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तीसरा मार्ग − संकट में परिवर्तन

THE THIRD WAY – CRISIS CONVERSION
(Hindi)

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स
by Dr. R. L. Hymers, Jr.

रविवार की संध्या, ९ मार्च २०१४ को दि बैपटिस्ट टैबरनेकल लॉस एंजीलिस में
प्रचार किया गया संदेश
A sermon preached at the Baptist Tabernacle of Los Angeles
Lord’s Day Evening, March 9, 2014

“व्याख्यात्मक प्रचार के लिये सर्तकता” द्वारा आइन एच.मुर्रे

“फिर उस ने कहा किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो वह मुझे दे दीजिये। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी। और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकटठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उडा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका तो उस देश में बडा अकाल पडा और वह कंगाल हो गया। और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पडा उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा। और वह चाहता था कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे और उसे कोई कुछ नहीं देता था। जब वह अपने आपे में आया तब कहने लगा कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं। मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाउंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाउं मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।” (लूका १५˸११−१९)


वर्तमान में खोये हुये लोगों को सुसमाचार सुनाने के दो तरीके हैं। पहला तरीका है कि लोग ''आसानी से विश्वास'' कर लें। दूसरा तरीका है ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' प्राप्त करना। देखा जाये तो दोनों तरीकों में कुछ त्रुटियां हैं क्योंकि इन दोनों तरीकों में से कोई भी तरीका परमेश्वर ने पश्चिमी देशों में १८५९ की बडी आत्मिक जाग्रति के पश्चात इस्तेमाल ही नहीं किया।

प्रमुख प्रचारकों का भी कथन है कि अधिकतर चर्च सदस्यों का कभी मन परिवर्तन हुआ ही नहीं। हमारी पुस्तक, मरते हुये देश को प्रचार करना, में मैंने और मेरे सहायक डॉ.सी.एल.कैगन ने ऐसे कई उद्धरण दिये हैं जिसमें बताया गया है कि अनेक इवेंजलिकल और कटटरपंथी विश्वासी अभी तक खोये हुये ही हैं, चाहे संडे स्कूल टीचर्स हो, डीकन्स हों, पास्टर्स की पत्नियां हो, और यहां तक कि पास्टर्स स्वयं भी उद्धार पाये हुये नहीं होते। डॉ.ए.डब्ल्यू.टोजर ने कहा था, ''इवेंजलीकल चर्चेस में शायद दस में से एक को ही नये जन्म का अनुभव प्राप्त होता है।'' डॉ.डब्ल्यू.ए.किसवेल, जो बहुत बडी कलीसिया फस्र्ट बैपटिस्ट चर्च आँफ डलास,टेक्सास के प्रसिद्ध पास्टर रहे हैं उनका कथन था, ''उन्हे आश्चर्य होगा कि उनको उनके चर्च के २५ प्रतिशत सदस्य भी अगर स्वर्ग में मिल जाये।'' १९४० में जवान प्रचारक बिली ग्राहम ने घोषित किया था कि हमारे चर्च के लगभग ८५ प्रतिशत सदस्य उद्धार पाये हुये नहीं होते हैं ''उनका नया जन्म नहीं हुआ है।'' डॉ. मुनरो ''मंक'' पार्कर, ने कटटरपंथी चर्चेस के विषय में भी कहा था कि, ''अगर चर्च के आधे सदस्य भी अगर उद्धार प्राप्त कर लें तो बडी आत्मिक जाग्रति आ जायेगी। वास्तव में, मैं सोचता हूं कि अगर अमेरिका के आधे प्रचारक ही अगर नया जन्म पा लें, तो हमें एक शक्तिशाली जाग्रति की अपेक्षा कर सकते हैं'' (मुनरो ''मंक'' पार्कर,थ्रू सनशाईन एंड शैडोज, सोर्ड आँफ दि लॉर्ड पब्लिशर्स,१९८७, पेज ६१‚७२)

इन सब आंकडों में हमने इन लोगों से प्राप्त करके हमारी पुस्तक, मरते हुये देश को प्रचार करना (पेज ४२‚४३) में उदघ्रत किया गया है। ये आंकडे डॉ.ए.डब्ल्यू.टोजर, डॉ.डब्ल्यू.ए.किसवेल, जवान प्रचारक बिली ग्राहम, और डॉ. ''मंक'' पार्कर के द्वारा, अनुमानित है। परन्तु इससे ये भी सोचा जा सकता है कि जिस तरह हम सुसमाचार प्रचार कर रहे हैं उसी में बडी भारी गलती है। और, जैसा कि मैंने कहा, सुसमाचार प्रचार के दो प्रमुख तरीके प्रचारक काम में ला रहे हैं ''आसानी से विश्वास दिलाना'' और ''प्रभुतापूर्ण उद्धार।'' इन दोनों तरीको को कभी भी परमेश्वर ने मन परिवर्तन के लिये प्रयोग ही नहीं किया।

पहला तरीका है ''आसानी से विश्वास दिलाना'' यह तरीका इवेजलिकल और कटटरपंथियों द्वारा सबसे अधिक काम में लाये जाने वाला तरीका है। इसमें खोये हुये व्यक्ति से कहा जाता है कि वह ''पापी की प्रार्थना'' कहे जिसमें यीशु से विनती करते हुये, ''उसे अपने दिल में आमंत्रित'' करना है। इसके करने के पश्चात खोये हुये जन ''बचाये गये,'' माने जाते हैं, और बाद में उनके भीतर परिवर्तन के कोई चिन्ह नहीं दिखाई देते, वे उसी तरह अपने जीवन में गहराई तक पाप में डूबे होते हैं, वे नियमित चर्च नहीं जाना चाहते हैं। पश्चिमी दुनिया में तो ऐसे लाखों लोग होंगे।

सुसमाचार प्रचार का दूसरा तरीका है ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' दिलवाना। यह तरीका ''आसानी से विश्वास दिलाना'' वाले तरीके के विरूद्ध प्रतिकिया है। किंतु ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' वाला तरीका ''आसानी से विश्वास दिलाने'' वाले तरीके को सुधारने में नाकामयाब रहा। यद्यपि इस मत में विश्वास रखने वालों के जीवन में अन्य लोगों की तुलना में अधिक प्रकाश पाया गया, उनका यह तरीका पारंपरिक जाग्रति लाने में कभी प्रयोग में नहीं लाया गया,न ही इसका उपयोग किया गया, किसी बडे रूप में इसने, कभी सच्चे मन परिवर्तन वालों को चर्च में नहीं जोडा। ''प्रभुतापूर्ण'' तरीके वाले प्रचारक ''आसानी से विश्वास लाने'' वाले विश्वासियों के पाप और अराजकता को ही सुधारने का प्रयास करते रहते हैं वे उनके उपर लगातार जोर डालने वाली शिक्षा का प्रचार करते हैं जिसके तहत उन्हें ''पश्चाताप'' करने के लिये प्रेरित करते हैं। इसका यह परिणाम होता है कि खोया हुआ जन एक प्रकार से “विद्वतापूर्ण तरीके से उद्धार पाने” वाली शिक्षा की गिरफ़त में आ जाता है वह इसे अपने धार्मिकता के कार्य समझने की भूल कर बैठता है। ''विद्वतापूर्ण तरीके से उद्धार पाना'' अर्थात बाईबल के पदों व शिक्षाओं में विश्वास रखना, बजाय यीशु ख्रीष्ट में विश्वास रखने के। यह मत बाईबल की आयतों व शिक्षाओं में विश्वास रखना सिखाता है, यीशु ख्रीष्ट स्वयं में विश्वास रखने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। इन प्रचारकों में से एक ने कहा था कि, ''हमें परमेश्वर ने क्या किया है इस पर विश्वास करना चाहिये।'' यद्यपि एक जन यह तरीका पहचान नहीं पाता है, यह ''विद्वतापूर्ण तरीके से उद्धार पाने'' की परिभाषा है। यह पापी को बताता है कि वह बाईबल में लिखी गई बातों पर विश्वास रखने से बचेगा न कि स्वयं यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास लाने से। डॉ.मार्टिन ल्यॉड जोंस की पुस्तक में ''सैंडीमैनियेज्म'' पर एक अध्याय देखिये, दि प्यूरीटन्स: देअर ओरिजिंस एंड सक्सेसर्स, बैनर आँफ ट्रूथ, २००२ संस्करण,पेज १७०−१९० सैंडीमेनियेज्म पर मेरे संदेश पढने के लिये यहां क्लिक कीजिये।

मसीह के समय में फरीसी कभी भी ''आसानी से विश्वास लाने वाले'' तरीके पर निर्भर नहीं थे। वे बाहरी रूप से बडा शुद्ध जीवन बिताते थे। नियमित धर्मशास्त्र पढते थे और उस पर विश्वास रखते थे। तो उनके जीवन में किस बात की कमी थी? केवल एक चीज की - स्वयं यीशु मसीह की! यीशु ने उनसे कहा था,

“तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनंत जीवन तुम्हे मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।” (यूहन्ना ५˸३९‚४०)

सी.एच.स्पर्जन ने कहा था, ''वह विश्वास जो आत्मा को बचाता है वह, यीशु पर विश्वास रखना है'' (“दि वारेंट आँफ फेथ,'' दि मेट्रापोलिटन टैबरनेकल पुलपिट, वॉल्यूम ९, पिलगिम पब्लिकेशंस, १९७९ पेज ५३०)

इसी संदेश में स्पर्जन ने कहा था, ''केवल (बाईबल के) तथ्यों का ज्ञान होना, कभी भी, किसी को, नहीं बचायेगा जब तक कि हम स्वयं उद्धारकर्ता के हाथों में अपनी आत्मा को न सौंप दें” (उक्त)।

उडाउ पुत्र, हम बाईबल में पढते हैं, जानता था कि उसके ''पिता'' के घर में ''भोजन से अधिक रोटी मिलती है'' (लूका १५˸१७)। किंतु यह सत्य जानने भर से उसका पेट नहीं भर गया। उसे ''पिता'' के पास सीधे आना पडा ताकि वह उस ''रोटी'' को खा सके। बाईबल पर विश्वास रखना, सच्चा विश्वास रखना, व मतों पर विश्वास रखना कभी किसी को उद्धार नहीं दिला सकता। मनुष्य बाईबल पर विश्वास रख सकता है, और बडी महान शिक्षाओं पर भी, जैसे बेस्टमिंस्टर की धार्मिक शिक्षायें, लेकिन वह इनसे उद्धार नहीं प्राप्त कर सकता। प्रेरित पौलुस ने कहा था'' पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है'' (२ तिमुथयुस ३˸१५)। बाईबल इसे और स्पष्ट करती है जब यह बताती है कि, ''विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है'' (इफिसियों २˸८)। और यह विश्वास सीधा मसीह पर केंदित होना चाहिये। जैसा कि प्रेरित पौलुस ने कहा, ''प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा'' (प्रेरितों के काम १६˸३१)। मेरे सहकर्मी डॉ.सी.एल.कैगन ने कहा था, ''कि वास्तव में, हम मसीह पर ''सीधे'' विश्वास करके बचाये जाते हैं, जो अन्य इन सब चीजों से बहुत बडा है - ''और वही सब वस्तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएं उसी में – कायम रहती है‚” कुलुस्सियों १˸१७ (मरते हुये देश को प्रचार करना, पेज २२०)। इस मूल सत्य को जान लेने के पश्चात हम ''आसानी से विश्वास लाने'' और ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' वाले तरीकों से उद्धार पाने से बच जाते हैं।

जो मैं यहां प्रस्तुत करने जा रहा हूं, हम उसे कहते हैं ''तीसरा रास्ता - संकट के समय परिवर्तन'' पहला रास्ता ''पापी वाली प्रार्थना'' में स्वीकार करना है। दूसरे रास्ते में स्वयं प्रयास करते हुये यीशु को अपने जीवन का स्वामी बनाना है - जो कोई पाप में डूबा पापी कभी नहीं कर सकता! किंतु ''तीसरा रास्ता - संकट में परिवर्तन'' यह सच्चा परिवर्तन है बाईबल में भी यही मार्ग उद्धार पाने का बताया गया है। मैंने यह नाम दिया है ''संकट में परिवर्तन'' - किंतु यह ''पुराने प्रचारकों'' के लिये केवल एक मत है; और परंपरावादी प्राटेस्टैंट और बैपटिस्ट के लिये नया नाम है। ''संकट में मन परिवर्तन करना'' यह अनुभव लूथर को हुआ था। ''संकट में मन फिराना'' जॉन बुनयन, जार्ज वाईटफील्ड, जॉन वेस्ली, और सी.एच.स्पर्जन ने इसका अनुभव किया था - और हर वह व्यक्ति इसका अनुभव करता है जो सच्चे रूप में मन परिवर्तित करता है बजाय ''पापी की प्रार्थना'' दोहराने के और ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' पाने के प्रसिद्ध तरीकों से जो बच जाता है - और इन तरीकों ने तो हमारे सदियों से पुराने तरीके ''संकट के समय परिवर्तन'' को तो बिल्कुल खत्म ही करके रख दिया जो हमारे बैपटिस्ट पूर्वजों का भी तरीका रहा है। इस परिवर्तन के लिये मैं ''भ्रष्टता'' का वर्णन करूंगा, तत्पश्चात मैं ''नये जन्म'' का वर्णन करूंगा।

१. प्रथम, ''संकट के समय परिवर्तन'' वाले तरीके में पहले मनुष्य का ''भ्रष्ट'' होना प्रगट हुआ है।

मैंने उडाउ पुत्र का व्रतांत चुना है ताकि मैं यह सबसे पुराने प्रकार ''संकट के समय परिवर्तन'' को समझा सकूं जो कि पहले से होता आया लेकिन बाद में इसे ''पापी की प्रार्थना'' व ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' पाने वाले तरीको ने आकर हटा दिया।

उडाउ पुत्र पापी था। उसने संपत्ति में से अपना भाग मांगा और घर छोडकर ''एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उडा दी'' (लूका १५˸१३)। हम भी ऐसा ही करते हैं, हमारे तरीके कुछ अलग हो सकते हैं। हम मसीह से मुंह मोल लेते हैं और उसके बिना पाप में जीवन बिताते हैं। हम मसीह को अस्वीकार कर देते हैं, जैसे उडाउ पुत्र ने उसके पिता का इंकार कर दिया था। सच में जब हम परिवर्तित नहीं होते हैं तो हम हमारे मुक्तिदाता को निम्न जानते हैं और उसका इंकार कर देते हैं, जैसा उडाउ पुत्र ने किया था, अपने कर्मो से उसने ऐसा प्रगट किया, कि कितना अधिक उसने अपने पिता का तिरस्कार किया और अंत में उसका इंकार कर चला गया,

“वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था वह दुखी पुरूष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी, और लोग उस से मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और, हम ने उसका मूल्य न जाना।” (यशायाह ५३˸३)

हमारे मनों में हम परमेश्वर व उसके पुत्र के शत्रु थे। हम परमेश्वर की व्यवस्था के काबिल नहीं थे, जैसे उडाउ पुत्र अपने पिता के घर की व्यवस्था के उपयुक्त नहीं था,

“क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है।” (रोमियों ८˸७)

हमारे मन मसीहा के प्रति तीव्र रूप से विरोधी थे। सचमुच में हम पूर्ण रूप से भ्रष्ट व निकम्मे पापी लोग थे, धार्मिकता का कोई अंश हमारे भीतर नहीं था। प्रेरित पौलुस इसीलिये लिखता है कि हम ''अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुये थे,'' और हम शैतान के नियंत्रण में थे, ''जो इस संसार का हाकिम था'' (इफिसियों २˸१)।

अगर आपने उद्धार नहीं पाया है तो यह आपकी अच्छी छवि प्रस्तुत नहीं करता। प्रेरित ने लिखा है, ''वे सब के सब पाप के वश में हैं। जैसा लिखा है कि कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं'' (रोमियों ३˸९‚१०)। यशायाह दर्शी ने भी आपकी आत्मिक दशा का चित्र खींचा है जब उसने इस प्रकार लिखा,

“........तुम्हारा सिर घावों से भर गया, और तुम्हारा हदय दुख से भरा है। नख से सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं; केवल चोट और कोडे की मार के चिन्ह और सडे हुए घाव हैं ........।” (यशायाह १˸५‚६)

यह उडाउ पुत्र की दशा थी। बाईबल क्या कहती है कि, ''वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पडा: उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा। और वह चाहता था कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था'' (लूका १५˸१५‚१६) ऐसी ही हमारी दशा भी तो है। ''उस देश का नागरिक'' शैतान है, जो हमारे दिमाग को नियंत्रित करता है, ''आत्मा जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है'' (इफिसियों २˸२) आप जानते हैं कि आप कितनी खतरनाक हालात में जकडे हुये हैं, शैतान के गुलाम हैं, शैतान के गुलाम बनकर जीवन बिता रहे हैं, ''अपराधों में मरे हुये हैं'' (इफिसियों २˸५) इसे भ्रष्टता या निकम्मापन कहेंगे। उडाउ पुत्र की ऐसी दशा थी। उसके स्वयं के पिता ने कहा कि वह ''मर'' गया था वह ''खो'' गया था। पिता ने कहा, ''मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है....'' (लूका १५˸२४)

मसीह से विरोध करके, आप सोचते हैं मैं स्वतंत्र हूं। किंतु वास्तव में आप गुलाम हैं, पाप में फंसे हुये हैं, परमेश्वर की बातों के प्रति मरे हुये हैं, शैतान की हुकूमत में हैं और उसकी गुलामी में जीवन जी रहे हैं। शैतान के द्वारा आप इतने अधिक नियंत्रित हैं कि, आप अपनी पाप के प्रति गुलामी को भी आजादी समझ बैठते हैं! आप के लिये सचमुच कोई आशा नहीं बचती, बिल्कुल भ्रष्ट जीवन, बिल्कुल उडाउ पुत्र के समान, जो पाप का दास बनकर बिना आशा के जी रहा था। अगर कोई आपकी इस भ्रष्ट दशा का अहसास भी करवाता है तो आप उससे बहस करने लगते हैं।

२. दूसरा, यहां पापी का अपनी उलझनों से निकलकर ''जागने'' का वर्णन है, यह ''संकट के समय परिवर्तन'' होने के तीसरे रास्ते में प्रगट हुआ है।

“जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं।” (लूका १५˸१७)

''जब वह अपने आपे में आया।'' अर्थात, जब उसको होश आया, जब वह पाप की बेहोशी से जागा, पाप की निर्जीव अवस्था में उसको कुछ भान हुआ। ''जब वह आपे में आया''; जब वह मौत की नींद से जागा - तब उसने विचार किया, ''मैं तो बर्बाद हो रहा हूं। एक खोये हुये पापी का अपनी परेशानी, पीडा, संघर्ष व पाप में जीवन बिताने का ज्ञान हो जाना जाग जाना कहलाता है। पवित्र आत्मा इस तरह जगाने का कार्य करता है। इस पर पर अपनी व्याख्या देते हुये, स्पर्जन ने कहा था,

एक पागल आदमी यह नहीं जानता कि वह पागल है, किंतु जैसे ही उसे होश आता है तो वह बडी पीडा से (देखता है) ग्रहण करता है कि वह किस दशा से निकल कर आ रहा है। उडाउ पुत्र ने पुन: उस सच्चे कारण को जाना और उचित निर्णय किया, और वह आपे में आया (सी.एच.स्पर्जन,एम.टी.पी.पिलगिम पब्लिकेशन्स, १९७७ पुन:मुद्रण, वॉल्यूम १७,पेज ३८५)

यह जागना कुछ इस तरह का होता है कि कोई व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो गया था, और उसे वापस जगाया गया। यूनानी पौराणिक कथा में एक मोहिनी स्त्री, सर्सी, ने मनुष्यों को सूअरों में बदल दिया। किंतु यूलिसिस ने उस स्त्री को विवश किया कि वह उसके साथियों को पुन: मनुष्य रूप में बना दे। परमेश्वर के आत्मा ने उडाउ पुत्र को विवश किया कि उसे अपने पाप की गर्त में गिरने का अहसास हो। तभी वह यह महसूस करेगा कि उसके लिये वह कितनी भयानक दशा है। इस दशा में उसके लिये कोई आशा नहीं बची थी। प्रेरित पौलुस ने ''जाग जाने'' की इस दशा के उपर कहा था,

''इस कारण वह कहता है हे सोने वाले जाग और मुर्दो में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी।'' (इफिसियों ५˸१४)

किंतु खोये हुये पापी का ''जागना'' शांतिप्रद नहीं होता है। इस संकट के समय उसके मन में सच्चे परिवर्तन की इच्छा बलवती होती है। प्राचीन रिचर्ड बक्तर (१६१५−१६९१) के अनुसार, प्रचार द्वारा मनुष्य को जगाया जाना सबसे अधिक आम बात है। कई प्रचारक रोमियों १०˸१३ से उदाहरण देते है जब सुसमाचार प्रचार करते हैं। किंतु उसकी अगली आयत के लिये मुश्किल से सोचते हैं, जो कहती है, ''और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें?''

इसलिये चर्च के अंदर हमारे पास सुसमाचारीय प्रचार होना चाहिये। ''और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें?'' और प्रचारको को आवश्यक है कि वे खोये हुये लोगों को सुसमाचार प्रचार करें। बहुत ही कम प्रचारक जानते हैं कि कैसे सुसमाचारीय संदेश तैयार करें व प्रचार करें - बहुत ही कम! कई वर्षो से मैंने किसी को सुसमाचारीय संदेश ठीक ढंग से प्रचार करते हुये नहीं सुना! यह अतीत की बात हो गई है। यही कारण है चर्च में भीड तो आ रही है लेकिन उस भीड ने उद्धार नहीं पाया है! ''और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें?''

सुसमाचारीय प्रचार के द्वारा पापी को यह बताना आवश्यक है कि वह अभिशप्त है इसके पहले कि वह यीशु के पास आये। उसे यह प्रगट होना चाहिये कि उसकी दशा बहुत खराब है। उसे पता होना चाहिये कि पाप उसके अस्तित्व में ही मौजूद है। ''पाप'' नहीं, किंतु एक पाप भी, उसे परमेश्वर से अलग करता है। पाप का प्रतीक है करना और स्वार्थी हो जाना। जैसे उडाउ पुत्र को भान हो गया था, कि वह पापी है, परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक विरोध है और बहुत अधिक स्वार्थी है। खोये हुये पापी को पुलपिट से ऐसा प्रचार सुनना आवश्यक है जब तक कि वह अपने मन में परिवर्तन की तीव्र इच्छा महसूस न करे। उसके अंदर यह इच्छा उसे विवश करना चाहिये कि सच में उसे दिल में बदलाव लाने की जरूरत है। वह स्वयं दिल बदलने की कोशिश करेगा तो असफल हो जायेगा। यही असफलता उसे जगायेगी और उसे इस पाप की निम्न अवस्था का बोध होने देगी। उसे बार बार बताया जाना आवश्यक है कि वह खोया हुआ प्राणी है। उसके अंदर मसीह को खोजने की ललक पैदा होना चाहिये। उसे यह बताया जाना चाहिये ''सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो..............'' (लूका १३˸२४)। जैसे जैसे पापी परिश्रम करता है वह असफल होता है, जोर मारता है वह असफल होता है, प्रयास करता है असफल होता है, इस प्रकिया में वह अंत में जाकर बिल्कुल निराश हो जायेगा। यही मार्ग है जिस पर उसे पहुंचना चाहिये था, नहीं तो यीशु उसे कभी नहीं मिल सकते ।

यह ''नियमबद्ध'' प्रचार कहलाता है - जिसे सभी प्राचीन, परंपरावादी प्रचारकों ने किया - जब तक कि पापियों ने स्वयं को बदलने की आशा अपने अंदर महसूस न की! इस आयत का यही आशय है, ''व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है'' (रोमियों ३˸२०) । लगातार पवित्र बनने में असफल होना, परमेश्वर के साथ मेल मिलाप करने में हार जाना - और विशेषकर, बार बार यीशु के पास आने में असफल रहना - पापी सोचना आरंभ कर देता है, ''मैं सचमुच खो चुका हूं!'' यह जाग्रति का अनुभव उसे होना चाहिये!

“जब वह अपने आपे में आया तब कहने लगा........ कि मैं यहां भूखा मर रहा हूं। मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाउंगा........” (लूका १५˸१७−१८)

इस बिंदु पर पहुंचकर जब पापी सारी आशायें त्याग देता है ''कि कुछ अच्छा हो पायेगा'' या ''इसे और अच्छे तरीके से करे'' - तब वह ''आपे में आता है'' - जाग जाता है और महसूस करता है कि उसे यीशु में अब विश्राम पाना चाहिये, क्योंकि वह स्वयं को बचाने के लिये कुछ नहीं कर सकता!

“और जब वह आपे में आया।'' उडाउ पुत्र को आंतरिक संघर्ष की गहरी दशाओं से होकर गुजरना पडा लगा‚ जैसे वह नर्क‚ में आ गया हो, जैसे बुनयन में बहुत परिवर्तन हुये, इसके पहले कि ''वह आपे में आया,'' इसके पहले कि उसका दिमाग सच्चा पश्चाताप करने की अवस्था में आ गया। आखिर, ''पश्चाताप करने के लिये'' यूनानी शब्द का अनुवाद होता है ''दिमाग का बदलना।'' यही ''तीसरा मार्ग'' है। यही ''संकट में मन परिवर्तन'' होना कहलाता है। ''मैं कुछ नहीं हूं वरन एक पाखंडी मूर्ख विरोधी पापी हूं!'' ''मेरे लिये कुछ उम्मीद नहीं है।'' ''मैं संकट में हूं! मुझे बदलना होगा - परन्तु मैं बदल नहीं सकता! मैं बदल नहीं सकता! मैं बदल नहीं सकता! मैं कोशिश कर चुका हूं! मैं कोशिश कर चुका हूं! जितनी अधिक कोशिश करता हूं, उतना असंभव यह होता जाता है! मैं पश्चाताप नहीं कर सकता! मैं बदल नहीं सकता! मैं बदल नहीं सकता! मैं अपना दिल नहीं बदल सकता! मैं खोया हूं! मैं हारा हुआ हूं! मैं परास्त हूं।'' बिल्कुल ऐसा अनुभव क्या लूथर, बुनयन, जॉन वेस्ली, वाइटफील्ड, स्पर्जन और डॉ. जॉन संग के साथ - और हर सच्चे परिवर्तित जन के साथ नहीं हुआ होगा? इस विषय को गहराई से समझने के लिये हमें थॉमस हुकर्स १५८६−१६४७ की पारंपरिक व श्रेष्ठ पुस्तक, दि सोल प्रीपरेशन फॉर क्राईस्ट पढनी चाहिये। इसका एक अल्प आधुनिक रूप है दि ओल्ड इवेंजलीकलइज्म: ओल्ड ट्रूथ्स फॉर ए न्यू अवेकनिंग द्वारा आईन एच.मुर्रे (दि बैनर आँफ ट्रूथ ट्रस्ट, २००५)

यह जानना महत्वपूर्ण है कि सभी परिवर्तन समान रूप से नहीं घटते। कुछ लोगों का अपराध बोध काम समय का हो सकता है। किसी को इस बोध की टीस थोडे समय रहती है, जबकि अन्य लोग इस अवस्था में अधिक या थोडे कम समय तक रह सकते हैं। मेरी स्वयं की पत्नी का नया जन्म उस समय हुआ था जब उसने पहली बार सुसमाचार सुना था। इसी तरह मेरे सहायक डॉ. क्रेटन एल.चान के साथ भी घटा। परमेश्वर प्रभुसत्ता है इसलिये वह पापियों के जीवन में अपने तरीके से काम करता है। जब कई लोग अपराध बोध को सहते हैं तो वे रोने लगते हैं, ऐसा कई लोग करते हैं। परन्तु मेरी स्वयं की मां का साथ बिना एक आंसू गिराये जीवन को बदल देने वाला अनुभव हुआ। दो बिंदु आवश्यक हैं, यद्यपि, प्रत्येक सच्चे परिवर्तन में - मनुष्य को अपने पाप का अहसास होता है, और यीशु मसीह में विश्वास से आराम मिलता है। ये दोनों वास्तविक चीजें मेरी पत्नी व डॉ. चान के परिवर्तन के समय घटी जैसे यह लूथर, बुनयन, जॉन वेस्ली, जॉर्ज वाईटफील्ड और स्पर्जन के साथ भी घटी थी - यद्यपि थोडे ही समय के लिये। यद्यपि इन सब को परिवर्तन से पहले विवेक में टीस उठी थी। लोग जो अपने पाप के लिये बहाने बनाते हैं या इसे हल्का जानते हैं उनका सच्चा परिवर्तन कभी नहीं होता।

बहुत अच्छा। मैं प्रसन्न हूं कि अंत में आप उनके जैसा महसूस कर रहे हैं! शायद अब आपको यीशु में आराम मिलेगा। शायद अब आप उसका प्रेम महसूस करेंगे, जो आपको बचाने के लिये उसको क्रूस तक ले गया - क्योंकि आप स्वयं तो अपने आप को बचा नहीं सकते! तब आप यीशु के प्रति आभारी महसूस करेंगे, जो आपके स्थान पर कूस पर मरा, उसने आपको आपके सारे पापों से शुद्ध करने के लिये उसका लोहू बहाया! इस अनुभव के बाद तो हम पूरे जीवन भर यीशु के आभारी रहेंगे- क्योंकि आपने उसके अनुग्रह का अनुभव किया है, उसके प्रेम को जाना है, अपने ''संकट के समय मन परिवर्तन'' की घडी में उसके सच्चे उद्धार को प्राप्त किया है - यही वह मार्ग है जो मन को बदल कर रख देता है और परमेश्वर के गुस्से से आत्मा को बचाता है! मैं उम्मीद करता हूं आप अंतर महसूस कर सकते हैं ''आसानी से विश्वास लाकर'' व ''प्रभुतापूर्ण उद्धार'' पाने के तरीको से यह मार्ग कितना अलग है। और मेरी प्रार्थना है कि जब आप यीशु पर विश्वास लाते हैं तो ऐसा ही आपका अनुभव होगा; और उसके अनमोल लोहू से आप शुद्ध किये जायेंगे! तब आप चाल्र्स वेस्ली के समान गा सकेंगे,

यीशु, मेरी आत्मा में प्यारा है, मैं मन में आनंदित होना चाहता हूं,
   जबकि जलधारा बहती है, जबकि तूफान अभी भी उठा है!
छुपा ले, मेरे मसीहा, छुपा ले, जब तक यह तूफान गुजर न जाये;
   स्वर्ग में तेरी पवित्र सुरक्षा में ; मेरी आत्मा को अंत में ग्रहण करना ।

तुझमें अनंत अनुग्रह पाया है, इतना अनुग्रह जो मेरे पापों को ढापें;
   चंगा करने वाली धारा बह निकले; भीतर मुझे शुद्ध बना साफरख ।
जीवन का सोता तू है, सेंतमेंत रहमत मुझे सदा लों तेरी मिले;
   मेरे मन के भीतर का सोता तू ने बहाया; अनंत तक बहता रहेगा।
(''यीशु, मेरी आत्मा में प्यारा'' चाल्र्स वेस्ली १७०७−१७८८)

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(संदेश का अंत)
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संदेश के पूर्व धर्मशास्त्र पढा गया मि.ऐबेल प्रुद्योमें: लूका १५˸१४−१९
संदेश के पूर्व एकल गाना गाया गया। मि.बैंजामिन किन्केड गिफिथ:
''यीशु, मेरी आत्मा में प्यारा'' (चाल्र्स वेस्ली १७०७−१७८८)

“व्याख्यात्मक प्रचार के लिये सर्तकता”

द्वारा आइन एच.मुर्रे
(न्यासी दि बेनर आँफ टूथ न्यास)

आजकल बहुत सारे समूहों में ''व्याख्यात्मक प्रचार'' का प्रचलन है और प्रचारकों से इसी रीति से प्रचार करने की अपील भी की जाती है। इसका सीधा सा अर्थ है धर्मशास्त्र से कोई उद्धरण ले लेना, और इसका पूरा अर्थ दूसरों को समझाना, इसके आगे और कुछ नहीं कहना; जो ऐसे प्रचार से असहमत रहते हैं वे बाईबल जो परमेश्वर का वचन है उसको नहीं जानने वालों को बचा पाते हैं।

किंतु ''व्याख्यात्मक प्रचार'' में अक्सर कुछ और भी छिपा होता है। यह वाक्यांश तब प्रयुक्त होता है जब किसी मंडली को बाईबल से एक अध्याय का अधिकतम भाग लेकर, या एक किताब, हर सप्ताह लगातार समझाई जाये। इस तरीके के प्रचार की तुलना उस प्रकार के प्रचार से करके देखें जिसमें प्रति रविवार अलग अलग पद बाईबल से लेकर उस पर प्रचार किया जाता है। बाद का वर्णित तरीका चूंकि ''व्याख्यात्मक'' नहीं है इसलिये यह इतना प्रसिद्ध नहीं हो पा रहा है।

क्या कारण है कि ''व्याख्यात्मक प्रचार'' इतना अधिक तुलनात्मक रूप में प्रसिद्ध हो गया? इसके अनेक कारण हैं। पहला, ऐसा प्रचार करने से प्रचार का स्तर बढ जाता है। बाईबल की किसी पुस्तक को लगातार समझाने से, ऐसा समझा जाता है कि, लोगों को बहुत विस्तार व बुद्धिमता पूर्ण तरीके से जो उन्हें समझ में आ जाये और कुछ सीखने को भी मिले, ऐसा प्रचार करना अधिक अच्छा है। प्रचारको को लगातार कहीं से पदों को खोजना नहीं पडता है - क्योंकि एक अध्याय लेने पर वह संपूर्ण अध्याय प्रचारक भी जानता है और मंडली भी जानती है। ये कारण जवान प्रचारकों द्वारा बहुत पसंद किये जाते हैं और वे इसी तरीके का प्रचार करते हैं। इसका कारण यह है कि जब बडी सभायें या सम्मेलन होते हैं तो जाने माने प्रचारक मूलत: एक अध्याय का कुछ भाग बोलने के लिये चुन लेते हैं; और ये छपे हुये कागज इन नये प्रचारकों को मिल जाते हैं और वे भी इसे प्रचार का उत्तम तरीका समझ कर स्वयं भी ऐसा ही प्रचार आरंभ कर देते हैं। इन छपे हुये संदेशों की बात तो ठीक है, स्वयं इसे छपवाने वाले पब्लिशर्स भी इसी तरह का ''व्याख्यात्मक'' प्रचार पसंद करते हैं क्योंकि यह आधुनिक जमाने में बडी प्रसिद्धी पा रहा है!१

हमारे मतानुसार, अब, यह समय है कि इस व्याख्यात्मक प्रचार की भी कुछ हानियों का वर्णन करना आवश्यक है:

१.  यह माना जाता है कि सभी प्रचारक इस प्रकार का प्रभावशाली संदेश बनाने में कुशल होते हैं। किंतु हर मनुष्य के पास अलग अलग वरदान होते हैं। स्पर्जन ऐसे ''व्याख्यात्मक प्रचार'' से अपरिचित था जब वह अपने जवानी के दिनों में ऐसे संदेश सुनता तो कभी कभी उसकी इच्छा होती कि इब्री लोगों को ये पत्रियां उन तक ही सीमित रखनी चाहिये, और उसने यह निर्णय लिया कि यह प्रचार का तरीका उसको मिले वरदानों के उपयुक्त नहीं है। एक प्रभावशाली ''व्याख्यात्मक'' प्रचारक कहलाना कोई आम वरदान नहीं है जैसा कुछ लोग सोचते हैं। यहां तक कि डॉ.ल्यॉड - जोन्स भी २० वर्ष पहले सेवकाई में थे किंतु उन्होंने बहुत धीमे धीमें ''व्याख्यात्मक'' क्रम को प्रचार में लाना आरंभ किया।

२.  यह बहस कि ''व्याख्यात्मक'' तरीका सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि इसमें बाईबल से अधिक से अधिक सामग्री लेकर समझाया जा सकता है क्योंकि यह प्रचार का उददेश्य भी है कि जितना संभव हो उतना अधिक प्रचार किया जाये। किंतु इस विचार को चुनौती देने की आवश्यकता है। प्रचार निर्देश दिये जाने से बढकर होना चाहिये। प्रचार से लोगों के मन छिदने चाहिये, वह जागना चाहिये, और पुरूष व महिला को इतना अधिक प्रेरित करें कि वे इस जगत में चमकें और धर्मशास्त्र के नियमित विद्यार्थी कहलायें। अगर प्रचारक अपने कार्य को प्रारंभिक रीति से निर्देश देने के रूप में लेता है बजाय उन्हें प्रेरित करने के, तो यह संदेश, अधिकतर हाथों में, एक प्रकार की साप्ताहिक ''कक्षा'' बन जाती है - अपने आप में ही यह खत्म हो जाती है। परन्तु सच्चा प्रचार तो एक ज्वाला के रूप में निरंतर चलने वाली प्रकिया को ईंधन देता है।

३.  महत्वपूर्ण रूप से चर्चेस - विशेषकर स्कॉटलैंड - के चर्चेस ने “संदेश” व “व्याख्यान” के अंतर को पहचाना। ''व्याख्यान'' का प्रयोग अतर्कपूर्ण रूप से नहीं किया जाता था इसका साधारण सा अर्थ था कि यह ''व्याख्यात्मक प्रचार'' से ही संबंधित था जिसमें किसी किताब या उद्धरण को निरंतर पढाना सम्मिलित था। ब्राटन प्लेस के जॉन ब्राउन, एडिनबर्ग, का प्रचार इसी तरह उपजा। ल्यॉड - जोन्स का रोमियों के उपर कार्य भी इसी प्रकार का था - उन्होंने इसे व्याख्यात्मक ''व्याख्यान'' का नाम दिया; व्याख्यान व संदेश के बीच अंतर के बारे में उनका यह मत था, कि संदेश संपूर्ण होता है, एक भिन्न संदेश होता है - जो स्वयं में पर्याप्त है - जबकि किसी उद्धरण पर व्याख्यान किसी बडे भाग का एक हिस्सा होना कहलाता है यह निरंतर चलता रहता है। रोमियों से अलग हटकर, ल्यॉड - जोंस ने इफिसियों के उपर विषय सामग्री को संदेश में ढाला, कोई भी उनके इन दोनों तरीकों में अंतर देख सकता था (पहला शुक्रवार रात को किया गया प्रचार था, दूसरा रविवार की सुबह का प्रचार था) किंतु दोनों समय के प्रचार में अंतर स्पष्ट था। इसका तात्पय्र रोमियों के उपर किये गये प्रचार को कम आंकना नहीं था, क्योंकि उददेश्य अलग हो सकता था।

४.  दिन के समाप्त होने पर, सबसे उत्तम प्रचार वह प्रचार माना जाता है जो सुनने वाले की सबसे अधिक सहायता करे, और इसके तारतम्य में निरंतर ''व्याख्यात्मक'' प्रचार का तरीका बिल्कुल आकर्षक नहीं होता है। लंबे समय तक यह कभी प्रसिद्ध नहीं होता, और इसका कारण यह है जैसा मैं सोचता हूं, यह स्पष्ट है कि : संदेश को धर्मशास्त्र से एक उद्धरण की आवश्यकता होती है ताकि वह एक यादगार संदेश सुन सके। यह उद्धरण सुनने वाले के दिमाग में दूसरा सब कुछ भूल जाने के बाद भी याद रहता है। कभी कभी, यह सच है कि, धर्मशास्त्र का एक पेराग्राफ भी आयत के स्थान पर लिया जा सकता है- सुसमाचारों में से कोई कहानी या घटना, उदाहरण के लिये जैसा ''व्याख्यात्मक प्रचार'' में होता है, जो आयतों का क्रम होता है और यह क्रम इसे ''पेराग्राफ'' बना देती है, तब विचारों की पूरी कडी इसे संदेश में बदल देती है, और दूसरे सारे सबक को अलग कर देती है (जैसे आप स्पर्जन के संदेशों में देख सकते हैं) कि अन्य अर्थ खो जाते हैं। प्रचारक एक व्याख्याकार बन कर रह गया है। कभी कभी तो वह धर्मशास्त्र में से उद्धरण या आयतें भी नहीं लेता जो वह लेना चाहता है। परन्तु लोगों को अक्सर कुछ न कुछ सहायता मिल जाती है, और बल्कि इससे अच्छी मदद मिल जाती है, धर्मशास्त्र के एक ही भाग से पढने से। परन्तु, यह कहा जा सकता है कि, ''क्या ल्यॉड जोंस का इफिसियों पर प्रचार व्याख्यात्मक और संदेशात्मक दोनों नहीं था? वह एक बार कुछ विचारों को प्रस्तुत करते हैं, और फिर निरंतर क्रम से आगे बढते हैं - ऐसा अन्य प्रचारक क्यों नही कर सकते?'' इसका उत्तर यह है कि ल्यॉड - जोंस इफिसियों पर प्रचार में व्याख्यात्मक व संदेशात्मक दोनों रूपों में प्रचार कर पाये, परन्तु इस प्रकार के प्रचार का वरदान अधिकतर प्रचारकों को नहीं होता। कई नौसिखयों ने एक के बाद एक आयतें समझाना आरंभ करते हुये धर्मशास्त्र की बडी पुस्तकें में से व्याख्यात्मक प्रचार शुरू किया है। उसके परिणाम बडे घातक रहे। इसलिये यह बहस का विषय है कि क्यों ''सुधारवादी'' प्रचार, एक से अधिक स्थान पर, ''भारी'' या ''रूखा'' कहकर उसकी आलोचना की जाती है। जो कम महत्वाकांक्षी होते हैं, जो ''व्याख्यात्मक'' प्रचार का तरीका अपनाते हैं, वे संपूर्ण भाग में एक आयत लेकर प्रचार करने का प्रयास नहीं करते हैं, और यही खतरा है जो आसानी से प्रचार को क्रमवत टिप्पणयों में बदल देता है।

५.  सुसमाचार प्रचार ''व्याख्यात्मक प्रचार'' के तरीके से नहीं किया जा सकता; वास्तव में‚ जहां ''व्याख्यात्मक'' का विशेष प्रयोग होता है, सच्चा सुसमाचार प्रचार जो मन व विवेक को निकट होता है वह खो जाता है। यह कहा जा सकता है कि अगर ऐसा होता है तो यह मनुष्य की गलती से होता है, न कि बाईबल के भाग से, क्योंकि क्या समस्त धर्मशास्त्र खोये हुये की आत्मा को जगाने के लिये उपयोग में नहीं लाया जाना है? निश्चत ही,यह आपत्तिपूर्ण है, समस्त धर्मशास्त्र परमेश्वर की आत्मा की सहायता से खोये हुये को जगाने के लिये और लोगों के लाभ के लिये नहीं होना चाहिये? यह हो सकता है, किंतु धर्मशास्त्र से यह स्पष्ट है कि कुछ खास सत्य है जो गैर विश्वासियों से बोलने के लिये काम में लाये गये है उदाहरण के लिये (प्रभु की गवाही देना) और यही वे सत्य हैं, और बाईबल के पद हैं जो उत्तम प्रतीक है, जिसको सुसमाचार प्रचार में विशेष व नियमित सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। जिन मनुष्यों ने पिछले समय में इन आयतों का प्रयोग पापियों के मन परिवर्तन के लिये किया वे है − वाईटफील्ड, मैकेने, स्पर्जन, ल्यॉड - जोंस और ऐसे अन्य और भी है। आज यह खतरा पैदा हो रहा है कि इस प्रकार का प्रचार भुला दिया गया है। आपने यह संदेश कब सुना था ''अगर मनुष्य सब कुछ प्राप्त करे और अपनी आत्मा को खो दे तो उसे क्या लाभ होगा?''


यह बहस की बात नहीं है कि धर्मशास्त्र के उद्धरण का नियमित क्रमवार प्रचार गलत है, साधारण सी बात है कि पुलपिट मिनिस्ट्री में इसे विशेष स्थान नहीं दिया जाना चाहिये। प्रत्येक प्रचारक को यह खोजना चाहिये कि वह कितना उत्तम प्रचार कर सकता है, और इसे वह हमेशा स्मरण रखे, जिस भी तरीके से वह सत्य का प्रचार कर रहा हो, इस समय विश्वास और पवित्र आत्मा से भरे हुये प्रचारकों की बहुत आवश्यकता है। सही शिक्षा प्रदान करना आवश्यक है: हमें ऐसे संदेशों की आवश्यकता है जो मंडलियों को द्रवित कर दे और बाहर के समाजों को भी संदेश दे।

उपरोक्त निष्कर्ष कोई उपन्यास नहीं है‚ मैं पिछली शताब्दी के महानतम प्रचारकों में से एक आर. बी. कूपर के विचारों के साथ इस संदेश का अंत करूंगा। उनके आत्म कथाकार ने संकेत दिया कि उन्होंने जो संदेश धर्मशास्त्र में से एक आयत लेकर प्रचार किये जाते हैं उसे ''व्याख्यात्मक'' प्रचार शब्द नाम देने से इंकार कर दिया। उनके अनुसार यह शब्द समस्त धर्मशास्त्र के उस व्याख्यात्मक प्रचार पर प्रयोग करना चाहिये जो इस नाम के योग्य हैं। वह निरंतर कहते हैं:

''ऐसा लगता है कि व्याख्यात्मक प्रचार की वैद्य रूप मे अनुशंसा करना गंभीर त्रुटि है। न ही यह संतोषजनक है कि कई परंपरावादियों क तरीके से, व्याख्यात्मक प्रचार को बढावा दिया जाये। समस्त प्रचार व्याख्यात्मक होना चाहिये.....वह सभी के आम वक्तव्य पर आपत्ति दर्ज करते थे कि धर्मशास्त्र से लिये गये एक भाग एक अध्याय: शायद के प्रचार को व्याख्यात्मक प्रचार कहा जाये। कूपर के अनुसार, क्रमवार टीकाओं में कुछ विशेष त्रुटियां होती है। वर्णन सतही होते हैं, क्योंकि उसमें बहुत सी सामग्री लेना है। और ऐसे संदेशों में एकता की कमी होती है, और सुनने वालों को यह स्पष्ट पता नहीं चल पाता है कि यह संदेश किस बारे में है।”२

प्रचार को जो भी तरीका प्रचारक अपनाता है, कूपर के निम्न शब्द सब पर लागू होते हैं:

''एक साधारण.....किंतु ओजपूर्वक दिया गया संदेश सम्मान और प्रतिकिया दोनों लाता है। उत्साह प्रेरित करता है। तर्क राजी करवाता है,- त्रुटिपूर्ण तर्क उलझन में डाल देता है। प्रचारक के रूप में हमारे पास दिल होना चाहिये। हम हमारे दर्शकों को थकाना बंद कर दें। हमारे प्रचार को इतना रूचिकर बनाये कि लोग उसमें डूब जायें और बच्चे भी उसे सुनें बजाय चित्र बनाने के और अपने पेंसिल कागज देने वाले माता पिता को शर्मिंदा कर दें। किंतु हमें हमारे दिमागों को तैयार करना होगा कि ऐसे प्रचार को तैयार करना बडा पीडादायक अनुभव होता है।” ३

पाद टिप्पणी

१. मैं इसे आवश्यक रूप से निम्न नहीं समझ रहा हूं। ''व्याख्यात्मक'' प्रचार छपे हुये पेज पर ही अच्छा लगता है, किंतु यह विचार करना खतरनाक है कि पढने और सुनने वालों के लिये क्या उत्तम है। पढना और सुनना दो अलग अलग चीजें हैं।

२. एडवर्ड हीरेमा, आर.बी., ए प्राफेट इन दि लैंड (जॉर्डन स्टेशन, ओंटेरियो पैया, १९८६) पेज १३८−९

३. संदर्भ, पेज २०४


रूपरेखा

तीसरा मार्ग − संकट में परिवर्तन

द्वारा डॉ.आर.एल.हिमर्स

“फिर उस ने कहा किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो वह मुझे दे दीजिये। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी। और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकटठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उडा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका तो उस देश में बडा अकाल पडा और वह कंगाल हो गया। और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पडा उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा। और वह चाहता था कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे और उसे कोई कुछ नहीं देता था। जब वह अपने आपे में आया तब कहने लगा कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं। मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाउंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाउं मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।” (लूका १५˸११−१९)

(यूहन्ना ५˸३९‚ ४०; लूका १५˸१७; २ तीमुथियस ३:१५; इफिसियो २˸८;
प्रेरितो के काम१६˸३१)

१. प्रथम, ''संकट के समय परिवर्तन'' वाले तरीके में पहले मनुष्य का ''भ्रष्ट'' होना प्रगट हुआ है‚ लूका १५˸१३; यशायाह ५३˸३; रोमियों ८˸७; इफिसियो २˸१; रोमियों ३˸९; यशायाह १˸५‚६; लूका १५˸१५‚१६; इफिसियो २˸२‚५; लूका १५˸२४ ।

२. दूसरा, यहां पापी का अपनी उलझनों से निकलकर ''जागने'' का वर्णन है,
यह ''संकट के समय परिवर्तन'' होने के तीसरे रास्ते में प्रगट हुआ है
लूका १५˸१७; इफिसियो ५˸१४; रोमियों १०˸१४; लूका १३˸२४;
रोमियों ३˸२०; लूका १५˸१७−१८ ।