मेरे पापों को अपने लहू से धोया! यीशु पर विश्वास रखना मेरी इच्छा का कार्य नहीं था, पर इसके बजाय मुझे उसको समर्पित करना था! मेरे परिवर्तन का क्षण इतना सरल था कि इसका मेरे अपने प्रयासों से कोई लेना देना नहीं था। यह सब अनुग्रह का कार्य था....मैं यीशु को अपने संपूर्ण अस्तित्व से प्रेम रखता हूं, और केवल उसी में विश्राम पाता हूं।

मेरी प्रार्थना है कि और भी लोग अपने पाप के प्रति जाग्रत हो सके और यीशु के पास आने की जरूरत महसूस कर सकें ताकि उनके पाप मसीह के लहू से शुद्ध किये जाऐं! सचमुच, आज की सुबह, आप ऐसा कह सकें,

मैं आपकी बुलाहट को सुनता हूं, जो मुझे, अपने पास, बुलाती है प्रभु,
   आपके कीमती लहू से साफ किया जाउं, जो कलवरी से बहा था।
मैं आता हूं, प्रभु! आता आपके पास!
   धोकर, मुझे शुद्ध कर, उस कलवरी के सोते से।
(''आता हूं, प्रभु ''लेविस हार्टसाफ, १८२८−१९१९)

''हम सोते न रहें, जैसे दूसरे करते हैं'' (१ थिस्सलुनीकियों ५ : ६)

अभी पूछताछ कक्ष में जाइये। इस आडिटोरियम के पीछे जाइये और डॉ.कैगन आपको उस कमरे में ले जायेंगे, जहां हम आपके लिये प्रार्थना करेंगे और बात करेंगे। डॉ.चान, निवेदन है कि आप प्रार्थना करें ताकि आज सुबह कोई यीशु के उपर विश्वास लाये। आमीन

(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें: १थिस्सलुनीकियों ५:१−६


रूपरेखा

सोइये नहीं - जैसे दूसरे सो रहे हैं!

द्वारा डॉ. आर.एल.हिमर्स

''हम सोते न रहें, जैसे दूसरे करते हैं'' (१ थिस्सलुनीकियों ५ : ६)

१. प्रथम, जो लोग नया जन्म पाये हुये हैं वे ऐसा कहें, ''इसलिये हम औरों की नाई
सोते न रहें '' मत्ती २५: ५

२. दूसरा, हमारी प्रार्थना है कि जिनका नया जन्म नहीं हुआ है वे कहें, ''हम सोये नहीं, जैसा दूसरे सोते हैं'' इफिसियों ५:१४; १कुरिन्थियों २:१४